Uttarakhand

‘बाघैन’ नाट्क में दिखा पलायन का दर्द

पलायन से खाली होते जा रहे उत्तराखण्ड के पहाड़ी गांवों के भूतहा घरों में एक ऐसा भय, एक ऐसा सन्नाटा जो रूह कंपा देता है। वैसे तो पहाड़ के गांवों में सबसे ज्यादा भय जो सताता है वह बाघ का ही है। आए दिन बाघों, तेदुओं के हमलों के शिकार बनते लोग बाघ से इतने भयभीत हो जाते हैं कि बाघ होने के एहसास से ही उनके मन का डर और बढ़ जाता है। ‘बाघैन’ भी गांव के आस-पास बाघ होने का ही एहसास कराता है। पहाडी बोली के कुछ शब्द ऐसे हैं जो किसी वस्तु या चीज के होने का आभास कराते हैं। जैसे ‘सडैन’ से किसी चीज के सड़ने का आभास होता है, ‘किड़ैन’ से किसी वस्तु के जलने के आभास होता है, उसी तरह ‘बाघैन’ से भी बाघ के होने का आभास होता है।

सुप्रसिद्ध लेखक व उपन्यासकार नवीन जोशी की कहानी ‘बाघैन’ पर बने इस नाटक का निर्देशन जनपद पिथौरागढ़ की ‘भाव राग ताल नाट्य अकादमी’ के निर्देशक कैलाश कुमार ने किया है और नाट्य रूपांतरण किया है प्रीति रावत ने। नाटक में सभी कलाकारों ने शानदार अभिनय किया।

नाटक में पहाड़ी गांवांे से लगातार होते जा रहे पलायन और पलायन की पीड़ा को झेलते गांव के बचे खुचे लोगो को दर्शाया गया है। नाटक में दिखाया गया है कि पलायन से कैसे गांव के गांव खाली होते जा रहे है। गांव के सारे घर खंडहर नजर आते हैं, जिन गांवों में कभी रौनक थी वे आज वीरान पड़े हैं और चारो तरफ सन्नाटा है। कुछ लोग इसी सन्नाटे के भय से गांव छोड़ने को मजबूर हैं, जो बाघ के भय से भी ख़तरनाक है। नाटक में दिखाया गया है कि मल्ला सेरा के आर्मी रिटायरमेंट आनंद सिंह को अपनी माटी से बेहद प्यार है। गांव मे केवल आनंद सिंह रह गए हैं, बाकी गांव वाले पलायन कर चुके हैं। ऐसे में अब उनके सुख दुःख का साथी है ‘शेरू’ (कुत्ता)। शेरू आनंद सिंह के लिए कुत्ता नहीं अपितु उसका साथी है, जिसे वह दिल की बात बताता है। उम्रदराज आनंद सिंह को शेरू की बहुत चिन्ता है। चिंता इस बात की है कि कही शेरू को बाघ न उठा ले जाए। आनंद सिंह शेरू के साथ ही अपने तीज त्यौहार भी मनाता है। और मनाए भी किसके साथ। यही नहीं वह अपनी खुशी के लिए शेरू की शादी भी करना चाहता है। परस्थितियां भले ही कुछ भी हों पर आनंद सिंह गांव नही छोड़ना चाहता। आनंद सिंह को गांव छोड़ चुके लोगों की और अपनी पत्नी की बहुत याद सताती है। लेकिन आनंद सिंह का धैर्य, साहस और जन्मभूमि से प्यार-लगाव को ‘बाघेन’ भी विचलित नही कर पाती। नाटक में विकास मॉडल का भी जिक्र किया गया है, जो उजड़ते गांवों से पलायन को रोक पाने में असमर्थ है।

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