वर्तमान लोकसभा का कार्यकाल अब अपने अंतिम वर्ष में प्रवेश कर चुका है। ऐसे में राज्य की प्रतिष्ठित नैनीताल-ऊधमसिंह नगर संसदीय क्षेत्र की जनता का अपने सांसद अजय भट्ट के प्रति चौतरफा व्याप्त आक्रोश का बड़ा असर 2024 के आम चुनाव में देखने को मिल सकता है। हालात वर्तमान सांसद के लिए इतने प्रतिकूल हैं कि भाजपा कार्यकर्ता तक उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री मोदी के नाम सहारे चुनाव जीतने की बात खुलकर कहने से गुरेज नहीं कर रहे हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल का अंतिम बजट संसद में पेश किया जा चुका है। हालांकि अभी 18वीं लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने में लगभग 15 महीनों का समय शेष है लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने स्तर से चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं। अन्य दलों की बनिस्पत भाजपा में सबसे ज्यादा हलचल नजर आने लगी है। गुजरात विधानसभा चुनावों में शानदार जीत और हिमाचल प्रदेश की हार के बाद भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व 2024 में प्रस्तावित आम चुनाव के लिए कमर कसने की कवायद शुरू कर चुका है। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की गत पखवाड़े संपन्न बैठक के बाद स्पष्ट है कि आने वाले समय में दस राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ ही 2024 के लोकसभा चुनावों की तैयारी भी भाजपा ने शुरू कर दी है। इस राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकली ध्वनि से स्पष्ट है कि राज्यों के विधानसभा और देश की लोकसभा के चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और उनकी लोकप्रियता के सहारे ही लड़े जाएंगे। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मजबूत नेता की छवि के चलते कई ऐसे राज्यों में भी भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया है जहां उसका प्रादेशिक नेतृत्व और संगठन कमजोर था।
उत्तराखण्ड ने 2014, 2019 के लोकसभा चुनावों और 2017, 2022 के विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि या फिर मोदी लहर के चलते कई नेताओं के चुनावी वैतरणी पार करते देखा। यह मोदी की छवि और समय रहते राज्य में नेतृत्व परिवर्तन कर युवा नेता पुष्कर सिंह धामी की ताजपोशी का ही कमाल था कि सारे मिथकों को तोड़ते हुए 2022 में भाजपा राज्य की सत्ता में दोबारा कायम हो गई हालांकि पहले की अपेक्षा उसे 12 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था। अब जब उत्तराखण्ड से चुने गये लोकसभा के सांसदों का कार्यकाल पांचवे वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है तो बीते चार बरस का लेखा-जोखा परख आगामी लोकसभा चुनाव में उनकी स्थिति का आकलन कर जमीनी हकीकत से रूबरू हुआ जा सकता है।
उत्तराखण्ड राज्य बनने से पूर्व या उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद हुए लोकसभा चुनावों की बात करें तो कभी उत्तराखण्ड में मजबूत रही कांग्रेस के किले में समय-समय पर सेंध लगती रही है और पिछले दो लोकसभा चुनावों में तो भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस को चुनावी मैदान से बिल्कुल बाहर धकेल दिया है। लेकिन ये जीत भारतीय जनता पार्टी की कम नरेंद्र मोदी की छवि की जीत ज्यादा है। इन्हीं जीत-हार की चर्चाओं के बीच उत्तराखण्ड से चुने गए सांसदों के कार्यकाल पर नजर डालने की कोशिश करते हैं तो तस्वीर का दूसरा पहलू कुछ और ही है। उत्तराखण्ड में 2014 के लोकसभा चुनावों में हरिद्वार से डॉ ़ रमेश पोखरियाल ‘निशंक, टिहरी से माला राज्यलक्ष्मी शाह, पौड़ी से भुवन चन्द्र खण्डूड़ी, नैनीताल -ऊधमसिंह नगर से भगत सिंह कोश्यारी और अल्मोड़ा से अजय टम्टा चुने गये। वहीं 2019 के लोकसभा चुनावों में भगत सिंह कोश्यारी के लोकसभा चुनाव लड़ने से इनकार के बाद भाजपा ने अजय भट्ट को अपना प्रत्याशी बनाया जिन्होंने भारी बहुमत से कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत को पराजित किया। बाकी संसदीय सीटों पर हरिद्वार से निशंक, टिहरी से राज्यलक्ष्मी शाह, पौड़ी से तीरथ सिंह रावत और अल्मोड़ा से अजय टम्टा चुनाव जीते।
इन चुने गये सांसदों के कार्यकाल की पड़ताल उनकी उपलब्धियों, असफलताओं का जायजा लेने से पता चलता है कि लहरों सहारे जीते गये चुनाव किस तरह जन अपेक्षाओं संग खिलवाड़ और विकास की गति में ठहराव पैदा कर देते हैं। कुछ ऐसी ही अद्योगति का शिकार नैनीताल-ऊधमसिंह नगर संसदीय क्षेत्र है जहां से वर्तमान सांसद अजय भट्ट केंद्र सरकार में रक्षा एवं पर्यटन राज्यमंत्री भी हैं। पहाड़ तथा एक बड़ा हिस्सा तराई का समेटे यह संसदीय क्षेत्र ऊधमसिंह नगर की जसपुर, काशीपुर, बाजपुर, गदरपुर किच्छा, रूद्रपुर, सितारगंज, नानकमत्ता, खटीमा और नैनीताल जिले की नैनीताल, भीमताल, लालकुआं, हल्द्वानी, कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्रों से मिलकर बना है। जिन अपेक्षाओं के साथ 2019 में जनता ने जिन्हें अपना सांसद चुना था क्या वे जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं? इन सवालों के प्रत्युत्तर में जनता द्वारा सवाल दागने से जाहिर होता है कि सतह पर भले ही सब अच्छा दिख रहा हो लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल इसके उलट है। सुदूर ब्लॉक बेतालघाट से जसपुर और धानाचूली से खटीमा तक लोगों को लगता है कि विकास के नाम पर खाली हाथ हैं। ऊधमसिंह नगर-नैनीताल संसदीय क्षेत्र के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के सहारे जीत कर आने वाले सांसद क्या आज इस स्थिति में हैं कि वे अपने कामों के नाम पर जनता के बीच वोट मांगने जा सकते हैं? जमीनी हालात जो इशारा करते हैं उसका उत्तर नहीं में ही है। 2019 के लोकसभा चुनावों में अजय भट्ट की जीत की एकमात्र वजह मोदी लहर ही थी।
नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ रहा है और भारतीय जनता पार्टी यहां से जब भी जीती है उसे किसी न किसी लहर ने ही पार लगाया है। 1991 का लोकसभा चुनाव बलराज पासी ने राम लहर के चलते जीता था। 1998 में इला पंत भी अटल बिहारी वाजपेयी के भरोसे चुनाव जीती थीं। 2014 और 2019 के चुनाव मोदी लहर के नाम रहे। इस संसदीय क्षेत्र में जब भी लहरविहीन चुनाव हुआ है भाजपा हमेशा चुनाव हारती रही है। जहां तक वर्तमान सांसद अजय भट्ट का प्रश्न है भले ही वे उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे हों या फिर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष लेकिन उनकी गिनती बड़े जनाधार वाले नेताओं में नहीं होती। अपने को प्रदेश में सर्वमान्य बनाने के कई अवसरों को उन्होंने गंवाया है। ऊधमसिंह नगर-नैनीताल के सांसद के रूप में उनका कार्यकाल बहुत उम्मीद नहीं जगाता। केंद्रीय मंत्री के रूप में उनके कार्यों का आकलन भाजपा के पक्ष में जाता नजर नहीं आ रहा है।
ऊधमसिंह नगर की राजनीतिक नब्ज को जानने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि ‘विकास के दावे सिर्फ दावों तक ही सिमट कर रह गए हैं। विकास के नाम पर सांसद के नाम का एक शिलापट्ट ढूंढ पाना मुश्किल है। उनका चार साल का कार्यकाल पूरा होने को है लेकिन रामपुर-रूद्रपुर, काठगोदाम राष्ट्रीय राजमार्ग आज तक अधूरा पड़ा है। सांसद के रूप में अजय भट्ट की यात्राओं का फोकस रूद्रपुर, काशीपुर जैसे महानगर ही हैं, छोटे कस्बों में तो उनका संपर्क नगण्य है।’ खटीमा के बहादुर सिंह राणा कहते हैं कि ‘सांसद का सिर्फ नाम सुना है उनके द्वारा किए गये कार्यों की उनको कोई जानकारी नहीं है।’ ऊधमसिंह नगर के वृहद भ्रमण के दौरान ‘दि संडे पोस्ट’ की टीम ने पाया कि सांसद अजय भट्ट के नाम पर लोगों में सकारात्मक भाव नदारद था। जसपुर में भाजपा से ही जुड़े एक कार्यकर्ता का कहना था कि ‘हमारे सांसद ने क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय कार्य किया हो ऐसा नजर नहीं आता। जसपुर की आर्थिकी की जान कताई मिलों की दुर्दशा पर उनका ध्यान आज तक नहीं गया। हम नरेंद्र मोदी के लिए कार्य करते हैं और करेंगे, केवल मोदी के नाम पर ही हमें वोट मिल सकते हैं अन्यथा सांसद को आगे कर चुनाव लड़ेंगे तो पार्टी का हश्र हम जानते हैं।’
खटीमा, सितारगंज, नानकमत्ता, रूद्रपुर, जसपुर, बाजपुर, काशीपुर के सुदूर इलाकों में कई लोग अपने सांसद अजय भट्ट के चेहरे से वाकिफ ही नहीं हैं। नानकमत्ता के निकट के एक गांव के सरदार सुखविंदर सिंह का कहना है कि ‘केंद्रीय मंत्री के बतौर अजय भट्ट का नाम जरूर सुना है उनके द्वारा क्षेत्र के लिए किए गये विकास कार्यों की तो कोई जानकारी हमें नहीं है।’ नैनीताल जिले के सुदूरवर्ती क्षेत्र ब्लॉक बेतालघाट के एक पूर्व जिला पंचायत सदस्य, जो भाजपा से ही जुड़े हैं, का कहना है कि उनके क्षेत्र में सांसद अजय भट्ट के कार्यों को ढूंढ पाना मुश्किल है। क्षेत्र के प्रति सांसद की उदासीनता चलते ही बेतालघाट में उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा था। भाजपा से ही जुड़े एक पूर्व पदाधिकारी कहते हैं कि ‘राजनीतिक जीवन से जुड़े और जो खासकर किसी जिम्मेदार पद पर हों के लिए ‘व’ शब्द का बहुत महत्व है। ‘वाणी’ और ‘विकास’ का समन्वय न हो तो
राजनीतिक राह कठिन हो जाती है। आप सिर्फ अपनी वाणी से जनता के समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकते हैं, आपको अपने द्वारा किए गये कार्यों को भी जनता को बताना होगा।’ कांग्रेस से जुड़े वीरेंद्र सिंह का कहना है कि नैनीताल लोकसभा सीट केसी पंत और नारायण दत्त तिवारी सरीखे नेताओं की कर्मभूमि रही है। नारायण दत्त तिवारी द्वारा स्थापित विकास के आयामों के पीछे सब फीका है। वे प्रश्न करते हैं कि ‘नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्व काल के बाद तराई में कितने नये उद्योग आए? कितने नये औद्योगिक संस्थानों की स्थापना हुई?’ इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं।
सिडकुल कर्मचारी यूनियन से जुड़े एक नेता का कहना है ‘रोज-रोज उद्योगों में छंटनी हो रही है लेकिन सांसद को हमारे साथ खड़े होने की फुर्सत नहीं है। ऐसे में हम भविष्य की क्या उम्मीद करें।’ भीमताल विधानसभा क्षेत्र के काठगोदाम हैड़ाखाना मार्ग की दुर्दशा पर अगर स्थानीय जनता अपने सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री का घेराव करने पर बाध्य होती है तो हालातों को आसानी से समझा जा सकता है। विकास खंड कोटबाग के ही एक भाजपा कार्यकर्ता जब कहते हैं कि हमें अपने विधायक बंशीधर भगत के द्वारा किए गये विकास कार्यों की जानकारी तो है मगर सांसद द्वारा किए गये कार्यों का हमें मालूम नहीं है। उनका तो क्षेत्र भ्रमण भी कम होता है। एक भाजपा कार्यकर्ता का ऐसा कथन निश्चित ही सांसद की कार्यशैली और उनकी क्षेत्र में लोकप्रियता पर खासा संदेह पैदा करता है। हल्द्वानी से ही जुड़े कालाढूंगी विधानसभा के ग्राम बेल बसानी के मोहन भट्ट कहते हैं कि ‘विकास की बात छोड़िए हमने अपने सांसद का सिर्फ नाम ही सुना है।’ हल्द्वानी के संबंध में बात करें तो लोग सवाल उठाते हैं कि हल्द्वानी की मूलभूत समस्याओं और अंतर्राजीय बस अड्डे जैसे मुद्दों पर सांसद की खामोशी गुस्सा पैदा करती है।
नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा के राजनीतिक माहौल, भाजपा के अंतर्विरोधों और भाजपा के सामने चुनौतियों का विश्लेषण भी भाजपा के लिए खतरे की घंटी समान है। 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने इस जनपद की नौ में से आठ विधानसभा सीटें जीती थी। 2022 में हुए चुनाव में लेकिन वह मात्र चार सीटों में सिमट कर रह गई। खटीमा से तो स्वयं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को हार का मुंह देखना पड़ा। नैनीताल जिले की पांच सीटों में से चार भाजपा के पास जरूर है लेकिन यहां पर भी भाजपा के अंतर्विरोध किसी से छिपे नहीं हैं। अजय भट्ट के सामने चुनौतियों और मोदी लहर के बाबत बात करने पर भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि ‘एक सांसद के रूप में अजय भट्ट का कार्यकाल उल्लेखनीय नहीं है। 2019 में तो आप नया चेहरा थे लेकिन 2024 में जनता आपके पांच सालों का आकलन भी करेगी। हिमाचल प्रदेश में जयराम ठाकुर की विफलता मोदी के चेहरे पर भारी पड़ी और भाजपा विधानसभा चुनाव हार गई। 2017 में स्वयं अजय भट्ट मोदी लहर के बावजूद रानीखेत विधानसभा से साढ़े चार हजार मतों से हार गए।’
आज से दस साल पहले राजनीतिक मामलों में जनता की याददाश्त कमजोर होती थी क्या याद रखना है, क्या भूल जाना है ये राजनेता ही तय करते थे। चुपचाप बैठी भीड़ नेता को ज्यादा भाती थी लेकिन सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक के युग में अब वे भीड़ अपने नेता से सवाल भी करती है और इन्हीं सवालों से अजय भट्ट को भी रू-ब-रू होना पड़ेगा। पिछले चार सालों में उपलब्धियों के जवाब ढूंढने पर अजय भट्ट की प्रभावशाली राजनीतिक मौजूदगी की तस्दीक नहीं होती, हां नरेंद्र मोदी फैक्टर ने अभी अपना आकर्षण खोया नहीं है। हालांकि लोकसभा के चुनावों में अभी एक साल से अधिक का समय बाकी है ऐसे में सटीक विश्लेषण तो नहीं किया जा सकता लेकिन क्षेत्र की मनोदशा को परखा जरूर जा सकता है। जमीनी हालात बताते हैं कि यदि भाजपा अपने सिटिंग सांसद को ही टिकट देती है तो उसे जनाक्रोश का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के प्रति असीम आकर्षण बरकरार होने के बावजूद स्थानीय प्रतिनिधि का जन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरने चलते पैदा हुआ जनाक्रोश इस संसदीय क्षेत्र में अपने चरम पर स्पष्ट देखा जा सकता है।
पिछले चार सालों में उपलब्धियों के जवाब ढूंढ़ने पर अजय भट्ट की प्रभावशाली राजनीतिक मौजूदगी की तस्दीक नहीं होती, हां नरेंद्र मोदी फैक्टर ने अभी अपना आकर्षण खोया नहीं है। जमीनी हालात बताते हैं कि यदि भाजपा अपने सीटिंग सांसद को ही टिकट देती है तो उसे जनाक्रोश का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के प्रति असीम आकर्षण बरकरार होने के बावजूद स्थानीय प्रतिनिधि का जन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरने के चलते पैदा हुआ जनाक्रोश इस संसदीय क्षेत्र में अपने चरम पर स्पष्ट देखा जा सकता है

