स्मृति शेष
09 मार्च 1951-16दिसंबर 2024
तबला वादक जाकिर हुसैन 73 साल की उम्र में इस संसार और अपने असंख्य प्रशंसकों को अलविदा कह अंतिम यात्रा पर निकल गए हैं। जाकिर हुसैन ‘इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस’ नामक बीमारी से पीड़ित थे। दो सप्ताह से अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को के एक अस्पताल में भर्ती हुसैन साहब के निधन से देशभर में शोक की लहर है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक ने उनके निधन पर गहरा शोक प्रकट किया है। आइए, जानते हैं तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन की जिंदगी से जुड़े दिलचस्प किस्से।
जब तबले का जिक्र आता है तो सबसे बड़े नामों में उस्ताद जाकिर हुसैन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। जाकिर हुसैन का जन्म 9 मार्च 1951 को मुम्बई में हुआ था। उनके पिता, उस्ताद अल्ला रक्खा, खुद एक महान तबला वादक थे। बचपन से ही जाकिर साहब ने अपने पिता से तबले की बारीकियां सीखनी शुरू कर दी थीं। उन्होंने अपनी कला में इतना अभ्यास और परिश्रम किया कि जब उनकी उंगलियां तबले पर पड़तीं तो श्रोता उनकी धुनों में खो जाते। उन्होंने तबले को हमेशा आम लोगों से जोड़ने की कोशिश की है, कहीं भी शास्त्रीय वाद्य की प्रस्तुति होती थी उस दौरान वो बीच-बीच में अपने तबले से कभी डमरू, कभी शंख, तो कभी बारिश की बूंदों जैसी अलग-अलग तरह की ध्वनियां निकालकर सुनाते थे। वे कहते थे कि ‘शिवजी के डमरू से कैलाश पर्वत से जो शब्द निकले थे, गणेश जी ने वही शब्द लेकर उन्हें ताल की जुबान में बांधा। हम सब तालवादक, तालयोगी या तालसेवक उन्हीं शब्दों को अपने वाद्य पर बजाते हैं। गणेश जी हमारे कुलदेव हैं।’
फिल्मों और पुरस्कारों की दुनिया
जाकिर हुसैन ने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में भी अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेरा। उन्होंने कई फिल्मों में बैकग्राउंड स्कोर तैयार किया और अपनी कला से सिनेमा को भी समृद्ध किया। उन्होंने न सिर्फ भारतीय शास्त्रीय संगीत में योगदान दिया, बल्कि जैज और वर्ल्ड म्यूजिक के साथ भी अपने तालमेल से संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाकिर हुसैन ने अपने जीवनकाल में सैकड़ों मंचीय प्रदर्शन किए और हर बार अपनी ऊर्जा और करिश्मे से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी कला का जादू ऐसा था कि उनका हर प्रदर्शन एक नया अनुभव होता इसके लिए उन्हें संगीत की दुनिया का सबसे बड़ा ग्रैमी अवार्ड 1992 में ‘द प्लेनेट ड्रम’ और 2009 में ‘ग्लोबल ड्रम प्रोजेक्ट’ मिला। इसके बाद 2024 में उन्हें तीन अलग-अलग संगीत एलबमों के लिए एक साथ तीन ग्रैमी मिले। उनके योगदान को देश और दुनिया में कई बार सराहा गया है। उन्हें पद्म श्री (1988) और पद्म भूषण (2002) जैसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों से भी नवाजा गया।
फिल्मों में भी किया अभिनय
जाकिर हुसैन ने 1983 में शशि कपूर की फिल्म ‘हीट एंड डस्ट’ से फिल्मों में डेब्यू किया था। इसके बाद जाकिर हुसैन ने फिल्म ‘साज’ में काम किया था। यह फिल्म 1998 में प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में जाकिर हुसैन ने शबाना आजमी संग रोमांस किया था। हालांकि ये फिल्म विवादों में फंस गई थी। बताया जाता है कि इस फिल्म की कहानी लता मंगेशकर और आशा भोसले से इंस्पायर थी। इसके बाद उन्होंने फिल्म ‘चालीस चौरासी’, ‘मंटो’, ‘मिस बिटीज चिल्ड्रन’ सहित 12 फिल्में की थी।
जीता ‘सेक्सी मैन’ का खिताब
जाकिर हुसैन का हैंडसम लुक और घुंघराले बाल उनकी पहचान थे। 1994 में भारतीय पत्रिका ‘जेंटलमैन’ ने उन्हें ‘सबसे सेक्सी मैन’ का खिताब दिया। इस प्रतियोगिता में उन्होंने अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गजों को भी पीछे छोड़ दिया था। जाकिर ने बताया था कि मैग्जीन वालों को यह यकीन नहीं हो रहा था कि वह अमिताभ बच्चन से ज्यादा वोट पाकर जीत सकते हैं। यह उनके व्यक्तित्व की खासियत थी कि वे पारंपरिक और आधुनिक दोनों रूपों में दिलों पर राज करते थे।
ताजमहल चाय की ब्रॉन्डिंग
जब टीवी पर प्रचार का दौर शुरू हुआ था तब ताज महल के आगे एक एड शूट किया गया था जिसमें जाकिर तबला बजाते हुए चाय की चुस्की लेते हुए कहते हैं ‘वाह उस्ताद वाह’ तभी दूसरा तबला वादक कहता है ‘वाह ताज बोलिए’। ताजमहल चाय पत्ती का यह विज्ञापन हर भारतीयों की जुबान पर आज भी रटा हुआ है। इस ब्रांड की चाय को घर-घर तक पहुंचाने का श्रेय जाकिर हुसैन को जाता है। जाकिर हुसैन के टेबल की थाप और उनकी परफेक्शन ने इस ब्रांड को ऐसा ऊंचा मुकाम दिलाया जो आज भी याद किया जाता है।
मां ने समझा था मनहूस
जाकिर हुसैन ने अपनी किताब ‘जाकिर हुसैन – एक संगीतमय जीवन’ में एक किस्से का जिक्र करते हुए लिखा है कि ‘जब मेरा जन्म हुआ था तब मेरे पिता की तबीयत बहुत खराब थी उनको दिल की बीमारी थी और घर की आर्थिक स्थिति सही नहीं थी, तब लोगों ने मां के कान भर दिए थे कि ये बच्चा मनहूस पैदा हुआ है। इसके आने से पिता की तबीयत और ज्यादा बिगड़ रही है। मां के दिमाग में यह बात घर कर गई।’ उसके बाद मां ने जाकिर को दूध पिलाना बंद कर दिया। तब परिवार के एक करीबी ने जाकिर को पालने की जिम्मेदारी उठाई। उन्होंने आगे लिखा है कि एक बाबा ने उनकी जिंदगी में बड़े बदलाव किए थे उनकी वजह से उन्हें बदकिस्मत से तकदीरवाला नाम मिला था। उन्होंने अपनी किताब में इस बात का जिक्र किया है कि ‘मेरे जन्म के तुरंत बाद ज्ञानी बाबा नाम के एक पवित्र व्यक्ति हमारे दरवाजे पर प्रकट हुए।
उन्होंने मेरी मां को उनका नाम बावी बेगम पुकारा। किसी को नहीं पता था कि उन्हें उनका नाम कैसे पता चला, लेकिन किसी तरह उन्होंने जान लिया। मेरी मां उनसे मिलने बाहर गईं और ज्ञानी बाबा ने उनकी ओर देखा और कहा- ‘तुम्हारा एक बेटा है। अगले चार साल उसके लिए बहुत खतरनाक हैं, इसलिए उसका अच्छे से ख्याल रखो। वो तुम्हारे पति को बचा लेगा। लेकिन बच्चे का नाम जाकिर हुसैन जरूर रखना। बाबा के कहे अनुसार निश्चित रूप से, मेरे जीवन के पहले चार साल में, मैं बीमार पड़ता रहा। मैं गलती से केरोसिन पी लेता था या मेरे शरीर पर बिना किसी कारण के फोड़े हो जाते थे या मुझे अचानक तेज बुखार हो जाता था, शायद ये टाइफाइड या कुछ और था लेकिन दिलचस्प बात ये थी कि मेरी हालत जितनी खराब होती गई, मेरे पिता उतने ही बेहतर होते गए। जैसा कि ज्ञानी बाबा ने भविष्यवाणी की थी, चार साल बाद अब्बा स्वस्थ और तंदुरुस्त हो गए और उस समय तक मेरी सेहत भी अच्छी हो गई थी। इस तरह मेरा नाम अब्बा पड़ा लेकिन ज्ञानी बाबा ने जोर देकर कहा कि मुझे जाकिर हुसैन कहा जाना चाहिए।’
एक सम्पूर्ण युग का अंत
तबले की थाप को जादुई बनाने वाले उस्ताद जाकिर हुसैन ने दुनिया को अलविदा कह दिया है। लेकिन उनका संगीत, उनकी धुनें और उनकी प्रेरणा हमेशा हमारे दिलों में अमर रहेंगी। जाकिर हुसैन का जीवन उन सभी के लिए प्रेरणा है जो कला और संगीत के प्रति समर्पित हैं तबले की थाप की धुन की जो छाप जाकिर हुसैन ने दी हैं। उनकी इस लकीर से बड़ी लकीर खीच पाना हर किसी के लिए सम्भव नहीं है। उस्ताद जाकिर हुसैन हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनके तबले की थाप हमारे कानो में हमेशा गूजती रहेंगी।

