इन दिनों सोशल मीडिया पर एक टेक्स्ट मैसेज बहुत वायरल हो रहा है। मैसेज में लिखा है, ‘मुसलमानों से नफरत करने वाले मोदी मुस्लिम महिलाओं से प्यार करते हैं।’ यह मैसेज तीन तलाक पर मोदी सरकार के विधेयक और अध्यादेश लाए जाने के मद्देनजर वायरल किया जा रहा है। मोदी सरकार तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने के लिए संसद में पूरी ताकत लगा रखी है। वहीं, विपक्ष ने इस पर अड़ंगा लगाने की ठान रखी है।

साल 2018 के अंतिम सप्ताह में लोकसभा ने तीन तलाक पर लाए गए संशोधित विधेयक को पारित किया। इस बिल के मुताबिक एक साथ तीन तलाक गैर कानूनी है। इसे तोड़ने वाले पति को तीन साल की सजा दिए जाने का प्रस्ताव पास किया गया है। लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में 245 और विपक्ष में 11 वोट पडे.। लोकसभा में पास होने के बाद इसे राज्यसभा में रखा गया। मगर इस पूरे सप्ताह उच्च सदन में हंगामा होता रहा। खबर लिखे जाने तक राज्यसभा में यह बिल पास नहीं हुआ है। जिस कारण तीन तलाक से संबंधित विधेयक कानून की शक्ल नहीं ले पाया है। शीतकालीन सत्र में इसके पास होने की संभावना बहुत कम हो गई है।

लोकसभा में तीन तलाक बिल पर वोटिंग का कांग्रेस और एआईएडीएमके ने बहिष्कार किया। वे इस बिल को विचार के लिए संसद की संयुक्त चयन समिति के पास भेजने की मांग कर रहे थे। मगर सरकार ने इसे नहीं माना। विपक्ष इस कानून में सजा का प्रावधान रखने का विरोध भी कर रहा था। जबकि सरकार सजा बरकरार रखना चाहती है। कांग्रेस समेत ज्यादातर विपक्षी पार्टियां तीन तलाक को अपराध करार दिए जाने का भी विरोध कर रही हैं। उनका तर्क है कि किसी और धर्म में तलाक अपराध के दायरे में नहीं है।

पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए तीन तलाक को अवैध करार दे दिया था। यह छह माह के लिए अवैध था। इसके बाद सरकार तीन तलाक पर संसद में एक विधेयक लेकर आई। लोकसभा में ये बिल पास हो गया था। राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है, इसलिए उच्च सदन में यह बिल पारित नहीं हो पाया। जिस कारण इसे कानून नहीं बनाया जा सका। इसके बाद सरकार इसी साल सितंबर महीने में तीन तलाक पर अध्यादेश ले आई, जिसे राष्ट्रपति ने भी मंज़ूरी दे दी। ये अध्यादेश संसद के शीत सत्र शुरू होने के छह हफ्तों तक मान्य रहता। इसीलिए सरकार इससे पहले इसे संसद से पारित करवाना चाहती थी।

पहली बार इस बिल को राज्य सभा में रखने के बाद इस पर तीखी बहस हुई थी। तीखी बहस के बीच सरकार ने इसके प्रावधान के दायरे को संशोधित करने के लिए हामी भर दी थी। इसलिए संशोधित बिल पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का अधिकार सिर्फ महिला और उनके रिश्तेदारों को ही देता है। विरोध के बावजूद तीन तलाक अब भी गैर जमानती है। अगर पुलिस किसी को तीन तलाक के आरोप में गिरफ्तार करती है तो वो जमानत पर रिहा नहीं होगा। हालांकि मजिस्ट्रेट जमानत दे सकते हैं, लेकिन वो भी पत्नी की बात सुनने के बाद ही।

इस नए बिल में एक तीसरा बदलाव ये भी किया गया है कि मुस्लिम दंपति आपसी सहमति से समझौता कर सकता है। अगर पत्नी इस समझौते के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाती है। यहां पत्नी की सुनवाई के बाद ही पति को जमानत मिल सकेगी। मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेंगे कि जमानत तभी दी जाए जब पति विधेयक के अनुसार पत्नी को मुआवजा देने पर सहमत हो। विधेयक के अनुसार मुआवजे की राशि मजिस्ट्रेट द्वारा तय की जाएगी। ये कुछ ऐसे बिंदु थे, जिस पर जनवरी 2018 में राज्य सभा में जमकर बहस के बाद सहमति बनी थी।

तलाक-ए-बिद्दत या इंस्टेंट तलाक दुनिया के बहुत कम देशों में चलन में है। भारत उन्हीं देशों में से एक है। एक झटके में तीन बार तलाक कहकर शादी तोड़ने को तलाक-ए-बिद्दत कहते हैं। ट्रिपल तलाक लोग बोलकर, टेक्स्ट मैसेज के जरिए या व्हॉट्सऐप से भी देने लगे हैं। एक झटके में तीन बार तलाक बोलकर शादी तोड़ने का चलन देश भर में सुन्नी मुसलमानों में है। देवबंद के दारूल उलूम को मानने वाले मुसलमानों में तलाक-ए-बिद्दत सबसे ज्यादा चलन में है। वे इसे सही मानते हैं। हालांकि कई इस्लामिक बुद्धिजीवी तलाक-ए- बिद्दत को सही नहीं मानते हैं। वे इसके खिलाफ बोलते भी हैं और काम भी कर रहे हैं। इनकी संख्या बहुत कम है। इस तरीके से कितनी मुसलमान महिलाओं को तलाक दिया गया इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है।

देश की सबसे बड़ी अदालत में तीन तलाक के मुद्दे को उठाने वाली पांच महिलाओं में से एक आतिया साबरी बिल में हुए इस संशोधन से बहुत खुश हैं। वो चाहती हैं कि बिल राज्यसभा में पारित हो जाए और सभी राजनीतिक पार्टियां इस पर एक साथ आगे आएं। आतिया इस बात से थोड़ा दुखी हैं कि राज्यसभा तक बिल आने में काफी वक्त लग रहा है लेकिन इस बात से ख़ुश भी हैं कि बिल में जो संशोधन हुए हैं, वो बहुत जरूरी थे।

वह कहती हैं, ‘मैं ख़ुद भुक्तभोगी हूं इसलिए कह सकती हूं कि जो संशोधन किए गए हैं वो जरूरी थे। अगर कानून बन जाएगा तो नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने की हिम्मत भी बढ़ेगी।’ उन्होंने आगे कहा, ‘जरूरी नहीं है कि तलाक के बाद औरत को उसके मायके वाले अपनाएं और उसकी देखभाल करें। ये संशोधन औरतों के हक में हैं।’ एक ओर जहां आतिया संशोधन को न्यायसंगत और मुस्लिम महिलाओं के हित में मानती हैं। वहीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी मानते हैं कि ये पूरा बिल ही गलत है।

कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर तीन तलाक पर सरकार हड़बड़ी में क्यों है। क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक वजह है। कुछ लोगों को लगता है कि यह राजनीतिक रूप से प्रेरित है और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को इसका फायदा पहुंचेगा। ऐसे लोगों का तर्क है कि मुस्लिम महिलाएं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके उद्धारक के रूप में स्वीकार करना शुरू कर देंगी और इससे मुसलमानों के एक बड़े तबके में निहित मोदी विरोधी भावनाओं को दूर करने में मदद मिलेगी। तीन तालाक पर कानून बनने के बाद मुस्लिम महिलाएं बीजेपी और एनडीए को वोट करेंगी। इससे मोदी सरकार को राजनीतिक लाभ मिलेगा।

लेकिन सभी इस तर्क से सहमत नहीं हैं। कुछ समीक्षकों का मानना है कि ऐसी भविष्यवाणियों पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगा। नफा-नुकसान को लेकर ऐसे लोग संशय में है। उनका कहना है कि मुस्लिम महिलाओं को जब तक राजनीति से इतर इसमें कुछ ठोस लाभ नहीं दिखता, वो अपने समुदाय की भावनाओं के खिलाफ जाकर वोट नहीं करेंगी। वह भी ऐसी पार्टी के पक्ष में, जिसे आमतौर पर मुस्लिम विरोधी माना जाता है।

तीन तलाक पर पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉक्टर आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं, ‘जो कानून अमानवीय है, इस्लामिक नहीं हो सकता। एक बार में तीन तलाक बोलना अमानवीय है। यह महिलाओं को जमीन में दफनाने जैसा है। कुरान में ट्रिपल तलाक की प्रक्रिया साफ-साफ लिखी हुई है। एक साथ तीन तलाक बोलना इस्लाम के किसी भी स्कूल में मान्य नहीं है। ये प्री-इस्लामिक प्रैक्टिस प्रथा है। इसलिए ट्रिपल तलाक इस्लाम का मूल तत्व नहीं है।’

आरिफ मोहम्मद खान आगे कहते हैं कि आज दुनिया भर के मुस्लिम मुल्कों में यह कानून बदला जा चुका है। अप्रतिबंधित तीन तलाक का अधिकार भारत को छोड़कर कहीं भी मुस्लिम पुरुष को हासिल नहीं है। इसके अलावा मुसलमानों की एक बड़ी संख्या आज अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों में रहती है, जहां पर्सनल लॉ जैसा कोई कानून नहीं है। उन देशों में रहने वाले मुसलमान वहां के कानून का पालन करते हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्तिगत अधिकार है, सामुदायिक नहीं। यह अधिकार लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य तथा संविधान के अन्य उपबंधों से बाधित है। इसी प्रावधान के तहत धर्म की स्वतंत्रता राज्य को ऐसे कानून बनाने से नहीं रोकती जिसका उद्देश्य धार्मिक आचरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य लौकिक कार्यकलाप का विनियमन या निर्बंधन हो। तो फिर कोई सरकार इस पर कानून बनाती है तो संविधान के अंतर्गत ही होगा।

बात अपनी-अपनी

‘मैं खुद भुक्तभोगी हूं इसलिए कह सकती हूं कि जो संशोधन किए गए हैं वो जरूरी थे। अगर कानून बन जाएगा तो नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने की हिम्मत भी बढ़ेगी।’
आतिया साबरी, याचिकाकर्ता

‘जो कानून अमानवीय है, इस्लामिक नहीं हो सकता। एक बार में तीन तलाक बोलना अमानवीय है। यह महिलाओं को जमीन में दफनाने जैसा है। कुरान में ट्रिपल तलाक की प्रक्रिया साफ-साफ लिखी हुई है। एक साथ तीन तलाक बोलना इस्लाम के किसी भी स्कूल में मान्य नहीं है। ये प्री-इस्लामिक प्रैक्टिस प्रथा है। इसलिए ट्रिपल तलाक इस्लाम का मूल तत्व नहीं है।’
डॉ. आरिफ मोहम्मद खान, पूर्व केंद्रीय मंत्री

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