श्वेता मासीवाल
सामाजिक कार्यकर्ता

 

सर्वोच्च दर्जा होने के बावजूद आज भी मां गंगा इतनी दयनीय स्थिति में क्यों है ये सवाल हर मानस के मन में उठने चाहिए। मुझे ये कहने में भी कोई संकोच नहीं की कलियुग के गंगा उपासकों ने तो ‘नमामि गंगा’ परियोजना बनाकर उसके श्री गणेश में ही करोड़ों का घोटाला कर डाला। इस परियोजना के माध्यम से भी गंगा मां ने कई नवल उपासकों को तार दिया। लेकिन ना तो गंगा तट पर अतिक्रमण हटा ना औद्योगिक प्रदूषण कम हुआ और ना ही प्लास्टिक कम हुआ, बल्कि मां के इन नवल उपासकों ने हर तरह से गंगा का शोषण ही किया है

मां गंगा के वैदिक आध्यात्मिक इतिहास के विषय में चिंतन के पश्चात क्रम आता है वर्तमान में गंगा की स्थिति को लेकर चिंता का। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने हरिद्वार निवासी मो. सलीम की याचिका पर 20 मार्च 2017 के दिन एक ऐतिहासिक निर्णय सुना गंगा को जीवित ईकाई (Living Entity) करार दिया था। इससे पहले केवल न्यूजीलैंड की उत्तरी द्वीप में बहने वाली वांगानुई नदी को ये मान्यता प्राप्त हुई थी। इस दर्जे के मायने ये होते हैं कि जीव नदी को किसी व्यक्ति के समान हक हासिल हों। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखण्ड के इस फैसले पर रोक लगा दी थी लेकिन उस वक्त देश में गंगा को लेकर एक सकारात्मक चर्चा अवश्य शुरू हो गई थी। गंगा में मछलियों की 140 प्रजातियां 35 सरीसर्प (Reptile) और इसके तट पर 42 स्तनधारी प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत की आध्यात्मिक सभ्यता की पोषक भी मां गंगा रही है। हिमालय की कन्दराओं में गंगा तट पर ना जाने कितने संतों ने वर्षों तक तप किया है और कई आज भी ध्यान में लीन हैं। हिमालय को सदाशिव और साधकों की स्थली बताया गया है और गंगा इस सभ्यता की द्योतक है।

सर्वोच्च दर्जा होने के बावजूद आज भी मां गंगा इतनी दयनीय स्थिति में क्यों है ये सवाल हर मानस के मन में उठने चाहिए। मुझे ये कहने में भी कोई संकोच नहीं की कलियुग के गंगा उपासकांे ने तो ‘नमामि गंगा’ परियोजना बनाकर उसके श्री गणेश में ही करोड़ों का घोटाला कर डाला। इस परियोजना के माध्यम से भी गंगा मां ने कई नवल उपासकों को तार दिया। लेकिन ना तो गंगा तट पर अतिक्रमण हटा ना औद्योगिक प्रदूषण कम हुआ और ना ही प्लास्टिक कम हुआ, बल्कि मां के इन नवल उपासकों ने हर तरह से गंगा का शोषण ही किया है।
एक महिला होने के नाते जब अंकिता भंडारी हत्याकांड हुआ था और गंगा चीला नहर में उस पहाड़ी बेटी का शव बरामद हुआ तब ऐसा लगा मानो गंगा ने उसे अपने अंग में भर लिया और किस तरह से देवभूमि के कलंक मिटाए?

‘मुण्डकोपनिषद्’ के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है। इनका केंद्र हिमालय की वादियों में उत्तराखण्ड में स्थित है। इसे देवात्मा हिमालय कहा जाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल-शरीरधारी व्यक्ति सामान्यतया नहीं पहुंच पाते हैं। अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माएं यहां प्रवेश कर जाती हैं। जब भी पृथ्वी पर संकट आता है, नेक और श्रेष्ठ व्यक्तियों की सहायता करने के लिए ये आत्माएं पृथ्वी पर उतर आती हैं।

भौगोलिक दृष्टि से इस क्षेत्र को उत्तराखण्ड से लेकर कैलाश पर्वत तक फैला हुआ माना जा सकता है। इसका प्रमाण यह है कि देवताओं, यक्षों, गंधर्वों, सिद्ध पुरुषों का निवास इसी क्षेत्र में पाया जाता रहा है। अनादिकाल से ही इस क्षेत्र को देवभूमि कहा और स्वर्गवत माना जाता रहा है। आध्यात्मिक शोधों के लिए, साधनाओं, सूक्ष्म शरीरों को विशिष्ट स्थिति में बनाए रखने के लिए वह विशेष रूप से उपयुक्त है।

पढ़ने जानने में ये बात कोरी फसक सी लग सकती है लेकिन हिमालय में जिस भी व्यक्ति ने आध्यात्मिक यात्रा करी है उन्होंने बड़ी सहजता से इन बातों का अनुभव भी किया है। स्वामी रामकृत हिमालय संतों के साथ निवास (Living With Himalayan Masters) पुस्तक में ऐसे कई किस्से दर्ज हैं।

ऐसी स्थिति में तो गंगा तट को आध्यात्मिक धरोहर के तौर पर सहेजा जाना चाहिए क्योंकि गंगा के साथ अध्यात्म की ऊर्जा भी साथ-साथ बहती है, जिसकी इस समय लगातार पतित होते समाज को बहुत आवश्यकता है। पूर्वोत्तर भारत में गंगा जी की सौगंध को सबसे बड़ी सौगंध माना जाता रहा है। और इसकी सौगंध झूठ कहने वाले नरक है, ऐसा माना जाता है। आजकल के दौर में जब कुछ सच नहीं लगता। सोच कर देखिए, मात्र दो दशक पूर्व तक गंगा के नाम से ही दूसरे व्यक्ति की बात पर भरोसा बैठ जाता था। क्या आदर्श समाज रहा होगा।

उत्तराखण्ड में गंगा के तटीय क्षेत्र अध्यात्म के लिए उचित वातावरण भी प्रदान करते हैं। भारत में ध्यान, योग और अध्यात्म विद्या सीखने के लिए अन्य देशों की अपेक्षा उचित वातावरण है। पश्चिमी संगीत के दिग्गज बीटल्स यूं ही ऋषिकेश नहीं आ गए थे। आज भी कई फिरंगी वहां योग समझते मोक्ष तलाशते सहजता से दिख जाते है। उस स्थान का महत्व ना जाने कितने वर्षों से केवल बढ़ रहा है। योग तो वैसे भी भारत की तरफ से पूरे विश्व को दिया गया एक नायाब तोहफा है और योग की भूमि के रूप में गंगा जी के किनारे बसे ऋषिकेश और हरिद्वार प्रसिद्ध है।

इसके अलावा कई प्राचीन आश्रम, गुफाएं और पहाड़ हैं, जहां जाकर तपस्या की जा सकती है या ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। अध्यात्म की इसी तलाश के लिए हजारों विदेशी यहां आकर हिमालय और गंगा के वातावरण से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। आवाम की आवाज कहे जाने वाले पद्म भूषण स्वर्गीय भूपेन हजारिका ने गंगा को लेकर अपने उद्गारों को बहुत सुंदर शब्दों में कलम बद्ध किया था। आसामी भाषा में लिखे गए इस गीत का अनुवाद है:

विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार/करे हाहाकार निःशब्द सदा ओ गंगा तुम/ओ गंगा बहती हो क्यों/नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई/निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यों/अनपढ़ जन, अक्षरहिन अनगीन जन, खाद्यविहीन, नेत्रविहीन दिक्षमौन हो क्यों/इतिहास की पुकार,करे हुंकार ओ गंगा की धार/निर्बल जन को, सबल-संग्रामी/समग्रो गामी, बनाती नहीं हो क्यों/व्यक्ति रहे, व्यक्ति केंद्रित/सकल समाज व्यक्तित्व रहित निष्प्राण, समाज को छोड़ती ना क्यों/इतिहास की पुकार, करे हुंकार ओ गंगा की धार/निर्बल जन को, सबल- संग्रामी/समग्रो गामी, बनाती नहीं हो क्यों/ रुदस्विनी, क्यूंन रहीं/तुम निश्चय चेतन नहीं/प्राणों में प्रेरणा, देती न क्यों/उनमद अवमी, कुरुक्षेत्रग्रमी, गंगे जननी/ नव भारत में भीष्मरूपी, सुतसमरजयी/जनती नहीं हो क्यों/ओ गंगा तुम, ओ गंगा तुम/ओ गंगा बहती हो क्यों?

गीत संगीत सिनेमा साहित्य का एक महत्वपूर्ण कार्य ये भी होता है कि समाज के सम सामयिक विषयों पर चर्चा को गति मिले। 1985 में जब ‘राम तेरी गंगा मैली’ फिल्म रिलीज हुई थी तब राज कपूर की इस कृति को खासी आलोचना का शिकार होना पड़ा था। मेरी दृष्टि में इसमें गंगा का प्रतीकत्व नायिका के माध्यम से किया गया है। गंगोत्री के नजदीक रहने वाली भोली और निश्चल ‘गंगा’ प्रेम में पड़ती है लेकिन प्रेमी को सामाजिक बंधन और व्यावहारिक विषय बांध लेते हैं और गंगा अपने साधक की तलाश में जब बनारस पहुंचती है तो उसे बाजार पहुंचा दिया जाता है।

हालांकि 85 में गंगा तथा उसकी सहायक नहरों का हाल काफी दुरुस्त था। लेकिन कुछ ऐसा ही बाजारवाद आज देखने को सर्वत्र मिल रहा है। गंगा व्यू के नाम से सैंकड़ों कंक्रीट के जंगल स्थापित कर दिए गए हैं जबकि मानकों के अनुसार गंगा नदी के तट से 200 मीटर की दूरी तक कोई भी गतिविधि पूर्णतः प्रतिबंधित है। गंगोत्री ग्लेशियर भी आज प्रदूषण मुक्त नहीं है। 87 वर्षों में 30 किलोमीटर लम्बे ग्लेशियर में से पौने दो किलोमीटर का हिस्सा बह चुका है। वजह भी आप और हम ही हैं। 2500 किलोमीटर लम्बी गंगा मां 40 करोड़ की आबादी को जीवित रखे हुए हैं लेकिन चंद रुपए के लालच में हर मोड़ पर गंगा की अस्मिता के साथ समझौता हो रहा है। बात करें पाताल भुवनेश्वर गुफा की तो ना जाने कितनी ऐसी प्राकृतिक गुफाएं देवभूमि उत्तराखण्ड में हैं जिनके धार्मिक आध्यात्मिक और भौगोलिक मायने है।

इन गुफाआंे में कई योगी स्थूल सूक्ष्म रूप में ध्यान लीन हैं लेकिन इसका चिंतन तक नहीं किया जाता जब टिहरी बांध परियोजना या जमरानी बांध परियोजना पटल पर उतारी जाती है। उत्तराखण्ड जो देश का आध्यात्मिक धरोहर है वहां इस पक्ष को शून्य पर रख कर विकास का मॉडल तैयार किया जाता है। जिस गति पर हम सवार है उस गति से आने वाली पीढ़ी के लिए हम गंगा को संरक्षित रख पाएंगे इसकी संभावना शून्य है। लेकिन इस लेख के माध्यम से अपने निजी अनुभव के आधार पर मैं यह अपील निश्चित करूंगी की जब आप गंगोत्री, देवप्रयाग, ऋषिकेश या हरिद्वार जाएं तो प्रातः या संध्या आरती में शामिल होकर मनन कीजिएगा की अग्नि देव प्रज्ववलित कर हम जल देव की उपासना तो करते हैं लेकिन अंतर के तमस को क्यों नहीं समाप्त कर पाते। क्या हमारी पीढ़ी गंगा को मैला कर तरेगी? क्या सारा दोष हम दूसरों के सर मढ़ेंगे?

क्या गंगा के जल को अंजुल में लेकर हम ये प्रण नहीं ले सकते कि अपने पूर्वजों के साथ-साथ अपने पूर्वजों द्वारा सहेजी गई जीव नदी को सहेजने में हम अपनी आहुति अवश्य देंगे?
अटल जी की कविता सहज याद आती है

अंतिम जय का वज्र बनाने
नव दधीचि हड्डियां गलाएं
आओ फिर से दिया जलाएं …
अफसोस है तो बस इतना कि गंगा या तो मेले उत्सव का साधन बन गई है या बुद्धिजीवी के चिंतन का। इस चिंतन को क्रियान्वित करने वाले गंगा पुत्र पुत्री जागें इसी प्रार्थना के साथ ..
साम्ब सदाशिव।

 

(लेखिका रेडियों प्रजेंटर, एड फिल्म मेकर तथा
वत्सल सुदीप फाउंडेशन की सचिव हैं)

इसी बीच एक बेहद मार्मिक खबर भी मिली कि पूर्व प्रधानमंत्री आदरणीय डॉक्टर मनमोहन सिंह जी का स्वर्गवास हो गया है। डॉ. मनमोहन सिंह वर्ष 2008 में काशी दौरे पर गए थे। वे देश के पहले राजनेता थे जिन्होंने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए गंगा नदी के किनारे आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती में भाग लिया था। यूपीए-1 शासनकाल के दौरान तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह 14-15 मार्च 2008 को वाराणसी पहुंचे थे। इसी दिन उन्होंने आरती कार्यक्रम में भाग लिया था। रोचक बात ये है कि उन्होंने काशी की यात्रा से लौटने के बाद बड़ा फैसला लिया था। उन्होंने गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी और गंगा डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलचर घोषित किया था।
गंगा के इस ख़ामोश उपासक को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

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