इलाहाबाद कानाम प्रयागराज कर दिया गया। लोग इसे एक सामान्य घटना की तरह ले रहे है। मामला अतीत के प्रति मोह और स्मृतियों से थोड़ा आगे बढ़कर हिन्दू-मुसलमान तक पहुंचा दिया गया है। बिहार में एक पुरानी कहावत है-‘बइठल बनियावा के कौन काम-ई कोठी के धान-चाउर, ऊ कोठी में।’
भले ही अंग्रेजी के महान लेखक शेक्सपीयर ने कहा हो कि नाम में क्या रखा है। हिन्दी के कवि केदारनाथ सिंह भी कहते हैं ‘जहां लिखा है सड़क वहां लिख दो प्यार फर्क नहीं पड़ती।’ मगर नाम में बहुत कुछ रखा है। और फर्क भी पड़ता है। नाम बदलना, नाम रखना नहीं होता है। नाम रखने के विपरीत काम है यह। नाम बदला एक तरह की हिंसा भी है। एक किस्म का विध्वंस। किसी भी सत्ता का तानाशाही रवैया भी इसे कहा जा सकता है। जब किसी व्यक्ति का स्थान कानाम, बदलते है तो आप उसके पहले ‘नाम’ से जुड़ी स्मृतियों के साथ-साथ उसकी संवेदना की हत्या करते हंै। यह ठीक उसी तरह से है जैसे आप किसी बस्ती को मिटाकर ‘टिहरी’ की तरह कहीं और विस्थापित कर दें। उस पुरानी बस्ती का वाशिंदा ताउम्र अपनी स्मृतियों के बदन से रिसते रक्त में ही विकास रक्त में ही विकास को नाक ढूंढता है।
शहर वही है, गली-मोहल्ले वही है, आबोहवा भी वही। उतनी ही धूप। उतनी ही गर्मी। दूरिया भी न बढ़ी है, न घटी है। शहर के उपर उतना ही आसमान। रोज सूरज उगेगा। रातों को आकाश में चांद दिखेगा। लेकिन जिन लोगों ने इलाहाबाद को जिया है, वे जब उस शहर में जायेंगे तो शहर के भीतर एक ‘शव’ की गंध नथुनो में महसूस होगा- कहीं कुछ था जो मर गया, कहीं कुछ है जिसका दुर्र्गंध असहज कर रहा है।
नाम बदलना हमारी संस्कृति, हमारी सोच की अभिव्यक्ति है और उस शासन के शासन का पैमाना भी। समय का पहिया पीछे नहीं लौटता। हमंे पीछे लौटाया जा रहा है जो समय की प्रकृति के खिलाफ है। बाकी तो जो है वह राजनीति है, वोट है, हिन्दू-मुसलमान है और यही सबसे खराब बात है।

