पिछले कुछ महीनों से लद्दाख में पूर्ण राज्य बनाने की मांग को लेकर अनशन चल रहे हैं पहले लद्दाख के लोगों ने लद्दाख के मैदानों में माइनस डिग्री ठण्ड में बैठकर अनशन किया, हजारों की तादाद में लोगों ने रैली निकाली। इसके बाद एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के द्वारा 21 दिन तक भूख हड़ताल की गई। सोनम वांगचुक के द्वारा अनशन खत्म होने के दूसरे दिन ही लद्दाख की महिलाओं के द्वारा इस अनशन को जारी किया जा रहा है। इन महिलाओं का कहना है कि ‘जब तक लद्दाख को सरकार पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं देती तब तक वह इस अनशन को जारी रखेंगे। लेह के एनडीएस मेमोरियल पार्क में यह सारे अनशन किये जा रहे हैं। इन 70 महिलाओं के अनशन में लेह की तमाम महिलाएं इसकी हिस्सेदार बन रही हैं रोजाना लद्दाख की 400-500 महिलाएं इस अनशन में शामिल हो रही हैं। यह अनशन 10 जारी रखा जाएगा इसके बाद इन महिलाओं के द्वारा लेह के शीर्ष निकाय के बैनर तले एलएसी के पास चांगथांग की ओर बॉर्डर मार्च या पश्मीना मार्च किया जाएगा। इस बॉर्डर मार्च में यह बताने की कोशिश उन हिस्सों को हाईलाइट किया जाएगा जिस पर चीन ने कब्जा कर लिया है। इस मार्च में 10,000 लोगों के शामिल होने की उम्मीद है।
अनशन में शामिल लोग
अनशन में शामिल एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी नोरजिन एंग्मो ने एक इंटरव्यू में बताया कि ‘मैं अपने बच्चों और पोते-पोतियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए भूख हड़ताल पर बैठी हूं। हम विकास के नाम पर लद्दाख के पर्यावरण को खराब होते नहीं देख सकते। यहां 20 साल पहले, नदियां इतनी साफ थीं कि हम सीधे पानी पीते थे, पर आज अत्यधिक प्रदूषित हैं। हमें उनकी रक्षा की जरूरत है।’ इस प्रदर्शन में इन सभी महिलाओं के पास वह कारजात मौजूद हैं जिनमे बीजेपी सरकार ने वर्ष 2019 में लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने का वादा किया है।
सोनम वांगचुक
अपनी 21 दिनों की भूख हड़ताल खत्म करने के बाद सोनम वांगचुक कहते हैं कि ‘यह आंदोलन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। हम सभी लोग बारी-बारी आंदोलन करते रहेंगे। पहले हमने मार्च निकाली फिर हमने भूख हड़ताल की अब हमारी बहनों ने इस मोर्चे को संभाला है। हम तब तक इस आंदोलन को जारी रखेंगे जब तक हमारी मांगें और सरकार के द्वारा किये गए वादों को पूरा नहीं किया जायेगा।
कब शुरू हुआ आंदोलन
केंद्र सरकार के द्वारा 5 अगस्त वर्ष 2019 को जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाकर पूर्ण राज्य का दर्जा ख़तम कर दिया गया था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बन गया। लेह और कारगिल को मिलाकर लद्दाख एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बना। लद्दाख के पास खुद की विधानसभा भी नहीं मिली जिसके कारण लेह और कारगिल के लोग खुद को राजनीतिक तौर पर बेदखल महसूस करने लगे। उन्होंने केंद्र के खिलाफ आवाज उठाई। बीते दो साल में लोगों ने कई बार विरोध-प्रदर्शन कर पूर्ण राज्य का दर्जा और संवैधानिक सुरक्षा मांगते रहे, लेकिन इस पर सरकार की कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई। धारा 370 हटने के बाद से ही लद्दाख के लोगों की न जमीन रही, न नौकरियां और न ही अलग पहचान। अपना हक वापस पाने के लिए ही लद्दाख की लोग लगातार आंदोलन कर रहे हैं।
केंद्र ने नहीं मानी लद्दाख की मांगें
इस साल की शुरुआत में बौद्ध बहुल लेह और मुस्लिम बहुल कारगिल के नेताओं ने लेह स्थित एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस के बैनर तले हाथ मिलाया। इसके बाद लद्दाख में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन और भूख हड़ताल होने लगीं। केंद्र ने मांगों पर विचार करने के लिए एक हाई लेवल कमेटी का गठन किया गया है, हालांकि, प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत सफल नहीं हुई। 4 मार्च को लद्दाख के नेताओं ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और बताया कि केंद्र ने मांगें मानने से इनकार दिया है। इसके दो दिन बाद वांगचुक ने लेह में अनशन शुरू किया था।
लगाए जा रहे कयास
4 साल पहले यानी वर्ष 2019 में धारा 370 को हटाया गया था, लेकिन अब कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार चुनाव से पहले आर्टिकल 371 को लागू कर सकते हैं। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर 24 फरवरी को केंद्र सरकार के साथ प्रदर्शनकारियों की चौथी बार बैठक में सरकार ने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने से इनकार कर दिया। 4 मार्च को लद्दाख के दो प्रमुख संगठन लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ गृह मंत्रालय की बैठक की गई थी।

