Uttarakhand

कौन बनेगा निकायों का नायक!

उत्तराखण्ड में नगर निकाय चुनाव पर सियासी संग्राम शुरू हो गया है। प्रदेश की प्रमुख पार्टी भाजपा और कांग्रेस पूरे दमखम के साथ अपने- अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतार चुकी हैं। प्रदेश की सभी 11 महापौर (मेयर) पद के लिए नामांकन हो चुके हैं। इस दौरान दोनों ही पार्टियों के नेताओं के बगावती तेवर परेशानी पैदा कर रहे हैं। कांग्रेस के मुखिया करण माहरा के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। इस चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों की जीत-हार के बाद उनका अध्यक्ष पद बरकरार रह पाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए यह चुनाव जीतना इसलिए भी जरूरी माना जा रहा है क्योंकि अधिकतम प्रत्याशी उनकी ही मनपसंद के उतारे गए हैं

प्रदेश में 11 नगर निगमों, 43 नगर पालिका परिषदों और 46 नगर पंचायतों सहित 100 नगर निकायों के लिए चुनाव आगामी 23 जनवरी को प्रस्तावित हैं। मतदान मतपत्रों से होगा और नतीजे 25 जनवरी को घोषित किए जाएंगे। राज्य के निकायों में इस समय कुल 30,83,500 मतदाता हैं, जिनमें से 14,93,519 महिलाएं, 15,89,467 पुरुष और 514 अन्य हैं।

राज्य की महापौर सीटों की बात करें तो सबसे ज्यादा दिलचस्प मुकाबला देहरादून और हल्द्वानी सीट पर देखने को मिलेगा। भाजपा ने देहरादून से सौरभ थपलियाल पर दांव खेला है। जबकि कांग्रेस ने वीरेंद्र पोखरियाल को टिकट दिया है। दोनों ही नए और युवा चेहरे हैं। इसी तरह हल्द्वानी में भाजपा ने गजराज सिंह बिष्ट को तो कांग्रेस ने ललित जोशी को मैदान में उतारकर कड़ी चुनौती पेश कर दी है। उत्तराखण्ड में भाजपा ने महापौर यानी मेयर के लिए देहरादून और हल्द्वानी के साथ ही ऋषिकेश के लिए शंभू पासवान, रुड़की से अनीता देवी अग्रवाल तो हरिद्वार से ओबीसी महिला प्रत्याशी के रूप में किरण जैसल, श्रीनगर से महिला सीट पर आशा उपाध्याय, कोटद्वार से सामान्य सीट पर शैलेंद्र रावत, पिथौरागढ़ से महिला सीट पर कल्पना देवलाल तथा अल्मोड़ा से ओबीसी सीट पर अजय वर्मा के साथ ही रुद्रपुर से सामान्य सीट पर विकास शर्मा को मेयर का टिकट दिया है। इसके अलावा श्रीनगर नगर निगम की महिला आरक्षित महापौर सीट पर भाजपा ने आशा उपाध्याय को अपना उम्मीदवार बनाया है।

कांग्रेस की बात करें तो देहरादून नगर निगम से वीरेंद्र पोखरियाल और कोटद्वार से रंजना रावत के साथ ही रुद्रपुर से मोहन खेड़ा, अल्मोड़ा से भैरव गोस्वामी, हरिद्वार से अमरेश वालियान और रूड़की से पूजा गुप्ता तथा ऋषिकेश से दीपक जाटव को प्रत्याशी घोषित किया है।

सबसे पहले देहरादून की बात करते है। यहां की नगर निगम अध्यक्ष यानी देहरादून मेयर की सीट पर सीधे-सीधे प्रदेश सरकार का असर देखने को मिलता है। देखा जाए तो देहरादून मेयर की सीट सत्तारूढ़ पार्टी की नाक का सवाल रहती है। मेयर की सीट पर चुनाव कौन लड़ेगा, इसका फैक्टर भी सीधे-सीधे मुख्यमंत्री की पहली पसंद और जिताऊ प्रत्याशी के रूप में देखने को मिलता है। राज्य गठन से लेकर अब तक देहरादून नगर निगम पद पर प्रत्याशी चयन को लेकर मुख्यमंत्री की पसंद का सीधा असर देखने को मिला है। इस बार भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस सीट पर अपने खास सिपहसालार को टिकट थमा कर चुनावी संघर्ष में उतार दिया है।

यह भी कहा जा रहा है कि सौरभ थपलियाल को उम्मीदवार बनाने में शीर्ष नेतृत्व के बीच सीधे संपर्क ने उनकी राह आसान बनाई। केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से उनकी नजदीकी ने सौरभ को मजबूत दावेदार के रूप में शुरू से ही रखा था। गौरतलब है कि धर्मेन्द्र प्रधान उत्तराखण्ड में कई अवसरों पर प्रभारी के रूप में भी सक्रिय रहे हैं। उस दौरान सौरभ की उनसे काफी निकटता बनी।

थपलियाल का पर्वतीय क्षेत्र से होने के नाते भी उनकी दावेदारी अंतिम समय तक मजबूत बनी रही। मोहकमपुर के चाणक्यपुरम में रहने वाले सौरभ थपलियाल पार्टी के बेदाग छवि के युवा नेता हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से छात्र राजनीति में प्रवेश करने वाले सौरभ डीएवी (पीजी) कॉलेज में छात्र संघ अध्यक्ष बने और भारतीय जनता युवा मोर्चा में कई पदों पर रहने के बाद पुष्कर सिंह धामी के बाद प्रदेश के अध्यक्ष भी बने।

सौरभ ने मेयर के टिकट की दौड़ में कई दिग्गजों को पीछे छोड़ा है। देहरादून में भाजपा की ओर से मेयर टिकट की दावेदारी को डेढ़ दर्जन से अधिक नाम आए थे। इनमें प्रमुख रूप से निर्वतमान मेयर सुनील उनियाल गामा का नाम था। गामा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। खासकर आय से अधिक संपत्ति के मामले में उन पर एक आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट विकेश नेगी ने आरोप ही नहीं लगाए बल्कि मामले को न्यायालय के समक्ष भी ले गए। इस चलते उनका टिकट संकट में पड़ गया। गामा के अलावा पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष पुनीत मित्तल, महानगर अध्यक्ष सिद्धार्थ अग्रवाल, धीरेंद्र पंवार, अनिल गोयल, कुलदीप बुटोला, राजकुमार पुरोहित, प्रकाश सुमन ध्यानी और रविन्द्र जुगरान आदि नेता टिकट पाने की कतार में शामिल थे।

कांग्रेस उम्मीदवार वीरेंद्र पोखरियाल भी अपनी सक्रियता और कार्यशैली से हमेशा चर्चाओं में रहें हैं। राज्य आंदोलन के दौरान पोखरियाल ने युवाओं की आवाज बुलंद कर राज्य आंदोलन को एक नई दिशा दी थी। छात्र राजनीति के समय से ही कांग्रेस का झंडा उठाकर चलने वाले पोखरियाल ने युवा कांग्रेस, किसान कांग्रेस और सहकारिता में अपना एक अलग मुकाम बनाया है। वह साल 1993-96 तक डीएवी महाविद्यालय देहरादून के छात्र संघ अध्यक्ष रहे हैं। वर्ष 2004 से अब तक वे लगातार सहकारी बाजार देहरादून के अध्यक्ष पद पर रहे हैं। इसके अलावा वर्ष 2007 में उत्तराखण्ड किसान कांग्रेस में जिला अध्यक्ष का दायित्व भी उन्हें सौंपा गया। वर्ष 2013 में उत्तराखण्ड राज्य आवास संघ लिमिटेड में निदेशक बनाए गए। वर्तमान में वीरेंद्र पोखरियाल कांग्रेस पार्टी में प्रदेश महामंत्री के पद पर हैं। इस दृष्टि से भाजपा उम्मीदवार सौरभ थपलियाल से वे किसी भी मामले में कमतर नहीं आंके जा सकते हैं।

निकाय चुनावों के लिए कांग्रेस की उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी होने के बाद से ही पार्टी के कार्यकर्ताओं में आक्रोश का माहौल बन रहा है। टिकट बेचे जाने तक के आरोप लगाए जा रहे हैं इस बाबत कई वीडियो वायरल हो रही हैं। प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष ज्योति रौतेला ने सोशल मीडिया पर एक संदेश पोस्ट किया है। जिसके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि वह नाराज हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है जिसमें लिखा है कि ‘‘याचना नहीं रण होगा’’। उनके इस पोस्ट के बाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कांग्रेस महिला प्रदेश अध्यक्ष उम्मीदवारों की सूची में शामिल कुछ नामों से खुश नहीं हैं।

ऋषिकेश में नगर निगम की सीट एससी-एसटी के लिए आरक्षित है। यहां कांग्रेस ने दीपक जाटव को अपना उम्मीदवार बनाया है जबकि भाजपा ने शंभू पासवान पर भरोसा जताया है। दोनों ही नेता पहली बार मेयर का चुनाव लड़ रहे हैं, लिहाजा मुकाबला दिलचस्प होने के आसार हैं। बताया जा रहा है कि शंभू पासवान पर मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल और सुबोध उनियाल, दोनों की मेहरबानी है जिसकी बदौलत वह टिकट पा गए। क्योंकि प्रेमचंद अग्रवाल ऋषिकेश से विधायक हैं ऐसे में शंभू पासवान का चुनाव उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ गया है। पिछली बार ऋषिकेश में भाजपा से अनीता ममगाईं मेयर बनीं थी। लेकिन बताया जा रहा है कि इस बार उनकी इस चुनाव में सक्रियता बहुत कम देखने को मिल रही है। इसका कारण यह भी है कि अनीता को एंटी प्रेमचंद गुट का माना जाता है। ऋषिकेश से कांग्रेस से टिकट के प्रबल दावेदार रहे दिनेश चंद्र मास्टर ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर पार्टी को असमंजस में डाल दिया है।

काशीपुर में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के करीबी माने जाने वाले दीपक बाली के समर्थकों ने तो टिकट फाइनल होने से पहले ही ढोल नगाड़ांे की थाप पर जश्न मना लिया था। बताया जा रहा है कि काशीपुर और रुद्रपुर नगर निगम में भाजपा से दावेदारी करने वाले दो चेहरे ऐसे हैं जो सिर्फ मुख्यमंत्री के करीबी होने के चलते टिकट पा गए। जिसमें दीपक बाली के अलावा विकास शर्मा हैं। जो टिकट फाइनल होने से पहले ही सोशल मीडिया में छाए हुए थे।

काशीपुर से भाजपा प्रत्याशी दीपक बाली आम आदमी पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं साथ ही वे विधानसभा चुनाव भी लड चुके हैं। चुनाव हारने के बाद दीपक बाली ने गुलाटी मारी और सीएम धामी के साथ हाथ पकड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। मजे की बात यह है कि दीपक बाली ने आम आदमी पार्टी में रहते हुए भाजपा की मेयर ऊषा चौधरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये थे और पार्टी के खिलाफ भी जमकर आग उगली थी। टिकट की दावेदारी में काशीपुर से पार्टी के जिलाध्यक्ष राम मेहरोत्रा जैसे कई ऐसे चेहरे हैं जिन्होने लंबे समय से पार्टी की सेवा की है और संघ-संगठन को मजबूत करने में अपनी भागेदारी निभाई है, लेकिन भाजपा और संघ के कर्मठ कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर अचानक से दलबदलू दावेदारों को मुख्यमंत्री धामी का करीबी होने की वजह से मिले टिकट पर पार्टी के नेताओं में रोष है। आशंका है कि इस सीट पर भीतरघात हो सकता है। इस चलते पार्टी बहुत सोच समझकर चुनावी रणनीति बनाने में जुटी है। कांग्रेस ने यहां से संदीप सहगल को अपना उम्मीदवार बनाया है। सहगल पार्टी के महानगर अध्यक्ष हैं साथ ही वे एडवोकेट भी हैं। संदीप सहगल का वैश्य वर्ग में खासा असर देखने को मिलता है।

रुद्रपुर से भाजपा प्रत्याशी विकास शर्मा पार्टी में विभिन्न पदों पर रह चुके हैं। वे एबीवीपी और आरएसएस से जुड़े रहे हैं। विकास शर्मा के काम को देखते हुए उन्हें सीएम पुष्कर सिंह धामी के अपनी विधानसभा क्षेत्र चंपावत का जिला प्रभारी भी नियुक्त किया था। कांग्रेस ने यहां से पवन खेड़ा को अपना कैंडिडेट बनाया है। पवन खेड़ा नगर निगम में पार्षद हैं। हालांकि भाजपा प्रत्याशी विकास शर्मा के मुकाबले वह कमजोर साबित हो रहे हैं। पूर्व में कांग्रेस में रहे प्रीत ग्रोवर बताते हैं कि कांग्रेस के उम्मीदवार की कमजोरी यह है कि उनके साथ उनकी पार्टी के नेता ही नहीं हैं। पार्टी में संगठन नाम की चीज नहीं है और गुटबाजी भी है। रुद्रपुर में इस बार पूर्व विधायक राजकुमार यूटर्न लेते दिखे। वे यहां से अपने भाई संजय ठुकराल के साथ खुद ही निर्दलीय मेयर का चुनाव लड़ रहे थे और नामांकन भी कर दिया था लेकिन अंतिम समय में अपना और भाई का टिकट वापस ले लिया। कुछ दिन पहले से ही राजकुमार ठुकराल की चर्चा थी कि वह कांग्रेस में जाएंगे और मेयर का टिकट लेकर चुनाव लड़ेंगे लेकिन किच्छा के कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ उनकी राह में रोड़ा बन गए। जिस चलते कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया।

कोटद्वार से कांग्रेस ने रंजना रावत तो भाजपा ने शैलेंद्र रावत को अपना उम्मीदवार बनाया है। रंजना रावत कभी पूर्व कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी के खेमे में थीं। लेकिन बताया जाता है कि एक बार रंजना रावत सुरेंद्र सिंह नेगी के कार्यालय से रोती हुई निकली थी तभी से दोनों में आपसी तकरार जारी है। इसके बाद वह अकेले ही अपने दम पर राजनीति कर रही हैं। नशे के खिलाफ आंदोलन चलाना हो या भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम रंजना रावत इसमें आगे रहती हैं। कोटद्वार से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पूर्व कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की भी चर्चा थी लेकिन अंतिम समय में रंजना रावत पर कांग्रेस ने मोहर लगा दी।

भाजपा के शैलेंद्र रावत यमकेश्वर के पूर्व विधायक हैं। 2012 में उन्हें भाजपा से टिकट नहीं मिला तो वह कांग्रेस में चले गए थे और 2017 में यमकेश्वर से चुनाव लड़े तब उन्होंने भाजपा की ऋतु खंडूड़ी को चुनाव हराया था। हालांकि बाद में उनकी घर वापसी हो गई थी। फिलहाल शैलेंद्र रावत और ऋतु खंडूड़ी में 36 का आंकड़ा रहता है । कोटद्वार नगर निगम चुनाव में हालांकि ऋतु खंडूड़ी उनके साथ दिखाई दे रही हैं।

अल्मोड़ा में अब से पहले नगर पालिका चुनाव होते रहे हैं लेकिन इस बार यहां पहली बार नगर निगम के चुनाव हो रहे हैं। यहां से कांग्रेस के प्रकाश जोशी नगर पालिका के कई मर्तबा अध्यक्ष रहे हैं। बताया जा रहा है कि अगर इस बार सीट सामान्य होती तो प्रकाश जोशी को अल्मोड़ा का पहला मेयर बनने से रोकना असंभव होता। शायद यही वजह रही कि भाजपा ने इस सीट को ओबीसी के लिए आरक्षित कर दिया। फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवार दोनों ही नए चेहरे हैं। कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे भैरव गोस्वामी व्यापार मंडल के दो बार अध्यक्ष रह चुके हैं। पिछले सप्ताह ही वह भाजपा को छोड़ कांग्रेस में आए थे। कांग्रेस को भैरव गोस्वामी से अच्छा कैंडिडेट कोई नजर नहीं आया और उन्होंने उनको ही अपनी पार्टी का प्रत्याशी बना दिया। उधर दूसरी तरफ भाजपा ने यहां से अजय वर्मा को उम्मीदवार बनाया है। अजय वर्मा की जीत सुनिश्चित करने के लिए पूर्व विधायक कैलाश शर्मा अथक प्रयास कर रहे हैं तो कांग्रेस प्रत्याशी भैरव गोस्वामी को अल्मोड़ा का मेयर बनाने के लिए प्रकाश जोशी ने कमर कस ली है।

पिथौरागढ़ में कांग्रेस ने अंजू लूंठी को मेयर सीट के लिए उम्मीदवार बनाया है। विदित हो 2017 के विधानसभा चुनाव में अंजू लूंठी कांग्रेस प्रत्याशी भी रह चुकीं हैं। वह दिवंगत नेता प्रकाश पंत की पत्नी चंद्रा पंत से 2200 मतों से चुनाव हार गई थीं। इस सीट पर कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष संगठन मथुरा दत्त जोशी अपनी पत्नी रुक्मणी देवी के लिए टिकट मांग रहे थे। यही वजह रही कि टिकट की घोषणा होने में देरी हुई और जिस दिन नामांकन का अंतिम दिन था उस दिन पार्टी ने अंजू लूंठी के नाम की घोषणा की। जबकि भाजपा की ओर से पिथौरागढ़ के मेयर पद पर राजू देवलाल की पत्नी कल्पना देवलाल को उतारा है। नगर निगम में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रत्याशी की घोषणा के बाद बगावत की भी आहट सुनाई देने लगी है। पिथौरागढ़ में पहली बार हो रहे नगर निगम चुनाव में यहां के कांग्रेस विधायक मयूख महर खासे नाराज हैं। वह अपने करीबी यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव ऋषभ महर की पत्नी मोनिका महर को कांग्रेस का टिकट दिलवाने की पैरवी कर रहे थे लेकिन पार्टी ने उनकी नहीं मानी। फिलहाल पिथौरागढ़ विधायक मयूख महर ने अपनी पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ ऋषभ मेहर की पत्नी मोनिका महर को निर्दलीय के तौर पर नामांकन करा दिया है।

नगर निगम श्रीनगर से भाजपा ने आशा उपाध्याय को अपना उम्मीदवार बनाया है। आशा उपाध्याय श्रीनगर के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष विपिन चंद्र की बहन हैं। जबकि कांग्रेस से मीना रावत को प्रत्याशी घोषित किया गया है। उधर निर्दलीय भी इस चुनाव में भाजपा कांग्रेस के खेल को बिगाड़ते नजर आ रहे हैं। मेयर पद के लिए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप से आरती भंडारी और पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष पूनम तिवारी चुनाव लड़ रही हैं। यूकेडी से सामाजिक कार्यकर्ता सरस्वती देवी भी चुनावी मैदान में है। इस सीट पर सबसे ज्यादा चुनौती भाजपा को मिल रही है क्योंकि भाजपा जिला उपाध्यक्ष लखपत भंडारी की पत्नी आरती भंडारी निर्दलीय के रूप से चुनाव लड़ रही हैं। याद रहे कि लखपत भंडारी वही नेता हैं जिन्होंने कहा था कि धन सिंह रावत (कैबिनेट मंत्री) मेरी वजह से विधायक बना था। लखपत भंडारी का इस क्षेत्र की जनता में काफी वजूद माना जाता है। भंडारी के कारण भाजपा को नुक्सान उठाना पड़ सकता है। वहीं कांग्रेस से पूर्व में पालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुकीं पूनम तिवारी भी निर्दलीय चुनावी मैदान में है। ऐसे में वह कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा सकती हैं। श्रीनगर में अधिकतर नगर पालिका के अध्यक्ष कांग्रेस के ही बनते रहे हैं। रुड़की नगर निगम में इस बार कांग्रेस ने सचिन गुप्ता की पत्नी पूजा गुप्ता को टिकट दिया है। गुप्ता क्षेत्र में मेडिकल कैंप लगाते रहे हैं। साथ ही ग्रामीण क्षेत्र में भी उनकी अच्छी पैंठ बताई जा रही है। दूसरी तरफ भाजपा ने पार्टी के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य ललित मोहन अग्रवाल की पत्नी अनीता अग्रवाल को अपना उम्मीदवार बनाया है जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार के पूर्व सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल का नजदीकी बताया जा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि रुड़की के अधिकतर भाजपाई अनीता अग्रवाल को जानते तक नहीं हैं।

पूर्व में भाजपा के ही जिला पंचायत अध्यक्ष रहे एक नेता की मानें तो अनीता अग्रवाल को टिकट देना पार्टी की बहुत बड़ी भूल साबित होगी क्योंकि अनीता अग्रवाल ना कभी क्षेत्र में गई और ना उन्हें कोई जानता है। यहां तक की चर्चा है कि अनीता अग्रवाल को मोटी आसामी होने के चलते ही टिकट दिया गया है। यहां निर्दलीय के तौर पर यशपाल राणा की पत्नी चुनावी मैदान में है। उन्होंने अपनी पत्नी श्रेष्ठा राणा को आगे कर खुद चुनावी कमान संभाल रखी है। यशपाल राणा सबसे पहले यहां मेयर बने थे। इसके बाद वह विधानसभा चुनाव भी लड़े और मात्र 2200 वोटों से चुनाव हारे। यशपाल राणा ठाकुर समुदाय से हैं। हालांकि रुड़की क्षेत्र में इस समुदाय की वोट न के बराबर है। फिर भी उनका जनता में खासा असर है। न्यायालय ने यशपाल राणा को एक मामले में 6 साल के लिए चुनाव लड़ने के लिए प्रतिबंधित किया था। पिछले नगर निगम चुनाव में यशपाल राणा ने अपने छोटे भाई रेशु राणा को यहां से मेयर का चुनाव लड़ाया था। तब रेशु राणा दूसरे नंबर पर रहें थे। जबकि भाजपा के मयंक गुप्ता यहां तीसरे नंबर पर रहे। मयंक गुप्ता भाजपा के प्रदेश महामंत्री, प्रदेश उपाध्यक्ष और जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। पिछले नगर निकाय चुनाव में यहां से निर्दलीय गौरव गोयल चुनाव जीते थे।

हरिद्वार में भाजपा ने अपनी प्रत्याशी किरण जैसल को चुनाव मैदान में उतार दिया है। दो- बार सभासद और नेता प्रतिपक्ष रहे वरिष्ठ भाजपा नेता सुभाषचंद की पत्नी किरण जैसल स्वयं भी लगातार दो बार पार्षद रही हैं। सुभाषचंद प्रदेश में सर्वाधिक मतों से सभासद पद पर जीत दर्ज करने का रिकॉर्ड भी बना चुके हैं। किरण जैसल ने भी लगातार खासे अंतर से पार्षद पद पर जीत दर्ज की है। जैसल को हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक का कैंडिडेट बताया जा रहा है। कांग्रेस ने अमरेश बालियान पर दांव लगाया है। बालियान ने इस चुनाव में कॉरिडोर के मुद्दे को उठाया है। उन्होंने कहा है कि हरिद्वार में बनने जा रहे कॉरिडोर को लेकर वो व्यापारियों के साथ हैं और व्यापारियों के हित में इस कॉरिडोर को लेकर विरोध करेंगे। हरिद्वार से आम आदमी पार्टी ने शिप्रा सैनी पर दांव लगाया है शिप्रा पार्टी के जिला अध्यक्ष संजय सैनी की पत्नी है। वह प्रत्येक वार्ड में रिपेयरिंग कैंप लगवाकर पंखा, फ्रिज एवं कूलर आदि की फ्री में रिपेयरिंग कराते रहे हैं।

 साथ में बबीता भाटिया और अंजना गोयल

 

रामनगर में फिर महाभारत

Ranjeet Rawat
Deevan Singh Bist

नगर निकाय चुनाव में छिड़े चुनावी घमासान को लेकर यूं तो कई शहर और कस्बे चर्चाओं में हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा रामनगर शहर की हो रही है। यह शहर 2022 के विधानसभा चुनावों में भी सुर्खियों में रहा था। तब यहां हुई टिकटों की उल्टा- पलटी ने कांग्रेस की हो रही जीत को हार में बदल दिया था। गत विधानसभा चुनाव में दो गुरु और चेला की आपसी तकरार का केंद्र बना रामनगर एक बार फिर ऐसी ही पटकथा लिखता नजर आ रहा है। इस बार फिर यहां निकाय चुनाव में महाभारत शुरू हो चुका है। निकाय चुनाव में जहां कांग्रेस की आपसी गुटबाजी दिख रही है वहीं भाजपा भी इसका शिकार हो रही है। हालांकि कहा जा रहा है कि भाजपा अपने नेताओं के बगावती सुरों को अंतिम समय में अपने पक्ष में कर लेगी। लेकिन ‘तेरा क्या होगा रे कांग्रेस!’

बहरहाल,रामनगर नगर पालिका परिषद से अध्यक्ष पद के लिए टिकट की दावेदारी कर रहे कांग्रेस नेता अपनी ही पार्टी के नेताओं पर टिकट वितरण को लेकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। यह उस समय सामने आया जब कांग्रेस नेता ताइफ खान ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर जारी किया जिसमें उन्होंने कहा कि इस वक्त वो कांग्रेस प्रदेश मुख्यालय देहरादून में हैं। रामनगर नगर पालिका परिषद क्षेत्र में उन जैसे कई नेता और कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने कांग्रेस को अपना पूरा जीवन दे दिया है। लेकिन उन लोगों को दरकिनार कर कुछ नेता एक ऐसे व्यक्ति को कांग्रेस को टिकट दिलाने जा रहे हैं, जिसने हाल ही में सरकारी नौकरी से वीआरएस लिया है। जिसका वो घोर विरोध करते हैं। ताईफ खान ने अपने वीडियो में कहा कि यदि कांग्रेस हाईकमान ने आज शाम तक सही निर्णय नहीं लिया तो वो कांग्रेस कार्यकर्ताओं का सम्मान बचाने के लिए आत्मदाह करेंगे। इस वीडियो के वायरल होते ही कांग्रेस के पूर्व विधायक रणजीत रावत का सारा खेल बिगड़ गया। दरअसल ताईफ खान जिस व्यक्ति की वीआरएस की बात कह आत्महत्या की धमकी दे रहे थे वह और कोई नहीं भुवन पांडे हैं। भुवन नगर पालिका में ड्राफ्ट मैन के पद पर थे। उनके आका रणजीत रावत ने उन्हें वीआरएस दिलवा कर कुछ दिन पहले ही कांग्रेस ज्वाइन करा दी। साथ ही उन्हें कांग्रेस का अघोषित उम्मीदवार बना दिया। यहीं से अन्य कांग्रेसी नेताओं ने विद्रोही तेवर अपनाए। जिसका नतीजा ताइफ खान के रूप में सामने आया। इसके अलावा फैजल हक, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष अकरम खान, निशांत पपनै, आदि नेता भी इसी परिपाटी का हिस्सा बन गए। यह देख कांग्रेस ने प्रदेश में पहली बार अजब-गजब फैसला ले लिया और रामनगर सीट को पार्टी की तरफ से ‘ओपन’ कर दिया। मामला अभी भी उलझा हुआ है। रणजीत रावत भुवन पांडे को चुनाव लड़ाने के लिए नामांकन करा कर अपनी हठधर्मिता पर अड़े हैं। रामनगर में कांग्रेस के दो प्रतिद्वंदी भुवन पाण्डे और मोहम्मद अकरम चुनावी मैदान में डटे हैं।

दूसरी तरफ भाजपा से भी कई नेता वर्षों से इस आस में थे कि रामनगर नगर पालिका की सीट आरक्षण से मुक्ति पाकर सामान्य होगी और वे अपना भाग्य आजमाएंगे। ऐसे नेताओं में गणेश रावत, नरेंद्र शर्मा, नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष भागीरथ लाल चौधरी, संजय डोर्बी, भूपेंद्र खाती, मदन जोशी और भावना भट्ट के साथ ही दर्जनों नेता शामिल थे। नेताओं के चेहरे पर जीत की खुशी के भाव तो उसी दिन आ गए थे जिस दिन यह सीट सामान्य हुई थी। लेकिन उनके अरमानों पर पानी तब फिर गया जब यहां से पार्टी ने मंडल अध्यक्ष मदन जोशी को अपना अधिकृत प्रत्याशी घोषित कर दिया। मदन जोशी को स्थानीय विधायक दीवान सिंह बिष्ट और सांसद अनिल बलूनी का आशीर्वाद प्राप्त है। साथ ही सरकारी अस्पताल को पीपीपी मोड पर संचालित कर रहा एक धनाढ्य व्यक्ति भी उनकी आर्थिक रीढ़ बना हुआ है। इसके बाद विरोध का जो दौर शुरू हुआ वह नामांकन तक पहुंच गया। भाजपा के आधा दर्जन नेताओं ने बगावती रुख दिखाया। ऐसे नेताओं में पूर्व अध्यक्ष भागीरथ लाल चौधरी, भावना भट्ट, गणेश रावत, नरेंद्र शर्मा, भूपेंद्र खाती और संजय डोर्बी के नाम शामिल है। हालांकि नरेंद्र शर्मा को छोड़कर अन्य सभी भाजपाई नेताओं ने अपने नाम वापस ले लिए हैं।

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