Country

हिंद-चीनी, भाई-भाई मल्लयुद्ध की नौबत क्यों आई? 20 जवानों की शहादत पर दुखी देश

हिंद-चीनी, भाई-भाई मल्लयुद्ध की नौबत क्यों आई? 20 जवानों की शहादत पर दुखी देश

कोरोना काल के बीच भारत और चीन के बीच यह भयावह स्थिति पैदा हुई कि दोनों तरफ से करीबन 63  सैनिक वीर गति को प्राप्त हो गए हैं। 20 जवान भारत के तो 43 चीन के मारे जाने की खबर है। अभी भी भारत के दर्जनों जवान लापता है। चीन बारी-बारी से उनकी लाशे भिजवा रहा है। दोनों देशों के सैनिकों की मौत किसी गोलीबारी में नहीं हुई है ना ही कोई परमाणु युद्ध हुआ है। लेकिन कहा जा रहा है कि मल्लयुद्ध (फिजिकली वार) में सैनिक आपसी लड़ाई का शिकार हो गए हैं। जिसमें कटीले तारों और खुखरी तथा पत्थरों से कुचलकर भारतीय जवानों की जान ले ली गई है।

पिछले महीने जब लद्दाख में चीनी सैनिकों की तैनाती की गई तो कहा जा रहा था कि देश और दुनिया का ध्यान कोरोना से भटकाने के चलने चीन ऐसा नाटक रच रहा है। लेकिन 15 जून को चीन का यह नाटक अचानक हकीकत में बदल गया। वर्षों से चला आ रहा हिंदी-चीनी, भाई-भाई का नारा अब लहू-लुहान हो गया।

इस मल्लयुद्ध में भारतीय ही नहीं बल्कि चीनी सैनिकों के नुकसान की भी बात कही जा रही है। लेकिन अभी तक इसकी कोई पुष्टि नहीं हो पाई है और न ही चीन ने कुछ कहा है। सुनने में जरूर आ रहा है कि उसके भी 43 सैनिक मारे गए है। लेकिन वह इसकी पुष्टि नहीं कर रहे हैं। बहरहाल, इसका असर दोनों देशों के सभी द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ना तय है।

साल 1993 से दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए जो समझौता हुआ था उस पर भी असर पड़ना लाजिमी है। दोनों देशों के बीच बार्डर पर पिछले 40 दिनों से तनाव था और अब तक दोनो देश इसका कोई समाधान नहीं निकल पाए थे। हालांकि, एक सप्ताह पूर्व आपसी सहमति की बात जरूर कही गई थी।

फिलहाल रक्षा मंत्रालय के सेना मामलों के विभाग ने सकरुलर जारी कर सभी सैनिकों और अधिकारियों को लौटने को कहा है जो लॉकडाउन के कारण या अन्य वजह से छुट्टी पर थे। उनसे कहा गया है कि किसी भी निजी कंपनी के जहाज से वापस आकर अपनी यूनिटों को रिपोर्ट करें। वहीं, उनके टिकट का रुपए सेना वापस करेगी। अभी तक नियम है कि केवल इंडियन एयरलाइंस से ही सफर करने पर सैनिकों और अधिकारियों को रिफंड किया जाता था, लेकिन असामान्य परिस्थितियों को देखते हुए छुट्टी पर गए सहकर्मी निजी एयरलाइन से अपनी यूनिटों को रिपोर्ट कर सकते हैं। इससे दोनों देशों के बीच स्थित तनावपूर्ण हो चली है।

देखा जाए तो भारत चीन सीमा पर लंबे समय से दोनों देशों के बीच लगातार कुछ न कुछ होता रहता है। शायद ही ऐसा कोई वर्ष गुज़रा होगा जब भारत और चीन की सेना के बीच सीमा पर आमना सामना न हुआ हो। धक्कम धुक्की न होती हो। कभी कभी तो ऐसा तनाव भी हुआ है कि हथियारों की छीना झपटी भी हुई है। ऐसा हालात समय-समय पर पैदा होते रहे हैं। लेकिन कल तो हद ही हो गई। जब चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों पर पीछे से वार किया।

याद रहे कि इससे पहले नौ मई को नॉर्थ सिक्किम के नाकू ला इलाके में भारत और चीन के सेनिको में झड़प हुई थी। उस समय लद्दाख में एलएसी के पास चीनी सेना के हेलिकॉप्टर देखे गए थे। फिर इसके बाद भारतीय वायुसेना ने भी सुखोई और दूसरे लड़ाकू विमानों की पेट्रोलिंग शुरू कर दी थी।

बताया गया कि जब सीमा पर दोनों देशों के बीच तनाव हुआ तो गत 6 जून को सैन्य कमांडर स्तर की बातचीत के बाद दोनों देशों में आम सहमति बन गई थी। लेकिन सोमवार को उसका गंभीर रूप सामने आया। चीन ने आम सहमति का खुलेआम उल्लंघन करना शुरू कर दिया। हालांकि, चीन की तरफ से कहा जा रहा है कि भारतीय सेना ने अवैध गतिविधियों के लिए दो बार सीमा पार की और चीनी सेना के ख़िलाफ़ भड़काने वाले हमले किए।

हालांकि, जो कल हुआ है इसकी शुरुआत तो 1958 से ही हो रही थी । जब अक्साई चीन में चीन ने सड़क बनाई थी। जो कराकोरम रोड से जुड़ती है और पाकिस्तान की तरफ़ भी जाती है। दुर्भाग्य से जब सड़क बन रही थी तब भारत का ध्यान उस पर नहीं गया। लेकिन सड़क बनने के बाद भारत के उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उस पर आपत्ति जताई थी। हालांकि, तब तक चीन ने सडक बनाकर तैयार कर दी थी। उस समय से ही भारत कह रहा है कि अक्साई चीन को चीन ने हड़प लिया है।

लेकिन, यह भारत का लचीलापन ही कहा जाएगा कि तब भारत ने इस पर कोई सैन्य कार्रवाई नहीं की थी। जिसका नतीजा आज तक भुगता जा रहा है। अब कार्रवाई इसलिए हो रही है क्योंकि भारत को अपना दावा करना है। जैसा कि पीओके और गिलगित-बालतिस्तान को लेकर भारत ने अपना दावा मज़बूत करना शुरू कर दिया है। कहा जा रहा है कि उसी संदर्भ में अक्साई चीन में भी गतिविधियां हो रही हैं। लेकिन, अब चीन इस मामले में गुर्राने लगा है। उसको इससे परेशानी होने लगी है।

45 साल बाद कल भारत के 20 सैनिक शहीद हुए है। जबकि इससे पहले भारत-चीन सीमा पर 1975 में यानी 45 साल पहले किसी सैनिक की मौत हुई थी। तब भारतीय सेना के गश्ती दल पर अरुणाचल प्रदेश में एलएसी पर चीनी सेना ने हमला किया था। इससे पहले 1962 के युद्ध में भारत के 1300 के करीब सैनिक शहीद हुए थे। इसके बाद 1967 में नाथु ला में सीमा पर दोनों देशों की सेना के बीच हिंसक झड़प हुई थी।

यहां यह भी बताना जरूरी है कि चीन के साथ 90 के दशक में रिश्तों की बुनियाद शुरू हुई थी। दोनों देशों के बीच यह बुनियाद 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के चीन दौरे से रखी गई थी। 1993 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसमिम्हा राव चीन दौर पर गए थे और इसी दौरान उन्होंने चीनी प्रीमियर ली पेंग के साथ मेंटनेंस ऑफ पीस एंड ट्रैंक्विलिटी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता एलएसी पर शांति बहाल रखने के लिए था। लेकिन शांति बहाल हो नहीं सकी थी।

1993 के बाद चीनी राष्ट्रपति जियांग ज़ेमिन 1996 में भारत के दौरे पर आए। बताया जा रहा है कि तब एलएसी को लेकर एक और समझौता हुआ था। तब तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने सीमा विवाद को लेकर स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर का मेकेनिजम तैयार किया था।

आगे चलकर जब एक दशक तक मनमोहन सिंह ने देेश पर राज किया और वह प्रधानमंत्री रहे तो उनके कार्यकाल में 2005, 2012 और 2013 में सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत हुई। उस दौरान तीन समझौते हुए। याद रहे कि उस समय वर्तमान विदेश मंत्री एस जयशंकर चीन में भारत के राजदूत हुआ करते थे। जिन्होंने इन तीनों दौरों की बातचीत में विशेष भूमिका निभाई थी।

इसके बाद देश में भाजपा का राज आया तो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के साथ रिश्तों में और गर्मजोशी लाने की कोशिश की। इसी के तहत 2018 के अप्रैल में वुहान से इन्फॉर्मल समिट की शुरुआत की गई। 2019 में इसी समिट के तहत दोनों नेताओं की मुलाक़ात महाबलिपुरम में हुई थी।

भारत और चीन के बीच यह तक़रार गलवान घाटी में है। जहां गलवान नदी काराकोरम पहाड़ से निकलकर अक्साइ चिन के मैदानों से होकर बहती है। जिसपर चीन ने 1950 के दशक में अवैध कब्जा कर लिया था। चीन पहले ये मानता रहा कि उसका इलाका नदी के पूर्व तक ही है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से 1960 से उसने इस दावे को नदी के पश्चिमी किनारे तक बढ़ा दिया था।

जुलाई 1962 में गोरखा सैनिक के एक दल ने जब गलवान घाटी में अपना कैंप लगाया तो चीनी सेना ने उसे घेर लिया था। ये 1962 के युद्ध की सबसे लंबी घेरेबंदी थी, जो 22 अक्टूबर तक चलती रही थी। उस दौरान चीनी सेना ने भारी गोलाबारी कर पोस्ट को तबाह कर दिया था। युद्ध के बाद भी चीनी सेना उसी सीमा तक वापस गई जो उसने 1960 में तय की थी यानि अवैध कब्जा बरकरार रखा।

विदित हो कि 2017 में डोकलाम को लेकर भारत-चीन के बीच काफ़ी बवाल हुआ था। जो 70-80 दिन चला था। इसके बाद फिर बातचीत से यह मसला सुलझा लिया गया था। यह मामला तब शुरू हुआ था जब भारत ने पठारी क्षेत्र डोकलाम में चीन के सड़क बनाने की कोशिश का विरोध किया।

देखा जाए तो तो डोकलाम चीन और भूटान के बीच का विवाद है। लेकिन यह एरिया सिक्किम बॉर्डर के नज़दीक ही पड़ता है और एक ट्राई-जंक्शन प्वाइंट है। जहां से चीन भी नज़दीक है। भूटान और चीन दोनों इस इलाक़े पर अपना दावा करते हैं और भारत भूटान के दावे का समर्थन करता रहा है। अक्साई चीन में स्थित गलवान घाटी को लेकर दोनों देशों के बीच इस तनाव की शुरुआत हुई थी।

करीब एक माह पूर्व गलवान घाटी के किनारे चीनी सेना के कुछ टेंट देखे गए थे। इसके बाद भारत ने भी वहाँ फ़ैज की तैनाती बढ़ी दी थी। दूसरी तरफ चीन का आरोप है कि भारत गलवान घाटी के पास रक्षा संबंधी ग़ैर-क़ानूनी निर्माण कर रहा है। अगर अक्साई चीन में भारत सैन्य निर्माण करता है तो वहां से चीन की सेना की गितिविधियों पर नज़र रखना आसान होगा।

यहां नरेंद्र मोदी सरकार का जिक्र करना भी जरूरी है। सब जानते हैं कि नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद चीन के साथ संबंधों की शुरुआत बड़े ही गर्मजोशी से की थी। 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से कम से कम 18 बार मुलाक़ात हो चुकी है। इन मुलाक़ातों में वन-टू-वन मीटिंग के अलावा दूसरे देशों में दोनों नेताओं के बीच अलग से हुई मुलाक़ातें भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए मोदी पाँच बार चीन के दौरे पर जा चुके हैं। देखा जाए तो भारत के पिछले 70 सालों में किसी भी एक प्रधानमंत्री का चीन का यह सबसे ज़्यादा बार चीन दौरा रहा है।

पिछले साल भी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महाबलिपुरम में अनौपचारिक मुलाक़ात हुई थी। 2019 में दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की शी जिनपिंग से यह तीसरी मुलाक़ात थी। 1993 के बाद से दोनों देशों के बीच कई द्विपक्षीय समझौते और प्रोटोकॉल को लेकर बात शुरू हुई ताकि सीमा पर शांति बनी रहे। लेकिन चीन पर शायद इसका कोई असर नही हुआ। जिसकी परिणति में यह मल्लयुद्ध हुआ और हमारे 19 सैनिक और एक सीनियर अफसर शहीद हो गए।

You may also like

MERA DDDD DDD DD