प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के मद्देनजर रैली को सम्बोधित किया जिसमें उन्होंने नजफगढ़ में वीर सावरकर कॉलेज सहित कई तोहफे दिए। लेकिन सावरकर के नाम कॉलेज को लेकर सियासत सुलग गई है और यह मामला राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भाजपा सावरकर के सहारे दिल्ली फतह कर पाएगी। जानकार कहते हैं कि यह विवाद न केवल दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे इतिहास के नायकों को लेकर अलग-अलग धारणाएं हो सकती हैं। एक तरफ भाजपा सावरकर को महापुरुष के रूप में देखती है तो वहीं कांग्रेस उन्हें ब्रिटिश समर्थक मानती है। इस विवाद के जरिए भाजपा ने दिल्ली चुनाव को और भी रोचक बना दिया है

दिल्ली विधानसभा चुनाव का ऐलान हो गया है। 5 फरवरी को मतदान और 8 फरवरी को नतीजे आएंगे। एक ओर जहां सत्ताधारी आम आदमी पार्टी तीसरी बार जीत के लिए अलग-अलग विधानसभाओं में जाकर ‘पदयात्रा’ कर रही है तो कांग्रेस ‘न्याय यात्रा’। इसकी रणनीतिक काट में भाजपा भी परिवर्तन यात्रा पर है। इसी के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली को सम्बोधित किया जिसमें उन्होंने विकास के सौगात के साथ-साथ नजफगढ़ में वीर सावरकर कॉलेज सहित कई तोहफे दिए। लेकिन सावरकर के नाम कॉलेज को लेकर सियासत सुलग गई है और यह मामला राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भाजपा सावरकर के सहारे दिल्ली फतह कर पाएगी।

विपक्षी पार्टी खासकर कांग्रेस का कहना है कि देश में कई स्वतंत्रता सेनानी हैं। सरकार उनमें से किसी के नाम पर भी यूनिवर्सिटी का नाम रख सकती थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी का नाम भी किसी स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर रखा जा सकता था। कांग्रेस सावरकर को स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती। उसने इसका कड़ा विरोध कर आरोप लगाया है कि सरकार उन लोगों का महिमामंडन कर रही है जिन्होंने कथित तौर पर औपनिवेशिक शक्तियों का साथ दिया था। भाजपा देश का इतिहास बदलने की कोशिश कर रही है।

कांग्रेस सांसद सैय्यद नासिर हुसैन ने इस फैसले की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि ‘औपनिवेशिक शासकों से दया मांगने के आरोपी को सम्मानित क्यों किया जाना चाहिए।’ ‘अंग्रेज अत्याचारी थे और उनसे दया मांगने वाले लोग ऐसी मान्यता के हकदार नहीं हैं।’ ‘कई स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की सम्प्रभुता और स्वतंत्रता के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। अगर उन्होंने कॉलेज का नाम उनमें से किसी के नाम पर रखा होता तो यह उनके लिए एक श्रद्धांजलि होती। लेकिन भाजपा के पास कोई नेता या आदर्श नहीं हैं इसलिए वे उन लोगों को बढ़ावा दे रहे हैं और उन्हें वैध बना रहे हैं जिन्होंने ब्रिटिश राज का समर्थन किया था।’

कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी मीडिया से बात करते हुए कहा कि सावरकर का दिल्ली में कोई बड़ा योगदान नहीं है। दिल्ली विधानसभा चुनाव नजदीक हैं इसलिए भाजपा सावरकर के सहारे ध्रुवीकरण कर माहौल बिगाड़ना चाहती है। कांग्रेस से जुड़े भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ ने इस फैसले की निंदा की। उनका तर्क था कि यह ब्रिटिश शासन का विरोध करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को कमजोर करता है। उन्होंने शिक्षा नीतियों के प्रति अपने असंतोष को उजागर करते हुए दावा किया, ‘सरकार आदतन ऐतिहासिक आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही है।’

नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया ने कॉलेज का नाम दिवंगत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम पर रखने को कहा था जबकि वामपंथी छात्र संगठन-स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले के नाम का सुझाव दिया था, वहीं आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा, पीएम मोदी और उनकी पार्टी देश में शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर रहे हैं। 37 लाख 45 हजार बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ चुके हैं। पहले इस पर जवाब देना चाहिए और मुझे लगता है कि भाजपा और मोदी जी के हाथों न तो इस देश के बच्चों का भविष्य सुरक्षित है न ही सरकारी स्कूलों की शिक्षा लोगों को नसीब हो पाएगी न रोजगार मिल पाएगा। इसके विपरीत नाम बदलने के समर्थकों का तर्क है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सावरकर का योगदान महत्वपूर्ण है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भाजपा ‘इतिहास को बदलने की कोशिश नहीं कर रही है, बल्कि इसके सभी पहलुओं को सामने लाने की कोशिश कर रही है।’ मुझे पूरा भरोसा है कि डीयू इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में सामाजिक चर्चा का विषय बनाएगा। भविष्य को देखने के लिए आईने का काम करता है। डीयू देश की सभ्यता का सच्चा आईना दिखाएगा।

सावरकर के नाम पर आपत्ति जताने वाले कई लोग ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ वाले हैं, मैं उनके नाम पर कॉलेज का नाम रखने के लिए विश्वविद्यालय को धन्यवाद देना चाहता हूं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सीआर केशवन ने मीडिया को बताया कि यह हमारे देश की राजधानी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत के सबसे बहादुर देशभक्तों और कट्टर राष्ट्रवादियों में से एक स्वातंर्त्य वीर सावरकर को उचित और महत्वपूर्ण श्रद्धांजलि है। जिस तरह से वीर सावरकर ने बहादुरी से ब्रिटिश क्रूरता का विरोध किया और औपनिवेशिक अन्याय के खिलाफ साहसपूर्वक लड़ाई लड़ी वह आने वाली पीढ़ियों खासकर हमारे युवाओं के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है। जहां तक कांग्रेस पार्टी द्वारा सावरकर जी की आलोचना और कॉलेज का नाम मनमोहन सिंह जी के नाम पर रखने की मांग का सवाल है। सिद्धांतहीन कांग्रेस पार्टी को राहुल गांधी से दो सवाल पूछने चाहिए। राहुल गांधी अक्सर सावरकर जी के बारे में जहर उगलते रहते हैं। देश की जनता राहुल गांधी के बीच का अंतर जानती है, जो धोखाधड़ी और गबन के आरोपों के साथ नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर बाहर हैं, जबकि वीर सावरकर जी ने 27 साल कैद में बिताए।

दूसरी ओर दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति योगेश सिंह ने कहा ‘यह प्रोजेक्ट 2021 में शुरू हुआ था। किसी को भी समय के बारे में सवाल नहीं उठाना चाहिए। सावरकर देश के युवाओं, लोगों और संस्कृति के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।’ हालांकि यह पहली बार नहीं है जब सावरकर के नाम पर सियासत गरमा गई है। इससे पहले कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने संसद में संविधान पर चर्चा के दौरान विनायक दामोदर सावरकर और भारतीय जनता पार्टी पर जमकर निशाना साधा। लोकसभा में राहुल गांधी ने वीर सावरकर का जिक्र करते हुए कहा कि इंदिरा गांधी ने मुझे बताया कि सावरकर ने अंग्रेजों से समझौता कर लिया था। उन्होंने अंग्रेजों को चिट्ठी लिखकर माफी भी मांगी। राहुल गांधी के इस बयान पर भाजपा के नेताओं ने पलटवार कर कांग्रेस को घेरा। इसी बीच सोशल मीडिया पर देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का 44 साल पुराना लेटर वायरल हो रहा है। इसमें उन्होंने वीर सावरकर की जयंती पर उनको ‘रिमार्केबल सन ऑफ इंडिया’ बताया था।

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए पूर्व पीएम इंदिरा गांधी का वह पत्र सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर कर लिखा, ‘यह दस्तावेज राहुल गांधी के लिए है, क्योंकि उन्होंने लोकसभा में वीर सावरकर और इंदिरा गांधी के बारे में गलत बयान दिया था।’

चार दशक पुरानी चिट्ठी
इंदिरा गांधी ने 20 मई 1980 को पंडित बाखले, सचिव, वीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक के नाम से संबोधित चिट्ठी में वीर सावरकर के योगदान का जिक्र किया था। यह चिट्ठी पंडित बाखले के पत्र के जवाब में लिखी गई थी। इस चिट्ठी में पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने लिखा था, ‘मुझे आपका पत्र 8 मई 1980 को मिला था। वीर सावरकर का ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मजबूत प्रतिरोध हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काफी अहम है। मैं आपको देश के महान सपूत (रिमार्केबल सन ऑफ इंडिया) के शताब्दी समारोह के आयोजन के लिए बधाई देती हूं।’

कौन थे वीर सावरकर
वीर सावरकर भारत के स्वतंत्रता सेनानी थे। वीर सावरकर राजनेता, कार्यकर्ता और लेखक भी थे। उन्होंने देश में जाति व्यवस्था के उन्मूलन की वकालत की थी। सावरकर ने अपने जीवनकाल में कई भूमिकाएं निभाईं और कहा जाता है कि उन्होंने 1922 में रत्नागिरी में हिरासत में रहने के दौरान हिंदुत्व की हिंदू राष्ट्रवादी राजनीतिक विचारधारा विकसित की थी। वे हिंदू महासभा में अग्रणी व्यक्ति बन गए। उसके बाद उनके अनुयायियों ने उनके नाम में ‘वीर’ जोड़ दिया। हालांकि सावरकर का जीवन काफी विवादास्पद रहा है खासकर वर्तमान भारतीय राजनीतिक माहौल में। देश के कुछ वर्ग उन्हें स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानता है। वीर सावरकर को अंग्रेजों ने लगभग 50 सालों तक जेल में रखा था। उन्हें सेलुलर जेल, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में रखा गया था। वीर सावरकर का प्रसिद्ध नारा था, ‘सभी राजनीति का हिंदूकरण करें और हिंदू धर्म का सैन्यीकरण करें।’ जेल में रहते हुए वीर सावरकर ने एक वैचारिक पुस्तिका लिखी ‘हिंदू कौन है?’ जिसे हिंदुत्व के नाम से जाना जाता है।

सावरकर का प्रारंभिक जीवन
वीर सावरकर का जन्म 28 मई1883 को महाराष्ट्र के नासिक शहर के पास भगूर गांव में एक मराठी हिंदू चितपावन ब्राह्माण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम दामोदर सावरकर और माता का नाम राधाबाई सावरकर था। सावरकर ने हाई स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही अपनी सक्रियता शुरू कर दी थी। उन्होंने 1903 में अपने बड़े भाई गणेश सावरकर के साथ मित्र मेला की स्थापना की जो बाद में 1906 में अभिनव भारत सोसाइटी बन गई और इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना और हिंदू गौरव को पुनर्जीवित करना था।

स्वतंत्रता संग्राम से कैसे जुड़े सावरकर
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सावरकर को बहुत प्रभावित किया। तिलक सावरकर से प्रभावित हुए और 1906 में उनकी कानून की पढ़ाई के लिए लंदन में शिवाजी छात्रवृत्ति प्राप्त करने में उनकी मदद की। उन्होंने 1905 के बंगाल विभाजन का विरोध किया और तिलक की उपस्थिति में अन्य छात्रों के साथ भारत में विदेशी कपड़ों की होली जलाई। 1909 के आसपास सावरकर पर देश में ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश रचने का आरोप लगाया गया था, जिसमें उन्होंने कई अधिकारियों की हत्या की थी। अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए सावरकर पेरिस चले गए, लेकिन बाद में लंदन लौट आए। मार्च 1910 में सावरकर को लंदन में हथियार वितरण, राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने और देशद्रोही भाषण देने जैसे कई आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। वीर सावरकर ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया और हिंदू सभाओं को अपने पदों पर बने रहने और किसी भी कीमत पर आंदोलन में शामिल न होने का निर्देश दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद न केवल दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे इतिहास के अलग-अलग नायकों को लेकर अलग-अलग धारणाएं हो सकती हैं। एक तरफ भाजपा सावरकर को एक महापुरुष के रूप में देखती है तो वहीं कांग्रेस उन्हें ब्रिटिश समर्थक मानती है। यह बहस आने वाले दिनों में भी जारी रहने की उम्मीद है। दोनों दलों के बीच तीखी नोक-झोंक भी देखने को मिल सकती है। इस विवाद के जरिए भाजपा ने दिल्ली चुनाव को भी रोचक बना दिया है।

गौरतलब है कि संसदीय स्तर पर भाजपा दिल्ली में सफल रही है लेकिन विधानसभा के नतीजे ज्यादातर निराशाजनक रहे हैं। ऐसे में 1998 से दिल्ली की सत्ता से बाहर भाजपा आगामी चुनाव में राष्ट्रीय राजधानी की बागडोर अपने हाथ में लेने के अवसर के रूप में देख रही है। इसी के तहत पीएम मोदी ने दिल्लीवासियों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए कई परियोजनाएं शुरू की हैं, जिनमें मुख्य रूप से द्वारका एक्सप्रेसवे, दिल्ली मेट्रो, आवास आदि जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के साथ ही अब सावरकर के नाम विश्वविद्यालय के शिलान्यास के सहारे दिल्ली चुनाव जीतना चाहती है। कुल मिलाकर भाजपा ने अपने सबसे बड़े तीर तरकश से बाहर निकाल मुकाबला रोचक बना दिया है।

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