म्यांमार में सेना की मौजूदगी और उसकी क्रूरता की पहले भी चर्चा होती रही है, जब वहां की नेता आंग सान सूकी को दशकों जेल में रहना पड़ा था। एक बार फिर से यह छोटा सा देश जो कभी बर्मा के नाम से जाना जाता था, अचानक सुर्खियों में आ गया है। वजह बनी है संयुक्त राष्ट्र की एक ताजातरीन रिपोर्ट। इस रिपोर्ट के मुताबिक म्यांमार के खाइल में हुए जनसंहार और मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में देश के बड़े सैन्य अधिकारियों की भूमिका की जांच होनी चाहिए। यह रिपोर्ट सैकड़ों साक्षात्कारों पर आधारित है। खास बात यह कि इसे म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ हुई हिंसा के लिए संयुक्त राष्ट्र में सबसे कड़ी निंदा के रूप में देखा जा रहा है।

याद रहे साल भर पहले म्यांमार में रोहिंग्या शरणार्थियों पर सेना का हमला हुआ था। पिछले साल 25 अगस्त को की गई सैन्य कार्रवाई से भयभीत करीब सात लाख रोहिंग्या मुसलमानों ने सीमा पार कर पड़ोसी देश बांग्लादेश में शरण ली थी। बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रोहिंग्या कार्यकर्ताओं ने प्रार्थनाओं, भाषणों और गीतों के जरिए उस काले दिन को याद किया। ठीक सालभर बाद ही संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट आई है जिसने वहां की क्रूर सेना के चेहरे को बेनकाब कर दिया है।

संयुक्त राष्ट्र के म्यांमार की सेना पर आरोप लगाने के बाद वहां की गतिविधियां बहुत तेज हो गई हैं। म्यांमार के सेना अध्यक्ष मिन आंग हलैग और अन्य वरिष्ठ अफसरां का फेसबुक अकाऊंट बंद कर दिया गया है। वहां फेसबुक की काफी पहुंच है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में यह मांग की गई है कि म्यांमार के जनरलों पर रोहिंग्या नरसंहार का मुकदमा चले। संयुक्त राष्ट्र की की रिपोर्ट में सेना अध्यक्ष मिग आंग हलैग समेत पांच अन्य जनरलों को दोषी माना गया है।

गौरतलब है कि पिछले साल म्यांमार के संगठन अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी ने म्यांमार की पुलिस और सेना की करीब 30 चौकियों पर हमला बोला था। इसके बाद ही सेना ने जवाबी कार्रवाई में रोहिंग्या मुसलमानों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। संयुक्त राष्ट्र ने इस नरसंहार को जातीय सफाई करार दिया है। दशकों जनतंत्र के लिए संघर्ष करने वाली आंग सान सूकी को नोबेल शांति का पुरस्कार मिल चुका है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में सूकी की कड़ी आलोचना की गई है। क्योंकि वह देश में जारी हिंसा को रोकने में नाकाम रहीं। रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया है-लोगों की हत्या, औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार, बच्चों के उत्पीड़न और पूरे के पूरे गांव को जलाने को न्याय संगत नहीं ठहरा सकते।

अमेरिका भले ही खुद खुलेआम मानवाधिकारों की उपेक्षा करता रहा है। मगर दुनिया का कोई देश इसकी जद में आता है तो वह दारोगा की तरह तनकर खड़ा हो जाता है। यही उसकी फितरत भी है। म्यांमार मामले में भी उसका यही रूप देखने को मिला है। अमेरिका ने रोहिंग्या मुसलमानों के जातीय नरसंहार और मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए म्यांमार सेना और पुलिस के चार कमांडरों और सेना की दो ईकाइयों को प्रतिबंधित कर दिया। अमेरिका की तरफ से म्यांमार के विरुद्ध उठाया गया यह सबसे कठोर कदम है। ट्रंप प्रशासन के इस मामले में थोड़ा विवाद भी है। टं्रप प्रशासन ने म्यांमार सेना के शीर्ष अधिकारियों को लक्षित नहीं किया। लेकिन रोहिंग्या अभियान से जुड़े अपराधों को मानवता विरोधी या जनसंहार कहे जाने पर भी रोक लगाई।

रिपोर्ट आने के बाद म्यांमार में सियासी हलचल तेज हो गयी है। सूकी को भी लगातार निशाने पर लिया जा रहा है। इसकी माकूल वजहें भी हैं। सूकी से लोगों को काफी उम्मीदें जगी मगर मायूसी हाथ लगी। लोगों को यकीन था वह लोकतंत्र की लंबी लड़ाई लड़ने वाली, लोकतंत्र की रक्षा में अपना सर्वस्व झोंक देंगी। लेकिन अब उन पर यह आरोप लग रहा है कि लंबे संघर्ष के बाद देश की कमान संभालाने वाली सूकी बदल गई हैं। सत्ता मिलते ही वह तीसरे साल पहले शुरू हुई क्रांति का भूल गईं। म्यांमार को सेना की तानाशाही से छुड़ाने का वादा करने वाली आंग सान सूकी की लड़ाई 1988 में हुई थी। उसके बाद भी अगले 22 सालों तक वहां सेना का ही वर्चस्व रहा। तीस साल बीत जाने के बाद सूकी देश की कांउसलर तो बन गई। मगर देश के हालात नहीं बदले। सेना का वही रवैया बदस्तूर जारी है। जनतंत्र लहूलुहान है। लिहाजा देश के लोगों में सेना शासक के साथ-साथ सूकी के प्रति भी जबरदस्त रोष है। वर्ष 2015 के चुनाव में सूकी को मिली जबरदस्त कामयाबी के बाद लोगों को उनसे बहुत अपेक्षाएं थी। लेकिन उनके आधे कार्यकाल में ही लोग मायूस हो गए हैं।

लंबी खामोशी के बाद अब सूकी ने भी अपनी खामोशी तोड़ी है। उन्होंने स्वीकार किया कि सेना के साथ उनकी सरकार के रिश्ते बुरे नहीं हैं। उनकी सरकार में शामिल सेना के कई शीर्ष अधिकारी काफी अच्छे हैं। सूकी ने कुछ दिन पहले अपने व्याख्यान में यह भी कहा था कि उनके देश के राखिने प्रांत में आतंकवाद का खतरा बना हुआ है। जिसके नतीजे काफी गंभीर हो सकते हैं। सूकी को म्यांमार में जनतंत्र के लिए संघर्ष करने वाली महिला के रूप में जाना जाता है। लेकिन उत्तरी राखिने प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों पर सैन्य कार्रवाई को लेकर विश्व समुदाय में उनकी काफी आलोचना हुई है।

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