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मिस्टर 10 परसेंट की दमदार वापसी

पाकिस्तान केे राष्ट्रपति नियुक्त किए जाने के बाद एक ओर जहां आसिफ अली जरदारी देश को आर्थिक संकट से उभारने के लिए वेतन न लेने की बात कर रहे हैं, वहीं दागी अतीत उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है जिसे लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में काफी चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि क्या वे 10 परसेंट कमीशन न लेने का भी ऐलान करेंगे

पड़ोसी देश पाकिस्तान में पिछले महीने आठ फरवरी को हुए आम चुनाव के बाद एक ओर जहां शहबाज शरीफ ने पांच मार्च को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रपति की कुर्सी में भी बदलाव हुआ है तो दमदार वापसी कर आसिफ अली जरदारी दोबारा पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए। राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद भले ही उन्होंने वेतन न लेने की घोषण की हो लेकिन उनकी लोक-लुभावनी घाोषणाओं के बजाय पाकिस्तानी मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा मिस्टर 10 परसेंट को लेकर हो रही है। ऐसे में यह जानना आवश्यक हो जाता कि आसिफ अली जरदारी कौन हैं और इन्हें मिस्टर 10 परसेंट के नाम से क्यों जाना जाता है?

मुख्यमंत्री पद की शपथ के दौरान मरियम नवाज

आसिफ अली जरदारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। इनका राजनीतिक सफर वर्ष 1983 में शुरू हुआ था। उस समय उन्होंने चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इनकी पत्नी बेनजीर भुट्टो जब प्रधानमंत्री बनी तो उनकी सरकार में जरदारी मंत्री बने थे। शुरुआत में जरदारी ने पर्यावरण मंत्रालय अपने हाथ में लिया और फिर धीरे-धीरे कई मंत्रालयों की बागडोर उनके हाथों में आ गई। यहीं से उनके भ्रष्टाचार का खेल शुरू हुआ। तब यह कहा जाता था कि जो भी सरकार के साथ व्यापार करना चाहता था जरदारी उससे पहले 10 प्रतिशत कमीशन तय कर लेते थे। ऐसे में जरदारी का भ्रष्टाचार उन पर भारी पड़ने लगा था। कई मामलों में उन पर घोटाले के आरोप लगने लगे थे। इसके चलते ही उनके नाम के साथ मिस्टर 10 परसेंट का दाग लगा।

गौरतलब है कि आज भले ही जरदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए हैं और देश की माली हालत को देख उन्होंने वेतन नहीं लेने की घोषणा की है लेकिन ये वही जरदारी हैं जिन पर भ्रष्टाचार से लेकर अपहरण और बैंक फ्रॉड जैसे कई आरोप लगे थे। यही नहीं इन्हें 12 साल तक जेल की हवा भी खानी पड़ी थी।

जरदारी का पहला कार्यकाल
आसिफ अली जरदारी इससे पहले साल 2008 से 2013 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रह चुके हैं। उस वक्त यह देश के 11 वें राष्ट्रपति बने थे। उस समय भी ये पाकिस्तान के पहले ऐसे राष्ट्रपति बने थे जिन्हें लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित किया गया था। इन्हांेने सफलतापूर्वक अपने कार्यकाल को पूरा करने के बाद अगले राष्ट्रपति को कार्यभार सौंप दिया था। जरदारी का पाकिस्तान की राजनीति में काफी मजबूत रिश्ता रहा है। पूर्व पीएम रहीं बेनजीर भुट्टो की सरकार में भी इनके द्वारा कई अहम भूमिकाएं निभाई गई थी। इनके राजनीतिक सफर में जहां अच्छी भूमिकाएं देखने को मिली हैं, वहीं पाकिस्तान में सरकार गिरने के बाद उन पर कई गंभीर आरोप भी लगे हैं जिसके चलते इन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।

कैसे लगा मिस्टर 10 परसेंट का दाग
समय बीतता गया और जरदारी के 10 फीसदी कमीशन खाने की आदत धीरे-धीरे उन पर भारी पड़ने लगी। उनके ऊपर कई फर्म और उद्योगपतियों द्वारा कमीशन खाने के इल्जाम लगने लगे। कई मामलों में जरदारी पर घोटाले के आरोप भी लगाए गए। घोटालों का यह सिलसिला इतना बढ़ा कि जरदारी को लोग ‘मिस्टर टेन परसेंट’ के नाम से बुलाने लगे। इनका घोटालों के तहत रखा गया यह नाम पूरे पाकिस्तान में इतना मशहूर हुआ कि जब यह साल 2008 में प्रेसिडेंट बने तो उस समय पाकिस्तान के अखबारों में छपा था कि ‘मिस्टर टेन परसेंट’ देश के नए राष्ट्रपति बने हैं, जो कि जीत के बावजूद भी काफी शर्मनाक था। जरदारी को एक स्विस कंपनी से जुड़े मामले में रिश्वत लेने का दोषी ठहराया गया, जिसके चलते उनके खिलाफ कई मुकदमे भी दर्ज किए गए थे। भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ-साथ जरदारी पर अपहरण और बैंक फ्रॉड जैसे भी कई आरोप लगाए गए थे जिसके चलते साल 1990 में इन्हें पहली बार जेल भेजा गया। इसके बाद साल 1996 में दोबारा जेल गए। इसके बाद इन्हें साल 1997 से 2004 तक जेल में रखा गया। 12 साल की सजा काटने के बाद इन्हें जमानत मिली लेकिन जमानत के बाद ही हत्या के मुकदमे की सुनवाई में शामिल नहीं होने के कारण उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। जिससे पता चलता है कि जरदारी का राजनीतिक सफर काफी खराब और आरोपों से भरा रहा है, इसलिए इनको राष्ट्रपति के लिए भारी बहुमत से चुना जाना बेहद आश्चर्यजनक है। राष्ट्रपति पद पर बैठने के बाद जरदारी ने वेतन न लेने का ऐलान तो कर दिया है लेकिन पाकिस्तान की जनता इसके अलग मायने निकाल रही है।

वेतन न लेने का किया ऐलान

पाकिस्तान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का राजनीतिक कल किसी से छुपा नहीं है। जिसके चलते वह अपनी छवि को लेकर भी काफी चिंतित बताए जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि ‘जरदारी अपने कल की कालिख को साफ करने के लिए जनता के हक में फैसले ले रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति पद पर नियुक्त होने के पश्चात ही वेतन न लेने का ऐलान कर दिया है।’ इस ऐलान के बाद से ही पाकिस्तान में राजनीति में काफी बातें उठने लगी हैं। जिस पर आलोचकों का कहना है कि ‘जरदारी वेतन न लेने का ऐलान कर जनता का विश्वास बढ़ाना तो ठीक है लेकिन इससे उनके पिछले दाग साफ होने वाले नहीं हैं क्योंकि दाग बेहद गहरे हैं जिनको देश की तमाम जनता जानती है। जरदारी वेतन न लेने का वादा कर रहे हैं लेकिन 10 परसेंट न लेने का वादा करना अभी बाकी है।’

इस ऐलान को करते हुए जरदारी ने कहा कि ‘देश नकदी संकट से जूझ रहा है। देश और देश के नागरिक आर्थिक कठिनाइयों का एक लम्बे समय से सामना कर रहे हैं जिसके चलते में अपना वेतन न लेने और देश को आर्थिक संकट से निकालने की पूरी कोशिश करने का ऐलान करता हूं।’ जरदारी के इस ऐलान के बाद उनकी इस पहल का अनुसरण करते हुए पाकिस्तानी गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने भी वेतन नहीं लेने का निर्णय लिया है। गौरतलब है कि इस्लामाबाद स्थित राष्ट्रपति भवन में 68 वर्षीय जरदारी ने 9 फरवरी 2024, को पाकिस्तान के 14वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी। उनकी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने कहा कि विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन को प्रोत्साहित करने और राजकोष पर बोझ न डालते हुए जरदारी ने यह फैसला लिया है। पूर्व राष्ट्रपति आरिफ अली को वेतन के रूप में प्रति माह 8,46,550 पाकिस्तानी रुपए दिए जाते थे। यह वेतन साल 2018 में संसद द्वारा तय किया गया था।

मरियम नवाज बनीं मुख्यमंत्री
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज पंजाब प्रांत की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गई हैं। इसके साथ ही मरियम ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण कर इतिहास रच दिया है। मरियम नवाज को पंजाब विधानसभा में 220 विधायकों का समर्थन मिला। मरियम नवाज के पंजाब सूबे का मुख्यमंत्री खास इसलिए है क्योंकि पंजाब को राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है। इसलिए पंजाब की सीट के लिए राजनीतिक दलों के बीच काफी घमासान चलता रहता है। मरियम नवाज का जन्म 1973 में पाकिस्तान के लाहौर शहर में हुआ था। मरियम ने 2012 में राजनीति में कदम रखा। पार्टी के चुनाव अभियान का प्रभारी के रूप में चुने जाने पर मरियम ने 2013 के पाकिस्तान चुनावों में पीएमएल-एन को जीत दिलाई। उसी वर्ष, उन्हें प्रधानमंत्री युवा कार्यक्रम का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। लाहौर उच्च न्यायालय में उनकी नियुक्ति को चुनौती दिए जाने के बाद उन्होंने 2014 में इस्तीफा दे दिया। 2017 में, पनामा पेपर्स घोटाले के मद्देनजर पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने मरियम को सार्वजनिक पद संभालने से अयोग्य घोषित कर दिया था। अदालत ने फैसला सुनाया कि मरियम मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल थी। पीएमएल-एन ने उसके खिलाफ आरोपों से इनकार किया और कहा कि वह निर्दोष थी।

जरदारी ने बेटी को दिया प्रथम महिला का दर्जा
आसिफ अली जरदारी ने बतौर राष्ट्रपति फैसला लेते हुए अपनी बेटी ‘आसिफा’ को देश की प्रथम महिला बनाने का फैसला लिया है। इस दर्जे को पाकिस्तान में खातून-ए-अव्वल कहा जाता है। जरदारी के इस फैसले पर लोगों का कहना है कि ‘जरदारी का ये एक सोचा-समझा कदम है। वह इस फैसले के जरिए अपनी बेटी को राजनीतिक विरासत सौंपना चाहते हैं। जरदारी अपने बेटे बिलावल से ज्यादा अपनी बेटियों से प्यार करते हैं, क्योंकि जरदारी के बिलावल के साथ कई तरह के राजनीतिक मतभेद भी रहे हैं जिसके चलते वह अपनी बेटी आसिफा को विरासत सौंपना चाहते हैं। जरदारी आसिफा को राजनीति में आगे बढ़ाना चाहते हैं ताकि वह भी अपनी मां बेनजीर भुट्टों की तरह देश की राजनीति को संभालने में बड़ा योगदान दे। यही कारण है कि उन्होंने आसिफा को प्रथम महिला का दर्जा देने का फैसला लिया है, ताकि वह राजनीति को करीब से समझ सके और आगे जाकर इनका हिस्सा बन सके।’

दूसरी ओर कुछ राजनीतिज्ञ इस फैसले की वजह नवाज शरीफ द्वारा अपनी बेटी मरियम नवाज को विरासत सौंपते हुए पंजाब की मुख्यमंत्री बनाना भी बता रहे हैं जिसके चलते भविष्य में होने वाले चुनावों में मरियम को नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन का चेहरा बनाया जा सकता है। यही कारण है कि जरदारी भी अपनी पार्टी पीपीपी के लिए एक मजबूत महिला नेता को तैयार करना चाहते हैं ताकि वह मरियम का मुकाबला कर सके।

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