पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-75
एक ‘भरोसेमंद नौकरशाही’ के साथ-साथ एक ‘समर्पित न्यायपालिका’ की जरूरत अब देश की प्रधानमंत्री को महसूस होने लगी थी। प्रिवी पर्स मामले में न्यायपालिका के फैसले को इंदिरा ने अपनी ‘गरीबी हटाओ’ नीति से जोड़ जनता की अदालत में जाने का निर्णय ले लिया। लोकसभा का कार्यकाल अभी एक बरस से अधिक बाकी था लेकिन इंदिरा अब निर्दलियों और वामपंथियों के रहमोकरम पर अपनी सरकार चलाने के पक्ष में नहीं थीं। मध्यावधि चुनाव कराए जाने के पीछे दो अन्य कारण भी थे। वे अपनी निरकुंश कार्यशैली के चलते तो विपक्षी दलों के निशाने पर लगातार बनी हुई थीं हीं, उन पर परिवारवाद को बढ़ावा देने के आरोप भी अब तेजी पकड़ने लगे थे। जवाहरलाल नेहरू राजनीति में हमेशा शुचिता, पारदर्शिता और व्यक्तिगत ईमानदारी के प्रबल पक्षधर थे। परिवारवाद के आरोप से बचने के लिए ही उन्होंने अपने कई वरिष्ठ सहयोगियों के सुझाव और दबाव को दरकिनार कर इंदिरा को अपने मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं बनाया था। उनकी बेटी लेकिन इस मामले में कमजोर साबित होने लगी थी। उनकी इस कमजोरी के मूल में थे उनके छोटे पुत्र संजय गांधी। 13 नवंबर, 1968 के दिन लोकसभा में सरकार ने संजय गांधी द्वारा भारत में निर्मित की जाने वाली एक ‘आम आदमी की कार’ के प्रस्ताव की जानकारी दी थी। तत्कालीन औद्योगिक विकास राज्यमंत्री ने संसद को बताया कि संजय गांधी ने एक पूर्णतः स्वदेशी सस्ती कार भारत में बनाए जाने के लिए लाइसेंस मांगा है। इस कार की संभावित कीमत साठ हजार रुपए बताई गई और प्रति एक लीटर पेट्रोल में इस कार द्वारा 24 किमी. मीटर की दूरी तय करने की बात संसद में सरकार ने रखी।
संजय गांधी के अलावा कई विश्व प्रसिद्ध कार निर्माताओं ने भारत में कार निर्माण करने का लाइसेंस तब सरकार से मांगा था। इन कंपनियों में ट्योटा, माजदा, रिनोल्ट और मौरिस सरीखी बहुराष्ट्रीय कंपनियां शामिल थीं। संजय गांधी के पास इस क्षेत्र का अनुभव शून्य था। उन्होंने कुछ समय रॉल्स-रॉयल कंपनी में बतौर टेªनी काम जरूर किया था लेकिन न तो उनके पास वाहन निर्माता का कोई अनुभव था और न ही वे स्थापित उद्योगपति थे। इसके बावजूद नवंबर 1970 में उन्हें लाइसेंस दे दिया गया। संजय ने अपनी इस कार का नाम मारुति (पवन पुत्र हनुमान का एक नाम) रखा था। उन्हें प्रति वर्ष पचास हजार पूर्णतः स्वदेशी कार बनाए जाने का लाइसेंस इंदिरा सरकार ने तमाम नियम-कानून को धता बताते हुए दिया था। उनके इस कदम की चौतरफा आलोचना होने लगी थी।समाजवादी नेता और सांसद जॉर्ज फर्नांडिस ने इसे ‘भाई- भतीजावाद का निकृष्टम रूप’ करार दिया तो जनसंघी नेता और सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे ‘असीमित भ्रष्टाचार’ कह पुकारा। इंदिरा सरकार को समर्थन दे रहे वामपंथी दल के नेता ज्योति बसु ने भी प्रधानमंत्री के इस फैसले की कड़ी शब्दों में निंदा कर इंदिरा को विचलित करने का काम कर दिया था। अपने ऊपर लग रहे आरोपों से वे भले ही कितनी भी व्यथित क्यों न थीं, सार्वजनिक तौर पर उन्होंने अपने इस कदम को यह कहते हुए उचित ठहराया कि ‘मेरे बेटे ने उद्यमिता दिखाई है…यदि मैं उसे प्रोत्साहित नहीं करूंगी तो कैसे भला मैं अन्य युवाओं को जोखिम उठाने के लिए कह सकती हूं।’
भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोपों के अतिरिक्त एक अन्य कारण भी मध्यावधि चुनाव कराए जाने के पीछे रहा। बकौल पुपुल जयकर बैंकों के राष्ट्रीयकरण और राजे-रजवाड़ों के प्रिवी पर्स को समाप्त किए जाने चलते देश का एक बड़ा पूंजीपति वर्ग इंदिरा सरकार के खिलाफ हो चला था। नक्सलवादी आंदोलन चलते देश के कई हिस्सों में कानून-व्यवस्था चरमराने लगी थी। ऐसे में प्रधानमंत्री को खुफिया एजेंसियों ने सेना द्वारा उनका तख्ता पलट किए जाने की बाबत आगाह किया। उन्हें बताया गया कि दिल्ली, बॉम्बे, कलकत्ता इत्यादि में चर्चा गर्म है कि थल सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशॉ ऐसा कुछ करने की रणनीति बना रहे हैं। स्वयं जनरल मानेकशॉ ने भी यह बात स्वीकारी थी कि वे जहां कहीं भी जाते हैं, उनसे पूछा जाता रहा कि वे कब सत्ता संभालने वाले हैं। इंदिरा ने खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट से चिंतित हो स्वयं जनरल मानेकशॉ (जो उनके करीबी मित्र भी थे) से पूछ डाला कि क्या वे ऐसा करने जा रहे हैं? सैम ने ऐसी किसी भी संभावना को सिरे से नकार इंदिरा को राहत देने का काम तब किया था।’ हालांकि थलसेना प्रमुख ने ऐसी किसी भी संभावना से स्पष्ट इनकार करा लेकिन इंदिरा गांधी की आशंकाएं कम नहीं हुईं। उन्होंने तय कर लिया कि वे सीधे जनता से संवाद कर अपने लिए न केवल मजबूत जनादेश हासिल कर अपने ऊपर लग रहे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों का भी जवाब अपने विरोधियों को दंेगी। 27 दिसंबर, 1970 को उन्होंने मध्यावधि चुनाव कराए जाने संबंधी आदेश राष्ट्रपति वी .वी. गिरी से जारी करवा दिया। यह इतना अप्रत्याशित था कि विपक्षी दलों को अपनी रणनीति बनाने तक का मौका तक नहीं मिला। फरवरी, 1971 में हुए इस आम चुनाव में राज्य विधानसभाओं के चुनावों को अलग रखा गया। इससे पहले के चार आम चुनाव में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभाओं के लिए मतदान होता था। इंदिरा ने इस परिपाटी को हमेशा के लिए बदल डाला। विपक्षी दलों ने ‘इंदिरा हटाओ’ का नारा देकर पूरे चुनाव को इंदिरा केन्द्रीत कर डाला जिसका भारी लाभ श्रीमती गांधी को मिला जिन्होंने विपक्ष की रणनीति को नकारात्मक करार देते हुए ‘गरीबी हटाओ’ का जुमला उछाल पूरे देश की फिजा बदल डाली। लोकसभा की 521 सीटों में से 518 सीटों के लिए हुए चुनाव में इंदिरा कांग्रेस को दो तिहाई से जीत हासिल हुई। 352 सीटें जीत इंदिरा ने स्थापित कर दिया कि देश की जनता का उन्हें पूरा समर्थन प्राप्त है। सिंडिकेट कांग्रेस का इन चुनावों में प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा और वह मात्र 16 सीट जीत पाने में सफल रही। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली अखिल भारतीय जनसंघ को 22 सीटें, सीपीआई (एम) को 25 तो सीपीआई को मात्र 21 सीटें मिली। प्रचंड बहुमत के साथ तीसरी बार प्रधानमंत्री बनी इंदिरा को अब रोकने वाला कोई नहीं बचा था। वे अपनी समाजवादी नीति को आगे बढ़ाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने लगीं। इसी बीच पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान में भारी राजनीतिक उथल- पुथल शुरू हो गई। नवंबर 1970 में पाकिस्तान के तत्कालीन सैन्य शासक जनरल याहय्या खान ने आम चुनाव कराए जाने का फैसला लिया था। इन चुनावों में मुख्यतः दो राजनीतिक दलों के मध्य मुख्य मुकाबला था। पश्चिमी पाकिस्तान में खासी जनाधार वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) जिसका नेतृत्व जुल्फीकार अली भुट्टो कर रहे थे और पूर्वी पाकिस्तान में मजबूत जड़ों वाली नेशनल अवामी लीग जिसके नेता शेख मुजीबुर रहमान थे। पाकिस्तान गठन के साथ ही पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के मध्य उर्दू भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाए जाने के मुद्दे पर भारी तनाव शुरू हो गया था जो आगे चलकर बंगाली मुसलमानों को कमतर नागरिक आंकने और राज्य सत्ता में उनकी कम हिस्सेदारी जैसे मुद्दों को लेकर पृथकतावादी राह पकड़ने लगा था। शेख मुजीबुर रहमान पूर्वी पाकिस्तान से आते थे फरवरी, 1948 में जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमउद्दीन ने उर्दू को राजकीय भाषा बनाए जाने का ऐलान करते हुए पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली भाषी नागरिकों से उर्दू सीखने का आह्नान किया, शेख रहमान ढाका विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने सरकार के इस फैसले को बंगाली भाषियों के खिलाफ षड्यंत्र बताते हुए विश्वविद्यालय कैंपस में इस कदम का भारी विरोध करना शुरू कर दिया। यह राजनीति में उनके प्रवेश और भविष्य में बड़े राजनेता बनने का शुरुआती कदम था। शेख मुजीबुर रहमान को पाकिस्तान सरकार द्वारा कई बार राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने के आरोप लगा लंबी हिरासत में रखा गया। हर बार उनकी गिरफ्तारी उनके प्रभामण्डल को बढ़ाने का कारण बनती चली गई। 1966 में नेशनल अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान को अलग राष्ट्र बनाए जाने की मांग सामने रख पाकिस्तान के दोनों हिस्सों मध्य तनाव गहराने का काम कर डाला। 1968 में नेशनल अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान को अलग राष्ट्र बनाए जाने की मांग सामने रख पाकिस्तान के दोनों हिस्सों मध्य तनाव गहराने का काम कर डाला। 1968 में शेख रहमान और उनके कई साथियों को राष्ट्रद्रोह के आरोप में हिरासत में ले लिया गया था। ‘अगरतल्ला षड्यंत्र केस’ के नाम से कुख्यात मुकदमे में उन पर बंगाली सैन्य अधिकारियों के साथ मिलकर सशस्त्र विद्रोह का आरोप लगाया गया। मुजीबुर रहमान के समर्थन में भारी जन आंदोलन पूर्वी पाकिस्तान में शुरू हुआ जिसके आगे घुटने टेकते हुए पाकिस्तानी सरकार को यह मुकदमा वापस लेना पड़ा था। 25 मार्च, 1969 के दिन पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल याहय्या खान ने देश में मार्शल लॉ लगा सत्ता अपने हाथों में ली। शेख मुजीबुर रहमान इस दौरान लंदन चले गए जहां उन्होंने घोषणा कर दी कि अब से पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश कह पुकारा जाएगा। 5 दिसंबर 1969 को की गई घोषणा में उन्होंने कहा- ‘There was a time when evil efforts were made to wipe out the world ”Bangla” from our land and map. The existence of the word ”Bangla” was found no where except in the Bay of Bengal. I on behalf of the people proclaim today that the estern province of Pakistan will be called ”Bangaladesh” instead of ”East Pakistan.” (एक समय ऐसा भी था जब ‘बांग्ला’ शब्द को हमारी जमीन और हमारे नक्शे से मिटाने के दुष्ट प्रयास किए गए। ‘बांग्ला’ शब्द बंगाल की खाड़ी के सिवाय कहीं नहीं मौजूद रहा। मैं आम जनता की तरफ से आज यह घोषणा करता हूं कि पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा अब से ‘पूर्वी पाकिस्तान’ के बजाए ‘बांग्लादेश’ कह पुकारा जाएगा।) 1970 में हुए आम चुनाव के नतीजे सैन्य प्रशासक जनरल याहय्या खान और पीपीपी के अध्यक्ष जुल्फीकार अली भुट्टो की अपेक्षानुसार नहीं रहे। सम्भवतः याहय्या खान को उम्मीद रही होगी की नतीजे पीपी के पक्ष में आएंगे। इसी अपेक्षा चलते उन्होंने दिसंबर 1970 में मार्शल लॉ हटा कर चुनाव कराए जाने का निर्णय लिया। नतीजे लेकिन शेख मुजीबुर के पक्ष में आए। पूर्वी पाकिस्तान से संसद के लिए 169 सीटें थीं जिनमें से 167 पर नेशनल अवामी लीग विजयी रही। वहीं दूसरी तरफ पश्चिमी पाकिस्तान से संसद की कुल 144 सीटों में से भुट्टों नेतृत्व वाली पीपी को मात्र 88 सीटों पर ही जीत हासिल हुई। इस तरह से पाकिस्तान की सत्ता शेख मुजीबुर रहमान के हाथों चली गई। भुट्टो और सैन्य प्रशासक इसके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने पहले तो गठबंधन सरकार बनाए जाने का प्रयास किया जिसकी कमान भुट्टो को सौंपे जाने की बात कही गई, शेख मुजीबुर रहमान ने सिरे से इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। याहय्या खान को भेजे अपने संदेश में शेख ने कह डाला ‘The demand of Bhutto sahab is totally illogical. Power is to be handed over to majority party, the Awami legaue. The power new lies with the people of East Bengal.’ (भुट्टो साहेब की मांग पूरी तरह गैरवाजिब है। सत्ता बहुमत पाने वाली पार्टी अवामी लीग को सौंपी जानी चाहिए। अब सत्ता पूर्वी बंगाल के लोगों के हाथों में है।)
क्रमशः