Editorial

प्रतिरोध के स्वर और प्रेस

 पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-91
 

जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रैलियों की शुरुआत दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में एक विशाल जनसभा को आयोजित कर की। इस सभा को जयप्रकाश नारायण ने भी सम्बोधित किया था। सभा के हीरो लेकिन जगजीवन राम थे जिन्हें सुनने के लिए दलित समाज रामलीला मैदान में उमड़ पड़ा था। सरकारी तंत्र हर कीमत पर इस रैली को विफल बनाना चाहता था। ‘दूरदर्शन’ ने जो तब एक मात्र टेलीविजन चैनल हुआ करता था, ठीक इसी दिन राजकपूर की फिल्म ‘बॉबी’ का प्रसारण करने की घोषणा कर दी। सरकार को उम्मीद थी कि जनता दूरदर्शन में ‘बॉबी’ फिल्म देखने चलते रामलीला मैदान में एकत्रित नहीं होगी। ऐसा लेकिन हुआ नहीं। रैली बेहद सफल रही थी। अंग्रेजी के एक दैनिक अखबार ने अगले दिन समाचार प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था ‘वेन बाबू बीट्स बॉबी’। (इस बाबू ने बॉबी को हरा दिया।’

अपने बेहद खराब स्वास्थ्य के बावजूद जयप्रकाश नारायण ने देशभर में रैलियों को सम्बोधित कर तानाशाही का शासन खत्म करने की दमदार अपील जनता से की थी। कैथरीन फ्रैंक के अनुसार चुनाव प्रचार के दौर में जब 1 फरवरी, 1977 को हृदयगति रुक जाने चलते राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का निधन हो गया तब इन अफवाहों ने खासा जोर पकड़ा था कि अपनी हार नजदीक देख प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति से चुनाव रोकने का दबाव बनाया था। दोनों के मध्य इस मुद्दे पर तकरार के चलते फखरुद्दीन अली अहमद को हृदयघात हो गया था। वे लिखती हैं कि ‘अमेठी सीट से चुनाव लड़ रहे संजय गांधी को आभास हो चला था कि चुनाव नतीजे कांग्रेस के पक्ष में नहीं आने वाले हैं। उन्होंने ही अपनी मां पर चुनाव रद्द करने का भारी दबाव बनाया था। चुनाव से ठीक दो दिन पहले 14 मार्च के दिन संजय गांधी की गोली मारकर हत्या करने का प्रयास उनके संसदीय क्षेत्र में किया गया। कैथरीन फ्रैंक का मानना है कि यह प्रयास प्रायोजित था ताकि संजय को सहानुभूति का लाभ मिल सके लेकिन ऐसा हुआ नहीं।’

20 मार्च, 1977 को आए चुनाव नतीजों ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने का काम किया। कांग्रेस का प्रदर्शन उत्तर भारत में बेहद खराब रहा। इतना खराब की स्वयं इंदिरा गांधी रायबरेली संसदीय सीट पर अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी राज नारायण के हाथों पराजित हो गईं। संजय गांधी अपना पहला चुनाव बुरी तरह हारे। उत्तर प्रदेश की 85 सीटों में से एक भी सीट जीत पाने में कांग्रेस विफल रही। बिहार में भी उसका खाता नहीं खुला था।

राजस्थान की 25 सीटों में से उसे केवल 1 सीट पर विजय मिली। मध्य प्रदेश की 40 सीटों में भी वह केवल 1 सीट जीत पाई थी। दक्षिण भारत, जहां आपातकाल का असर कमतर रहा था, कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा था। आंध्र प्रदेश की 42 सीटों में से उसे 41 सीटों पर जीत मिली, कर्नाटक की 28 सीटों में से 26 में कांग्रेस सफल रही। केरल की 20 सीटों में से 11 सीटें उसके खाते में रही तो तमिलनाडु की 39 सीटों में से 14 सीटें जीत पाने में कांग्रेस को सफलता मिली। 1971 के आम चुनाव में 540 लोकसभा की सीटों में 353 सीटें कांग्रेस के नाम रही थी। 1977 में यह आंकड़ा घटकर मात्र 153 रह गया। कांग्रेस को 200 सीटों का सीधा नुकसान उठाना पड़ा था। आजादी बाद से ही दलित और अल्पसंख्यक कांग्रेस का सबसे मजबूत वोट बैंक रहते आए थे। आपातकाल के दौरान दोनों की वोट बैंकों से भारी अत्याचार का सामना करना पड़ा था। संजय गांधी के ‘नसबंदी अभियान’ का शिकार सबसे अधिक यही तबका को हुआ था। नतीजा इन चुनावों में इन दोनों का कांग्रेस से छितर जाने के रूप में देखने को मिलता है। बाबू जगजीवन राम का कांग्रेस छोड़ना दलितों को जनता परिवार की तरफ ले गया। दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम का मुसलमानों से कांग्रेस के खिलाफ मतदान करने की अपील का भारी असर पड़ा था। उत्तर भारत में विशेषकर, अल्पसंख्यकों ने जनता पार्टी के पक्ष में मतदान कर आपातकाल के दौरान उन पर हुए अत्याचारों का बदला निकाला। जवाहर लाल नेहरू की बेटी के इस पराभव में निश्चित तौर पर उनका अतिशय पुत्रमोह एक बड़ा कारण रहा। संजय गांधी के चलते ही व्यक्तिगत तौर पर प्रधानमंत्री पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप 1970 में मारुति परियोजना से लगने लगे थे। आपातकाल के दौरान संजय गांधी सत्ता का अघोषित, अवैध और घोर अलोकतांत्रिक केंद्र बन उभरे तो इसकी जिम्मेदार इंदिरा ही थी। संजय के आचरण को लेकर गांधी परिवार के मध्य भी गम्भीर मतभेद आपातकाल के दौरान उभरे थे। पुपुल जयकर 20 मार्च की शाम इंदिरा गांधी से मिली थीं। उनके अनुसार-‘जब मैं निकलने लगी तब राजीव मेरे साथ अकेले थे।’ उन्होंने कहा, ‘मैं संजय को कभी माफ नहीं करूंगा। मां की इस स्थिति के लिए वही जिम्मेवार है। मैंने मां से संजय की बाबत कई बार बात की थी और बताया था कि लोग संजय की बाबत क्या-क्या कहते हैं लेकिन उन्होंने कुछ भी मानने से इंकार कर दिया। राजीव की आंखों में आंसू थे।

21 मार्च को मंत्रिमंडल की बैठक बाद नेहरू की बेटी ने प्रधानमंत्री पद से अपना इस्तीफा कार्यवाहक राष्ट्रपति बीडी जत्ती को सौंप दिया। 30 बरस की आजादी बाद पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनने का अब वक्त आ गया था।

आपातकाल में प्रतिरोध के स्वर और प्रेस
आपातकाल की घोषणा होने और प्रेस सेंसरशिप कानून लागू होने के बाद प्रतिरोध के स्वर बेहद कम देखने को मिलते हैं। आपातकाल से ठीक एक बरस पहले शुरू हुए बिहार छात्र आंदोलन और उससे पहले गुजरात छात्र आंदोलन के दौरान अखबारों और पत्रिकाओं में केंद्र और राज्य सरकारों के खिलाफ लगातार लिखा जाने लगा था। जयप्रकाश द्वारा बिहार छात्र आंदोलन की कमान संभालने बाद उनके समर्थन में कई कविताएं लिखी गई थीं। 18 मार्च, 1974 को पटना के गांधी मैदान में जेपी की ऐतिहासिक जनसभा के बाद कदमकुआं में आयोजित सम्मेलन में जनकवि बाबा नागार्जुन ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर तीखा प्रहार करती अपनी कविता सुनाई थी- ‘इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको/सत्ता की मस्ती में भूल गईं बाप को/छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको/काले चिकने माल का मस्का लगा आपको।’


यह कविता इस आंदोलन के दौरान खासी चर्चित रही थी। नवम्बर, 1976 में जब जयप्रकाश नारायण पुलिस की लाठी से चोटिल हुए थे तब ‘धर्मयुग’ साप्ताहिक के सम्पादक धर्मवीर भारती ने ‘मुनादी’ शीर्षक से एक लम्बी कविता लिख अपना प्रतिरोध दर्ज कराया था- ‘खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का/हुकुम शहर कोतवाल का/हर खासो-आम को आगह किया जाता है/कि खबरदार रहें/और अपने-अपने किवाड़ों को अंदर से/कुंडी चढ़ाकर बंद कर लें/गिरा लें खिड़कियों के परदे/और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें क्योंकि/एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी/ अपनी कांपती कमजोर आवाज में/सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है!’


1973-74 के दौरान कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने भ्रष्टाचार और कुशासन से कराह रहे देश की पीड़ा सामने रखते हुए एक नाटक ‘बकरी’ लिखा जिसका मंचन आपातकाल के दौरान जमकर किया गया। इस नाटक के दूसरे संस्करण की भूमिका में सर्वेश्वर ने उल्लेख किया है कि ‘चंडीगढ़ में इसके प्रदर्शन ने वहां के रंगजगत में एक नई भूमिका अदा की। यह सिलसिला जोर पकड़ रहा था कि आपातकाल लागू हो गया और इस नाटक का प्रदर्शन रुक गया। पर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन के रंगकर्मियों द्वारा यह खेला जाता रहा। ऐसा एक प्रदर्शन पटना के नौबतपुर प्रखण्ड के गांव टेड़वा में ‘राकेश’ संस्था ने किया, जहां यह पेट्रोमैक्स के सहारे खेला गया। कहते हैं पुलिस द्वारा पूछताछ किए जाने पर एक दूसरा ही आलेख ‘बकरी’ नाम से अधिकारियों को दे दिया गया जो बीस सूत्रीय कार्यक्रम से जुड़ा लगता था। यह जेल से बचने के लिए जरूरी था।’
गजलकार दुष्यंत ने भी इस दौर में एक से बढ़कर एक रचनाएं लिखीं। जेपी की बाबत उन्होंने लिखाः
‘एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है/आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है/खास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए/ यह हमारे वक्त की सबसे बड़ी पहचान है/एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो/इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।’आपातकाल लगने के पश्चात् लेकिन प्रतिरोध की आवाजें लगभग खामोश हो गईं। यहां तक कि जेपी आंदोलन के दौरान तल्ख कविता ‘मुनादी’ लिखने वाले धर्मवीर भारती ने अपने सम्पादन में निकल रही पत्रिका ‘धर्मयुग’ में इंदिरा अथवा आपातकाल के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा। कवि फणीश्वरनाथ रेणु ने जरूर आपातकाल लागू होने के बाद कठोर शब्दों में अपना प्रतिरोध दर्ज कराते हुए कविता लिखी ‘इमरजेंसी’-
‘इमरजेंसी-वार्ड की ट्रॉलियां हड़बड़-भड़भड़ करती/ ऑपरेशन थिएटर से निकलती हैं-इमरजेंसी/सैलाइन और रक्त की बोतलों में कैद जिंदगी/रोगमुक्त किंतु बेहोश काया में/ बूंद-बूंद टपकती रहती है-इमरजेंसी/सहसा मुख्य द्वार पर ठिठके हुए मौसम/और तमाम चुपचाप हवाएं एक साथ/मुख और प्रसन्न शुभकामना के स्वर-इमरजेंसी।’

गांधीवादी चिंतक और कवि भवानी प्रसाद ने प्रण लिया था कि वे आपातकाल के विरोध में प्रतिदिन एक कविता लिखेंगे। आपातकाल के बाद इन कविताओं को एक संग्रह ‘त्रिकाल संध्या’ के नाम से प्रकाशित किया गया था जिसकी पहली कविता इंदिरा गांधी और उनके सिपहसालारों पर करारा व्यंग्य करने वाली थी-‘बहुत नहीं सिर्फ चार कौए थे काले/उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले/उनके ढंग से उड़े, रुके, खाए और गाए/वे जिसको त्योहार कहें सब मनाएं/कभी-कभी जादू हो जाता दुनिया में/ दुनियाभर के गुण दिखते हैं औगुनिया में/ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गए/इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गए।’महाराष्ट्र 70 के पूर्वार्ध में नई राजनीतिक चेतना का केंद्र बन उभर रहा था। यह चेतना दलित समाज में अपने अधिकारों को लेकर संगठित रूप से चल रही थी। इस आंदोलन का नेतृत्व लेखकों और कवियों के हाथ में था जिन्होंने 1972 में ‘दलित पैंथर’ संगठन की नींव रखी। अम्बेडकरवादी लेखक राजा घासे, मराठी कवि नामदेव ढसाल और उपन्यासकार जेपी पवार के नेतृत्व में गठित ‘दलित पैंथर’ का लक्ष्य जाति प्रथा की समाप्ति था। स्त्री अधिकारों को लेकर समाजवादी चिंतक मृणाल गोरे मुम्बई में सक्रिय थी। मुम्बई के गोरेगांव इलाके में पानी की उपलब्धता कराने के प्रयास चलते उन्हें ‘पानीवाली बाई’ कह पुकारा जाता था। 26 जून, 1975 की सुबह लेकिन सभी प्रकार के आंदोलनों के लिए गहन खामोशी का संदेश लेकर आई। ‘दलित पैंथर’ और मृणाल गोरे के स्वर खामोश हो गए। मराठी लेखिका और महिला अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने वाली दुर्गा भागवत ने जरूर आपातकाल के विरोध में अपनी आवाज उठाई थी। उन्होंने ‘मुम्बई मराठी ग्रन्थ संग्रहालय’ दादर में आपातकाल का विरोध करने के लिए सभा आयोजित की जिससे प्रेरणा लेते हुए अगस्त, 1975 में कराड़ में एक साहित्य सम्मेलन आयोजित कर आपातकाल के खिलाफ प्रतिरोध दर्ज कराया गया। राममनोहर लोहिया की जीवनीकार इंदुमती केलकर समेत कई लेखकों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी। दुर्गा भागवत को भी कुछ अर्से बाद गिरफ्तार कर लिया गया था। दिल्ली में चित्रकार विवान सुंदरम और उनके साथियों-गुलाम मोहम्मद शेख, रामेश्वर ब्रूटा आदि अपनी चित्रकारी के जरिए आपातकाल का प्रतिरोध करने के लिए याद किए जाते हैं। विवान सुंदरम का कहना था कि ‘असहमति कला का अभिन्न अंग है।’ उन्होंने 1974 में इंदिरा गांधी और संजय गांधी का एक चित्र ‘मिसेज जी’ नाम से बनाया था जिसमें इंदिरा गांधी एक तानाशाह के रूप में दर्शाई गयी थीं। सुंदरम के अनुसार-‘मैंने ‘मिसेज जी’ को 1974 में ही तैयार कर लिया था। मुझ सरीखे बहुतों को आपातकाल की आहट मिलने लगी थी।’

क्रमशः

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