इस बात को इतना समय नहीं बीता है जो भूला जा सके कि रूस और अमेरिका के बीच जारी शीतयुद्ध ने पूरी दुनिया की राजनीति को प्रभावित किया। जो आज की दुनिया है वह और उसका भूगोल-इतिहास शायद ऐसा न होता जैसा दोनों देशों की कारगुजारियों की वजह से है। नब्बे में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया दो ध्रुवीय से एक धु्रवीय जरूर हो गई है। मगर रूस की अहमियत वैश्विक राजनीति में मिटी नहीं है। पुरानी कहावत है हाथी मरे भी तो नौ लाख का।

रूस की अहमियत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई द्विपक्षीय वार्ता में प्रकट हो गई। दुनिया के दारोगा कहे जाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति पहली बार रूसी राष्ट्रपति पुतिन के सामने डिफेंसिव नजर आए। पुतिन ने इस महामुलाकात में अमेरिकी डिप्लोमेसी को विफल कर दिया जिसे उनकी बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है। नतीजतन द्विपक्षीय बैठक करने के बाद डोनाल्ड ट्रंप अपने देश की मीडिया के निशाने पर आ गए।

सात जुलाई को फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में ट्रंप ने पुतिन के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की। पुतिन ने मीडिया के सामने साफ किया कि वह चाहते थे कि ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बनें। लेकिन रूस ने अमेरिकी चुनाव में कभी भी दखल नहीं दिया। यहां तक तो ठीक था। मगर पुतिन के सुर में सुर मिलाते हुए जो ट्रंप ने जो किया उससे मामला बिगड़ गया। पुतिन की बात का समर्थन करते हुए डोनाल्ड्र टं्रप ने कहा कि पुतिन सही हैं और अमेरिका का इस मामले में बेवकूफी भरा रवैया रहा।

अब अमेरिकी मीडिया का आलम यह है कि वहां ट्रंप को देशद्रोही के दायरे में रखा जा रहा है। दरअसल शीतयुद्ध के वक्त से ही प्रतिद्वंदी रूस के राष्ट्रपति का समर्थन करने पर अमेरिकी मीडिया ने कहा कि ट्रंप ने जो किया वह देशद्रोह से कम नहीं है। यह ट्रंप के शासनकाल का सबसे शर्मनाक दौर है। यह विवाद 2016 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ा है। इस बाबत अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का आरोप है कि रूस ने इस चुनाव में दखलंदाजी कर नतीजों को फिक्स करने की कोशिश की। खबर यह भी है कि वार्ता से पहले सलाहकारों ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को पुतिन के साथ बातचीत में सावधान होने की हिदायतें दी थी। अमेरिकी जनता भी इस उम्मीद में थी कि ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाबत रूसी राष्ट्रपति पुतिन को घेरेंगे। लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं किया। अलबत्ता पुतिन के आगे एक तरह से उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। हालांकि वार्ता से पहले ट्रंप के तेवर तीखे थे। उन्होंने दोनों देशों के बीच खराब संबंधों के लिए पूर्व अमेरिकी शासकों को दोषी माना था।

अब अमेरिका में हर तरफ राष्ट्रपति टं्रप की आलोचना हो रही है। अमेरिकी सांसद के अल्पसंख्यक नेता चक्र स्कूमर ने ट्रंप के प्रदर्शन को शर्मनाक, कमजोर, खतरनाक और विचारहीन बताया है। बराक ओबामा के वक्त सीसीए के निदेशक रहे जॉन ब्रेमन ने ट्रंप के इस कदम को राजद्रोह बताया। कुछ पूर्व सांसदों ने इस मुलाकात को अमेरिका के इतिहास का काला दिन बताया है। लेकिन टं्रप समर्थकों की दलील है कि इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। इस घटना को एक दूसरे नजरिए से देखने की जरूरत है। इस वार्ता को दुनिया के दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच अच्छे रिश्ते करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। खास बात यह कि इस मुलाकात और ट्रंप के रुख ने यूरोप को दुविधा में डाल दिया है। वह दोनों देशों के बीच के रिश्तों को बहुत साफ नहीं देख पा रहा है। समझ नहीं पा रहे हैं कि वह आगे की अपनी रणनीति कैसे बनाएं। टं्रप के रक्षात्मक रुख ने मामले को उलझा दिया है।

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