देश की कोई भी राजनीतिक पार्टी आरक्षण के साथ छेड़छाड़ की हिम्मत नहीं कर सकती है। उन्हें डर होता है कि इससे आरक्षण का लाभ लेने वाला वोट बैंक उनके हाथ से खिसक सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर अकेले भाजपा ही ऐसी पार्टी मानी जाती थी जिससे सवर्ण वर्ग को उम्मीद रही कि वह आरक्षण को लेकर कोई बड़ा फैसला ले सकती है। लेकिन हाल की कुछ घटनाओं से सवर्णों की यह उम्मीद भी टूटती रही।
दरअसल, एससी-एसटी और ओबीसी का वोट भाजपा को भी चाहिए। 2014 में भाजपा की बड़ी जीत के पीछे ओबीसी का बहुसंख्यक वोट और दलितों का कुछ वोट भी प्रभावी साबित हुआ। लिहाजा भाजपा भी अब दलितों और ओबीसी का वोट बैंक बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। केंद्र सरकार का हालिया एक फैसला भी इसी ओर इशारा करता है। अगस्त के अंतिम दिन केंद्र सरकार ने 2021 में ओबीसी की जनगणना कराने का निर्णय लिया है। संविधान में दस साल के लिए दिया गया आरक्षण करीब 71 साल बाद भी किसी जाति को मुख्य धारा में जोड़ नहीं पाया, क्योंकि सरकार या राजनीतिक दलों ने इसे
सामाजिक समानता के बजाए वोटों के तुष्टिकरण के रूप में इस्तेमाल किया।
आरक्षण का ही प्रभाव है कि पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न प्रदेशों में सामाजिक रूप से मजबूत जातियां भी अपने लिए आरक्षण की मांग करने लगी हैं। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन, हरियाणा में जाट आंदोलन और गुजरात में पाटीदार आंदोलन इनमें से प्रमुख हैं। ये तीनों ही आंदोलन अपनी जाति के लिए आरक्षण की मांग करते हैं। जबकि राजस्थान और कई अन्य प्रदेशों में गुर्जर प्रभावशाली जाति रही है। इस जाति के लोग बड़े ओहदों के साथ आर्थिक रूप से भी मजबूत हैं। उसी प्रकार हरियाणा में जाटों की एक मजबत पृष्ठ भूमि, राजनीति एवं अन्य क्षेत्रों में प्रभुत्व है। फिर भी वे पिछले कुछ वर्षों से अपने लिए आरक्षण मांग रहे हैं। उनका पिछला आंदोलन हिंसक रहा। गुजरात में हार्दिक पटेल पाटीदार आंदोलन से वहां पटेलों के लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं। गुजरात में पटेलों का वर्चस्व हर क्षेत्र में है। फिर भी ये प्रभावशाली जाति सरकार पर दबाव बनाए हुए है। वहीं विपक्ष अंदरखाने इनके आंदोलन को हवा देने में लगा रहता है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू पिछले साल सभी प्रकार का जाति आधारित आरक्षण बंद करने की वकालत कर चुके हैं। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में जस्टिस काटजू ने कहा, ‘जाति आधारित आरक्षण ने एससी और एसटी समुदाय को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। जाति व्यवस्था भारत के लिए अभिशाप है और यदि हमें प्रगति करनी है तो इसे खत्म किया जाना चाहिए।’ काटजू ने तर्क दिया कि अब दलितों को लगता है कि उन्हें बराबरी के लिए खुद संघर्ष करने की जरूरत नहीं हैं, बल्कि सरकारें ही उन्हें बराबरी दिलाएंगी। इसलिए बराबरी के लिए संघर्ष करने के बजाए दलित आरक्षण के लिए रोते रहते हैं। काटजू ने कहा, ‘इसमें कोई शक नहीं है कि जातिगत आरक्षण ने दलितों को चुनावों का वोट बैंक बनाने में मदद की है जिसे धूर्त नेता अपनी मनमर्जी से चलाते हैं।’
1882 में बने हंटर कमीशन ने आरक्षण की प्रणाली बनाई। 1932 में अंग्रेजों ने भारत में राज करने के लिए सांप्रदायिक बंटवारे के तहत दलितों और अन्य धर्मों को बांटने के लिए उस आरक्षण प्रणाली का प्रयोग किया। तब महात्मा गांधी ने इसकी कड़ी मुखालफत की। लेकिन अंततः वह इस मुद्दे पर अंबेडकर के साथ समझौते के लिए तैयार हो गए। आरक्षण की लड़ाई में संविधान सभा में एक वोट की कमी से आरक्षण प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। जिस कारण डॉ अम्बेडकर के सामने एससी-एसटी को आरक्षण देने संबंधी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई थी, लेकिन अम्बेडकर अपनी तर्कशक्ति का प्रयोग कर धारा 10 में संशोधन करने में कामयाब रहे, जिसका परिणाम आरक्षण है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। बशर्ते, यह साबित किया जा सके कि वे औरों के मुकाबले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं। 1950 में 10 साल (1960 तक) तक एससी के लिए 15 फीसदी, एसटी के लिए 7 .5 फीसदी आरक्षण की बात कही गई थी। धीरे-धीरे इसे खत्म करने के बजाय वर्ष 1993 में मंडल कमीशन की सिफारिश पर इसमें और इजाफा करते हुए ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया। एससी और एसटी के कुल 22 .5 प्रतिशत आरक्षण के बाद ओबीसी को भी 27 फीसदी आरक्षण दे दिया गया। इसी सिफारिश के तहत आरक्षण के आधार को भी परिभाषित किया गया।
आरक्षण के इन प्रावधानों को लगातार बढ़ाते हुए अब 2020 तक कर दिया गया है। पिछले 71 साल में मदद का यह रवैया न केवल बढ़ता गया है, बल्कि इसका दायरा और स्तर भी इतना बढ़ चुका है, जितना कि संविधान निर्माताओं ने कल्पना तक न की होगी।
हरियाणा में जाट आरक्षण के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के फैसले को अवैध करार देते हुए अपने ऐतिहासिक फैसले संविधान के अनुच्छेद 15 (4) और 16 (4) की फिर से व्याख्या करते हुए साफ किया कि देश की आरक्षण नीति से जुड़े तमाम पहलुओं पर गंभीरता के साथ चर्चा हो। प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अगर लिंग, समुदाय या क्षेत्र आधारित आरक्षण दिया जाता है, तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। आरक्षण के तहत योग्यता को दरकिनार करने का ही परिणाम है कि ब्रेन ड्रेन को लगातार बढ़ावा मिल रहा है। इसी विषय पर 1970 में टिप्पणी करते हुए पूर्व वाणिज्य सचिव और अमेरिका में राजदूत आबिद हुसैन ने कहा था, ‘प्रतिभा के नष्ट होने से बेहतर है वह पलायन कर जाए।’
आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य जाति पर जोर देना नहीं, जाति को खत्म करना था। अमेरिका जैसे देशों में भी ‘अफरमेटिव एक्शन’ के तहत अश्वेत लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन उसके दूरगामी नकारात्मक असर को देखते हुए इसे समाप्त किए जाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। समय के साथ आरक्षित वर्ग के भीतर एक अभिजात्य वर्ग ने पैठ जमा ली और सामाजिक न्याय के फायदों को निचले तबके तक पहुंचने से रोक दिया। अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए इस वर्ग ने आरक्षण की पात्रता पर जब कभी बहस या चर्चा की बात की तो वे उसे कमजोर कर देते हैं।
दलित विचारक चंद्रभान प्रसाद ने कहा, ‘देश के दलितों के उत्थान की प्रक्रिया में आरक्षण के मुकाबले मुक्त बाजार व्यवस्था ज्यादा कारगर है। उन्होंने कहा कि आरक्षण की व्यवस्था महज 10 फीसदी लोगों का फायदा कर सकती है, जबकि मुक्त बाजार व्यवस्था में 90 फीसदी दलितों के उत्थान की क्षमता है। 1919 में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कींस की पुस्तक ‘इकनॉमिक कंसीक्वेंसेस ऑफ पीस’ आई थी। इस पुस्तक के हवाले से देश की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह सवाल पूछा जा सकता है कि आरक्षण को आगे जारी रखने के आर्थिक परिणाम क्या हो सकते हैं?
सार्वजनिक तौर पर कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण के बारे में खुलकर बात नहीं करता। यह सत्ता लोलुपता और सत्ता खोने का डर ही है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भी किसी नेता ने आरक्षण के लिए एक नए सिरे से बहस की हिम्मत नहीं दिखाई है। वर्ष 2015 में जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक साक्षात्कार में आरक्षण की समीक्षा की बात की तो राजनीतिक दलों ने पूरे देश को सर पर उठा लिया। कुल मिलाकर आरक्षण एक राजनीतिक हथकंडा है, जिसे पार्टियां चुनाव के समय अपनाती हैं। चूंकि यह मुद्दा सीधे-सीधे जनाधार और वोट बैंक से जुड़ा है, इसलिए हर राजनीतिक पार्टी इस मुद्दे पर हमेशा से सावधानी बरतती रही है। वोट बैंक की राजनीति के लिए आरक्षण का खेल खेलना देश और समाज में अस्थिरता और अव्यवस्था को बढ़ावा देगा। विभिन्न प्रदेशों में प्रभावीशाली जातियों द्वारा किया किया जा रहा आंदोलन गलत है या सही इस पर फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता, पर यह बात तय है कि अब घड़ी आ गई है, जब सरकार को इस आंदोलन के बहाने रिजर्वेशन सिस्टम के बारे में गंभीरता से सोचते हुए एक साकारात्मक बहस की तरफ बढ़ना चाहिए।
‘आरक्षण दलितों का अधिकार’
दलित चिंतक एवं भाजपा सांसद उदित राज से बातचीत
आरक्षण कब तक जारी रहेगा?यदि सीधा जवाब दें तो जब तक शोषित समाज को सामाजिक न्याय नहीं मिल जाता। आरक्षण दलितों का अधिकार है। आरक्षण देकर कोई दलितों पर कृपा नहीं की गई है। इसलिए इसे खत्म नहीं किया जा सकता। सरकार यदि अभी तक दलितों को मुख्यधारा से नहीं जोड़ पाई है तो इसके लिए सत्ता दोषी है न कि वह शोषित समाज।
पर संविधान में आरक्षण सिर्फ दस साल के लिए दिया गया था, जबकि हर दस साल में इसे आगे बढ़ा दिया जाता है। क्या यह सही है?
संविधान में सिर्फ दस साल नहीं लिखा है। उसमें और भी कई चीजें लिखी हुई हैं। मसलन, संविधान से सरकार को दस साल में दलितों, वंचितों को मुख्यधारा में लाने को एक तरह से निर्देश दिए गए हैं। यदि वह पूरा नहीं होता तो फिर क्या करें। इसके लिए आरक्षण की समय सीमा बढ़ाने का प्रावधान है। तभी तो हर सरकार इसे बढ़ाती रही है। क्या आप यह कहना चाहते हैं कि सभी सरकारें संविधान से बाहर जाकर आरक्षण की समय बढ़ा रही हैं। यदि हां तो आप पूरी तरह गलत हैं।
क्या आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए?
आप समीक्षा क्या करेंगे? यही न कि शोषित समाज को आरक्षण का कितना लाभ मिला। मैं कह रहा हूं अभी भी शोषित समाज मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाया है। इसीलिए तो आरक्षण जारी रहने की जरूरत है। यदि सामाजिक न्याय मिल गया होता तो फिर आरक्षण अपने आप खत्म हो जाता।

