
श्वेता मासीवाल
सामाजिक कार्यकर्ता
पाताल भुवनेश्वर की यात्रा के अंत में प्रकट होता है कलियुग के अंत का रहस्य। इस गुफा में चारों युगों के प्रतीक के रूप में चार पत्थर स्थापित हैं (सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग) इन चार पत्थरों को चार द्वारों का रूप माना गया है, जिनके नाम हैं बीते मोक्षद्वार, पापद्वार रणद्वार और धर्मद्वार। इनमें से बीते युगों के प्रतीक तीन द्वार बंद हो चुके हैं। इनमें से धर्मद्वार को कलियुग का प्रतीक माना जाता है। इस पत्थर की सबसे खास बात तो यह है कि ये पत्थर लगातार धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है। यह मान्यता है कि जब यह पत्थर गुफा की छत को छू लेगा उस दिन कलियुग का अंत हो जाएगा। इस बात को इन पाषाण हो चुके युगों के स्तम्भों के सामने सुनकर सहसा रोंगटे खड़े हो जाते हैं
हिंदू पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने क्रोधित हो भगवान गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया और फिर माता पार्वती के कहने पर गणेश जी को हाथी का सिर लगाया गया था। वहीं जो सिर भगवान शिव ने अलग किया था, अगला पड़ाव उस अचम्भित करने वाले आदि गणेश का है। धड़ से नीचे जिस प्रकार श्वास नली, भोजन नली और गले की नसे दिखाई देती हैं, वैसा ही कुछ यहां एक कलाकृति में दिखता है। इसी स्थान पर 108 पंखुड़ियों वाले ब्रह्माकमल के रूप में एक चट्टान मौजूद है जिसके विषय में कहा जाता है कि जब गणेश जी का सर धड़ से अलग हुआ तब उसे जोड़ने हेतु ब्रह्माकमल से ही अमृत धारा का अभिषेक हुआ। मान्यता है कि आज भी ब्रह्माकमल से जल की बूंदें आदि गणेश जी के ऊपर पड़ती हैं।
इसके आगे दर्शन होते हैं चारों धामों के, केदारनाथ पंच बद्री तथा अमरनाथ गुफा के भी। अद्भुत बात ये कि दशकों बाद मैंने स्वयं जो नजारा अमरनाथ गुफा में देखा, जिस प्रकार बर्फ की आकृति वहां बनती है, ठीक वैसे ही यहां भी स्थित है।
हिमालय के इन रहस्यों को समझ पाना भी उतना ही जटिल है जितना इस स्थान पर चूनपानी यानी लाइमस्टोन की कलाकृतियों की जटिलताएं। इसके आगे है काल भैरव की गुफा। मुझे आज भी याद है पंडित श्री भंडारी जी ने बताया था कि वो लोग काल भैरव की गुफा के गर्भ गृह तक गए हैं और किवदंती है कि जो इस गुफा की पूंछ यानी अंत तक पहुंचेगा वो दोबारा जन्म मरण के चक्र में न फंसकर सीधा मोक्षधाम ही पहुंचेगा। इसके आगे पहुंच कर दर्शन होते हैं पाताल की अधिष्ठात्री देवी माता भुवनेश्वरी के। किसी विग्रह के समान ही माता के नेत्र मुख के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।
आगे बढ़ने पर समुद्र मंथन से निकला पारिजात का पेड़ नजर आता है तो ब्रह्मााजी का पांचवें मस्तक के दर्शन भी यहां पर होते हैं। गुफा के दाहिनी ओर इसके ठीक सामने ब्रह्माकपाल और सप्तजलकुंड के दर्शन होते हैं, जिसकी बगल में टेढ़ी गर्दन वाले एक हंस की आकृति दिखाई देती है। मानस खंड में वर्णन है कि हंस को कुंड में मौजूद अमृत की रक्षा करने का कार्य दिया गया था लेकिन लालच में आकर हंस ने खुद ही अमृत को पीने की चेष्टा की, जिससे शिव जी के श्राप के चलते हंस की गर्दन हमेशा के लिए टेढ़ी हो गई। इसके आगे जाकर गंगा जल के सात कुंडों के दर्शन होते हैं जिससे यह मान्यता स्थापित होती है कि गंगा सभी लोकों में बहकर तारने का कार्य करती है। इसके आगे ही हंस की कलाकृति अमृत की पहरेदारी करती दिखाई देती है। इस गुफा की सबसे अलौकिक कलाकृति अब सामने नजर आती है- साक्षात् शिव की जटाएं जो श्वेत वर्ण की हैं। कहते हैं इन्हीं जटाओं के माध्यम से भागीरथी को धरती पर उतारा गया था ताकि गंगा का वेग सम्भालने की ऊर्जा को धरती सह सके।
इसके बाद दिखती है तैंतीस कोटि देवी-देवताओं की कलाकृति। ये एकमात्र दिव्य स्थल है जहां सभी देवी-देवताओं के एक साथ दिव्य दर्शन होते हैं। यहीं पर स्थित हैं स्वयंभू शिवलिंग बाबा, पाताल भुवनेश्वर महादेव के रूप में, जिनके किनारे तांबे से मढ़ाई हुई है ये सिद्ध कार्य आदि गुरु शंकराचार्य ने किया था। कहते हैं इस स्वयंभू शिवलिंग में इतनी ऊर्जा थी कि इसके सीधे दर्शन की ऊर्जा मानव चक्षु में नहीं थी और इस कार्य के बाद ही चंद्र राजाओं ने भी बाबा के दर्शन किए थे। इसी शिवलिंग में आपको ब्रह्मााजी, महादेव और शयन करते विष्णु भगवान की छवि भी स्पष्ट नजर आती है। यहां रोजाना अभिषेक और पूजन होता है, में ऐसी मान्यता है कि यहां से कुछ दूर स्थित हाटकाली मंदिर में काली स्वरूप को कीलित करने और यहां इस सिद्ध गुफा में शिवलिंग को भी कीलित करने पश्चात् आदि गुरु कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए प्रस्थान कर गए थे। यहां पर एक और अनोखी कलाकृति एक उभार के रूप में दिखाई देती है। यह उभार कैलाश पर्वत होने का आभाष देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे यहां कैलाश जाने का मानचित्र भी बना हो। क्या मासूम किसी काल में जीपीएस समान कोई विधा हो।
हरि अनंत
हरि कथा अनंता!
इन्हीं भेदों को समझने के लिए ‘उत्तराखण्ड एक आध्यात्मिक खोज’ यात्रा शुरू की है। कहते हैं शिव तांडव के भी कई प्रकार हैं और हिमालय पर ज्ञान प्राप्ति के पूर्व भी शिव ने हिमालय पर तांडव किया था। शिव जहां विहार करते हैं उस हिमालय के किसी अगले दिव्य पड़ाव पर चलेंगे अगले अंक में।

