प्रदेश में अब निकाय चुनाव ने दस्तक दे डाली है। यूं तो राज्य में नगर निकायों का कार्यकाल गत् वर्ष नवम्बर में ही समाप्त हो गया था लेकिन प्रशासनिक तैयारियां पूरी न होने चलते समय पर चुनाव नहीं कराए जा सके। अब हर हालत में सितम्बर तक यह चुनाव होने हैं। ऐसे में कुमाऊं के प्रदेश द्वार का दर्जा पाए हल्द्वानी में विभिन्न राजनीतिक दलों के भीतर दावेदारों ने अपनी दावेदारी पेश करनी शुरू कर दी है। भाजपा से निवर्तमान मेयर डॉ. जोगेन्द्र रौतेला, मुख्यमंत्री धामी के अति विश्वस्त शंकर सिंह कोरंगा और सांसद अजय भट्ट के निकटवर्ती महेंद्र सिंह अधिकारी समेत कई नेता सक्रिय हैं तो कांग्रेस भीतर ललित जोशी, राजेंद्र सिंह बिष्ट, दीपक ब्लूटिया और शोभा बिष्ट का नाम चर्चाओं में है
उत्तराखण्ड में नगर निकाय चुनाव की उल्टी गिनती आरंभ हो चुकी है। अगर कुछ अप्रत्याशित नहीं घटा तो सितंबर माह के पहले सप्ताह तक यह चुनाव सम्पन्न हो चुके होंगे। उत्तराखण्ड में नगर निकायों का कार्यकाल 10 नवंबर 2023 को पूरा हो चुका था लेकिन सरकार की लापरवाही और हीलाहवाली के चलते चुनाव की तैयारियां नहीं हो पाई और सरकार ने नगर निकायों में प्रशासक नियुक्त कर दिए। छह माह के लिए प्रशासक नियुक्त तो कर दिए गए लेकिन इन छह महीनों में परिसीमन, आरक्षण निर्धारण जैसी प्रक्रियाएं अधूरी ही रहीं। बीच में लोकसभा चुनावों के मद्देनजर चुनाव की औपचारिक तैयारियां थमी सी रह गईं। स्थानीय निकाय चुनाव हों या पंचायती चुनाव, चुनाव समय पर न कराने में सरकारों की दिलचस्पी हमेशा से सवालों के घेरे में रही है। समय पर वार्डों का परिसीमन और आरक्षण की स्थिति स्पष्ट न हो पाने के कारण सरकारें चुनाव न कराने का आसान बहाना ढूंढ़ लेती हैं। ट्टाामी सरकार भी पुरानी सरकारों की तरह समय पर नगर निकाय चुनाव कराने के अपने दायित्व निभाने में असफल रही।
नगर निकाय चुनाव की सुगबुगाहट के बीच हल्द्वानी नगर निगम में भी दावेदारों की सरगर्मियां तेज हो गईं। फिर वो चाहें भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस, दावेदारों की एक लंबी फेहरिस्त है। हालांकि दावेदारों की दावेदारी आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होने पर ही साफ हो पाएगी फिर चाहे वो मेयर की दावेदारी हो या पार्षद की। नगर निगम बनने से पहले जब हल्द्वानी को नगर पालिका का दर्जा प्राप्त था, अधिकांश समय नगर पालिका पर कांग्रेस ही काबिज रही। कुमाऊं मंडल का प्रवेश द्वार कहलाए जाने वाले हल्द्वानी नगर की स्थापना 1834 में तत्कालीन कमिश्नर टेªल द्वारा में की गई थी। कभी हल्दू के पेड़ों से गुलजार रहे हल्द्वानी की आबादी में 1831 तक व्यापारी वर्ग की बहुतायत थी।
1860 में कमिश्नर रैमजे ने इसे तराई का तहसील मुख्यालय बनाया। 1835 में टाउन अधिनियम लागू होने के बाद यहां 1837 में नगर पालिका कमेटी गठित की गई। 1942 में हल्द्वानी-काठगोदाम को मिलाकर नगरपालिका का गठनकर इसे तृतीय श्रेणी की नगरपालिका का दर्जा दे दिया गया। 1956 में इसे द्वितीय और 1966 में इसे प्रथम श्रेणी की नगर पालिका घोषित किया गया। नगर पालिका का दर्जा मिलने के बाद इसका प्रतिनिधित्व करने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है। चौधरी श्याम सिंह, मुरली मनोहर माथुर, दया किशन पांडे, धनानंद पाण्डे, हीरा बल्लभ बेलवाल, नंद किशोर खंडेलवाल, मो. अब्दुल्ला, नवीन चंद्र तिवारी, सुषमा बेलवाल, हेमंत वगड्वाल, रेनू अधिकारी ने अलग-अलग समय पर अध्यक्ष के रूप में प्रतिनिधित्व किया। 2011 में हल्द्वानी -काठगोदाम नगर पालिका का दर्जा बढ़ाकर इसे नगर निगम का दर्जा दिया गया। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के डॉ. जोगेंद्र सिंह रौतला 2011 और 2018 में लगातार दो बार मेयर का चुनाव जीत चुके हैं।
हल्द्वानी नगर पालिका के गठन से लेकर आज तक हल्द्वानी में ऐसा नहीं है कि विकास यात्रा नहीं देखी है लेकिन जिस प्रकार अंग्रेजी हुक्मरानों ने हल्द्वानी को तव्वजो देते हुए इसे एक शहर के रूप में स्थापित करने की पहल की थी शायद उस भावना के साथ उस विकास यात्रा पर हल्द्वानी उतना खरा नहीं उतरा। स्थानीय जरूरतों के साथ स्थापित और राजनीतिक लाभ की दृष्टि से स्थापित स्थानीय निकायों में अंतर होता है। अंग्रेजों ने हल्द्वानी के महत्व को देखते हुए इसे नगर पालिका का दर्जा जल्दी ही दे दिया था। कुमाऊं का प्रवेश द्वारा उनके लिए राजनीतिक दृष्टि से भले ही महत्व का नहीं रहा हो लेकिन उन्होंने हल्द्वानी के प्रशासनिक महत्व को अच्छे तरीके से समझा था। उस वक्त स्थानीय निकाय स्वयं में एक सरकार होते थे। नगर पालिका राजनीति का अखाड़ा ना होकर स्वयं अट्टिाकार सम्पन्न स्थानीय सरकारें होती थीं। शायद इसी वजह से उस वक्त के नगर पालिका प्रतिनिधि कई बड़े काम कर पाए। मसलन सड़कों और पार्कों का विकास। समय के साथ बदलती परिस्थितियों ने नगर पालिकाओं की स्थिति बदहाल होती गई।
राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और प्रतिबद्धताएं विकास के ऊपर भारी पड़ती गई। यही विमर्श हल्द्वानी नगर पर भी भारी पड़ा। 2011 में नगर पालिका से नगर निगम में उन्नयन के बाद हुए मेयर चुनावों में भाजपा के डॉ. जोगेंद्र सिंह रौतेला ने समाजवादी पार्टी के अब्दुल मतीन सिद्दीकी को 2 हजार से भी कम वोटों से हराया। इस बार कांग्रेस प्रत्याशी हेमंत वगड्वाल तीसरे स्थान पर रहे। 2018 के नगर निगम के चुनावों में नगर निगम की सीमाओं का विस्तार हुआ जिसमें कालाढूंगी विट्टाानसभा और लालकुआं विधानसभा शामिल किए गए जिसके चलते विस्तारित नगर निगम भाजपा के ज्यादा अनुकूल हो गया। विस्तार से पहले हल्द्वानी नगर निगम में हल्द्वानी विधानसभा का संपूर्ण भाग आता था जिसमें कांग्रेस ज्यादा मजबूत थी। नगर निगम में नए क्षेत्र जुड़ने के साथ निगम का समीकरण काफी बदल गया। यही कारण था कि 2018 में मेयर के चुनावों में हल्द्वानी विधानसभा में आने वाले क्षेत्र में कांग्रेस के प्रत्याशी सुमित हृदयेश 10 हजार मतों से आगे थे लेकिन नगर निगम से जुड़े नए क्षेत्रों में भाजपा प्रत्याशी की बढ़त इतनी ज्यादा थी कि सुमित हृदयेश को लगभग दस हजार मतों से हार का सामना करना पड़ा था।
2024 में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में दावेदारों की एक लंबी सूची है। मेयर के दावेदारों को इंतजार है तो इसका कि हल्द्वानी में मेयर की सीट इस बार भी सामान्य रहेगी या फिर आरक्षण के किस दायरे में आएगी, सामान्य महिला अथवा अनुसूचित जाति के लिए या फिर अनुसूचित जाति महिला के लिए। पिछले दो बार से हल्द्वानी में मेयर की सीट सामान्य रही है जिसमें भारतीय जनता पार्टी के डॉ. जोगेंद्र पाल सिंह रौतेला ने लगातार दो बार मेयर बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। सूत्र बताते हैं कि डॉ. जोगेंद्र रौतेला इस बार भी मेयर का चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं और सीट सामान्य ही रहे इस बात के लिए वो पुरजोर प्रयास कर रहे हैं। व्यवहार कुशल रौतेला अपने कार्यकाल की उपलब्धियों के दम पर मजबूत दावेदार हैं। मेयर की सामान्य सीट होने पर नगर पालिका के पूर्व वरिष्ठ उपाध्यक्ष महेंद्र सिंह अधिकारी की दावेदारी भी कम मजबूत नहीं है।
पूर्व रक्षा एवं पर्यटन राज्य मंत्री अजय भट्ट के खास लोगों में शुमार महेंद्र सिंह अधिकारी ने एन लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस के दिग्गज महेश शर्मा को भाजपा में शामिल करा अपनी काबिलियत साबित की थी। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रकाश रावत भी सामान्य सीट होने पर मेयर के प्रबल दावेदार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की राजनीति जमात के मजबूत स्तंभ रहे शंकर सिंह कोरंगा भी सामान्य सीट होने पर पूरे दमखम के साथ दावेदारी करने के मूड़ में हैं। महिला सीट होने पर विजय लक्ष्मी चौहान, पूर्व ब्लॉक प्रमुख शांति भट्ट वर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष बेला तोलिया और पूर्व जिला पंचायत अट्टयक्ष सुमित्रा प्रसाद की दावेदारी मजबूत बताई जा रही है। अनुसूचित जाति के लिए मेयर सीट आरक्षित होने पर भाजपा अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष समीर आर्य, उद्योगपति व भीमताल से विट्टाायक का चुनाव लड़ चुके मोहन पाल सहित दर्जा राज्यमंत्री दिनेश आर्य, पूर्व दर्जा राज्यमंत्री अजय राजौर, भुबन आर्य दावेदारों में शुमार हैं।
जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है वहां भी दावेदारों की एक लंबी फौज है। पूर्व में दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री रहे ललित जोशी की दावेदारी मजबूत है। 2018 के मेयर चुनावों में वो मजबूत दावेदार थे लेकिन सुमित हृदयेश के प्रत्याशी चलते उन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए थे। युवाओं में लोकप्रिय ललित जोशी राज्य आंदोलकारियों में शामिल रहे हैं। नगर पालिका के पूर्व वरिष्ठ उपाध्यक्ष वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस के सचिव राजेंद्र सिंह बिष्ट ‘रज्जी’ सामान्य सीट रहने पर कांग्रेस से मजबूत दावेदारों में एक हैं। अपने दादा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. नंदन सिंह बिष्ट की विरासत संभाल रहे राजेंद्र बिष्ट स्व. इंदिरा हृदयेश के निकटस्थों में गिने जाते रहे हैं। उनकी मां शोभा बिष्ट 2011 की पहली नगर निगम में महत्वपूर्ण पार्षद रहीं हैं। कांग्रेस से अन्य दावेदारों में प्रेस प्रवक्ता दीपक बल्यूटिया, सौरभ भट्ट, व्यापारी नेता नवीन वर्मा, गोपाल सिंह नेगी, सुहेल सिद्दीकी, अखिल भंडारी, योगेश जोशी के नाम की भी चर्चा है। महिला सीट होने पर शोभा बिष्ट की दावेदारी सबसे मजबूत है। अपने ससुर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. नंदन सिंह बिष्ट की राजनीतिक विरासत के साथ नगर निगम की पार्षद रहीं शोभा बिष्ट एक संघर्षशील महिला हैं। अन्य महिला दावेदारों में मधु सांगुड़ी, राधा आर्य शशि वर्मा, मीमांसा आर्य, राजो टंडन प्रमुख है।
कुल मिलाकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस सहित अन्य दलों को आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है और उसी के लिए अपने उच्च स्तर पर संबंधों का इस्तेमाल करते हुए अपने हितों के अनुरूप निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अंततोगत्वा आरक्षण का फैसला सरकार के स्तर पर ही तय होना है और उसी अनुरूप सभी राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बनाने का इंतजार है।

