बिहार में भले ही नीतीश सरकार सत्ता में वापस आ चुकी है, सरकार के मुखिया खासे व्यथित और असहज बताए जा रहे है। नीतीश कुमार की इस असहजता का कारण 13 बरसों में पहली बार उनकी पार्टी जद(यू) का भाजपा की बरस्क विधानसभा में कम सीटें जीत पाना है। अपनी शर्तों पर भाजपा संग सत्ता में साझेदारी करने के आदि नीतीश को अब भाजपा के इशारों पर सरकार चलानी पड़ रही है। राजनीति के मास्टर खिलाड़ी का मानना है कि भाजपा ने चिराग पासवान को आगे कर उनको हालिया संपन्न चुनावों में भारी नुकसान पहुंचाने की चाल सोच-समझ कर चली है। जद(यू) के बड़े नेताओं को आशंका है कि आने वाले समय में भाजपा कांग्रेस और राजद में फूट डाल इन पार्टियों के विधायकों से दलबदल करा राज्य विधानसभा में खुद का बहुमत पाने का प्रयास करेगी। यदि ऐसा हुआ तो नीतीश के बजाए भाजपा अपने किसी नेता को सीएम बनाने में सफल हो जाएगी। जद(यू) नेताओं का मानना है कि अपने इस लक्ष्य को पाने के लिए ही बिहार की राजनीति से सुशील मोदी को दूर किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक नीतीश कुमार के विधानसभा में नेता विपक्ष तेजस्वी यादव पर फूटे गुस्से के इन्हीं कारणों के चलते अलग निहितार्थ निकाल रहे हैं। तेजस्वी पर तीखा प्रहार करते समय लालू को अपना मित्र कह पुकारने वाले नीतीश कुमार ने इशारों-इशारों में भाजपा नेतृत्व को चेता दिया है कि नाराज मित्र को वे जब चाहे मना भी सकते हैं। पटना में इन दिनों चर्चा गरम है कि लालू यादव को जेल से रिहाई के बाद राज्य में सत्ता समीकरण बदल सकते हैं। जानकारों का दावा है कि प्रदेश भाजपा में इन दिनों खासी खलबली मची हुई है। राज्य के कई बड़े भाजपा नेताओं को सुशील मोदी की कमी अभी से अखरने लगी है।
नीतीश का लालू प्रेम, भाजपा के लिए खतरे की घंटी

