कुछ दिन पूर्व राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के जुर्म में दोषी एक महिला को बरी कर दिया। यहां ध्यान दीजिए, हाईकोर्ट ने दोषी महिला को बरी किया आरोपी को नहीं। अदालत में दोषी महिला के वकील ने बताया कि हत्या के दौरान महिला प्री मेंस्टु्रअल स्ट्रेस (पीएमएस यानी पीरियड्स के दौरान हिंसक होना) से ग्रसत थी। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पीएमएस से ग्रस्त महिला को बरी करने का यह पहला मामला है। ऐसा मामला पहले कभी अदालत में नहीं आया था। दूसरे देशों में भी बहुत कम इसके उदाहरण हैं। यहां तक कि भारतीय डॉक्टरों के पास भी ऐसे केस न के बराबर ही आए हैं, क्योंकि अधिकांश लोगों को पीएमएस के बारे में पता नहीं है।
राजस्थान के अजमेर जिले के नासिराबाद में 21 वर्षीय चंद्रा कुमारी ने अपने तीन बच्चों को कुएं में धकेल दिया था। दो बच्चों को डूबने से बचा लिया गया। एक बच्चे की मौत हो गई थी। निचली अदालत ने चंद्रा को हत्या का दोषी ठहराया था। वह हाईकोर्ट गईं। चंद्रा के वकील ने हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जब यह घटना घटी उस दौरान महिला प्री मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम से गुजर रही थी। हाईकोर्ट में विदेश में हुई ऐेसी कुछ घटनाओं का जिक्र किया गया, जब महिलाएं पीरियड्स के दौरान हिंसक हो जाती हैं।
कोर्ट में तीन डॉक्टरों की गवाही दर्ज की गई। एक डॉक्टर ने बताया कि कुछ महिलाएं पीरियड्स में कुछ अजीब सा बर्ताव करने लगती हैं। डॉक्टर ने दावा किया कि पीएमएस के दौरान महिलाएं इतनी हिंसक हो जाती हैं कि वह आत्महत्या करने पर भी उतारू हो जाती हैं। एक अन्य डॉक्टर ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए बताया कि उन्होंने महिला का इलाज किया था। उसके लक्षण इतने गंभीर थे कि उसे शांत करने के लिए बेहोशी का इंजेक्शन देना पड़ा।
पीएमएस महिला के पीरियड्स शुरू होने से पांच से सात दिन पहले का वक्त होता है। इस दौरान महिलाओं के व्यवहार में बदलाव महसूस होने लगता है। उनके व्यवहार में चिड़चिड़ापन देखने को मिलने लगता है। इतना ही नहीं कई मामलों में तो महिलाओं को आत्महत्या करने जैसे विचार भी आने लगते हैं। दिल्ली के लक्ष्मीनगर में गाइनोकॉलजिस्ट डॉक्टर अदिति आचार्य पीएमएस के बारे में बताती हैं, ‘महिलाओं के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव के चलते पीएमएस होता है। इस दौरान लड़कियों को पेट और ब्रेस्ट के पास दर्द महसूस होता है। वे कभी गुस्सा तो कभी अचानक खुश होने लगती हैं। छोटी-छोटी बातों में रोना आने लगता है।’
पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस जर्नल में पीएमएस पर एक रिसर्च प्रकाशित की गई थी। पिछले साल अप्रैल को छपे इस रिसर्च के अनुसार 90 प्रतिशत महिलाएं पीएमएस का अनुभव करती हैं। इनमें से 40 प्रतिशत
महिलाओं को इस दौरान तनाव महसूस होता है। इनमें से दो से पांच प्रतिशत महिलाएं बहुत अधिक तनाव का शिकार हो जाती हैं, जिससे उनकी आम जिंदगी पर असर पड़ता है। इसी जर्नल की एक और रिपोर्ट बताती है हेट्रोसेक्सुअल कपल के मुकाबले लेस्बियन कपल के बीच पीएमएस का दौर काफी आराम से बीतता है। इसके अनुसार लेस्बियन कपल में दोनों पार्टनर लड़कियां होती हैं तो वो एक दूसरे की समस्या को भी काफी अच्छे तरीके से समझ पाती हैं। मुश्किल वक्त में दोनों एक-दसरे को बेहतर तरीके से सपोर्ट कर पाती हैं।
जर्नल ऑफ विमेन हेल्थ में 2011 के एक अध्ययन में कहा गया है कि मासिक धर्म वाली महिलाओं में से 20 फीसद को पीएमएस है, जो उनके जीवन को प्रभावित करता है और उनको प्रोफेशनल की मदद हासिल करने की जरूरत है। ब्रिटेन की एक वेबसाइट द कनवरसेशन ने पिछले साल पीएमएस पर एक स्टडी की। इस स्टडी के दौरान उन्होंने पीएमएस से जूझ रही महिलाओं पर कपल में और सिंगल में थैरेपी देकर उनके व्यवहार को परखा। इस स्टडी में पाया गया कि जिस थैरेपी में कपल शामिल थे उनमें पीएमएस से उबरने की संभावनाएं ज्यादा थी। जबकि अकेले थैरेपी में शामिल होने वाली महिलाओं में ऐसा अंतर नजर नहीं आया।
विदेशों में धीरे-धीरे पीएमएस पर स्टडी और शोध होने लगे हैं। भारत में यह अभी दूर की कौड़ी ही है। एक तरह यहां अभी भी 90 फीसदी से ज्यादा महिलाएं पीरियड्स पर बात करने से ही कतराती हैं। ऐसे में इस पर कोई रिपोर्ट या स्टडी सोचना भी दूर की बात है। कुछ हाई प्रोफाइल महिलाएं जरूर इस पर बात करती हैं। वह भी अपनी महिला मित्रों से ही। समस्या यह है कि पीएमएस स्पष्ट रूप से परिभाषित सिंड्रोम नहीं है। विदेशी शोधकर्ताओं ने इस श्रेणी में आने वाले 150 लक्षणों की पहचान की है। पीएमएस का एक रूप है, जो अधिक गंभीर है। प्रीमेंस्ट्रुअल डिसफॉरिक डिजीज या पीएमडीडी को अमेरिकन साइकियाट्रिक सोसिएशन के डायग्नोसिस एंड स्टेटिस्टिकल मैनुअल ऑन मेंटल डिसऑर्डर द्वारा मानसिक बीमारी के रूप में दर्ज किया गया है।
मेयो क्लिनिक के मुताबिक पीएमडीडी का कारण स्पष्ट नहीं है। यह देखते हुए कि पीएमएस और पीएमडीडी दोनों में अंतर्निहित अवसाद और चिंता समान है। ऐसे में यह संभव है कि मासिक धर्म की अवधि को शुरू करने वाले हार्मोनल परिवर्तन मूड डिसऑर्डर के लक्षणों को और बिगाड़ देते हों। पीएमडीडी के ट्रीटमेंट में लक्षणों को रोकने या कम करने पर ध्यान दिया जाता है और इसमें एंटीड्रिप्रेसेंट्स शामिल हो सकते हैं।
भारत के लिए समस्या यह है कि यहां इस पर डेटा की कमी है। कुछ विशेषज्ञ डॉक्टरों का यह भी कहना है कि पीएमएस की गंभीर स्थिति से निपटने के लिए भारतीय डॉक्टर प्रशिक्षित भी नहीं हैं। इस पर ध्यान देने की जरूरत है।
आपराधिक मुकदमों में बचाव के लिए भारत में पीडीएस का उदाहरण नहीं था। राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय पहला उदाहरण बना। पीएमएस से शुरू हुए पागलपन को फ्रांस में मान्यता प्राप्त है। यूके में भी ऐसे मामले सामने आए हैं। यूके में पीएमएस के कारण अपराध से बरी किए जाने या अपराध कम किए जाने की मांग की गई है।
ऑस्ट्रेलिया के अपराध विज्ञानी डॉ पैट्रीशिया ईस्टियल ने अपने लेख ‘पीएमएस इन कोर्टरूम’ में, विभिन्न उदाहरणों को संग्रहित किया है। जिसमें गंभीर पीएमएस को बचाव के रूप में इस्तेमाल किया गया था। भारत में इस पर पहला फैसला सुनाने वाले राजस्थान हाईकोर्ट के दोनों जजों ने भी उनके लेख का अध्ययन किया।
इस सिंड्रोम को अपराध में सजा से बचने के लिए अमेरिका में विरोध भी हुआ था। वहां नारीवादी संगठनों ने इसका विरोध किया था। ऐसे महिला संगठनों को डर था कि यह एक महिला की छवि को उसके हार्मोन की गुलाम के रूप में पेश करेगी। यह डर सही है। पर इसकी चिकित्सीय दशा भी एक सच्चाई है। जो गंभीर पीएमएस की ओर ले जाती है। अपने लेख में डॉ ईस्टियल यह भी कहती हैं कि इसे साबित करने के लिए कड़े नियमों की जरूरत है ताकि आपराधिक सजा से बचने के लिए पीडीएस का गलत इस्तेमाल न हो सके।
‘बीमारी है यह’
मनोचिकित्सक डॉ. अरुण ब्रूटा से बातचीत
 
पीएमएस बीमारी है या एक प्राकृतिक प्रक्रिया है?
स्वभाविक रूप में यह एक बीमारी ही है। प्राकृतिक प्रक्रिया तो पीरियड्स होता है। पीरिड्यस के दौरान कुछ अलग किस्म की महिलाओं पर यह असर डालता है। पीएमएस के ऐसे मामलों को मैंने देखा है जिसमें महिलाएं घबराहट, उन्मादी बर्ताव जैसे रोना, चीखना, चीजें फेंकना या यहां तक कि अपने बच्चों को पीटने जैसे लक्षण प्रदर्शित करती हैं।
क्या यह मनोरोग है?
ऐसे लोग जिनको सीमांत-अवसाद या सीमांत-उन्माद है, पीएमएस के दौरान उनके लक्षण और बिगड़ने की आशंका रहती है। यदि वह अपने चरम पर पहुंच जाता है तो मनोरोग के दायरे में आता है। यदि ऐसे लोग हत्या या आत्महत्या जैसे कदम उठाते हैं तो वह एक मनोवैज्ञानिक व्यवहार है।
‘पारिवारिक सपोर्ट की जरूरत’
स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. अदिति आचार्य शर्मा से बातचीत
 
पीएमएस की पहचान कैसे कर सकते हैं?
अगर अवसाद, अनिद्रा और बेहद थकान जैसे लक्षण बार-बार होते हैं (कम से कम दो मासिक धर्म चक्रों के लिए)। यदि लक्षणों की शुरुआत डिंब उत्सर्जन (ओवुलेशन) के आस-पास होती है और ये आपके जीवन को काफी बाधित करते हैं। यदि ब्लीडिंग शुरू होने के पांच दिनों के भीतर ये लक्षण गायब हो जाते हैं, तो आपको पीएमएस हो सकता है।
महिलाओं में बदलाव क्यों आता है?
पीएमएस के दौरान महिलाओं के पेट, ब्रेस्ट और निजी अंग में खून की मात्रा बढ़ जाती है। उन्हें दर्द महसूस होता है। अब जरा सोचिए किसी के निजी अंगों के आस-पास दर्द हो रहा हो, वह दर्द हर महीने कुछ दिनों तक बेचैन करता हो तो कोई कैसे नॉर्मल रह सकता है। इसीलिए ऐसे वक्त पर महिलाओं को बहुत ही ज्यादा पारिवारिक सपोर्ट की जरूरत होती है। यदि उस वक्त सपोर्ट नहीं मिलता है तो वह और ज्यादा बेचैन हो जाती हैं।
क्या पीएमडीडी या पीएमएस से ग्रस्त कोई महिला हत्या तक कर सकती है?
अगर इसका पता नहीं चलता और लंबे समय तक इलाज नहीं किया जाता, अगर मस्तिष्क में फीलगुड हार्मोन रिलीज नहीं हो रहा है और कोई महिला ऐसे ही एक के बाद एक मासिक चक्र के दौर से गुजरती है, तो क्या कोई अतिवादी कदम उठा सकता है? यह काफी हद तक मुमकिन है।
क्या यह भारत के लिए नया है?
भारत में पीडीएस के मामले पहले से रहे हैं। भारत में आम लोगों के लिए स्वास्थ्य अभी भी दुर्लभ ही है। जब तक बीमारी भयानक रूप नहीं लेती तब तक आम लोग डॉक्टर के पास नहीं जाते। गरीब से लेकर निम्न मध्यवर्गीय लोग आज भी भारत में झोला छाप डॉक्टरों और तांत्रिकों के पास पहले जाते हैं।

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