1990 के दशक के आखिर में जब कांग्रेस नेतृत्व के सवाल पर संघर्ष करती हुई दिख रही थी और सोनिया गांधी ने राजनीति में न आने का फैसला कर लिया था तो प्रियंका गांधी ने ही पर्दे के पीछे हालात संभाले थे। इसके बाद वो लगातार अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी को राजनीति में आगे बढ़ने में मदद करती रहीं। पिछले कुछ सालों के दौरान जब राहुल गांधी ने ‘भारत जोड़ो’ अभियान के दौरान लंबी यात्राएं कीं तो वो उनके साथ लगातार बनी रहीं। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा और पार्टी के अंदर और बाहर उन्हें चुनावी राजनीति में उतारने की मांग भी बढ़ने लगी थी। बहरहाल, वायनाड से प्रियंका गांधी के जीत कर लोकसभा में आने की पूरी संभावना जताई जा रही है। अगर वो लोकसभा सांसद बनती हैं तो ये 2024 के लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस और इंडिया गठबंधन की सहयोगी पार्टियों का हौसला बढ़ाने के साथ प्रियंका गांधी संसद में अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के साथ मिल कर मोदी सरकार पर दबाव बनाने की बेहतर रणनीति भी बना सकती हैं

महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनावों के साथ 48 विधानसभा सीटों सहित 2 लोकसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव की तारीखों के ऐलान बाद देश की राजनीति फिर से गरमा गई है। एक ओर जहां सवाल उठ रहा है कि क्या हरियाणा में जीत की हैट्रिक लगाने के बाद एनडीए अब महाराष्ट्र और झारखंड में बूस्टर डोज ले पाएगा? या फिर हरियाणा में मिली हार से सबक लेकर कांग्रेस साथी दलों के साथ दो राज्यों में कमबैक करेगी? वहीं वायनाड से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने उपचुनाव में ताल ठोक दी है। वायनाड में भी 13 नवंबर को वोटिंग होनी है। ऐेसे में राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा यह सवाल सुर्खियों में है कि क्या अब गांधी परिवार से देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचने की बारी प्रियंका गांधी की है?
गौरतलब है कि प्रियंका गांधी पहली बार चुनावी मैदान में उतरी हैं। उन्होंने बीते 23 अक्टूबर को केरल की वायनाड लोकसभा सीट से अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। इससे पहले उन्होंने एक रोड शो किया, जिसमें उन्होंने कहा कि वो पिछले 35 सालों से चुनाव प्रचार कर रही हैं लेकिन पहली बार अपने लिए वोट मांग रही हैं।

वहीं राहुल गांधी ने बहन के लिए प्रचार करते हुए कहा कि ‘वायनाड के अब दो सांसद हैं एक औपचारिक और एक अनौपचारिक। राहुल ने प्रियंका गांधी की उम्मीदवारी का समर्थन करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा, वायनाड के लोगों के लिए मेरे दिल में खास जगह है। मैं उनके प्रतिनिधि के तौर पर अपनी बहन से बेहतर किसी उम्मीदवार की कल्पना नहीं कर सकता था। मुझे उम्मीद है वो वायनाड की जरूरतों के लिए जी-जान से काम करेंगी और संसद में एक मजबूत आवाज बन कर उभरेंगी।’

ये सीट पहले राहुल गांधी के पास थी। उन्होंने लोकसभा चुनाव दो सीटों वायनाड और रायबरेली से लड़ा था और दोनों ही जगह उन्हें जीत मिली थी। जिसके बाद राहुल ने वायनाड से इस्तीफा दे दिया था। अब पार्टी ने उनकी बहन प्रियंका गांधी के चुनावी डेब्यू के लिए वायनाड सीट को चुना है। वायनाड सीट पर 13 नवंबर को मतदान होगा और 23 को मतगणना होगी। अगर प्रियंका गांधी जीतती हैं तो गांधी परिवार के मौजूदा तीनों सदस्य सांसद हो जाएंगे। राहुल गांधी लोकसभा के सदस्य हैं जबकि उनकी मां सोनिया गांधी राज्यसभा में हैं। प्रियंका गांधी चुनाव जीतने के बाद लोकसभा की सदस्य बनेंगीं।

तीन दशक तक की पर्दे के पीछे राजनीति

प्रियंका गांधी कांग्रेस की राजनीति में पर्दे के पीछे से तो काफी लंबे समय से सक्रिय रही हैं। वर्ष 1990 के दशक के आखिरी वर्षों से ही वो अपनी मां सोनिया गांधी के चुनाव अभियानों का जिम्मा संभालती रही हैं। इसके अलावा 2004 में जब उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से राहुल गांधी सक्रिय राजनीति में आए तो प्रियंका गांधी ने ही उनके लिए जोरदार जनसम्पर्क अभियान चलाया था। लेकिन खुद को बैकग्राउंड में ही रखा। पहली बार उनकी राजनीति में आधिकारिक एंट्री 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हुई जब उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनावी अभियान का प्रभारी बनाया गया था। लेकिन कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली थी। इसके बाद 2022 में यूपी के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी खराब रहा। तब आलोचकों ने कहा था कि प्रियंका गांधी के तौर पर कांग्रेस का तुरूप का पत्ता फुस्स हो गया।

2019 में जब प्रियंका गांधी को कांग्रेस महासचिव बनाया गया था तो ये चर्चा थी कि वो अपनी मां की पारंपरिक सीट रायबरेली से चुनाव लड़ सकती हैं। यहां तक कि उन्हें चुनाव में खड़े होने की अपील करते हुए पोस्टर भी लग गए थे लेकिन उन्हें चुनाव मैदान में नहीं उतारा गया।

अहम क्यों है प्रियंका का चुनाव लड़ना

राजनीति विश्लेषकों का मानना है कि ये बिल्कुल सही समय है। कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया और वो संसद में काफी मुखर नज़र आ रही है। अगर प्रियंका भी लोकसभा पहुंचती हैं तो वह अपने भाई के साथ मिल कर मोदी सरकार को और अच्छी तरह से घेर सकती हैं। वायनाड उनके लिए आसान सीट साबित हो सकती है क्योंकि राहुल गांधी यहां काफी लोकप्रिय साबित हुए हैं। प्रियंका गांधी ने वायनाड के वोटरों से अपील की है कि ‘1989 में मैंने 17 साल की उम्र में पहली बार अपने पिता के लिए चुनाव प्रचार किया था। इसके बाद मैंने अपनी मां, भाई और अपने कई सहकर्मियों के लिए अलग-अलग चुनावों में प्रचार किया लेकिन ये पहली बार है जब अपना चुनाव प्रचार कर रही हूं। अगर आप मुझे अपना प्रतिनिधि बनाएंगे तो ये मेरे लिए सम्मान की बात होगी।’

दादी इंदिरा गांधी से होती है प्रियंका की तुलना

भारतीय मतदाताओं का एक वर्ग प्रियंका गांधी को पसंद भी कर रहा है। लोग प्रियंका में उनकी दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की झलक देखते हैं। उनका मानना है कि वो इंदिरा गांधी जैसी मजबूत इच्छाशक्ति वाली महिला हैं और भारतीय राजनीति की चुनौतियों का बखूबी सामना कर सकती हैं।

प्रियंका गांधी राहुल गांधी के उलट अपने पिता राजीव गांधी की राजनीतिक उत्तराधिकारी समझी जाती रही थीं। यहां तक कि आतंकवादी हमले में मारे गए उनके पिता के अंतिम संस्कार के दौरान भी लोग ये उम्मीद कर रहे थे कि प्रियंका ही कांग्रेस की नई नेता होंगी। लेकिन इसके बाद प्रियंका गांधी सक्रिय राजनीति में नहीं उतरीं।

ऐसा माना जाता है कि 1990 के दशक के आखिर में जब कांग्रेस नेतृत्व के सवाल पर संघर्ष करती हुई दिख रही थी और सोनिया गांधी ने राजनीति में न आने का फैसला कर लिया था तो प्रियंका गांधी ने ही पर्दे के पीछे हालात संभाले थे। इसके बाद वो लगातार अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी को राजनीति में आगे बढ़ने में मदद करती रहीं। पिछले कुछ सालों के दौरान जब राहुल गांधी ने ‘भारत जोड़ो’ अभियान के दौरान लंबी यात्राएं कीं तो वो उनके साथ लगातार बनी रहीं। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा और पार्टी के अंदर और बाहर उन्हें चुनावी राजनीति में उतारने की मांग भी बढ़ने लगी थी। बहरहाल, वायनाड से प्रियंका गांधी के जीत कर लोकसभा में आने की पूरी संभावना जताई जा रही है। अगर वो लोकसभा सांसद बनती हैं तो ये 2024 के लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस और इंडिया गठबंधन की सहयोगी पार्टियों का हौसला बढ़ने के साथ प्रियंका गांधी संसद में अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के साथ मिल कर मोदी सरकार पर दबाव बनाने की बेहतर रणनीति भी बना सकती हैं।

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी पार्टी के लिए देशभर में लगातार जमीन तैयार कर रहे हैं। अब लगता है कि यूपी में कांग्रेस को दोबारा जिंदा करने की जिम्मेदारी राहुल गांधी ने उठा ली है। पहले यूपी की जिम्मेदारी प्रियंका के कंधों पर थी, लेकिन अब उन्हें वायनाड से चुनाव लड़ने का जिम्मा सौंपने से बीजेपी की मुश्किल बढ़ा दी है, क्योंकि अगर प्रियंका वायनाड से जीतती हैं तो देश के दोनों छोरों से पार्टी अब बीजेपी को घेरने वाली है।

कांग्रेस की तिकड़ी बढ़ाएगी बीजेपी की टेंशन

प्रियंका गांधी आखिरकार चुनावी मैदान में उतर गई हैं। कांग्रेस को 15 साल बाद पहली बार लगा है कि यूपी में उसकी स्थिति सुधर सकती है। वायनाड से अगर प्रियंका को जीत मिलती है तो फिर लोकसभा में उत्तर और दक्षिण के राज्यों से गांधी परिवार के सदस्य देखने को मिलेंगे। सोनिया गांधी पहले से ही राज्यसभा में हैं। उत्तर से राहुल गांधी, दक्षिण से प्रियंका गांधी और पश्चिम से सोनिया गांधी कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई दे सकते हैं।

जानकार कहते हैं कि गांधी परिवार का सियासी जुड़ाव भले ही उत्तर से ज्यादा रहा है, लेकिन दक्षिण से भी उनका राजनीतिक रिश्ता कम नहीं है। गांधी परिवार का इतिहास अगर देखें तो इंदिरा गांधी 1978 का उपचुनाव कर्नाटक के चिकमगलूर से जीतीं और फिर 1980 में आंध प्रदेश के मेडक सीट से भी जीत हासिल की थी। 1999 में सोनिया गांधी की राजनीतिक एंट्री, अगर कहें कि दक्षिण भारत से हुई तो गलत नहीं होगा।

बेल्लारी से चुनाव लड़ी थीं सोनिया गांधी
सोनिया गांधी वर्ष 1999 में अमेठी और बेल्लारी से चुनाव लड़ी थीं लेकिन बेल्लारी में पहले चुनाव हुआ था। दोनों सीट जीतने के बाद सोनिया गांधी ने तब बेल्लारी की सीट छोड़ दी थी। 2019 में जब राहुल गांधी को लगा कि चुनौती अमेठी में बड़ी है तो चुनाव के लिए राहुल ने भी वायनाड ही चुना और वायनाड से ही जीते। 2024 में अब मां सोनिया गांधी के बाद प्रियंका का भी राजनीतिक में पर्दापर्ण वायनाड से ही हो रहा है। जहां से अब वो चुनाव लड़ेंगी। उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है, क्योंकि वायनाड में राहुल गांधी की जीत का अंतर काफी बड़ा था।

संसद में कब-कब पहुंचा गांधी परिवार
वर्ष 1989 से 1991 के बीच राजीव गांधी और मेनका गांधी संसद सदस्य थे। राजीव गांधी अमेठी से कांग्रेस के सांसद थे जबकि मेनका गांधी पीलीभीत से जनता दल की सांसद थीं। 1999 से 2004 के बीच सोनिया गांधी और मेनका गांधी सांसद थीं। सोनिया गांधी अमेठी से कांग्रेस की सांसद थीं तो मेनका गांधी पीलीभीत से निर्दलीय सांसद थीं। 2004 से 2009 के बीच राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मेनका गांधी सांसद थे। राहुल अमेठी से कांग्रेस के सांसद थे, सोनिया गांधी रायबरेली से और मेनका गांधी पीलीभीत से 2009-24 तक राहुल गांधी सोनिया गांधी वरुण गांधी और मेनका गांधी, चार लोग सांसद थे। अगर इस बार प्रियंका जीत गईं तो सिर्फ तीन ही लोग सांसद हो सकते हैं यानी सत्ता पक्ष के खिलाफ गांधी परिवार की मुखर आवाज संसद में जोरदार तरीके से सुनाई देगी।

गौरतलब है कि संसद भवन में गांधी परिवार के सांसदों की आवाज हमेशा सुनाई देती रही है। कभी इनकी संख्या ज्यादा तो कभी कम मगर रही जरूर। 1999 में बेल्लारी से सोनिया गांधी जीतीं थी। 2019 में वायनाड से राहुल गांधी जीते। अब वायनाड से प्रियंका गांधी चुनाव लड़ेंगी। अगर गांधी परिवार का इतिहास देखें तो जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिर गांधी, फिरोज गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी, मेनका गांधी फिर राहुल गांधी, वरुण गांधी और अब प्रियंका गांधी वायनाड जीतीं तो वो भी संसद सदस्य हो जाएंगी। संसद में गांधी परिवार की मौजूदगी के बीच अलग बात ये है कि इस बार सत्ता पक्ष से गांधी परिवार का कोई सदस्य संसद में नहीं रहेगा और दूसरी ओर अगर प्रियंका गांधी वायनाड से चुनाव जीत जाती हैं तो पहली बार ऐसा होगा कि भाई-बहन और मां की तिकड़ी संसद में मौजूद रहेगी।

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