इसमें कोई संशय नहीं कि इजरायल और हमास के युद्ध ने दुनिया का सबसे बड़ा ध्रुवीकरण करने का काम कर दिखाया है। इस संघर्ष ने अरब देशों समेत पूरी इस्लामिक मुल्कों और चीन, रूस को एक अलग पाले में खड़ा कर दिया है तो वहीं ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी यूरोपीय देश और अमेरिका दूसरे पाले में नजर आते हैं। गाजा पर हुए हमलों पर अरब देश एकजुट क्यों हैं ये तो समझ आता है लेकिन असल सवाल यह है कि आखिर चीन और रूस भी इजरायल के विरोध में क्यों जाते दिख रहे हैं। 7 अक्टूबर को हुई घटना के बाद से दुनिया वेस्ट और रेस्ट में विभाजित हो गई है। भारत को छोड़कर ज्यादातर मुल्कों ने इस मामले में स्पष्ट रुख अपनाया है। केवल भारत ने इस मामले में बीच का रास्ता चुना है, जो रुख उसका गुटनिरपेक्ष आंदोलन के दौर से चला आ रहा है

इजरायल-हमास युद्ध को अब दो महीने होने वाले हैं, लेकिन हालात हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। इस युद्ध के चलते दुनिया एक बार फिर से दो हिस्सों में बंट गई है। अभी रूस-यूक्रेन युद्ध की आग की लपटें कम भी नहीं हुई थी कि दुनिया को हमास-इजरायल युद्ध की चिंगारी ने बिखेर कर रख दिया है। दुनिया के देशों ने जिस तरह रूस-यूक्रेन युद्ध में गुट बना लिए थे अब उसी तरह अधिकांश पश्चिमी देशों ने इजरायल का समर्थन किया है तो कुछ देशों ने विरोध। लेकिन दो देश ऐसे भी हैं जिन्होंने इस युद्ध को लेकर अपनी धारणा सभी देशों से एकदम अलग बनाई हुई है। ये दो देश हैं रूस और चीन। दोनों देश गाजा में इजरायल की सैन्य जवाबी हमले और फिलिस्तीनी नागरिकों पर इसके प्रभाव की आलोचना करने से जरा भी नहीं कतराते हैं।
इजरायल और हमास के युद्ध ने दुनिया का सबसे बड़ा ध्रुवीकरण करने का काम किया है। इस संघर्ष ने अरब देशों समेत पूरी इस्लामिक दुनिया और चीन, रूस को एक पाले में खड़ा कर दिया है तो वहीं ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे यूरोपीय देश और अमेरिका दूसरे पाले में नजर आते हैं। गाजा पर हुए हमलों पर अरब देश एकजुट क्यों हैं ये तो समझ आता है लेकिन असल सवाल जेहन में यह उठता है कि आखिर चीन और रूस भी इजरायल के विरोध में क्यों जाते दिख रहे हैं। 7 अक्टूबर को हुई घटना के बाद से दुनिया वेस्ट और रेस्ट में विभाजित हो गई है। भारत को छोड़कर ज्यादातर मुल्कों ने इस मामले में स्पष्ट रुख अपनाया है। केवल भारत ने इस मामले में बीच का रास्ता चुना है, जो रुख उसका गुटनिरपेक्ष आंदोलन के दौर से चला आ रहा है।
एक तरफ पश्चिमी देश सीधे तौर पर इजरायल संग खड़े दिख रहे हैं। दूसरी तरफ चीन और रूस ने संतुलन की नीति अपनाते हुए पहले हमास के आक्रमण की आलोचना की फिर इजरायल के सैन्य कार्रवाई की भी निंदा कर रहे हैं और उससे पीछे हटने की अपील कर रहे हैं। इस जंग के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इजरायल की सेना को पीछे धकेलने के लिए प्रस्ताव आ चुके हैं, लेकिन रूस और चीन ने उसका एकजुट होकर विरोध किया है। इजरायल के खिलाफ सुरक्षा परिषद में 4 प्रस्ताव आ चुके हैं, लेकिन अमेरिकी वीटो के चलते खारिज हुए हैं, वहीं चीन और रूस एक ही पाले में खड़े दिखे हैं।
इन प्रस्तावों में इजरायल की निंदा की गई है, जबकि अमेरिका ने यह कहकर वीटो लगाया कि इसमें इजरायल के सेल्फ डिफेंस के अधिकार का तो जिक्र ही नहीं है। यही नहीं हमास के प्रतिनिधिमंडल ने तो रूस का दौरा तक किया है। कहा जाता है कि वहां पर बंधकों को रिहा करने और सीजफायर की संभावनाओं पर बात हुई थी। चीन और रूस दोनों ने ही बीते कुछ दशकों में इजरायल के साथ संबंध मजबूत किए थे। चीन ने तो बड़े पैमाने पर इजरायल में निवेश भी किया। वहीं इजरायल ने रूस को सीरिया में छिड़े गृह युद्ध के दौरान मदद की थी।
लेकिन दोनों देशों के लिए अरब वर्ल्ड को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। अरब वर्ल्ड इजरायल के सैन्य हमलों से चिंतित है। यह गुस्सा यहां तक है कि इजरायल से दोस्ती करने वाले यूएई और सऊदी अरब तक ने फिलहाल उससे दूरी बना ली है। जानकार मानते हैं कि इस रणनीति के पीछे वजह यह है कि अमेरिका के ध्रुव वाले वर्ल्ड ऑर्डर को वैकल्पिक व्यवस्था के साथ चुनौती दी जा सके। इसी के तहत चीन अरब वर्ल्ड को साथ लेना चाहता है। जबकि यूक्रेन युद्ध के बाद अकेला पड़ा रूस इस मौके को दुनिया के एक ध्रुव को साथ लेने के मौके के तौर पर देख रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में भी इजरायल के खिलाफ 18 नवंबर को जो प्रस्ताव आया था, उसमें 145 वोट पक्ष में पड़े। अमेरिका समेत महज 7 वोट खिलाफ थे और 18 देश गैरहाजिर रहे। इससे साफ है कि ग्लोबल साउथ, अरब वर्ल्ड, साउथ अमेरिका और यूरोप के बड़े हिस्से समेत तमाम देश इजरायल के विरोध में खड़े दिखे। ऐसे में चीन और रूस अमेरिका को इस मसले पर अलग दिखाकर बड़े पैमाने पर दुनिया में गोलबंदी का हिस्सा बनना चाहते हैं। यही दोनों की रणनीति है।
इजरायल और हमास के बीच लड़ाई से रूस और चीन को फायदा होता है या नहीं, यह काफी हद तक एक धारणा का विषय है, जबकि पश्चिम रूस और चीन को अवसरवादी के रूप में देख रहे हैं। हालांकि रूस और चीन को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका हश्र पश्चिम जैसा न हो, क्योंकि यूक्रेन और गाजा संकट के विपरीत व्यवहार में उनके पाखंड के लिए आलोचना की जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इजरायल-हमास की लड़ाई से रूस को फायदा होगा। यूक्रेन से उसकी लड़ाई अमेरिका और यूरोपीय देशों के लिए बड़ा मुद्दा रही है। मौजूदा संकट के चलते अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों का ध्यान इजरायल- हमास संघर्ष पर ज्यादा रहेगा। अगर संघर्ष जारी रहता है तो अमेरिका के लिए इजरायल को प्राथमिकता देते रहना जरूरी होगा। जानकारों का मानना है कि इससे यूक्रेन पर उसकी पकड़ कमजोर हो सकती है जो रूस के लिए अच्छी खबर है।
अमेरिकी अखबार पॉलिटिको में छपी रिपोर्ट के मुताबिक क्रेमलिन में मौजूद प्रोपेगैंडिस्ट अब ऐसी बातें कह रहे हैं कि मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग रूस के लिए एक जीत की तरह है। इससे यूक्रेन को भेजी जा रही मदद पर भी असर पड़ेगा। यूक्रेन को दी जा रही आर्थिक सहायता कम होगी। यूरोपियन यूनियन के एक राजदूत ने अखबार को बताया, ‘राष्ट्रपति पुतिन के लिए ये सबसे सटीक बर्थडे गिफ्ट था। हमास के इजरायल पर हमले के कारण अमेरिका का ध्यान बंट जाएगा। अमेरिका का स्वाभाविक फोकस इजरायल पर होता है।’ हालांकि राजदूत ने आगे कहा कि वो उम्मीद करते हैं कि यूक्रेन को दी जा रही मदद पर इसका बड़ा प्रभाव ना पड़े। लेकिन निश्चित रूप से ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट कितने वक्त तक चलेगा।
चीन के सऊदी से संबंध हो सकते हैं मजबूत
हमास हमले के बाद कई मुस्लिम देशों ने खुलकर फिलिस्तीन का समर्थन किया है। इनमें ईरान, कतर, तुर्कि और पाकिस्तान जैसे देश शामिल हैं। उधर सऊदी अरब ने इजरायल और फिलिस्तीन के बीच टू-स्टेट सॉल्यूशन की बात करते हुए बयान जारी किया। कुछ दिन पहले सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका से एक मिलिट्री पैकेज की कीमत पर इजरायल के साथ संबंध बहाल करने का ऐलान किया था। लेकिन अब इजरायल गाजा पट्टी पर कार्रवाई कर रहा है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि सऊदी अरब अब इस समझौते से पीछे हट सकता है और इसका फायदा चीन को हो सकता है। वो सऊदी अरब के साथ अपनी दोस्ती को नए आयाम दे सकता है। 9 अक्टूबर को इसका उदाहरण भी देखने को मिला। चीन और सऊदी अरब ने ज्वाइंट नेवल एक्सरसाइज शुरू की है। नाम ब्लू स्वर्ड-2023, चीन के आधिकारिक समाचार पत्र पीएलए डेली के अनुसार इस बात की जानकारी दी गई। एक्सरसाइज चीन के गुआंगडोंग प्रांत के झिंजियांग में आयोजित की जा रही है।
क्या है ग्लोबल साउथ
‘ग्लोबल साउथ’ से तात्पर्य उन देशों से है जिन्हें अक्सर विकासशील, कम विकसित तथा अविकसित देश के रूप में जाना जाता है, जो मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में स्थित हैं। 1960 के दशक में उपजा ग्लोबल साउथ शब्द आम तौर पर लैटिन अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और ओशिनिया के क्षेत्रों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

