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कब मिलेगी पीपीपी मोड से मुक्ति?

 

पड़ताल

 

सरकारी तंत्र में सबसे ज्यादा बजट स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च किया जाता है। उत्तराखण्ड में सरकारी शिक्षा का हाल तो सबको पता है लेकिन स्वास्थ्य की स्थिति इससे भी बदतर है। राज्य बने 23 साल होने के बावजूद सरकारें उत्तराखण्ड में आम लोगों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करवाने में कामयाब नहीं हो पाई हैं। कहना अतिश्योक्ति न होगी कि यहां स्वास्थ्य सुविधाएं भगवान भरोसे हैं। तत्कालीन त्रिवेंद्र रावत सरकार ने कुमाऊं-गढ़वाल के प्रवेश द्वार रामनगर के रामदत्त जोशी संयुक्त चिकित्सालय को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मोड के तहत शुरू किया था। तब अपेक्षा की गई थी कि यहां विशेषज्ञ डॉक्टर होंगे, बेहतर इलाज होगा। तमाम विरोधों के बावजूद अस्पताल को संचालित करने के लिए उत्तर प्रदेश की एक कंपनी को ठेके पर दिया गया। उसके बाद से अस्पताल बेहतर सुविधा देने की बजाय अराजकता और विवादों का केंद्र बन गया। आए दिन कोई न कोई ऐसी घटना होती रहती है जिससे यह अस्पताल चर्चाओं में रहता है। मरीजों के इलाज में लापरवाही के कारण कई मौतें होने के आरोप अस्पताल पर लग चुके हैं। यह हॉस्पिटल रेफरल सेंटर साबित हुआ है। यहां सत्तासीन पार्टी के नेताओं से लेकर भाजपा के कार्यकर्ता, विपक्ष के नेता, ब्लॉक कमेटी और नगर पालिका के प्रतिनिधि सहित जनता कई बार धरना-प्रदर्शन तक कर चुकी है। स्थानीय विधायक से लेकर सांसद और सूबे के स्वास्थ्य मंत्री खुद कई बार पीपीपी मोड से मुक्ति का आश्वासन दे चुके हैं। ऐसा एक नहीं कई बार हुआ है। लेकिन बावजूद इसके रामनगर के अस्पताल को इस दायरे से बाहर नहीं किया जा रहा है। फिलहाल यह अस्पताल अनुबंध की समय सीमा को पार कर जाने के बाद भी धड़ल्ले से चल रहा है

21 नवंबर 2021
स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने के उद्देश्य से प्रदेश के छह अस्पताल पीपीपी मोड पर दिए थे। पीपीपी मोड पर संचालित अस्पतालों से लगातार शिकायतें मिल रही हैं। अब पीपीपी मोड पर संचालित अस्पतालों को एक सप्ताह का समय दिया जा रहा है। एक सप्ताह में व्यवस्था नहीं सुधरती है तो सरकार पीपीपी मोड पर पुनर्विचार करेगी।
डॉ. धन सिंह रावत, स्वास्थ्य मंत्री
1 अक्टूबर 2023

रामनगर के अस्पताल को मॉडल अस्पताल बनाया जाएगा। यहां पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती की जाएगी जिससे जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए यहां से बाहर न जाना पड़े। प्रदेश में पीपीपी मोड पर संचालित अस्पताल की समीक्षा होगी। समीक्षा बाद यदि रामनगर अस्पताल की स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार नहीं होगा तो इसे पीपीपी मोड से हटा देंगे। स्वास्थ्य सुविधाओं में लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
डॉ. धन सिंह रावत, स्वास्थ्य मंत्री
2 अप्रैल 2024

उत्तराखण्ड हेल्थ सिस्टम डेवलपमेंट प्रोजेक्ट की ओर से चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के महानिदेशक को पत्र जारी हुआ। पत्र में स्पष्ट किया गया कि लोक निजी सहभागिता अंतर्गत संचालित रामदत्त जोशी चिकित्सालय, रामनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भिकियासैंण, सामुदायिक केंद्र बिरांेखाल को अनुबंधावधि 6 जुलाई 2024 को पूर्ण हो रही है। ऐसे में 6 जुलाई तक पीपीपी मोड संचालक को अस्पताल वापस सरकार को हस्तांतरित करना होगा। ताकि 7 जुलाई 2024 से सरकार की ओर से अस्पताल संचालित हो सके।
5 अप्रैल 2024

उत्तराखण्ड हेल्थ सिस्टम डेवलपमेंट प्रोजेक्ट की ओर से पत्र प्राप्त हुआ है। पत्र के अनुसार रामदत्त जोशी चिकित्सालय को पीपीपी मोड
संचालक को 6 जुलाई 2024 तक हस्तांतरित करना है। इसके लिए पीपीपी मोड संचालक को तीन माह का समय दिया गया है।
डॉ. चंद्रा पंत, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, रामनगर अस्पताल

उक्त तथ्यों से समझा जा सकता है कि पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड पर अस्पतालों खासकर रामनगर के रामदत्त जोशी सयुक्त चिकित्सालय का संचालन भाजपा सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। पीपीपी मोड़ से हटाने की घोषणा करने के बावजूद भी भाजपा सरकार की क्या मजबूरी है कि वह शुभम सर्वम कंपनी के साथ अपने अनुबंध को खत्म करने की बजाय इसे आगे बढ़ाने की नियत बनाए हुए है? जिस अस्पताल को गत 6 जुलाई को सरकार को हस्तांतरित कर दिया जाना था अभी भी यह बदस्तूर चल रहा है?

इस योजना को प्रदेश में लागू करने का काम तत्कालीन कांग्रेस के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने किया था। उनके कार्यकाल में उत्तराखण्ड में पीपीपी मोड पर अस्पताल शुरू करने की योजना बनाई गई थी। राज्य सरकार ने 2012 में पीपीपी पर उत्तराखण्ड नीति तैयार की थी। जिसके दायरे में न केवल स्वास्थ्य बल्कि शहरी बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, कृषि और पर्यटन भी शामिल थे। जिन्हें प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में पहचाना गया था। सभी को पीपीपी परियोजनाओं के तहत संचालित करने, उन्हें विकसित करने और क्रियान्वित करने के लिए सरकार ने एक विशेष नोडल एजेंसी, उत्तराखण्ड पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप सेल (यूपीपीपीसी) बनाई। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने इन पीपीपी परियोजनाओं के क्रियान्वयन और यूपीपीपीसी तथा इसकी तकनीकी कमेटी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यूपीपीपीसी के गठन के बाद से, कुल 75 पीपीपी परियोजनाएं (6382.78 करोड़ रुपए की लागत वाली) कार्यान्वयन के लिए चिन्हित की गई थी जिनमें से केवल नौ परियोजनाएं ही जमीनी स्तर पर कार्य कर पाई है।

तत्कालीन विजय बहुगुणा सरकार में गैरसैंण सहित चौखुटिया और अन्य कई स्थानों पर अस्पतालों को पीपीपी मोड़ पर संचलित किया गया था। जिनमें चौखुटिया के वाशिंदांे ने इसका जमकर विरोध किया था। जिसके बाद इसे हटा दिया गया था। इसके उपरांत तत्कालीन भाजपा सरकार में पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड पर अस्पतालों का संचालन शुरू किया गया। तत्कालीन त्रिवेंद्र सिंह सरकार द्वारा विश्व बैंक की सहायता से जिला अस्पताल बौराड़ी, जिला अस्पताल पौड़ी, संयुक्त अस्पताल रामनगर, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पाबौ, सामुदायिक केंद्र बेलेश्वर, देवप्रयाग, घंडियाल, भिकियासैंण और बीरोंखाल को पीपीपी मोड पर शुरू किया गया है।

सात जुलाई 2020 को प्रदेश सरकार की ओर से रामनगर के रामदत्त जोशी संयुक्त चिकित्सालय को उत्तर प्रदेश की शुभम सर्वम कम्पनी को चार साल के लिए दिया गया था। चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ दिन पहले ही बनाई गई शुभम सर्वम कम्पनी के पास इस कार्य हेतु कोई अनुभव न होते हुए भी उसके साथ यह अनुबंध किया गया। तब से यह अस्पताल पीपीपी मोड के अंतर्गत शुभम सर्वम कंपनी ही चला रही है। कंपनी ने सभी चिकित्सकों के साथ ही पूरा स्टाफ अपना तैनात कर दिया। इसके एवज में राज्य सरकार द्वारा प्राइवेट कंपनी को हर माह के हिसाब से चार साल तक 96 करोड़ रुपए देना तय किया गया। इतनी बड़ी धनराशि देने के बावजूद भी अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था राम भरोसे है। बेहतर इलाज न मिलने के कारण यहां कई मरीजों की मौत तक हो चुकी है। अस्पताल के विरोध में कई बार स्थानीय जनता धरना-प्रदर्शन कर चुकी है। बावजूद इसके सरकार अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं ले सकी है।

सरकार के पीपीपी मोड पर अस्पताल संचालित होने के बाद बेहतर चिकित्सा के जो दावे किए गए थे वे भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो यह अस्पताल केवल रेफरल बनकर रह गया है। यहां डॉक्टरों व स्टाफ द्वारा अभद्रता करने और गलत व्यवहार को लेकर आए दिन शिकायत सामने आती रहती है। खुद प्रदेश के मंत्री और जनप्रतिनिधि भी इसका शिकार हो चुके हैं। मजे की बात यह है कि जब भी प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री यहां निरीक्षण करने पहुंचते हैं, उस समय स्थानीय जनता उनसे अस्पताल को पीपीपी मोड से हटाने की गुहार लगाती रही है। लेकिन उनकी पुकार हर बार अनसुनी कर दी जाती है।

1 जुलाई 2024 को रामनगर में नवनियुक्त सांसद अनिल बलूनी का स्वागत समारोह किया गया। इस दौरान स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत भी मौजूद थे। उन्होंने कहा कि जब भी वह रामनगर आए तब लोगों ने पीपीपी मोड पर संचालित अस्पताल की व्यवस्थाओं के खिलाफ नाराजगी जताई। इस बार भी जब उनके सामने नाराजगी जताई गई तो उन्होंने जनसभा में मौजूद लोगों से कहा कि जो इस हॉस्पिटल से पीपीपी मोड हटवाना चाहते हैं वे हाथ उठा दे। मंत्री के इतना कहने भर की देर थी लगभग 98 प्रतिशत लोगों ने अपने हाथ ऊपर उठाकर विरोध जताया। इसके बाद मंत्री ने कहा कि अब पीपीपी मोड पर संचालित सभी अस्पतालों को सरकार वापस अपने संरक्षण में चलाएगी। अस्पतालों में पर्याप्त संसाधन जुटाने के साथ विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती भी की जाएगी। सांसद अनिल बलूनी ने भी इसका समर्थन किया और कहा कि उन्होंने अपने चुनावी वादों में यह कहा था कि वह पीपीपी मोड से इस अस्पताल को हटवा देंगे।

बड़ा सवाल यह भी है कि जब प्रदेश में पीपीपी मोड पर संचालित अस्पतालों से लापरवाही के तमाम मामले सामने आते रहे हैं तब भी पीपीपी मोड पर अस्पतालों को क्यों दिया जाता रहा है? दरअसल, पिछले साल पीपीपी मोड पर चल रहे अस्पतालों से तमाम शिकायत आने के बाद स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत ने इस बाबत निर्देश दिए थे कि अनुबंधित अस्पतालों की निगरानी सीएमएस के अलावा सीएमओ भी करेंगे। जिससे अनुबंधित अस्पतालों में सभी सुविधाएं होने के साथ ही मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें। लेकिन ये निगरानी कितनी होती है ये वे मरीज बखूबी बता देते है जो यहां पर भर्ती रहते हैं।

‘दि संडे पोस्ट’ ने जब रामनगर अस्पताल का दौरा किया तो अधिकतर मरीज और उनके तीमारदार यहां की चिकित्सा व्यवस्था से संतुष्ट नजर नहीं आए। सल्ट से आई भवानी देवी की बहु की यहां पर डिलीवरी हुई है लेकिन एक सप्ताह के बाद भी अभी जच्चा-बच्चा स्वस्थ नहीं हैं। भवानी देवी ने बताया कि उनकी बहु का दर्द अभी भी कम नहीं हो रहा है। बस पेन किलर दवाइयां देकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। धुमाकोट से आए एक मरीज के तीमारदार राजेंद्र रावत ने बताया कि कई दिनों के बाद भी चाचा की तबियत में सुधार नहीं है। उनको लीवर में परेशानी है। जब ज्यादा कहते हैं तो दिल्ली ले जाने का जवाब दे दिया जाता है। ऐसी ही एक तीमारदार ने बताया कि अगर इस अस्पताल में ज्यादा शिकायत की जाती है तो उन्हें बाउंसरों से धमकाया जाता है। चौंकाने वाली बात यह है कि उत्तराखण्ड का यह शायद ही पहला हॉस्पिटल होगा जहां बाउंसर रखे जाते हैं।

चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. ललित मोहन उप्रेती की मानें तो पीपीपी मोड सफलताओं और असफलताओं का मिला-जुला रूप रहा है। इसने उत्तराखण्ड में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की कुछ सबसे पुरानी समस्याओं को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिनमंे डोमेन विशेषज्ञों की तैनाती, आईसीयू क्षमताओं का विकास, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करना जैसी पहल इसके कुछ सकारात्मक उदाहरण हैं। इसके तहत चल रही टिहरी और देहरादून जैसी कुछ स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से बेहतर तरीके से काम कर रही हैं। लेकिन वहीं दूसरी तरफ डॉ. उप्रेती पीपीपी मॉडल में कुछ खामियों की ओर भी इशारा करते हैं। वे कहते हैं ‘ढीले एमओयू प्रारूप, नियम और शर्तों में अस्पष्टता और निगरानी ढांचे की अनुपस्थिति कुछ प्रमुख मुद्दे हैं। सरकार के साथ भागीदारी करने वाले संगठन मुख्य रूप से लाभ के उद्देश्य से संचालित होते हैं, जो सेवा वितरण प्रक्रिया को कमजोर कर रहा है। एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र की स्थापना होनी आवश्यक है। अगर स्वतंत्र निगरानी तंत्र होता तो राज्य की पीपीपी आधारित स्वास्थ्य सेवा परियोजनाओं के प्रदर्शन को बढ़ावा दे सकती है।’

108 आपातकालीन सेवाओं के पूर्व सीईओ अनूप नौटियाल स्वास्थ्य क्षेत्र में 108 जैसी आपातकालीन सेवाओं को उत्तराखण्ड के लिए उत्कृष्ट अनुभव बताते हैं। पीपीपी मोड़ से संबंधित सवाल पर वह कहते हैं कि स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत करने की दिशा में पीपीपी एक सकारात्मक कदम रहा है। हालांकि, मजबूत निगरानी तंत्र की अनुपस्थिति के कारण पीपीपी मॉडल की क्षमता और वास्तविक जमीनी नतीजों के बीच बड़ा अंतर है।

मंत्री और जनप्रतिनिधियों के साथ हुआ गलत सलूक

प्रदेश के तत्कालीन मंत्री बंशीधर भगत का इस अस्पताल में आना विवादास्पद रहा। तब उनकी अस्पताल प्रशासन के साथ हुई तू-तू, मैं-मैं का वीडियो बहुत वायरल हुआ था। बताया जाता है कि जब भगत यहां निरीक्षण करने पहुंचे तो स्टाफ ने उनसे सीधे मुंह बात नहीं की। जिससे उनमें गरमा गर्मी का माहौल हो गया था। स्थानीय विधायक दीवान सिंह बिष्ट एक बार स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत के साथ यहां पहुंचे थे। तब उन्होंने मंत्री को बताया था कि एक बार वह ईसीजी कराने पहुंचे, तब अस्पताल में उनके परिचित डॉक्टर नहीं थे। वह खुद ही ईसीजी रूम में पहुंच गए तो वहां मौजूद डॉक्टर ने उनसे अच्छा व्यवहार नहीं किया। उन्होंने अपनी व्यथा को मंत्री के सामने व्यक्त करते हुए कहा कि जब विधायक के साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है तो फिर आम जनता के साथ कैसा होता होगा?

गत् दिनों लैंसडाउन के विधायक महंत दलीप सिंह रावत खुद हॉस्पिटल में ही पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी के साथ धरने पर बैठ गए। उनके परिचित लोगों के साथ सल्ट में एक दुर्घटना हो गई थी। जिनकी हालत देखने जब वे इस अस्पताल में पहुंचे तो वहां की कुव्यस्था देख कर नाराज हो गए। पीड़ित लोगांे का एक्सरे करने में लापरवाही बरते जाने पर विधायक महंत दलीप सिंह रावत इतने नाराज हुए कि उन्होंने अस्पताल से ही स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत को फोन मिलाकर यहां की शिकायत कर डाली। साथ ही विधायक ने दो टूक कह दिया कि इस अस्पताल को पीपीपी मोड़ से मुक्त कराएं। तब मंत्री धन सिंह रावत ने एक बार फिर वादा किया कि वे इस पीपीपी मॉडल को रामनगर के अस्पताल के अनुबंध से खारिज कर देंगे।

कोविड में किया फर्जीवाड़ा

वर्ष 2020 में रामनगर में पीपीपी मोड के अस्पताल का कारनामा सामने आया था। इस अस्पताल के कर्मचारियों ने सौ से अधिक युवकों को कोविड की फर्जी निगेटिव रिपोर्ट दे दी। ये सभी युवक कोटद्वार में चल रही सेना की भर्ती में शामिल होने जा रहे थे। इस भर्ती में कोविड रिपोर्ट के साथ जाना अनिवार्य किया गया था। पौड़ी जिले के यह बच्चे रामनगर में इस भर्ती के लिए यूथ फाउंडेशन से प्रशिक्षण ले रहे थे। बताया जा रहा है कि इन बच्चों की भर्ती 27 दिसंबर 2020 को होनी थी, जिसके लिए यह रामनगर के रामदत्त जोशी संयुक्त चिकित्सालय में अपनी कोविड जांच कराने गए। आरोप है कि वहां मौजूद पीपीपी मोड के कर्मचारियों ने इनसे 500 से एक हजार रुपए प्रति बच्चे से वसूले और बिना जांच के ही उन्हें कोरोना की निगेटिव रिपोर्ट दे दी। इन कर्मचारियों ने यहां तक फर्जीवाड़ा किया कि कोरोना की निगेटिव रिपोर्ट 21 दिसंबर को ही 27 दिसंबर की तिथि की बनाकर दे दी।

बच्चे की आंख की गई रोशनी
मामला 19 मई 2024 का है। रामनगर के गिहार बस्ती भवानीगंज क्षेत्र में रहने वाले सुनील कुमार गिहार के पुत्र आयुष (11) को आई आंधी तूफान के दौरान आंख में लकड़ी का टुकड़ा घुस गया था। परिजन उसे उपचार के लिए अस्पताल लेकर गए थे। 20 मई को अस्पताल के नेत्र चिकित्सक डा. संयम ने बच्चे की आंख का ऑपरेशन किया। आरोप है कि ऑपरेशन से पहले बच्चे को जिस आंख में चोट लगी थी, उससे दिख रहा था। बच्चे की आंख के ऑपरेशन के बाद जब उन्होंने उसकी पट्टी खोली तो उसे आंख से कुछ भी नहीं दिखाई दिया। इसके बाद परिजन उसे एक रामनगर के निजी अस्पताल ले गए जहां डॉक्टरों ने बताया कि उसकी आंख की रोशनी जा चुकी है।

कई लोगों की हो चुकी है मौत
बीते दिनों संयुक्त चिकित्सालय में सल्ट की एक प्रसूता महिला और ऑपरेशन के दौरान एक बच्ची की मौत हो गई थी। कई बार मरीजों को सही उपचार न मिलने का आरोप भी अस्पताल प्रबंधन पर लग चुके हैं। लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपए की धनराशि सरकार द्वारा देने के बाद भी जब एक प्रसूता महिला की डिलीवरी चिकित्सालय में नहीं हो सकती है तो ऐसे स्वास्थ्य सेवा का कोई औचित्य ही नहीं है। यही नहीं बल्कि वर्ष 2020 में 30 जुलाई को एक युवक की चिकित्सालय में मौत हो गई थी। तब परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया। इसके अलावा सुंदरखाल के एक युवक का हाथ फैक्चर होने पर उसे इलाज देने की बजाय काशीपुर रेफर कर दिया गया। चिकित्सालय प्रबंधन पर कई बार तीमारदार अभद्रता करने का भी आरोप लगा चुके हैं।

चारों तरफ है गंदगी का आलम

‘दि संडे पोस्ट’ ने जब अस्पताल का मौका-ए-मुआयना किया तो चारांे तरफ गंदगी का आलम दिखाई दिया। अस्पताल में जिस गंदगी को हरे और लाल रंग के डिब्बों में डालना चाहिए था वहां कोई भी डब्बा नहीं दिखाई दिया। गंदगी के ढेर जगह-जगह लगे थे। यहां तक कि जहां मरीजों के तीमारदारों के बैठने की जगह है वहां भी थूकदान होने की बजाय लोगों ने दीवार को थूक-थूककर लाल बनाया हुआ है। शौचालयों में गंदगी पसरी पड़ी है। जब ‘दि संडे पोस्ट’ टीम अंदर पहुंची तो शौचालयों में इतनी बदबू आ रही थी कि यहां एक सेकंेड भी खड़ा होना मुश्किल हो गया। एक मरीज रविंद्र बिष्ट ने बताया कि इस गंदगी की वजह से ही इस अस्पताल में बार-बार संक्रमण की बीमारी फैलती है।

चर्चा में भाजपा के झंडे के रंग के बोर्ड

पूरे उत्तराखण्ड में शायद ही यह पहला हॉस्पिटल होगा जहा पर डॉक्टरों और अन्य सूचक बोर्ड लाल और हरे रंग में इस कदर रंगे हैं जिन्हें देखने पर ऐसा लगता है जैसे भाजपा के झंडे का रंग हो। इसको लेकर तरह-तरह की चर्चा है।

बात अपनी-अपनी

मंत्री धन सिंह रावत जी रामनगर में हॉस्पिटल को पीपीपी मोड से हटाने की घोषणा कर चुके हैं।
अनिल बलूनी, सांसद पौड़ी-गढ़वाल

रामनगर हॉस्पिटल को दिसंबर तक एक्शटेन कर दिया गया है। इसके बाद ही इसे पीपीपी मोड से हटाने पर विचार किया जाएगा।
डॉ. आर. राजेश कुमार, सचिव स्वास्थ्य

पहले 6 जुलाई को ही अस्पताल को हैंडओवर किए जाने के आदेश दिए थे लेकिन अब इसे तीन माह के लिए बढ़ा दिया गया है। ऐसा क्यों किया गया इसकी मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है।
डॉ. चंद्रा पंत, सीएमएस, रामदत्त जोशी संयुक्त चिकित्सालय रामनगर

अस्पताल वाला मुद्दा इतना बड़ा है नहीं जितना इसे बनाया जा रहा है। इस मामले में राजनीति ज्यादा हो रही है। यहां की ओपीडी तो इतनी ज्यादा होती है उन्हें देखकर तो नहीं लगता कि मरीज इस हॉस्पिटल के इलाज से असंतुष्ट हैं।
दीवान सिंह बिष्ट, विधायक, रामनगर

व्यवस्थाएं सुधारने के नाम पर रामनगर का संयुक्त चिकित्सालय पीपीपी मोड के तहत निजी संस्था को दिया गया था। जो कि रेफरल सेंटर और बदइंतजामी का अड्डा बन चुका है। इलाज न मिल पाने व लापरवाही के कारण मरीजों की मृत्यु की खबरें अक्सर आती रहती हैं। यह सब सरकारी संरक्षण में चल रहा है तथा निजी संस्था को करोड़ों रुपया देकर जनता के टैक्स के पैसे का भाजपा सरकार द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है। इस अस्पताल के संचालकों के भाजपा नेताओं के साथ बहुत करीबी रिश्ते बताए जा रहे हैं जिसके कारण अस्पताल में हो रही अनियमितताओं के खिलाफ प्रशासन द्वारा अस्पताल के समक्ष धरना-प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध है। पिछले दिनों एक भाजपा नेता के रिश्तेदार को इलाज न मिल पाने के बाद से रामनगर संयुक्त चिकित्सालय को पीपीपी मोड से हटाए जाने की खबरें आ रही हैं। स्वास्थ्य मंत्री जवाब दंे कि जनता के टैक्स के करोड़ों रुपए जो निजी संस्था को अस्पताल चलाने के नाम पर सरकारी खजाने से चुकाया गया है, उसकी भरपाई कौन करेगा?
मुनीष कुमार, संयोजक, समाजवादी लोकमंच

यह पहली बार था जब सत्ता पक्ष के विधायक महंत दिलीप रावत जी इस अस्पताल की अव्यवस्थाओं के खिलाफ बोले। एक हमारे रामनगर के विधायक हैं और सत्ता पक्ष से जुड़े लोग हैं जिन्हें इस मुद्दे पर सांप सूंघ जाता है। पता नहीं वह कब नींद से जागेंगे। रामनगर विधायक तो इस मुद्दे पर वर्षों से मौन साधे हैं। आखिर समझ नहीं आता कि ऐसी कौन सी घुट्टी उन्हें पीपीपी मोड के संचालकों ने पिला रखी है? अस्पताल के खिलाफ बोलने पर मैं गलत हो सकता हूं पर विधायक दलीप रावत जी तो गलत नहीं हो सकते। उन्होंने स्वयं अपने आखों से अस्पताल की अव्यवस्थाओं को देखा। विधायक जी को अस्पताल में एक्सरे के लिए एक घंटा इधर से उधर भटकना पड़ा। एक दो घंटे यदि मरीजों को अस्पताल में और रोक देते तो ना जाने क्या अनहोनी हो जाती। विधायक का प्रोटोकॉल होता है लेकिन स्टाफ का कोई भी व्यक्ति अपनी कुर्सी से उठने को तैयार नही था, ना ही किसी ने कुर्सी में विधायक जी को बैठने को कहा। मैं स्वयं विधायक जी के साथ मौजूद था। मैंने उन्हें इस अस्पताल की अव्यवस्थाओं के बारे में अवगत कराया। इसी के साथ मैंने बताया कि 4 साल में दस बारह बार तो मैंने इस अस्पताल को पीपीपी मोड से हटाने के लिए धरना दे दिया है पर मेरी कोई सुनने को तैयार नही है। विधायक जी ने अस्पताल से ही स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत को फोन लगाकर अव्यवस्था का पूरा विवरण दिया और कहा कि इस अस्पताल को पीपीपी मोड से हटाया जाए। हो सकता है अब विधायक दलीप रावत जी के हस्तक्षेप के बाद इस अस्पताल का उद्धार हो जाए।
संजय नेगी, पूर्व ब्लॉक प्रमुख रामनगर

उत्तराखण्ड सरकार द्वारा रामनगर संयुक्त चिकित्सालय अस्पताल को भारी भरकम रुपया देकर पीपीपी मोड पर दिए जाने के बाद भी अस्पताल की स्वास्थ्य सेवा में इजाफा होने के बजाय स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई। कार्यदायी संस्था द्वारा अस्पताल में मानकों के अनुसार विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती न होना, एग्रीमेंट के अनुसार दवाई व अन्य सेवाएं उपलब्ध न कराने के कारण कार्यदायी संस्था के खिलाफ जनता का रोष लगातार बढ़ता जा रहा है। जिसके कारण सरकार एवं संगठन की फजीहत हो रही है। स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध न होने के कारण अस्पताल रेफरल सेंटर मात्र बनकर रह गया है। पीपीपी मोड पर जाने के बाद भी लोगों को उपचार के लिए बाहर जाना पड़ रहा है। हद तो तब हो गई जब कार्यकारी संस्था द्वारा स्थानीय विधायक दीवान सिंह जी एवं कालाढूंगी के विधायक बंशीधर भगत जी के साथ भी अभद्र व्यवहार किया गया। यही नहीं स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लैंसडाउन के विधायक दलीप सिंह रावत जी को भी यहां धरने पर बैठने पर मजबूर होना पड़ा।
प्रभात ध्यानी, राज्य आंदोलनकारी एवं प्रधान महासचिव, उपपा

यह अस्पताल रामनगर ही नहीं, बल्कि धुमाकोट, बीरोखाल, गैरसैंण, थलीसैंण तक के मरीजों का इलाज करने के लिए प्रसिद्ध रहा है। लेकिन जब से यह पीपीपी मोड पर गया है तब से यहां पर सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है। यह सिर्फ रेफरल सेंटर बनकर रह गया है। पहाड़ों से यहां लोग इलाज कराने आते हैं लेकिन उन्हें हल्द्वानी या दिल्ली रेफर कर दिया जाता है। यहां एक ही मरीज की अलग-अलग कई डॉक्टरों की पर्ची बनवाकर सिर्फ ओपीडी में मरीजों की संख्या को बढ़ाने का कारनामा किया जाता है। यहां वर्ल्ड बैंक की योजना के तहत आने वाले करोड़ों रुपयों को ठिकाने लगाया जाता है।

रणजीत रावत, पूर्व विधायक सल्ट

हमारी सरकार का पीपीपी मोड में हॉस्पिटल को चलाने का इरादा इसलिए था कि यहां मरीजों को सभी सुविधाएं मिलेंगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हमारी पार्टी के सभी कार्यकर्ता पीपीपी मोड के खिलाफ हैं। यहां अनुबंध के अनुरूप काम नहीं हो पा रहा है। हमने इसका विरोध किया है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक सभी से अपील की है कि वे यहां से पीपीपी मोड को हटाएं। मैंने यहां पीपीपी मोड लागू होने से पहले तीन एसी दिए थे जिनमें एक इमरजेंसी में तो दो जच्चा-बच्चा वार्ड में थे लेकिन पीपीपी मोड शुरू होते ही तीनों एसी हटाकर ऑफिसों में लगा लिए गए।
राकेश नैनवाल, प्रदेश मंत्री भाजपा

स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धनसिंह रावत जी के बयान के बाद अब पीपीपी मोड का अध्याय खत्म होने जा रहा है। पार्टी कार्यकर्ताओं ने भी एक स्वर से पीपीपी मोड को हटाने की राय दी थी। मेरा मानना है कि रामनगर हॉस्पिटल कम से कम दो सौ बैड के बड़े हॉस्पिटल के रूप में उच्चीकृत किया जाना चाहिए। यह स्थानीय आबादी के अलावा गढ़वाल के लैंसडौन, चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्रों के साथ ही सल्ट, बेतालघाट, भिकियासैंण, गैरसैण तक के लोगों के उपचार का केंद्र है। यह अभी सौ बैड का हॉस्पिटल है लेकिन पीपीपी में सिर्फ सत्तर बिस्तरों वाले हॉस्पिटल के रूप में अनुबंधित है।
गणेश रावत, पत्रकार एवं भाजपा नेता

स्वास्थ्य के क्षेत्र में जन प्रतिनिधि और जनता की उदासीनता ही आज के हालात के लिए जिम्मेदार हैं। भले ही स्लिप ऑफ टंग रहा हो लेकिन कंप्यूटर को कंपाउंडर कहने वाले विधायक साहब के चुनावी मुद्दों में से अस्पताल का कोई लेना देना नहीं था। ना वो कभी चिंतित दिखे न कभी जनता ने सवाल उठाए। अस्पताल सरकारी हो या गैर सरकारी, एक जिम्मेदार संस्थान होता है। कॉर्बेट नेशनल पार्क के कारण हमारा रामनगर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त स्थान है। लेकिन क्या आज भी हम स्वास्थ्य के मुद्दे को लेकर सजग हुए है? इसके लिए मैं सिर्फ अस्पताल प्रबंधन को दोषी नहीं मानती। सबसे बड़ा दोष जनता की उदासीनता का है। कभी किसी नवजात की मृत्यु, कभी प्रसव पीड़ा में सलती महिला का रेफरल कभी एंटी वेनम न मिलने से मजदूर के बच्चों की मृत्यु। जब खुद पर बीत जाती है तो थोड़े दिन भुक्तभोगी हल्ला करते हैं और पुनः चीजें सामान्य हो जाती हैं। क्यों इस विषय पर कभी आवाज उठाई नहीं जाती? अगर कोई आवाज उठती भी है तो जनता खुलकर सामने क्यों नहीं आती?
श्वेता मासीवाल, सोशल एक्टिविस्ट एवं सचिव, वात्सल्य फाउंडेशन

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