गत् पखवाड़े देश की सर्वाेच्च अदालत ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण बंटवारे का जब से फैसला सुनाया है तब से मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीति में उबाल आ गया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि इसका सामाजिक असर कितना होगा? क्या इस फैसले से जाति की राजनीति करने वाले दल प्रभावित होंगे? कोर्ट के फैसले के क्या मायने हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर जिस तरह से एससी और एसटी समूहों की ओर से 21 अगस्त को भारत बंद का आह्वान किया गया है इसके बावजूद अभी तक सड़क पर कोई बड़ा प्रतिरोध देखने को नहीं मिला है। हालांकि इसका एक कारण यह है कि देश की दो सबसे बड़ी पार्टियां भाजपा और कांग्रेस इसके पक्ष में हैं। रणनीतिक रूप से दोनों ने चुप्पी साध रखी है लेकिन ये दोनों पार्टियां चाहती हैं कि एससी और एसटी के आरक्षण का बंटवारा हो ताकि इन दोनों समुदायों के अंदर भी जो सबसे पिछड़े और वंचित हैं उनको आरक्षण का लाभ मिले। ऐसे में इसका सामाजिक असर कितना होगा यह अभी नहीं कहा जा सकता है लेकिन यह तय है कि इसका बड़ा राजनीतिक असर होने जा रहा है।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने प्रवक्ताओं को निर्देश दिया है कि वे इस पर कुछ नहीं बोलें। मीडिया में चल रही बहस में भी उनको शामिल होने से रोक लगाई गई है। मगर दोनों को अपने पक्ष के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। बिना बताए दोनों का रुख स्पष्ट है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल तेलंगाना विधानसभा चुनाव के प्रचार में एससी के आरक्षण के बंटवारे का समर्थन किया था। एससी के अंदर अलग से मडिगा जाति के आरक्षण का आंदोलन चलाने वाले एमआरपीएस के नेता एम कृष्णा मडिगा तेलंगाना में नरेंद्र मोदी की सभा में उनके मंच पर गए थे और वहां मोदी के गले लगकर रोए थे। तब मोदी ने मंच से ऐलान किया था कि वे मडिगा को अलग से आरक्षण दिलाने पर विचार के लिए एक कमेटी बनाएंगे। दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने कमेटी का गठन भी किया। इससे अपने आप भाजपा का रुख स्पष्ट है कि वह आरक्षण के भीतर आरक्षण के समर्थन में है।
इसी तरह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को भी अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसके राज्यों के नेता इसका समर्थन करने लगे हैं। जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया उसी दिन सबसे पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि उनकी सरकार सबसे पहले इस फैसले को लागू करेगी। रेड्डी के इस बयान के बाद दिल्ली में कुछ नेताओं ने नाराजगी भी जताई। उनका कहना था कि मामले को ठंडा होने देना चाहिए था। लेकिन रेवंत ने कांग्रेस का पक्ष साफ कर दिया। अब दोनों बड़ी पार्टियां कोर्ट के इस फैसले के समर्थन में हैं और प्रादेशिक पार्टियों में भी समाजवादी पार्टी या तृणमूल कांग्रेस आदि को इसमें परेशानी नहीं है तो उससे ऐसा लग रहा है कि यह मामला ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा। बहुजन समाज पार्टी या राजद जैसी विपक्षी पार्टियां जरूर फैसले का विरोध कर रही हैं लेकिन उनका ज्यादा असर नहीं होगा। कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर होगी लेकिन लगता नहीं है कि उससे कोई बदलाव आएगा। तभी तमाम कथित दलित विचारक अब यह मांग करने लगे हैं कि अगर आरक्षण के बंटवारे का फैसला करना ही है तो वह संसद से हो, सुप्रीम कोर्ट से नहीं। लेकिन उनको पता नहीं है कि सरकार ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर फैसला सुप्रीम कोर्ट से ही करा रही है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीस साल पुराने पांच न्यायाधीशों के ईवी चिनैया (2004) मामले में दी गई व्यवस्था को गलत ठहरा दिया है। ईवी चिनैया फैसले में पांच जजों ने कहा था कि एससी, एसटी एक समान समूह वर्ग हैं और इनका उपवर्गीकरण नहीं हो सकता। जिस पर अब चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अट्टयक्षता वाली सात सदस्यीय पीठ ने यह फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने कहा कि कोटा के भीतर कोटा का अर्थ है आरक्षण के पहले से आवंटित प्रतिशत के भीतर एक अलग आरक्षण का प्रावधान लागू करना। यह मुख्य तौर पर यह तय करने के लिए किया जाता है कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे पिछड़े और जरूरतमंद समूहों तक पहुंचे जो इससे वंचित रह जाते हैं। इसका उद्देश्य आरक्षण के बड़े समूह के अंदर छोटे, कमजोर वर्गों का आधार सुनिश्चित करना है ताकि वे भी आरक्षण का फायदा उठा सकें। एससी और एसटी के भीतर भी कई जातियां ऐसी हैं जिन्हें आरक्षण की व्यवस्था के बीच भी उचित लाभ नहीं मिल पाता है। इसलिए कोटा के अंदर कोटा से इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
कोर्ट के फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि राज्य सरकारें एससी और एसटी में सब कैटेगरी बना सकती हैं जिससे जरूरतमंद कैटेगरी को आरक्षण का लाभ मिल सकेगा। हालांकि अगर राज्य एक या ज्यादा श्रेणी को अनुसूचित जाति के तहत 100 प्रतिशत रिजर्वेशन देने का फैसला लेते हैं तो यह अन्य श्रेणियों को लाभ से वंचित करने जैसा होगा। इस फैसले से यह स्पष्ट है कि इसे लागू करने के लिए सरकार के पास जातियों का आंकड़ा होना चाहिए जो कि जमीनी सर्वे के आधार पर एकत्र किया जाना चाहिए। इसी आधार पर कोटे में कोटा वाली जाति का निर्धारण किया जाना चाहिए।

