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अब कोर एजेंडे पर भाजपा का फोकस

 

भाजपा शासित राज्यों में यूसीसी का दौर

 

उत्तराखण्ड में समान नागरिक संहिता के लागू होने के बाद इसे देशभर में लागू करने की मांग भाजपा समर्थित राज्य करने लगे हैं। इसी चलते एक ओर जहां गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेद्र पटेल ने यूसीसी का मसौदा तैयार करने और कानून बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई की अध्यक्षता में समिति गठित की है, वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र में भी इसकी सुगबुगाहट होने लगी है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या धीरे-धीरे देशभर में यूसीसी लागू किया जाएगा?

हाल ही में उत्तराखण्ड में लागू हुए समान नागरिक संहिता कानून के बाद अब गुजरात और महाराष्ट्र में भी इसे लागू करने की खबरें इन दिनों देश की राजनीतिक गलियारों में सुर्खियों में हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने यूसीसी का मसौदा तैयार करने और कानून बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय समिति गठित की है जो 45 दिनों में राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी और जिसके आधार पर सरकार निर्णय लेगी। गुजरात के मुख्यमंत्री का कहना है कि भारत का संविधान नागरिकों के कर्तव्यों को पूरा करने के लिए है। बकौल पटेल पीएम मोदी के नेतृत्व में उनका लक्ष्य देशभर में समान नागरिक संहिता लागू करना है ताकि सभी को समान अधिकार मिलें। अनुच्छेद 370 को हटाने और तीन तलाक पर रोक लगाने का हवाला देते हुए पटेल ने कहा, ‘उत्तराखण्ड समान नागरिक संहिता लागू करने वाला आजाद भारत का पहला राज्य बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने भाषण में धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता का जिक्र किया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू होनी चाहिए। संविधान की भावना और संविधान निर्माताओं को ध्यान में रखते हुए हम धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता के लिए पूरी ताकत से काम कर रहे हैं।’

दूसरी तरफ महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता लागू करने पर बड़ा बयान दिया है। शिंदे ने कहा कि ‘राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने पर निर्णय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री अजित पवार के साथ चर्चा के बाद लिया जाएगा।’ उनकी टिप्पणी इस सवाल के जवाब में आई कि क्या महाराष्ट्र उत्तराखण्ड और गुजरात के नक्शे कदम पर चलते हुए यूसीसी लागू करेगा। इससे पहले विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी पदाधिकारियों को सम्बोधित करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि महाराष्ट्र में महायुति की सरकार बनने पर समान नागरिक संहिता कानून लाने पर कोई रोक नहीं सकता है।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या धीरे-धीरे पहले भाजपा शासित राज्यों और फिर पूरे देश में समान नागरिक संहिता कानून लागू किया जाएगा? इसके लागू होने से क्या फायदे और नुकसान होंगे? लागू करने की चुनौतियां क्या होंगी? इसकी पहल कब हुई? आखिर समान नागरिक संहिता क्या है जिसकी मांग लगातार होती रही है? कानूनविदों और राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि समान नागरिक संहिता एक राजनीतिक मुद्दा रहा है। समय-समय पर इसको लेकर बहस होती रही है। देश के संविधान के अनुच्छेद 44 में समान सिविल संहिता का उल्लेख है, जहां राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में संविधान में राज्य को कॉमन सिविल कोड के लिए प्रयास करने हेतु निर्देशित किया है। ऐसे में उत्तराखण्ड में इसे लागू करने के बाद खासकर भाजपा शासित राज्यों में लागू करने की खबरों को बल मिल गया है और भाजपा अपने एजेंडे में लगातार कामयाब होती जा रही है। भारतीय जनता पार्टी अपने अहम मुद्दों और वादों में से एक समान नागरिक संहिता को लागू करने के मुद्दे को फिर गरमाने की कोशिश कर रही है। यही नहीं उत्तर प्रदेश सरकार और हिमाचल प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी इसे सही निर्णय बताते हुए यह कह चुके हैं कि राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने पर सरकारें विचार कर रही हैं। इसके लिए अधिकारियों को इसे एक्जामिन करने का निर्देश दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि गृह मंत्री अमित शाह कई बार स्वयं यह कह चुके हैं कि भाजपा की केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370, राम जन्मभूमि, नागरिकता संशोधन कानून और तीन तलाक जैसे ज्यादातर मुद्दों को हल कर दिया है और अब समान नागरिक संहिता जैसे जो कुछ मुद्दें बचे हैं, आने वाले वर्षों में उन्हें भी हल कर लिया जाएगा। यानी भाजपा ने यूसीसी को कानूनी अमलीजामा पहनाने की प्लानिंग अलग बनाई है। यूसीसी के लिए बीजेपी संसद के रास्ते के बजाय विधानसभा के जरिए आगे बढ़ने की रणनीति पर चल रही है। अमित शाह ने राज्यसभा में संविधान पर चर्चा के दौरान समान नागरिक संहिता को लेकर अपना स्पष्ट नजरिया रखा था। उन्होंने कहा था कि जिस तरह उत्तराखण्ड में बीजेपी सरकार ने यूसीसी को लागू किया है उसी तरह हम बीजेपी शासित सभी राज्यों में समान नागरिक संहिता को लागू करेंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा अब अपने तीसरे और बचे हुए एकमात्र कोर एजेंडे को लेकर भी कदम उठाने का फैसला कर चुकी है। धीरे-धीरे ही सही भाजपा अपने तीसरे कोर एजेंडे समान नागरिक संहिता को देशभर में लागू करने की तरफ कदम बढ़ा रही है। फिलहाल भाजपा की राज्य सरकारों ने इसकी शुरुआत कर दी है, जिससे भाजपा को देश भर के माहौल का अंदाजा लगाने में मदद मिलेगी और फिर इस मुद्दे पर भी केंद्र सरकार आगे कदम बढ़ा सकती है क्योंकि पूरे देश में इसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार के स्तर पर ही संसद से इस कानून को पारित करवाना पड़ेगा।

गौरतलब है कि देश के अधिकांश राजनीतिक दलों को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और देश में समान नागरिक संहिता इन तीन मुद्दों पर सबसे ज्यादा ऐतराज था। भारत की राजनीति में भाजपा के इन तीनों कोर एजेंडों को लेकर विरोध इतना ज्यादा था कि 1998 में एनडीए गठबंधन के बैनर तले सरकार बनाने के लिए भाजपा को इन तीनों मुद्दों को भूलना पड़ा और 6 वर्षों तक सरकार चलाने के बावजूद भाजपा ने इन तीनों को लेकर कोई कदम नहीं उठाया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अब भाजपा ने देश के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह से बदल दिया है।

जानकार कहते हैं कि अलग-अलग धर्मों के लिए एक समान कानून बनाने को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि यह काम संसद का है। इसी बीच उत्तराखण्ड में 27 जनवरी को समान नागरिक संहिता लागू कर दी गई। इसके बाद देश भर के राज्यों में इसे लागू करने को लेकर जो बहस काफी दिनों से जारी है, वह रफ्तार पकड़ेगी। क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 44 में नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत समान नागरिक संहिता के बारे में प्रावधान किया गया है। इसमें कहा गया है कि राज्य इस बात का प्रयास करेगा कि सभी नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड हो और देश भर में इसे लागू किया जाए। संविधान सभा में जब इस पर बहस हुई तो बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर ने कहा था कि व्यावहारिक रूप से इस देश में एक सिविल संहिता है जो समान रूप से पूरे देश में लागू है। लेकिन विवाह-उत्तराधिकार का क्षेत्र ऐसा है जहां एक समान कानून लागू नहीं है। यह बहुत छोटा-सा क्षेत्र है जिस पर हम समान कानून नहीं बना सके हैं।

कानूनविद कहते हैं कि अलग-अलग धर्मों में पर्सनल कानून में शादी की उम्र, गुजारा भत्ता, वसीयत, उत्तराधिकार आदि को लेकर अलग-अलग कानून हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहु-विवाह की छूट है, लेकिन अन्य धर्मों में एकल विवाह का नियम कड़ाई से लागू है। बहुविवाह को भारतीय कानून के तहत अपराध माना गया है। उसके लिए सात साल तक कैद का प्रावधान है। तीन तलाक अवैध घोषित होने के बावजूद अन्य प्रकार के मौखिक तलाक (तलाक-ए-हसन एवं तलाक-ए-अहसन) आज भी मान्य हैं। इनमें भी तलाक का आधार बताने की बाध्यता नहीं है और इंतजार की अवधि भी मात्र 3 महीना है। बाकी धर्मों में तलाक के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होता है।

मुस्लिम कानून में मौखिक वसीयत एवं दान मान्य हैं, लेकिन अन्य धर्मों में केवल रजिस्टर्ड वसीयत हो सकती है। मुस्लिम कानून में उत्तराधिकार की व्यवस्था बेहद उलझी हुई है। वहां पैतृक संपत्ति में पुत्र एवं पुत्रियों के अधिकार में काफी अंतर है। अन्य धर्मों में भी शादी के बाद अर्जित संपत्ति में पत्नी के अधिकार परिभाषित नहीं हैं। तलाक का आधार भी सबके लिए एक समान नहीं है। गोद लेने और भरण-पोषण करने का नियम भी हिंदू, मुस्लिम, पारसी, ईसाई के लिए अलग-अलग हैं। मुस्लिम महिला गोद नहीं ले सकती, जबकि अन्य धर्मों में भी गोद लेने की व्यवस्था पुरुष प्रधानता पर आधारित है।

विवाह की न्यूनतम उम्र भी सबके लिए समान नहीं है। मुस्लिम धर्म में माहवारी शुरू होने पर लड़की को निकाह योग्य मान लिया जाता है। हिंदू मैरिज एक्ट के तहत पहले 15 साल से ऊपर की उम्र में शादी हो सकती थी लेकिन इस अधिनियम को 1978 में संशोधित कर महिलाओं के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष और पुरुषों के लिए 21 वर्ष कर दी गई। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 ने 1929 के अधिनियम की जगह ली, जिसमें न्यूनतम आयु सीमा पहले जैसी ही है। बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक, 2021 में लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाकर 21 वर्ष करने का प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट: यूसीसी पर पहल करे सरकार

देश भर में यूसीसी की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जब मामला गया तब तत्कालीन चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली बेंच ने 30 मार्च 2023 को सभी धर्म और जेंडर के लिए एक समान कानून बनाने को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई से मना कर दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि इस मामले में कानून बनाने को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया जाना सही नहीं है। मामला संसद के दायरे में है। हालांकि इससे पहले कई बार सुप्रीम कोर्ट सरकार से यूसीसी को लेकर पहल करने के लिए कह चुका है।

क्या है समान नागरिक संहिता
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में नीति-निर्देशक तत्वों के तहत समान नागरिक संहिता का प्रावधान किया गया है। जिसके अनुसार राज्य यानी भारत सरकार देश के पूरे भू-भाग में अपने नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। भाजपा इसी आधार पर यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने की बात कहती रही है। हमारे देश में क्रिमिनल कानून सभी नागरिकों के लिए समान हैं। लेकिन परिवार और संपत्ति के बंटवारे के लिए नियम धर्मों के आधार पर अलग-अलग हैं। यदि भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होता है तो यह कानून सभी जाति, धर्म, समुदाय या संप्रदाय के पर्सनल लॉ से ऊपर होगा। यानी देश में विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि कानूनों में भी एकरूपता आ जाएगी। फिलहाल भारत में हिंदू विवाह अधिनियम- 1955, मुस्लिम पर्सनल कानून, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम-1956, इसी तरह ईसाई और पारसी समुदाय आदि से जुड़े सिविल कानून हैं। इसके तहत शादी और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को भी रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। इस अनुच्छेद का उद्देश्य संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य’ के सिद्धांत का पालन करना है।

क्यों हो रही है यूसीसी की मांग?
लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और यह सुनिश्चित करने के लिए भारत में एक समान नागरिक संहिता की मांग की जा रही है कि सभी नागरिक कानूनों के एक ही समूह द्वारा शासित हों। यूसीसी के समर्थकों का तर्क है कि अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून के तहत समान व्यवहार के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं और एक समान कोड सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करेगा। उनका यह भी तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और सांप्रदायिक तनाव को जन्म देती है।

यूसीसी को लागू करने की चुनौतियां
भारतीय समाज ही नहीं, घर-घर में भी अलग-अलग रीति रिवाज हैं। देश में हिंदुओं की आबादी सबसे ज्यादा है। लेकिन हर राज्य में अलग धार्मिक मान्यताएं और रिवाज हैं। इसके अलावा किसी समुदाय में पुरुषों को कई शादी करने की इजाजत है। किसी जगह पर विवाहित महिलाओं को पिता की संपत्ति में हिस्सा न देने का नियम है। समान नागरिक कानून लागू होने के बाद ये सभी नियम खत्म हो जाएंगे। ऐसे में इस कानून को लागू करना कई चुनौतियों को न्योता देने जैसा है।

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