मेरी बात

चौदह दिसम्बर के दिन लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘संविधान की 75 वर्ष की गौरव यात्रा’ विषय पर आयोजित चर्चा के दौरान देश के सम्मुख 11 संकल्प रखे। इस दिन प्रधानमंत्री, जो बहुत कम संसद में आते हैं, जमकर बोले, पूरा दो घंटा बोले। उन्होंने आदतानुसार कांग्रेस को जमकर खरीखोटी सुनाई। ऐसा करते समय वह भूल गए कि इसी कांग्रेस के चलते देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति मिली थी। वह यह भी भूल गए कि जिस विचारधारा की वह और उनकी पार्टी भाजपा संवाहक है, उस विचारधारा की उद्गम स्थली राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आजादी की लड़ाई में कभी भी हिस्सेदार नहीं रहा था। हमारे प्रधानमंत्री यूं बहुत सारी चीजों को भूलने के आदी हैं। दूसरे के पाप गिनाते-गिनाते मोदी कभी थकते नहीं, अपने पापों को वह संभवतः पाप मानते ही नहीं हैं, अथवा उन्हें भूलना ही श्रेयसकर समझते हैं। उन्होंने अपने इस भाषण में कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार पर जमकर निशाना साधा। कांग्रेस के अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी उन्हें यकायक याद हो आए। केसरी के जरिए उन्होंने कांग्रेस को दलित विरोधी साबित करने का काम किया तो नरसिम्हा राव सरकार के कार्यकाल में हुए सांसद खरीद कांड की तरफ इशारा करते हुए मोदी जी ने कांग्रेस पर रिश्वतखोरी का भी आरोप लगाया। लब्बोलुआब यह कि उन्होंने इस मुल्क की हर दुष्वारी का आदतानुसार ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ा। अपने सम्बोधन के अंत में प्रधानमंत्री ने संविधान की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर देशवासियों के समक्ष 11 संकल्प पेश किए। इन संकल्पों के बरअक्स चलिए प्रयास करते हैं कि आजादी उपरांत की हमारी यात्रा का गंतव्य क्या था और हम कहां आ पहुंचे हैं।

प्रधानमंत्री का पहला संकल्प है नागरिक और सरकार अपने कर्तव्यों का पालन करें। संकल्प तभी लिए जाते हैं जब संकल्पित विषय को लेकर आशंका अथवा अनिश्चिंतता बनी हो। निश्चित ही बीते 75 बरस के दौरान न तो इस राष्ट्र के नागरिकों ने अपने कर्तव्यों का पालन किया है, न ही सरकारों ने। चूंकि यह 11 संकल्प संविधान की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने सामने रखे हैं इसलिए संविधान में बताए मार्ग जरिए समझा जाए कि कौन कहां पर चूका। नागरिक भूल गए कि संविधान ने भारत को बहुसंख्यकों का राष्ट्र नहीं करार दिया है, वरन इसे पंथनिरपेक्ष राष्ट्र बनाया है। मेरी दृष्टि में नागरिकों की सबसे बड़ी चूक इस कर्तव्य का पालन न करने की है। इस संकल्प को प्रधानमंत्री द्वारा लोकसभा में पेश किए गए सातवें संकल्प से जोडं़े तो स्पष्ट हो जाता है कि यह कितने खोखले संकल्प हैं। सातवां संकल्प है संविधान का सम्मान। अब इसे भला मोदी जी से बेहतर कौन जानता है कि संवैधानिक मूल्यों का शरण, अपहरण और चीरहरण करने की दोषी कांग्रेस ज्यादा है या फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके गर्भ से उत्पन्न भाजपा? दूसरा संकल्प मोदी जी ने हर क्षेत्र और समाज को विकास का लाभ मिलने का लिया। 77 बरस के आजाद राष्ट्र में इसी राष्ट्र और समाज का अटूट हिस्सा रहे अल्पसंख्यकों की वर्तमान में कैसी स्थिति है और क्यों हैं, इसके बरअक्स आप दूसरे संकल्प की व्यर्थता को समझ सकते हैं, यदि समझना चाहें तो। नरेंद्र भाई ने तीसरा संकल्प भ्रष्ट्राचार के प्रति जीरो टॉलरेंस का लिया। अब यह जीरो टॉलरेंस है क्या, पहले इसको आमजन तक यदि मोदी पहुंचाए, समझाएं तो बात बने। क्या इस जीरो टॉलरेंस का मतलब विपक्षी दलों के नेताओं को ईडी और सीबीआई सहारे डरा-धमका भाजपा में शामिल करा उन्हें पाक साफ घोषित करना तो नहीं? 2014 के बाद से लगातार कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों के महा भष्ट्र करार दिए गए नेताओं को भाजपा ने पहले तो केंद्रीय एजेंसियों की जकड़ में लिया है और फिर उन्हें गले लगाकर माफ कर दिया। असम के वर्तमान भाजपाई मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा, महाराष्ट्र के अजित पवार, बंगाल के सुवेंदु अधिकारी, उत्तराखण्ड के विजय बहुगुणा, अन्य राज्यों के दर्जनों दागियों को अपनी ‘ख्याति प्राप्त’ वाशिंग मशीन में डाल शुद्ध करना ही संभवत भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस संकल्प का सच है।

मोदी जी ने बतौर चौथे संकल्प देश के कानून, नियम और परंपरा के पालन में देश के नागरिक में गर्व का भाव होने की बात कही है। यह अजब-गजब का संकल्प है। एक तरफ तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी हैं तो दूसरी तरफ वे तमाम आशंकाएं हैं जो 2014 के बाद से ही लगातार गहराती जा रही हैं और चीख-चीख के कह रहीं हैं कि देश कानून के हिसाब से नहीं चल रहा है और ‘सर्वधर्म सम्भाव’ सरीखी परंपराओं का पालन नहीं हो रहा है। चौथा संकल्प मोदी जी के सातवंे संकल्प से सीधे जुड़ता है। अपने सातवें संकल्प में प्रधानमंत्री जी ने संविधान के सम्मान और राजनीतिक स्वार्थ के लिए संविधान को हथियार न बनाए जाने की बात संसद में कही। है न कमाल की बात। प्रधानमंत्री जी संविधान के सम्मान का संकल्प देशवासियों को दिलाना चाहते हैं तो दूसरी तरफ आजादी उपरांत संवैधानिक संस्थाओं के घोर क्षरण की बात मोदी जी के कार्यकाल में ही जोर-शोर से उठ रही है। सर्वोच्च न्यायालय के कार्यरत् न्यायधीशों को ‘लोकतंत्र खतरे में हैं’ कहने के लिए विवश होना पड़ रहा है और संविधान को ‘बुलडोज’ करने वाले कार्य रोज हो रहे हैं। पांचवां संकल्प गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का और छठवां संकल्प देश की राजनीति से परिवारवाद की समाप्ति का है। दोनों ही संकल्प स्वागत योग्य हैं। प्रश्न केवल इतना, आशंका केवल इतनी कि देश की सबसे बड़ी पंचायत में संकल्प पेश करने वाले नरेंद्र मोदी स्वयं अपनी पार्टी भीतर इसे लागू कर पाने में क्योंकर असफल साबित हो रहे हैं? संभवतः वे प्रयरासरत हैं लेकिन सफल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि राजनीति इस देश में समाज सेवा नहीं परिवारिक पेशा बन चुकी है। निश्चित ही कांग्रेस परिवारवादी राजनीति की जननी और पोषक रही है, भाजपा भी इस बीमारी से लेकिन अछूती नहीं है इसलिए यह संकल्प भी प्रधानमंत्री जी के अन्य संकल्पों समान ही सद्इच्छा करार दिया जा सकता है, जुमलेबाजी भी इसको कहा जा सकता है। मोदी जी ने अपने आठवां संकल्प में हर कीमत आरक्षण को जारी रखने की बात कही है। यह मेरी समझ से गलत है और सामाजिक समरसता में जहर घोलने वाला है। आरक्षण हो लेकिन उस वर्ग को आरक्षण का लाभ मिलना बंद होना चाहिए जिनकी एक या दो पीढ़ी इसका लाभ उठा चुकी हैं। ऐसे वर्ग को किसी भी कीमत आरक्षण नहीं मिलना चाहिए और इन्हें मिल रहे आरक्षण को आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग, जो किसी भी जाति से आता हो, उन्हें दे देना चाहिए। ऐसा लेकिन हो पाना संभव नहीं क्योंकि इतना साहस न कांग्रेस और न ही भाजपा नेतृत्व में है। मामला वोट बैंक राजनीति से सीधे जुड़ता है इसलिए ऐसा होता मुझे तो कम से कम नजर नहीं आता। प्रधानमंत्री का नौवां संकल्प महिला विकास का, दसवां संकल्प राज्यों के विकास से राष्ट्र के विकास का और ग्यारवां संकल्प एक भारत श्रेष्ठ भारत के ध्येय का है। अब इन संकल्पों की जब बात प्रधानमंत्री संसद में कर रहे थे, तब क्या उन्हें मणिपुर की महिलाओं का दर्द याद रहा होगा? क्या उन्हें बृजभूषण सिंह सरीखे भाजपा नेताओं के यौन उत्पीड़न से त्रस्त महिला खिलाड़ियों का स्मरण आया होगा और क्या एक भारत श्रेष्ठ भारत की बात करते समय उन्हें सालों से धधक रहे मणिपुर की पीड़ा, गलवान घाटी में मौजूद चीनी सेना, अवैध खनन से कराह रहा उत्तराखण्ड, बुलडोजर तले कुचला जा रहा उत्तर प्रदेश, कोलकाता में महिला डॉक्टर की बलात्कार बाद नृशंस हत्या, अंकिता भंडारी के हत्या का पूरा सच न सामने आने देने की त्रासदी, इत्यादि-इत्यादि का स्मरण आया होगा? कुछ प्रश्नों के उत्तर होते ही नहीं। ये ऐसे ही प्रश्न हैं जिनका उत्तर, सही उत्तर कोई देना चाहेगा नहीं। हां, 77 बरस के भारत की यात्रा को बूझने का प्रयास कर रहे हर नागरिक को लेकिन ऐसे सैकड़ों प्रश्नों से बार-बार दो-चार जरूर होना पड़ेगा।

प्रधानमंत्री ने जिस शीतकालीन सत्र में उपरोक्त ग्यारह संकल्प पेश किए, उस सत्र में जो कुछ हुआ वह भारतीय लोकतंत्र के गिरते स्तर का भयावह सच सामने ला देता है। संसद परिसर में धक्का- मुक्की, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का चोटिल होना, राहुल गांधी पर भाजपा की महिला सांसद द्वारा पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराना, भाजपा का आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को चोर कह पुकारना और उसके जवाब में आप सांसद संजय सिंह का प्रधानमंत्री को चोर कह देना, सभी कुछ बेहद शर्मनाक है। दशकों पहले समाजवादी चिंतन राममनोहर लोहिया ने इसी संसद के लिए कहा था- ‘संसद को स्वांग, पाखंड और रस्म अदायगी का अड्डा बना दिया गया है जहां सरकार और सदस्य जानवरों की तरह जुंगाली करते-करते हैं।’ लोहिया जी यह भी कहा करते थे कि ‘समूचा हिंदुस्तान कीचड़ का तालाब है जिसमें कहीं-कहीं कमल खिल आए हैं। कुछ जगहों पर अय्याशी के आधुनिकता सचिवालय, हवाई अड्डे, होटल, सिनेमाघर और महल बनाए गए हैं। उनका इस्तेमाल उसी तरह के बने-बने लोग-लुगाई करते हैं। लेकिन कुल आबादी के एक हजारवें हिस्से सभी इन सबका कोई सरोकार नहीं है। बाकी तो गरीब, दुखी, नंगे और भूखे हैं।’ सोचिएगा, यदि समय मिले तो, 77 बरस में यह कहां आ पहुंचे हम?

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