
जम्हूरियत यानी प्रजातंत्र की पहली शर्त है अभिव्यक्ति की आज़ादी। अगर प्रजातंत्र के सार तत्व को बचाए रखना है तो अवाम को मुखर होना होगा और यह मुखर होना तभी मुमकिन है जब अभिव्यक्ति की आज़ादी अक्षुण्ण हो। इसलिए प्रजातंत्र में सत्ता समय-समय पर बदलती है, हुक्मरान बदलते हैं। अगर ये बदलाव न हो तो सत्ता में बैठे लोग तानाशाह हो जाएंगे, निरंकुश हो जाएंगे।
अवाम और सत्ता के दरमियां जो एक बहुत ही अहम सेतु है वह है मीडिया यानी प्रेस। अगर सही मायने में किसी को जन प्रतिनिधि होने का हक है तो वह है मीडिया। मीडिया जनता के सवाल को उठाती है और सत्ता के गलियारे तक पहुंचाती है।
नीतीश कुमार को मीडिया की आज़ादी से आपत्ति !
मीडिया जनता की राय लेती है और जनमत तैयार करती है। लेकिन अफ़सोस, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मीडिया की आज़ादी से आपत्ति है। उन्हें आलोचना नहीं चाहिए। इसलिए वे पत्रकारों के सवाल से तिलमिला उठते हैं, सदन में प्रतिपक्ष के नेता के सवाल से बौखला उठते हैं। ये वही नीतीश कुमार हैं न जो जे पी आंदोलन से पैदा हुए हैं….वह जे पी आंदोलन जो इंदिरा गांधी की तानाशाही के खि़लाफ़ था।

जहां सबके साथ प्रेस की आज़ादी को भी ख़त्म कर दिया गया था। जी हां, बिहार के मुखिया नीतीश कुमार ने आदेश पारित किया है कि सोशल मीडिया पे अगर कोई मुख्यमंत्री के साथ-ंउचयसाथ उनके मंत्री, सांसद, विधायक व अफ़सरान के खि़लाफ़ अभद्र, आपत्तिजनक, आलोचनात्मक टिप्पणियां करेगा तो उस पर क़ानूनी कार्रवाई होगी और उसे जेल भेज दिया जाएगा क्योंकि यह क़ानून के प्रतिकूल है और साइबर अपराध की श्रेणी में आता
है।
आखिर कौन तय करेगा कि सोशल मीडिया पर अनसोशल क्या है ?
अब यह पैमाना बताया नहीं गया है कि सोशल मीडिया पर अनसोशल टिप्पणियां क्या हैं और क्या होंगी? क़ानून की किसी धारा का स्पष्ट ज़िक्र नहीं है। अभद्र भाषा का इस्तेमाल न हो, यह तो पहले से तय है। इसमें नया क्या है? संविधान निर्माताओं ने अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब समझाया है।
अब आपत्तिजनक शब्द पे ज़रा आइए। यह कैसे तय होगा कि आपत्तिजनक क्या है? जो मेरे लिए आपत्तिजनक हो सकता है, वह दूसरों के लिए न हो। मसलन, अगर मैं कहूं कि रूपेश सिंह हत्या के मामले में नीतीश सरकार विफल रही और पुलिस प्रशासन नाकाम है, तो मुझे जेल भेज दिया जाएगा।
आप क्या चाहते हैं नीतीश कुमार जी, ‘राग दरबारी’?
लोग आपकी दरबारी करें और आपके सुर में सुर मिलायें। अगर अपराध बढ़ता है और बढ़ भी रहा है तो सवाल लोग करेंगे ही। आप सूबे के मुखिया हैं तो सवाल किससे होगा? अफ़सरान के खि़लाफ़ भी नहीं बोलना है। तो भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों का हम गुणगाण करते रहें।
आज सोशल मीडिया एक बहुत सशक्त माध्यम है और बड़े-बड़े नामचीन पत्रकार इससे जुड़े हुए हैं। टी वी पर ख़बर आने के पहले मोबाइल पर ख़बरें आ जाती हैं। यानी आप इस सशक्त माध्यम को पंगु बनाना चाहते हैं। जो अभद्र या गाली-गलौज की भाषा अपनाता है, उस पर कार्रवाई कीजिए न,कौन रोक रहा है। लेकिन आपत्तिजनक…इसका फ़ैसला कैसे होगा नीतीश कुमार जी?
यह एक ऐसा शब्द आप लाये हैं जिससे आप किसी पर भी नकेल कस सकते हैं कि यह क़ानून के प्रतिकूल है और साइबर अपराध है।
तथाकथित चैट को लेकर सरकार की ओर से अभी तक कोई बयान नहीं
अब मैं ज़रा साइबर अपराध को लेकर एक बहुत ही अहम मुद्दे पे आ रहा हूं। एक टी वी पत्रकार ब्राॅडकास्ट रिसर्च ऑडियंस कांउसिल के हेड के साथ तथाकथित रूप से व्हाट्सएप्प चैट करता है कि तीन दिन बाद भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान में एक ज़बरदस्त सर्जिकल स्ट्राइक होने वाला है और कश्मीर को लेकर एक बड़ा निर्णय लिया जाना है और ठीक तीन दिन बाद बालाकोट सर्जिकलस्टाइक होता है।

अभी तक सरकार की ओर से इस तथाकथित चैट को लेकर कोई बयान नहीं आया है, जब कि यह एक बेहद गंभीर साइबर अपराध है और राष्टीय सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ भी। सवाल है कि अगर यह चैट सही है तो उस पत्रकार तक ख़बर लीक कैसे हुई और कौन है इसके लिए ज़िम्मेवार?
प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, एन एस ए मुखिया और एयर चीफ मार्शल के अलावा किसी को इस ख़ुफिया ऑपरेशन की ख़बर नहीं हो सकती। फिर इस पत्रकार को जानकारी कैसे हुई? मैं नहीं जानता कि इस चैट की विश्वसनीयता क्या है? लेकिन जो ख़बरें टी वी और सोशल मीडिया पर तैर रही हैं, उसे देखते हुए तो सरकार की तरफ़ से स्पष्टीकरण तो आना ही चाहिए था।
अगर यह चैट ग़लत है तो उस पर भी सरकार का बयान आना चाहिए
लेकिन न केन्द्र में बैठी सरकार ने इस पर बयान दिया है और न ही साइबर अपराध को लेकर चिंतित नीतीश कुमार ने कोई बयान दिया है। क्यों नहीं बयान दिया नीतीश जी ने? यह देश का मामला है, राष्टीय सुरक्षा का मामला है। अगर यह चैट ग़लत है तो उस पर भी सरकार का बयान आना चाहिए था। लेकिन कुछ नहीं। क्या एन आई ए को यह गंभीर मुद्दा नहीं लग रहा?
क्या पी एम ओ को यह गंभीर मुद्दा नहीं लग रहा? क्या यह जांच का विषय नही है? नीतीश जी, जब आप सोशल मीडिया के दुरूपयोग और साइबर अपराध की बात कर रहे हैं, तो इससे बड़ा साइबर अपराध और दुरूपयोग होगा? इस पर कुछ बोलेंगे नीतीश जी? और हां, अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रेस की आज़ादी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने कई बारस्थितियों को स्पष्ट किया है। इसलिए अभी उसके तफ़सील में जाने की ज़रूरत नहीं है।
( लेखक टी वी पत्रकारिता से समय तक जुड़े रहे हैं और अब साहित्य लेखन से संबद्ध हैं।)

