- वृंदा यादव
पड़ोसी देशों संग संबंध प्रगाढ़ करने के उद्देश्य से ‘नेबरहुड फर्स्ट नीति’ पर विशेष जोर दिए जाने की बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद कही थी। वर्तमान में नेपाल, भूटान और श्रीलंका संग हमारे रिश्तों में खटास बढ़ी है। अब मालदीव सत्ता परिवर्तन के बाद चीन के करीब जाता नजर आने लगा है
मालदीव भारत के लिए कूटनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। यहां की सुरक्षा बन ाए रखने में भी भारत ने कई प्रकार से योगदान दिया है और भारत के मालदीव से संबंध दोस्ताना रहे हैं। लेकिन हाल ही में हुए मालदीव राष्ट्रपति के चुनाव में प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) मोहम्मद मुइजू की जीत के बाद समीकरण बलने लगे हैं। क्योंकि मुइजू चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के करीबी माने जाते हैं। चुनाव के दौरान मुइजू ने भारतीय सैनिकों के खिलाफ ‘इंडिया आउट’ का नारा दिया था। उनका कहना है कि भारतीय सैनिक देश की संप्रभुता के लिए खतरा हैं। अब मोहम्मद मुइजू मालदीव के नए राष्ट्रपति का पद ग्रहण करने जा रहे हैं तो उन्हें वहां रहने वाले भारतीय सैनिक खटकने लगे हैं। मुइजू ने ऐलान किया है कि वह मालदीव से भारतीय सैनिकों को हटाएंगे। यहां तक कि चुनाव में अपनी जीत के तुरंत बाद उन्होंने भारतीय सैन्य कर्मियों सहित सभी भारतीय सैनिकों को हटाने की कसम खा कहा कि चुनाव नतीजों ने बता दिया है कि मालदीव के लोग यहां विदेशी सेना की मौजूदगी नहीं चाहते हैं। मैं अपने नागरिकों की इच्छा का सम्मान करूंगा। विदेशी सैनिकों को वापस भेजने की प्रक्रिया जल्द शुरू होगी।
मालदीव में क्यों तैनात हैं भारतीय सैनिक
मालदीव और भारत के बीच पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह के कार्यकाल के दौरान नजदीकियां बढ़ी थी। भारत और चीन दोनों के लिए मालदीव सामरिक और रणनीतिक दोनों ही दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है जिसके लिए भारत न सिर्फ मालदीव में अच्छा निवेश करता है, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर तमाम चीजें डेवलप करने में मदद करता है। चीन भी लगातार मालदीव में अपने पांव जमाने का प्रयास करता रहा है। भारत ने मालदीव को 2 हेलीकॉप्टर और एक डोनियर एयरक्राफ्ट भी डोनेट किए जो इमरजेंसी मेडिकल सर्विसेज, रेस्क्यू और समुद्र की निगरानी और पैट्रोलिंग के काम आते हैं। इन विमानों के देखरेख के लिए कई भारतीय टेक्नीशियन और पायलट मालदीव में रहते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार यहां के लामू और अद्दू द्वीप पर साल 2013 से ही भारतीय सैनिक तैनात हैं। साथ ही भारतीय नौसैनिक भी मालदीव में तैनात हैं। पूरे मालदीव में भारतीय नौसेना ने 10 एकीकृत तटीय निगरानी प्रणाली का प्रबंधन कर रखा है। मालदीव नेशनल डिफेंस फोर्स के प्रमुख जनरल अब्दुल्लाह शमाल और रक्षा मंत्री मारिया अहमद का कहना है कि मालदीव में 75 भारतीय सैनिक तैनात हैं। भारतीय सेना ने पहली बार वर्ष 1988 में मालदीव में प्रवेश किया जब मालदीव में हुए सत्ता पलट के विरोध में तत्कालीन राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम ने भारत से सैन्य मदद मांगी। मालदीव भारत के लिए बहुत अहम है जिसके कारण भारत किसी भी स्थिति में इस देश से संबंध खराब नहीं करना चाहता। इसलिए भारत सरकार बेझिझक उनकी मदद के लिए आगे आईं। यह पहली बार था जब भारतीय सेना ने मालदीव में प्रवेश किया था।
मालदीव को क्यों खटक रही भारतीय सेना
मालदीव की सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने के लिए वर्षों से भारत के सैनिक वहां रहते आए हैं, वहीं दूसरी ओर मालदीव को अब भारत द्वारा दी जाने वाली यह सुरक्षा सहन नहीं हो रही है। हालांकि कई पार्टियों द्वारा भारतीय सैनिकों को द्वीव से हटाए जाने की मांग पहले भी कई बार उठाई गई है। हाल ही में हुए दीव के राष्ट्रपति चुनाव के बाद से इस बात में तेजी आ गई है। मालदीव में पिछला राष्ट्रपति चुनाव साल 2018 में हुआ था जिसमें इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को राष्ट्रपति के रूप में चुना गया था अब पांच साल बाद सितंबर 2023 में हुए चुनाव में सोलिह को हराकर प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) के मोहम्मद मुइजू ने राष्ट्रपति के चुनाव में भारी बहुमत से जीत हासिल की है जो पूर्ण रूप से चीन का समर्थन करते हैं। जबकि इससे पहले मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद सोलिह को भारत का समर्थक माना जाता था जिससे भारत और मालदीव के बीच अच्छे संबंध बने हुए थे। लेकिन अब उनकी हार से भारत और मालदीव के रिश्ते खराब हो सकते हैं। मोहम्मद मुइजू पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के समर्थक हैं और उनकी सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। अब्दुल्ला यामीन को चीन का कट्टर समर्थक माना जाता है। मुइजू भी चीन समर्थक हैं और चुनाव से पहले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों के साथ एक बैठक में उन्होंने कहा भी था कि अगर वह राष्ट्रपति बनते हैं तो चीन और मालदीव के रिश्तों की नई शुरुआत होगी। चीन के समर्थक होने की वजह से ही राष्ट्रपति बनने के बाद मोहम्मद मुइजू ने अब्दुल्ला यामीन को तुरंत जेल से रिहा कराकर घर में नजरबंद कर दिया है।
चीन का समर्थन करने वाले अब्दुल्ला यामीन ने साल 2013 में मालदीव के राष्ट्रपति चुनावों में जीत हासिल की थी जिसके बाद उन्हीं के शासन काल में मालदीव में चीन का दखल काफी बढ़ गया जिसकी वजह से मालदीव चीन के भारी कर्ज के जाल में फंस गया था। अब्दुल्ला यामीन पिछले कई वर्षों से जेल में है। राष्ट्रपति रहते भारी आर्थिक घोटालों के आरोप चलते उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। लेकिन अब मोहम्मद मुइजू का जीत हासिल करना यामीन के लिए एक अच्छी खबर के रूप में सामने आया है क्योंकि दोनों ही चीन का समर्थन करते हैं जिससे मालदीव में हुआ ये चुनाव भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है।
मालदीव के चुनाव का भारत पर असर
मोहम्मद मुइजू से पहले मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम महोम्मद सोलिह थे जो भारत के समर्थक थे लेकिन उसके उलट मुइजू चीन का समर्थन करते हैं। हालांकि मुइजू का शपथ ग्रहण 17 नवंबर को होगा, लेकिन उन्होंने अपनी बयानबाजी से यह साफ कर दिया है कि उनके पूर्ववर्ती के उलट वह चीन की सत्ता को ही अपना समर्थन देंगे। जो भारत के सामने एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि मालदीव सामरिक और रणनीतिक, दोनों ही नजरिए से भारत के लिए महत्वपूर्ण है। खाड़ी के देशों से तेल के जहाज हिंद महासागर से गुजरते हैं जो मालदीव से होकर ही जाते हैं। एक तरीके से यह केंद्र बिंदु है। जिसे देखते हुए चीन हिंद महासागर में अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए लगातार मालदीव को अपने पाले में लाने की कोशिश करता आया है।
दूसरी ओर भारत के केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप से मालदीव सिर्फ 700 किलोमीटर दूर है और अगर मालदीव को अपने पाले में करने के उद्देश्य में चीन सफल हो जाता है तो वह आसानी से भारत पर नजर रख सकता है। जो भारत के लिए मुश्किलें खड़ी करेगा। पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने अपने शासन काल के दौरान ‘इंडिया फर्स्ट’ यानी भारत को प्राथमिकता देने की नीति लागू की हुई थी जिसका मोहम्मद मुइजू पूर्ण रूप से विरोध कर रहे हैं, इन्होंने अपने चुनाव अभियान में भी ‘इंडिया आउट’ यानी भारत को देश से बाहर करने का नारा दिया था। बीबीसी की एक रिपोर्ट में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार अरविंद येलरी कहते हैं कि मालदीव में हुए चुनाव परिणाम भारत के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि मुइजू जिस गठबंधन से आते हैं, उसका पहले ही चीन का समर्थन करने का रिकॉर्ड रहा है। ये जीत चीन के लिए फायदेमंद है क्योंकि चीन लगातार मालदीव में अपने पैर जमाकर भारत के प्रभाव को कम करने की कोशिश में जुटा है।

