वर्ष 1968 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा गठित भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) इन दिनों एक अजीबो-गरीब संकट का सामना कर रही है। यह संकट अमेरिकी सरकार द्वारा गिरफ्तार किए गए एक भारतीय नितिन गुप्ता के चलते शुरू हुआ। गुप्ता को अमेरिकी सरकार ने खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या का षड्यंत्र रचने और मनी लॉन्ड्रिंग करने समेत कई गम्भीर अपराधों का आरोपी बनाया है। रॉ का संकट लेकिन अमेरिका द्वारा विकास यादव नामक एक पूर्व रॉ एजेंट चलते पैदा हुआ है जिसे अमेरिका ने पन्नू की हत्या के लिए भाड़े के हत्यारों को कॉन्ट्रेक्ट देने का दोषी माना है। अब खुफिया जगत में रॉ की भारी किरकिरी हो रही है

खालिस्तानी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू भारत को आए दिन आतंकी हमले करने की धमकी देता रहता है। पन्नू की दोहरी नागरिकता उसके लिए हर बार फायदेमंद साबित हुई है। यही वजह है कि अमेरिकी नागरिक होने की वजह से अमेरिका पन्नू की पैरवी करने में लगा है और भारतीय खुफिया एजेंसी समेत भारत सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। कभी कनाडा, कभी अमेरिका में रहने वाले गुरपतवंत सिंह पन्नू ने दोनों देशों की नागरिकता ले रखी है और भारत ने इसे 2020 से आतंकी घोषित कर रखा है। कथित तौर पर कहा जाता है कि भारतीय खुफिया एजेंसी (रॉ) ने खालिस्तानी नेताओं को अंजाम तक पहुंचाने की योजना बनाई थी। लेकिन अमेरिका में पन्नू के लिए बिछाए गए जाल में वो खुद फंस गया जिससे भारत सरकार और खुफिया तंत्र सवालों के घेरे में है।

बीते 18 अक्टूबर को अमेरिकी सरजमीं पर पन्नू को मारने की साजिश रचने के खिलाफ न्यूयॉर्क के अमेरिकी जिला न्यायालय में मुकदमा दर्ज किया गया है। जिसमें न्याय विभाग ने विकास यादव और उसके सहयोगी निखिल गुप्ता उर्फ निक पर पन्नू की हत्या के लिए सुपारी देने, हत्या की साजिश रचने और मनी लॉर्ड्रिंग का आरोप लगाया है। पिछले साल अमेरिका ने चेकिया में निखिल गुप्ता को गिरफ्तार किया था और इस वर्ष प्रत्यर्पण कर उसे अमेरिका लाया गया है। अमेरिका के अटॉर्नी जनरल मेरिक बी गारलैंड का कहना है कि ‘न्याय विभाग अमेरिकियों को निशाना बनाने, उन्हें खतरे में डालने और उनके अधिकारों को कमजोर करने के प्रयासों को बर्दाश्त नहीं करेगा, जिनका हर अमेरिकी नागरिक हकदार है।’

न्यूयॉर्क कोर्ट में दायर अभियोग के अनुसार विकास यादव ने निखिल गुप्ता को और गुप्ता ने भाड़े के हत्यारे को तय किया था, जो कि अमेरिका खुफिया जांच एजेंसी सीआईए का एजेंट था। खुफिया एजेंट को ही किलर मैन मानते हुए उसे ‘टारगेट’ की हत्या के लिए एक लाख डॉलर यानी 83 लाख रुपए की सुपारी दी गई। उसे न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में 15 हजार डॉलर एडवांस में दे दिए गए। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि रॉ का यह मिशन उसके ही बचकानी योजना से विफल रहा है। जिससे भारतीय खुफिया एजेंसी की तीखी आलोचना की जा रही है। भारतीय खुफिया एजेंसी के साथ काम कर चुके एक अधिकारी को सबूतों के साथ अमेरिका द्वारा पकड़ा जाना उसके लिए शर्मिंदगी की बात मानी जा रही है।

अमेरिकी न्याय विभाग (यूएसडीओजे) द्वारा लगाए गए आरोप दिन पर दिन गंभीर होते जा रहे हैं। आरोपों के मुताबिक कनाडा में हरदीप सिंह निज्जर और अमेरिका में पन्नू की हत्या के साजिश के तार आपस में मिले हुए हैं। जिस महीने पन्नू को मारने की साजिश रची गई उसी महीने कनाडा में खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या हुई थी। अमेरिकी न्याय विभाग के कहने अनुसार यादव ने खुद को भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का ‘सीनियर फील्ड ऑफिसर’ बताया था, जिसे ‘सुरक्षा प्रबंधन’ और ‘खुफिया’ सूचनाएं जुटाने की जिम्मेदारी मिली है। अमेरिका द्वारा विकास यादव पर भारत में बैठकर पन्नू की हत्या की प्लानिंग करने का आरोप लगाया गया है। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के पूर्व अधिकारी यादव घटना के समय कथित तौर पर रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के साथ काम कर रहे थे।

समय से पहले ही क्यों दिया गया पन्नू की हत्या का निर्देश
कहा जा रहा है कि सीआरपीएफ के पूर्व अधिकारी विकास यादव जो कथित तौर पर भारतीय खुफिया एजेंसी के एजेंट ने इस मिशन को अंजाम देने के लिए निखिल गुप्ता को हायर किया। यादव और गुप्ता की ज्यादातर बातचीत फोन पर और एनक्रिप्टेड एप्लीकेशंस के जरिए हुई। यादव ने एनक्रिप्टेड ऐप पर गुप्ता से सम्पर्क कर उसे अपना नंबर अमन के नाम से सेव करने के लिए कहा और उसे आश्वासन दिया की उसके खिलाफ भारत में दर्ज मामले रद्द कर दिए जाएंगे। दरअसल निखिल गुप्ता ऐसा व्यक्ति है जिस पर अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थों और हथियारों की तस्करी का मामला दर्ज था। गुप्ता ने आगे पन्नू की हत्या करवाने के लिए एक अन्य आदमी सीएस को चुना जिसके बारे में उसे लगा कि वह आपराधिक पृष्ठभूमि वाला है। लेकिन वह अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसी के लिए गोपनीय सूत्र के तौर पर काम करने वाला एजेंट था। इस एजेंट ने गुप्ता को यूसी’ से मिलाया, जो असल में गोपनीय तरीके से काम करने वाला अमेरिकी एजेंसी ड्रग एन्फोर्समेंट एजेंसी, का अधिकारी था। डीईए अमेरिकी न्याय विभाग की एजेंसी है जो नियंत्रित पदार्थों की तस्करी से जुड़े अपराधों पर नियंत्रण रखने का काम करती है। अभियोग के अनुसार डीईए के अधिकारी यूसी के सामने निखिल गुप्ता ने हरदीप सिंह निज्जर और गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या कराने के लिए भाड़े के हत्यारे देने के लिए कहा था। जिसके लिए एक लाख अमेरिकी डॉलर देने की बात तय हुई। 9 जून, 2023 को न्यूयॉर्क के मैनहट्टन स्थित सूत्र के जरिए 15 हजार डॉलर का नकद अग्रिम भुगतान भी किया गया, जिसका उल्लेख भी अभियोग-पत्र में किया गया है। योजना के मुताबिक विकास यादव निखिल गुप्ता के जरिए डीएई अधिकारी यूसी को पन्नू का पता, फोन नंबर और दिनचर्या की पूरी जानकारी एक के बाद एक देने लगा। यादव इस काम को अंजाम तक पहुंचाने की हर जानकारी चाहता था। यही वजह थी कि जो तस्वीरें यूसी द्वारा गुप्ता को भेजी गई वो तस्वीरें गुप्ता यादव को भिजवाता था। निखिल गुप्ता और यादव पन्नू की हत्या को अंजाम जल्द से जल्द देना चाहते थे लेकिन उन्होंने यूसी को साफ कह दिया था पन्नू की हत्या का समय 21 जून, 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के आस-पास न हो। हालांकि पन्नू की हत्या तो नहीं लेकिन कनाडा में प्रधानमंत्री के अमेरिकी दौरे के तीन दिन पहले कनाडा में खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या जरूर हो गई । जिसका वीडियो कथित तौर पर विकास यादव ने निखिल गुप्ता को भेजा। जिसके बाद गुप्ता ने भाड़े के हत्यारे को निश्चित समय से पहले ही मौके को देखते हुए पन्नू की हत्या को अंजाम देने का निर्देश दिया।

अमेरिकी अभियोग पत्र के अनुसार सीएस को निखिल गुप्ता ने कहा था कि ‘29 जून से पहले हमें हर हाल में चार काम तो पूरे करने ही हैं।’ उसे पन्नू और ‘कनाडा के तीन लक्ष्यों’ के संदर्भ में बताया गया। विकास यादव और निखिल गुप्ता की यह पूरी योजना तब फेल हुई जब 30 जून, 2023 को निखिल गुप्ता को पन्नू की हत्या के आरोप में अमेरिका के अनुरोध पर प्राग में गिरफ्तार कर लिया गया और उसे अमेरिका को सौंप दिया गया। जिस पर अब मुकदमा अमेरिका में चलाया जा रहा है। एक तरफ भारत को यहां सफाई देनी पड़ रही है, वहीं कनाडा ने भी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर भारत के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है। कनाडा का भी मानना है कि इस हत्या के पीछे भारतीय एजेंट का हाथ है हालांकि उसके पास इसका कोई सबूत नहीं है।

गुप्ता को इस काम के लिए हायर करना यादव की बेवकूफी मानी गई और विकास यादव को पन्नू का मामला सौंपना रॉ का नौसिखियापन माना जा रहा है। खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) की एक और नासमझी देखी गई। एक तरफ भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह मानने से इंकार कर दिया कि विकास यादव उसका कर्मचारी है। वहीं निखिल गुप्ता का अभियोग सार्वजनिक होने के दो महीने बाद ही विकास यादव को रॉ की सहयोगी एजेंसी एविएशन रिसर्च सेंटर में वरिष्ठ फील्ड ऑफिसर बना दिया गया। इस बीच यह भी सामने आया है कि दिसम्बर 2003 में दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ ने विकास यादव को अपहरण और फिरौती के मामले में गिरफ्तार किया था लेकिन इस साल अप्रैल में जमानत पर रिहा कर दिया गया। इस पूरे मामले में भारत सरकार का हाथ है या नहीं इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है लेकिन खुफिया तंत्र सवालों के घेरे में जरूर आ गया है कि कैसे संवेदनशील ऑपरेशनों में अप्रशिक्षित लोगों को शामिल किया जा रहा है। जासूसी एजेंसियों के बुनियादी तौर-तरीकों का उल्लंघन किया जा रहा है, चाहे वह हिटमैन भाड़े के हत्यारे को चुनना हो या किसी बिचौलिए को। डीआईए के एक पूर्व अधिकारी के अनुसार
अमेरिका में व्यक्ति के निजी अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत कानून हैं। अमेरिका भारतीय अधिकारियों के खिलाफ मजबूत सबूत ला सकता है, जिनमें शीर्ष पदाधिकारी भी हो सकते हैं जो कि सरकार को परेशानी और शर्मिंदगी में डाल सकता है।

कथित तौर पर रॉ पीछे छोड़ता चला गया सबूत
यह मामला ऐसे समय में जोर पकड़ रहा है जब भारत-अमेरिका के बीच खुफिया सहयोग संबंध बेहतर होने की दिशा में हैं। गौरतलब है कि अमेरिका ने साल 2020 में गलवान घाटी में झड़प के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा के समीप चीनी सेना की गतिविधियों के बारे में भारत से खुफिया जानकारी साझा की थी। लेकिन पन्नू मामले के बाद से अमेरिका और भारत में वह पुरानी बहस फिर शुरू हो सकती है कि बतौर साझेदार भारत किस कदर भरोसेमंद हो सकता है या नहीं हो सकता है। विषेशज्ञों का मानना है कि हो सकता है कि इस घटना से अमेरिकी खुफिया साझेदारी पर असर न पड़े लेकिन इनमें इस हद तक कमी आ सकती है कि अमेरिका के अन्य साथी देश अधिक संवेदनशील द्विपक्षीय और वैश्विक खुफिया नेटवर्क में भारत को जोड़ने के अमेरिकी नेतृत्व के प्रयासों को भविष्य में जटिल बना दे। आखिरकार ये नेटवर्क अपने ही साथी देशों के इनपुट पर निर्भर करते हैं। ऐसे में भारत इस आकर्षक नेटवर्क से बाहर हो सकता है।

खुफिया बिरादरी द्वारा रॉ पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि खुफिया एजेंसी में विदेशी अभियानों के लिए अनुभवी जासूसों की कमी है। इसके अलावा एक अन्य अधिकारी का कहना है कि अक्सर मिशन को जल्द अंजाम देने का दबाव गलत परिणाम देता है। कुछ एक्सपर्ट इंसानी जासूसी की पूरी तरह कमी और डिजिटल संचार पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता पर अफसोस जताते हैं। जिसके जरिए वो पकड़े गए। असल में यादव और गुप्ता की ज्यादातर बातचीत फोन पर हुई। यादव ने एनक्रिप्टेड ऐप पर गुप्ता से संपर्क किया। इस नंबर में भारत का कंट्री कोड था और यह एक ईमेल अकाउंट पर रजिस्टर्ड था जिसने नई दिल्ली के नजदीक से इंटरनेट को एक्सेस किया था। अमेरिकी अभियोग के अनुसार भी गुप्ता ने सीएस और यूसी से फोन, वीडियो और टेक्स्ट संदेशों के जरिए अन्य बातों के अलावा लॉजिस्टिक और हत्या को लेकर लेनदेन के बारे में बातचीत की।

इस पूरे मिशन के साथ कथित तौर पर आरोपी अपने सबूत पीछे छोड़ते गए। अभियोग के मुताबिक दोनों आरोपियों के बीच एक महत्वपूर्ण बातचीत 3 जून, 2023 को हुई जो पन्नू को मारने की साजिश का एक सबूत है। दिल्ली से बात करते हुए निखिल गुप्ता ने कथित तौर पर सीएस से अनुरोध किया कि वह अपने साथियों को जल्द यह हत्या करने के लिए कहे ‘उसे खत्म करो, ब्रदर, खत्म करो उसे इतना ज्यादा टाइम मत लो इन लोगों को हटाओ, काम खत्म करो’। रक्षा खुफिया एजेंसी (डीआईए) के एक पूर्व प्रमुख का कहना है कि इस तरह के निर्देश देते समय फोन पर कौन बात करता है, जब आप उसे अमेरिका में अंजाम देना चाहते हैं, जो फाइव आईज अलायंस का नेतृत्व करता है?’ फाइव आइज देश अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड एक दूसरे के साथ नियमित रूप से खुफिया सूचनाएं साझा करते हैं और खासकर इंटरनेट संवाद पर विशेष निगरानी रखते हैं। इनकी जासूसी के गोपनीय तरीकों का खुलासा 2013 में व्हिसिलब्लोअर एडवर्ड स्नोडेन ने किया था। गौरतलब है कि टेक्नोलॉजी के जरिए पकड़े जाने से बचने के लिए ओसामा बिन लादेन भी वर्षों तक फोन और इंटरनेट से दूर रहकर बचा था। वहीं अलकायदा भी अपने लोगों से सम्पर्क कूरियर के जरिए करता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो कथित तौर पर अमेरिका के हाथों रॉ के एजेंट का पकड़ा जाना रॉ की विफलता को दर्शाती है। इस विफलता से भारत-अमेरिका के बीच खुफिया सहयोग का भविष्य भी दांव पर लगा हुआ है।

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