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मराठा आरक्षण आंदोलन हुआ शांत ; क्या है इतिहास

पिछले कुछ महीनों से महाराष्ट्र का मराठा आरक्षण आंदोलन सुर्ख़ियों में था जो 27 जनवरी को शांत हो गया है। महाराष्ट्र के इन आंदोलनकर्ताओं की मांग थी कि मराठा जाति के पिछड़ेपन को देखते हुए इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर दिया जाए। इस आंदोलन में ठहराव तब आया जब मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रमुख नेता म​​​नोज जरांगे से मुंबई में मुलाकात की और जिसके बाद शिंदे सरकार ने आंदोलनकारियों की सभी मांगें मान ली।

 

मुख्यमंत्री शिंदे ने जरांगे को उनकी मांगे स्वीकार किये जाने का पत्र भेजा जिसे स्वीकार करते हुए जारांगे ने कहा कि “मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अच्छा काम किया है। हमारा विरोध अब खत्म हो गया है। हमारा अनुरोध स्वीकार कर लिया गया है।” शिंदे ने जरांगे को जूस पिलाकर उनका आंदोलन खत्म करवाया और उनकी विभिन्न मांगों के संबंध में एक मसौदा अध्यादेश उन्हें सौंपा। आंदोलन कर रहे मराठाओं का कहना कहना है कि मराठा बिरादरी को कुनबी उपजाति का प्रमाण पत्र दिया जाए और उन्हें भी अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल कर आरक्षण दिया जाये। आंदोलन कर्ताओं का कहना है कि वो 54 लाख मराठा जिनके रिकॉर्ड सरकार के पास हैं उन्हें कुनबी उपजाति का प्रमाणपत्र दे दिया जाए। जिनके पास रिकॉर्ड नहीं हैं उन्हें शपथ पत्र लिखकर दिया जाए।

 

क्या है इसका इतिहास

 

मराठाओं के इतिहास की बात करें तो प्राचीन काल से मराठों को योद्धा जाति माना जाता था। इतिहास को देखें तो मराठा कोई जाति नहीं है बल्कि कई जातियों का समूह है। जिसमें मराठा , कुनबी व कुलवाड़ी शामिल हैं। कई जिलों में कुनबी और मराठा को एक ही जाति का माना जाता था। लेकिन वर्ष 1901 की जनगणना के आधार पर मराठा-कुनबी के बीच 3 जातियां मानी गयी। जिसमें मराठा , कुनबी और कोंकणी मराठा शामिल थे। मराठा अपने आपको क्षत्रिय बिरादरी से जोड़ते हैं। मराठाओं को परिभाषित करते हुए कहा गया कि इसमें सभी गैर ब्राह्मण जातियां शामिल हैं। लेकिन कुछ समय बाद अमीर खेतिहर तबके भी खुद को मराठा कहना कहने लगे जिसके परिणामस्वरूप पिछड़े और गरीब तबके के रूप में कुनबी जाति ही रह गयी। जिसका मराठाओं ने शुरुआत से ही विरोध किया है।

 

आरक्षण की मांग शुरू हुई

 

कुनबी समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल करने के बाद से मार्ताओं द्वारा कई बार आरक्षण की मांग उठाई जा चुकी है। वर्ष 1919 में कोल्हापुर के शाहूजी महाराज ने मराठाओं के लिए अलग प्रतिनिधित्व की मांग करते हुए मांटेग्यू चेम्सफोर्ड आयोग को लिखा कि कारोबार या शिक्षा से जुड़ा समुदाय न होने के कारण मराठा एक पिछड़ा वर्ग है जिनकी स्थिति बहुत ख़राब है।
इतिहास पर भी नजर डालें तो पता चलता है कि ब्रिटिश शासन काल से ही मराठा सत्ता से जुड़े रहे और ताकतवर रहे। लेकिन जो मराठा खेती का काम करते थे ख़राब ही रही। आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में मराठाओं की कुल आबादी लगभग 33 प्रतिशत है। जिसमें से लगभग 90 प्रतिशत मराठा खेतिहर मजदूर या गरीब वर्ग के हैं। यही कारण आये दिन मराठा आरक्षण की मांग उठती रहती है। महाराष्ट्र में खुदखुशी करने वाले किसानों में भी मराठाओं की संख्या अधिक है।

इसके बाद वर्ष 1990 के दशक में जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने पर महाराष्ट्र सरकार ने कुनबी जाति को ही अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया। जिसके आधार पर केवल इसी समुदाय को आरक्षण भी प्राप्त हुए। जिसके बाद मराठाओं ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि मराठा और कुनबी जाति एक ही है। यह मुद्दा कई बार में भी उठाया गया जहाँ उन्हें कोई सफलता हासिल नहीं हुई।

 

साल 2009 में मराठा आरक्षण संघर्ष समिति की स्थापना की गयी जिसमें कुल 18 संगठन शामिल थे। इस समिति का उद्देश्य सिर्फ मराठा समुदाय को पिछड़ा वर्ग में शामिल करवाना है जिसके माध्यम से मरठा भी शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ उठा सकें। साल 2014 में मरठाओं की मांग को स्वीकार करते हुए महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार ने मराठाओं को 16 प्रतिशत आरक्षण को प्रदान कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप महाराष्ट्र में आरक्षण की सीमा बढ़कर 73 प्रतिशत तक पहुँच गयी। जिसके विरोध में अन्य जातियों ने आवाज उठानी शुरू कर दी। सरकार के इस फैसले के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। जिसपर फैला सुनते हुए सरकार द्वारा लागू किये गए मराठा आरक्षण ख़ारिज कर दिया गया।

इसके बाद साल 2018 में एक बार फिर महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने मराठाओं को 16 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित किया। लेकिन साल 2019 में मुंबई हाईकोर्ट ने इस पर भी रोक लगा दी। मुंबई हाईकोर्ट के इस फैसले विरोध में महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाये। जिसपर फैसला सुनाते हुए मई 2021 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की खंडपीठ ने मराठा आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया। जिसके बाद से अब तक यह मराठा आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है।

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