शीतकालीन सत्र के दौरान संविधान पर शुरू हुई चर्चा विपक्ष के विरोध-प्रदर्शन, सांसदों की धक्का-मुक्की के बाद राजनीतिक रंग में बदल गई है। यह जंग दलित वोट बैंक को साधने की ऐसी कवायद है जिसमें पक्ष और विपक्ष बाबा साहेब के सहारे एक-दूसरे पर हमलावर हैं। आलम यह है कि दोनों ओर से अम्बेडकर के अपमान और सम्मान को लेकर आरोप-प्रत्यारोप के बीच मामला संसद से पुलिस थाने तक जा पहुंचा है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या अम्बेडकर के नाम पर सियासी जंग का असर आगामी दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगा या फिर चुनाव से पहले यह मुद्दा फुस्स हो जाएगा?
देश में इन दिनों अम्बेडकर के नाम पर सियासत तेज हो गई है। आलम यह है कि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान संविधान पर शुरू हुई चर्चा विपक्ष के विरोध-प्रदर्शन, सांसदों की धक्का-मुक्की के बाद राजनीतिक रंग में बदल गई है। एक ओर जहां भाजपा ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (बीएनएस) की धारा 117, 125, 131, 351 और 3(5) के तहत मामला दर्ज कराया है, वहीं कांग्रेस ने भी संसद परिसर में मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ अभद्रता का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई है। ऐसे में सबसे पहले जानते हैं आखिर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अम्बेडकर को लेकर ऐसा क्या कहा जो देश की सियासत गरमा गई है।
क्या कहा अमित शाह ने
संसद में संविधान पर बहस हो रही थी तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कांग्रेस और विपक्ष को टारगेट कर कहा, ‘अभी एक फैशन हो गया है, अम्बेडकर, अम्बेडकर, अम्बेडकर। इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिलता।’ अपने भाषण में अमित शाह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहली कैबिनेट से अम्बेडकर के इस्तीफे का जिक्र कर रहे थे। कांग्रेस की ओर इशारा करते हुए शाह ने कहा कि अब चाहे अम्बेडकर का नाम सौ बार ज्यादा लो लेकिन साथ में अम्बेडकर जी के प्रति आपका भाव क्या है, ये वह बताएंगे। अमित शाह ने कहा, ‘अम्बेडकर ने देश की पहली कैबिनेट से इस्तीफा क्यों दे दिया? उन्होंने कई बार कहा कि वह अनुसूचित जातियों और जनजातियों के साथ होने वाले व्यवहार से असंतुष्ट हैं। उन्होंने सरकार की विदेश नीति से असहमति जताई थी, अनुच्छेद 370 से भी सहमत नहीं थे। अम्बेडकर को आश्वासन दिया गया था, जो पूरा नहीं हुआ, इसलिए कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था।’ अमित शाह ने कहा, ‘जिसका विरोध करते हो उसका वोट के लिए नाम लेना कितना उचित है।’ उनकी यह टिप्पणी अब विवादों में है।
हमलावर हुआ विपक्ष
अमित शाह के बयान को लेकर कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल आपत्ति जता रहे हैं और उनसे माफी मांगने के लिए कह रहे हैं। कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा, जिस तरह से एक दलित नेता का अपमान किया गया और उन्हें धक्का दिया गया यह सब एक साजिश है। कांग्रेस की ओर से सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी बीजेपी पर हमला करते हुए कहा कि उनकी एफआईआर झूठी है। यह एफआईआर राहुल के खिलाफ नहीं, बल्कि अम्बेडकर के खिलाफ है। गृहमंत्री अमित शाह द्वारा संसद में अम्बेडकर पर दिए गए बयान को न केवल कांग्रेस, बल्कि आम आदमी पार्टी, लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी सहित कई विपक्षी दलों ने भी प्रमुखता से उठाना शुरू कर दिया है। लालू प्रसाद यादव ने शाह को सियासत से संन्यास लेने की सलाह देते हुए कहा कि अमित शाह ने उनके भगवान का अपमान किया है।
तेजस्वी यादव ने अमित शाह के बयान को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर लिखा है, ‘भाजपाई कान खोलकर सुन लें बाबा साहेब अम्बेडकर हमारे फैशन, पैशन, इंस्पेरशन और मोटिवेशन भी हैं। आरएसएस और भाजपा वालों ने पहले महात्मा गांधी को गाली दी, फिर जननायक कर्पूरी ठाकुर को दी, फिर नेहरू को दी और अब अम्बेडकर को गाली दे रहे हैं। इनके अपने तो सब नेता माफीवीर रहे, इसलिए देश के महापुरुषों को अपमानित कर रहे हैं।’ इस मुद्दे पर विपक्षी दलों के नेताओं ने संसद में प्रदर्शन भी किया और मल्लिकार्जुन खड़गे ने जहां पीएम मोदी से अमित शाह को अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की मांग तक उठा दी है तो अरविंद केजरीवाल ने भी बड़ा दांव खेल केंद्र में एनडीए की सहयोगी जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार और टीडीपी चीफ एन. चंद्रबाबू नायडू को खत लिख एनडीए से अपना समर्थन वापस लेने के लिए विचार करने को कहा है। केजरीवाल ने सवाल पूछा है कि ‘देश की जनता माननीय नीतीश और चंद्रबाबू नायडू जी से पूछना चाहती है ‘क्या आप अमित शाह द्वारा किए गए बाबा साहेब के अपमान का समर्थन करते हैं।’
शाह के बयान पर विपक्ष की आक्रामकता इतनी बढ़ गई है कि भाजपा इसे लेकर गम्भीर हो गई है। सदन में बयान के बाद अमित शाह को प्रेस कान्फ्रेंस कर सफाई देनी पड़ी कि उन्होंने यह बात क्यों कही। इसके बाद भी मामला शांत नहीं हुआ तो पीएम मोदी को खुद मैदान में उतरना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर एक के बाद एक छह पोस्ट करके कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर कहा कि संसद में गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के अम्बेडकर के अपमान करने वाले और एससी-एसटी को नजरअंदाज करने के काले इतिहास को उजागर कर दिया तो अब कांग्रेस नाटकबाजी करने लगी है। कांग्रेस के अम्बेडकर के प्रति पापों की लम्बी फेहरिश्त है जिसमें दो बार चुनाव हारना भी शामिल है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या अम्बेडकर के अपमान का मुद्दा दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगा या फिर चुनाव से पहले यह मुद्दा फुस्स हो जाएगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सबसे पहले तो विपक्ष
भीमराव अम्बेडकर के संविधान को लेकर उनकी खूब चर्चा करता है। विपक्ष यह कहने से नहीं चूकता कि भाजपा बाबा साहेब के संविधान को बदलना चाहती है। नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान जब 400 पार सीटें जीतने का नारा दिया तब विपक्ष ने यही प्रचारित किया कि भाजपा को इतनी सीटें संविधान को बदलने के लिए चाहिए। जबकि भाजपा आरोप लगाती आई है कि विपक्ष अम्बेडकर नाम तो जपता है, लेकिन उन्हें सम्मान देने की पूर्ववर्ती सरकारों ने कभी जरूरत नहीं समझी। उन्हें भारत रत्न लायक कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों ने नहीं समझा, जबकि कांग्रेस अपने ही जीवित नेताओं को उनके सक्रिय सियासी जीवन में ही भारत रत्न सम्मान देने से नहीं चूकी। दोनों राजनीतिक दल खुद ज्यादा अम्बेडकर समर्थक बताकर दलित वोट बैंक पर सेंध लगाना चाहते हैं। क्योंकि बाबा साहेब के नाम से दुनियाभर में मशहूर डॉ. भीमराव अम्बेडकर भारतीय संविधान ही नहीं, बल्कि राजनीति के केंद्र बन चुके हैं। दलित और शोषित-पीड़ित समाज अम्बेडकर को अपना मसीहा मानता है। यही वजह है कि अम्बेडकर अपने जीवन में जिस सियासी दल और विचाराधारा के खिलाफ खड़े थे, वो भी आज उन्हें अपनाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। अमित शाह ने यह बात शायद इसलिए कही थी कि विपक्ष लगातार संविधान और इसमें किए आरक्षण के प्रावधान को लेकर भाजपा के खिलाफ नैरेटिव गढ़ता रहा है। विपक्षी नेता संविधान की प्रति लेकर घूमते हैं। विपक्ष ने लोकसभा चुनाव के दौरान कहा था कि भाजपा संविधान को बदलने और आरक्षण खत्म करने की तैयारी में है। इसमें विपक्ष को काफी हद तक कामयाबी भी मिली थी।
जहां तक सवाल है दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्ष का अम्बेडकर वाला दांव का तो जिस तरह से अमित शाह के बयान पर विपक्ष ने कोहराम मचाया है उससे यह बात साफ हो गई है कि आने वाले चुनावों में यह मुद्दा जरूर बनेगा। इसी बहाने विपक्ष अपने नैरेटिव को स्थापित करने की कोशिश करेगा कि भाजपा जब अम्बेडकर से इतना घृणा करती है तो उनके संविधान के प्रति उसका क्या रुख होगा। संविधान में की गई आरक्षण की व्यवस्था को बदलने का प्रयास करने का आरोप विपक्ष पहले से ही भाजपा पर लगाता रहा है। लालू यादव ने कहा भी है कि अमित शाह के बयान से अम्बेडकर के प्रति घृणा साफ झलकती है।
बीजेपी अक्सर ऐसे बयानों में उलझ जाती है। अब तक कई ऐसे मौके आए हैं जब भाजपा को बयानों में उलझ कर नुकसान उठाना पड़ा है। इनमें पहला बयान संघ प्रमुख मोहन भागवत का रहा जो उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान 2015 में दिया था। उन्होंने कहा था कि आरक्षण लागू हुए लंबा समय बीत गया है अब इसकी समीक्षा करने की जरूरत है। लालू यादव ने तब उनके बयान को लपक लिया था और यह नैरेटिव गढ़ा कि भाजपा आरक्षण खत्म करना चाहती है। विधानसभा चुनाव में लालू के इस नैरिटव से भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा था।
दिल्ली में फरवरी 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी ने इसे बाबा साहेब का अपमान बताते हुए चुनावी मुद्दा बनाने की बात कही है। यह मुद्दा ‘आप’, कांग्रेस और भाजपा के लिए केंद्र बिंदु बन गया है। अम्बेडकर की विरासत को लेकर आरोप-प्रत्यारोप से चुनावी चर्चा प्रभावित होने की उम्मीद है। खासकर दिल्ली की कुल 70 में से उन 12 सीटों पर जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। दिल्ली में दलितों की आबादी 16.7 प्रतिशत है। इस ताने-बाने में कुछ क्षेत्र अपनी दलित आबादी के केंद्रित होने के कारण अलग-अलग महत्व रखते हैं। ऐसी स्थिति में इन समुदायों के मतदाता भाजपा से दूरी बना सकते हैं।
अम्बेडकर के बहाने वोट बैंक पर नजर
अम्बेडकर के अपमान और सम्मान की इस राजनीति में बीजेपी यह बता रही है कि अम्बेडकर के जीवित रहते और मृत्यु के बाद भी कांग्रेस ने हमेशा उनका अपमान किया, वहीं कांग्रेस यह बताने में जुटी है कि बीजेपी के मन में अम्बेडकर और संविधान को लेकर श्रद्धा नहीं है। इस तरह से दोनों की नजर अम्बेडकर के बहाने उस बड़े वोट बैंक को साधने की है जो बाबा साहेब को सियासी और समाजिक मसीहा मानते हैं।
कांग्रेस क्यों बता रही बाबा साहेब का अपमान?
लोकसभा चुनाव 2024 में संविधान और आरक्षण का नैरेटिव सेट करना इंडिया गठबंधन के लिए कुछ हद तक सफल रहा था, जिसके चलते दलित समाज बीजेपी से छिटक गया था। लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी संविधान की कापी लेकर वोट मांग रहे थे और संसद में भी हाथ में संविधान लेकर विपक्ष के कई सांसदों ने शपथ ली थी। यही वजह है कि कांग्रेस राज्यसभा में अमित शाह के दिए गए बयान को बाबा साहेब का अपमान बताकर दलित समाज का विश्वास जीतना चाहती है। जिसके लिए उसने आक्रमक रुख अख्तियार कर रखा है।
अम्बेडकर और कांग्रेस के बीच रिश्ते
कांग्रेस और अम्बेडकर के बीच पहला टकराव 1930 में गोलमेज सम्मेलन के दौरान हुआ था। बाबा साहेब दलितों के लिए अलग निर्वाचिका यानी निर्वाचन क्षेत्र की मांग कर रहे थे। उनका तर्क था कि दलितों को राजनीतिक तौर पर सशक्त करने के लिए अलग प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है। जबकि गांधी जी इसके विरोध में थे। उनका तर्क था कि इससे हिंदू समाज विभाजित होगा।1932 में गांधी जी ने इसके खिलाफ आमरण अनशन शुरू कर दिया था। इसके बाद पूना समझौता हुआ जिसमें अलग निर्वाचिका की जगह आरक्षित सीटों का प्रावधान किया गया।
अम्बेडकर जवाहर लाल नेहरू सरकार में कानून मंत्री थे। हालांकि 1951 में 27 सितंबर को उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसका कारण वैचारिक मतभेद था जो हिंदू कोड बिल से उपजा। अम्बेडकर हिंदू कोड बिल के समर्थक थे जिसमें महिलाओं को संपत्ति, विवाह और तलाक का समान अधिकार दिया जाना था। यह बिल संसद में पास नहीं हो सका इससे अम्बेडकर बेहद निराश हुए। इसके अलावा उन्होंने ये महसूस किया कि कांग्रेस दलितों के अधिकारों के प्रति गंभीर नहीं थी। इसके बाद वह अनुसूचित जातियों को संगठित करने में जुट गए और ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन नामक संगठन बनाया। कांग्रेस की अंतरिम सरकार से इस्तीफा देने के एक साल बाद ही चुनाव हुए। इसमें बाबा साहेब उत्तर मध्य निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतरे। इस चुनाव में काजरोलकर को जीत मिली जो कांग्रेस उम्मीदवार थे। इसके अलावा वह 1954 में बम्बई की भंडारा सीट से उपचुनाव में खड़े हुए यहां भी वह कांग्रेस उम्मीदवार से हारे। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली। दोनों ही चुनावों में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनके खिलाफ चुनाव प्रचार भी किया था। कांग्रेस और अम्बेडकर में शुरुआत से ही वैचारिक मतभेद थे जो समय-समय पर सामने आते रहते थे।

