Uttarakhand

बढ़ रहा काजी का कारवां

उत्तराखण्ड में आगामी 10 जुलाई को होने वाले दो विधानसभा उपचुनाव पर पूरे देश की नजर है। यह दोनों चुनाव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कद तय करेंगे। पिछले साल चंपावत और बागेश्वर उपचुनाव में विजय पताका फहराने के बाद हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में तीसरी बार पांचों लोकसभा सीट जीतकर मुख्यमंत्री धामी अति उत्साहित हैं। सियासी गलियारों में चर्चा लेकिन यह है कि बदरीनाथ और मंगलौर का चुनावी समर धामी के विजय रथ की अग्नि परीक्षा ले रहा है। फिलहाल मंगलौर में भाजपा के लिए करतार सिंह भडाना को चुनाव लड़ाना कड़ी चुनौती साबित हो रहा है। भड़ाना धनबल पर चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन पार्टी नेता उनके साथ मन से काम करने के बजाय औपचारिकता निभाते नजर आ रहे हैं। सहानुभूति फैक्टर और बसपा का उम्मीदवार होने के बावजूद उदेबुर्रहमान उर्फ मोंटी सबसे कमजोर साबित हो रहे हैं तो वहीं कांग्रेस के काजी निजामुद्दीन मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं

हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में उत्तराखण्ड की पांचों सीटें लगातार तीसरी बार जीत कर इतिहास रचने वाली भाजपा मंगलौर विधानसभा सीट पर बढ़े मनोबल के साथ उप चुनाव लड़ रही है। भाजपा मंगलौर विधानसभा सीट के उपचुनाव को हर हाल में फतह करके यहां से लगातार चुनाव हारने वाले मिथक को तोड़ने को आतुर है। पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए इस उपचुनाव में भाजपा नई व्यूह रचना के साथ मैदान में है। इसके लिए पार्टी ने विधानसभा क्षेत्र के सभी 132 बूथों के लिए जबरदस्त तैयारी की है। यहां तक कि 32 शक्ति केंद्र बनाए हैं। एक शक्ति केंद्र 4 बूथ का बनाया गया है। पार्टी के प्रांतीय से लेकर मंडल, बूथ प्रवासी और पन्ना प्रमुख के साथ ही जमीनी स्तर तक पदाधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जा चुकी है। भाजपा को अपनी जीत का एक आधार यह भी नजर आ रहा है कि मुस्लिम मतदाता यहां कांग्रेस और बसपा के बीच बट जाएगा और हिंदू वोट एकमत होकर उसे मिल जाएगा, जिसकी संभावनाएं कम दिख रही है। पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन को देखें तो इस सीट पर उसे अब तक सबसे अधिक 24101 वोट 2019 के लोकसभा चुनाव में मिले। 2024 के आम चुनाव में उसके वोट घटकर 21000 रह गए। जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा यहां 16964 वोट ही हासिल कर पाई। 2022 की बात करें तो उसे 18763 वोट मिले थे। इस तरह देखें तो पांच साल में वह 1799 वोट ही बढ़ा सकी। एक भी चुनाव ऐसा नहीं देखा जिसमें वह कांग्रेस और बसपा के आस-पास भी नजर नहीं आई हो।

भाजपा के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उसके अपने ही नेता पार्टी प्रत्याशी करतार सिंह भड़ाना को मन से चुनाव नहीं लड़ा रहे हैं। पार्टी नेता सिर्फ औपचारिकता पूरी करते नजर आ रहे हैं। भाजपा के लिए नुकसानदायक बात यह भी है कि यहां पूर्व मंत्री यतीश्वरानंद चुनावी बागडोर संभाले हुए हैं। उनसे दलित मतदाता पूरी तरह से दूरी बनाता दिख रहा है। कारण पिछले दिनों एक दलित युवती से रेप और हत्या का आरोपी है वह भाजपा का ओबीसी कार्य समिति सदस्य आदित्य राज सैनी है। सैनी को स्वामी यतीश्वरानंद का खास बताया जाता है। इसके अलावा दलितों की नाराजगी की एक वजह दो साल पूर्व बेलड़ा कांड भी है जिसमें एक दलित युवक की हत्या कर दी गई थी। हत्या के आरोपियों को बचाने के आरोप भी स्वामी यतीश्वरानंद पर लगे हैं। दलितों की यहां 22 हजार वोट है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस चुनाव से स्थानीय सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत तथा पूर्व कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक भी दूरी बनाए हुए हैं। भाजपा के ही लोगों का कहना है कि अगर करतार सिंह भड़ाना हारते हैं तो इसका ठीकरा स्वामी के सिर पर ही फूटेगा और अगर जीतते हैं (जिसकी बहुत कम संभावना है) तो सेहरा भी स्वामी के सिर पर ही बंधेगा।

भड़ाना क्योंकि पैराशूट प्रत्याशी हैं जिसे स्थानीय नेता खासकर गुर्जर स्वीकार नहीं कर रहे हैं। उनका हरियाणा से आकर चुनाव लड़ना स्थानीय गुर्जर नेताओं को अखर रहा है। बताया जा रहा है कि पूर्व विधायक कुंवर प्रणव सिंह चैम्पियन यहां से चुनाव लड़ने की दावेदारी पेश कर रहे थे लेकिन पार्टी ने ऐन मौके पर भड़ाना को टिकट दे दिया और चुनाव लड़वाया है। भड़ाना का नाम यूं तो हरियाणा से लेकर यूपी तक चुनाव लड़कर अपनी नेतागिरी चमकाने में आता रहा है। वह पूर्व में हरियाणा में चौटाला सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। लेकिन इसके पीछे उनका सामाजिक सरोकारों से दूर-दूर तक नाता नहीं बताया जाता है। वह सिर्फ धनबल और बाहुबल पर ही राजनीतिक यात्रा करते रहे हैं। उनकी यह यात्रा हरियाणा और यूपी से होते हुए अब उत्तराखण्ड तक जा पहुंची है। भड़ाना को एक राजनेता से ज्यादा खनन कारोबारी के रूप में जाना जाता रहा है। उत्तराखण्ड में आकर चुनाव लड़ने के पीछे भी उनका मकसद हरिद्वार गंगा नदी में खनन बताया जा रहा है। भड़ाना को टिकट दिलाने के पीछे उत्तराखण्ड प्रभारी दुष्यंत गौतम की अहम भूमिका बताई गई है।

भड़ाना के बारे में चर्चा यह है कि वह पैसे के बल पर मतदाताओं को प्रभावित कर रहे हैं। भाजपा के एक कार्यकर्ता ने बताया कि पार्टी के हर नेता को वह चुनाव प्रचार में घूमने के लिए एक गाड़ी और 20 हजार रुपए प्रतिदिन दे रहे हैं। भड़ाना का मतदाताओं पर बेशुमार खर्चा का एक उदाहरण यह भी बताया जा रहा है कि उन्होंने स्थानीय मतदाताओं के लिए तीन होटलों के दरवाजे खुलवाए हुए हैं जिनमें होटल पैसेफिक, होटल सैंट्रम और एक अन्य होटल है। यहां मतदाताओं के लिए खान-पान की निशुल्क सुविधा उपलब्ध बताई जा रही है।

भाजपा इस उप चुनाव को जीतने के लिए बहुत पहले से ही गोटियां फिट करने में लगी हुई थी। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उपचुनाव से पहले ही भाजपा ने विभिन्न दलों में सेंधमारी प्रारंभ कर दी थी। इसी कड़ी में मंगलौर सीट से पूर्व में विधानसभा चुनाव लड़ चुके आम आदमी पार्टी के नेता नवनीत राठी, आर्य समाज नारसन के संरक्षक स्वामी सत्यानंद और जिला पंचायत सदस्य अरविंद राठी को भाजपा में शामिल करा लिया था। इन नेताओं के साथ ही बड़ी संख्या में इनके कार्यकर्ताओं और पंचायत प्रतिनिधियों ने भी भाजपा का दामन थाम लिया था। इसके अलावा यहां जाट मतदाताओं को पार्टी के पाले में लाने के लिए रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी को बुलाया गया है। वे 6 जुलाई को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ एक रैली में शामिल होंगे। लेकिन वहीं दूसरी तरफ भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने जाटों के साथ ही अन्य मतदाताओं को भाजपा से दूरी बनाने के लिए कहकर राजनीति को गर्मा दिया है। गत दिनों टिकैत मंगलौर विधानसभा के गांव में पहुंचे थे। जहां उन्होंने किसान नेता चंद्रपाल बालियान की तेरहवीं कार्यक्रम के बाद मौके पर मौजूद लोगों से भाजपा का नाम लिए बिना ही कहा कि झूठी और बेईमान पार्टी से दूर ही रहें।

गौरतलब है कि मंगलौर सीट से दो बार विधायक रहे बसपा के कद्दावर नेता विधायक हाजी सरवत करीम अंसारी का 30 अक्टूबर को नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में निधन हो गया था। पूर्व में मंगलौर सीट पर सरवत करीम अंसारी और कांग्रेस के काजी मोहम्मद निजुमाद्दीन के बीच कड़ा मुकाबला होता रहा है। 2012 के विधानसभा चुनाव में सरवत करीम अंसारी ने कांग्रेस के काजी मोहम्मद निजामुद्दीन को हराकर जीत दर्ज की थी। जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के काजी निजामुद्दीन ने बसपा के सरवत करीम अंसारी को हराकर हिसाब चुकता कर लिया था। इसके बाद 2022 के चुनाव में सरवत करीम अंसारी ने कांग्रेस के काजी निजामुद्दीन को फिर पटखनी दे दी थी। इस बार हाजी सरबत करीम अंसारी के पुत्र चुनावी महासमर में उतर चुके हैं।

हालांकि अगर सहानुभूति फैक्टर से देखें तो यहां सबसे मजबूत उम्मीदवार उदेबुर्रहमान उर्फ मोंटी दिवंगत विधायक हाजी सरबत करीम अंसारी के पुत्र हैं। जिन्हें बसपा ने अपना कंडीडेट बनाया है। वैसे भी बसपा यहां से अब तक के हुए चार विधानसभा चुनावों में से तीन में विजयी रही है। उदेबुर्रहमान उर्फ मोंटी का सहानुभूति फैक्टर और दूसरा बसपा से टिकट होने के साथ ही तीसरा प्लस प्वाइंट यह है कि वे मुस्लिम मतों में सबसे ज्यादा संख्या वाले अंसारी समाज से आते हैं। अंसारी समाज के मतदाताओं की संख्या यहां 20, 000 है। लेकिन इसके बावजूद भी उनके लिए इस बार जीत का आधार बनता नहीं दिखाई पड़ रहा है। कारण यह है कि मोंटी एक अपरिपक्व नेता हैं। जिस तरह उनके पिता मंगलौर की जनता में
लोकप्रिय हुआ करते थे वहीं वे मतदाताओं के बीच अपनी मजबूत पकड़ नहीं बना पाए हैं। पिता की मौत के बाद मोंटी पहली बार राजनीतिक रण में उतरे हैं वह भी सीधा विधानसभा का उपचुनाव लडने को। ऐसे में उनकी राजनीतिक दांव-पेंच में निपुणता ना होना उनका पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण है। उनके साथ चुनाव प्रचार में भी बहुत कम लोग देखे जा रहे हैं। उनके लिए चिंता का विषय यह है कि उनके चुनावी पिटारे में जो उनकी पार्टी का कैडर वोट था वह भी उनसे खिसक रहा है। बसपा के कैडर वोट दलितों में कांग्रेस के उम्मीदवार काजी निजामुद्दीन सेंध लगा रहे हैं।

इस समय सबसे मजबूत उम्मीदवार अगर कोई दिखाई दे रहा है तो वह कांग्रेस के काजी निजामुद्दीन ही हैं। काजी यहां से पूर्व में तीन बार विधायक रह चूके हैं। उनकी सबसे अच्छी बात यह है कि वे मुस्लिम मतों के साथ ही हिंदू मतदाताओं के बीच भी अपनी पैठ बनाए हुए हैं। पूरे प्रदेश में एकमात्र मंगलोर विधानसभा सीट ही ऐसी थी जिसमें गत लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा वोट कांग्रेस को मिले थे। यहां कांग्रेस भाजपा से करीब 23000 मत अधिक लेकर आई। इस आधार को देखें तो कांग्रेस अपनी जीत के प्रति यहां आशान्वित नजर आती है।

काजी निजामुद्दीन का पॉलिटिकल बैकग्राउंड भी उनका मजबूत स्तंभ रहा है। काजी निजामुद्दीन के पिता मोहीउदद्दीन काजी पांच बार यूपी विधानसभा के सदस्य चुने गए। वह राज्य गठन के बाद उत्तराखण्ड की अंतरिम विधानसभा के सदस्य बने और सबसे वरिष्ठ सदस्य होने के नाते उन्होंने वर्ष 2000 में राज्य की अंतरिम विधानसभा के प्रोटेम स्पीकर के रूप में भी काम किया। 10 नवम्बर 2015 को उनका निधन हो गया। इसके बाद उनकी राजनीतिक बागडोर काजी निजामुद्दीन ने संभाली।

काजी निजामुद्दीन का राजनीतिक प्रभाव न केवल उत्तराखण्ड में है, बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी भी है। वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव रह चुके हैं और राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सह प्रभारी के रूप में कार्यरत रहे हैं। 2017 में उन्हें राष्ट्रीय निकाय की कोर टीम में शामिल किया गया था। काजी निजामुद्दीन का राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट से खासा याराना है। शायद यही वजह है कि सचिन पायलट मंगलौर में आकर काजी के पक्ष में गुर्जर समाज की वोटों को साधेंगे। गुर्जरों में सचिन पायलट को सिरमौर नेता माना जाता है। यहां गुर्जर मतदाता भी चुनाव को खासा प्रभावित करतें हैं। कांग्रेस के ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व विधायक यशवीर सिंह के पुत्र रहे तथा झबरेडा नगर पालिका के चेयरमैन गौरव चौधरी भी गुर्जर ही हैं। चौधरी काजी निजामुद्दीन की जीत सुनिश्चित कराने के लिए पहले से ही चुनाव मैदान में उतरे हुए हैं। जिन गुर्जर मतों को भाजपा कैंडिडेट करतार सिंह भड़ाना अपना बताकर दावा कर रहे हैं गौरव चौधरी उनके इस दावे की हवा निकाल रहे हैं। इसी के साथ पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी बद्रीनाथ के बाद मंगलोर के चुनावी रण में अपने राजनीतिक कौशल का इस्तेमाल कर वोटों को प्रभावित कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि मंगलौर विधानसभा एक मुस्लिम बाहुल्य विधानसभा है, यहां पर जाति समीकरण के हिसाब से मुस्लिमों में सबसे ज्यादा अंसारी और तेली जाति का दबदबा है। इसके अलावा इस सीट पर जाट, गुर्जर, अंसारी, तेली और दलित निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं। पिछले चुनाव जहां पूरी तरह जातीय गोलबंदी पर लड़े जाते रहे, वहीं इस बार जातीय समीकरण के साथ-साथ विकास का फैक्टर भी काम कर रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सीवर, सड़क, किसान समस्या, बिजली, मूल निवास प्रमाण पत्र जैसे मुद्दे यहां हैं। लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा भाजपा के कैंडिडेट के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। यह मुद्दा है करतार सिंह भड़ाना का बाहरी प्रत्याशी होना। भड़ाना का बाहरी होना स्थानीय नेताओं को अंदर ही अंदर कचोट रहा है। उन्हें लग रहा है कि हरियाणा का एक नेता उनके राजनीतिक हकों पर डाका डालने यहां आ गया। देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा अपनी पार्टी के नेताओं को इस मुद्दे पर कैसे संतुष्ट करती है?

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