Uttarakhand

हाथ के बदलेंगे हालात?

उत्तराखण्ड राज्य के इतिहास में सत्ता सुख भोगती आई भाजपा और कांग्रेस में नेताओं का आपसी गमन बदस्तूर जारी है। जो नेता कभी ‘हाथ’ के साथ थे उनमें से अधिकतर अब ‘कमल’ खिलाते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस की आपसी कलह का ही नतीजा है कि उत्तराखण्ड में अब भाजपा कांग्रेसमय हो चली है। कांग्रेस के समक्ष यक्ष प्रश्न यह है कि उसके नेता पार्टी का दामन क्यों छोड़ रहे हैं? इसके लिए दोषी कौन है? क्या लोकसभा चुनाव के परिणाम बाद कांग्रेस के हालात बदलेंगे या पार्टी फिर उसी पुराने ढर्रे पर चलकर सांप निकलने के बाद लकीर पीटने वाली स्थिति में रहेगी?

भाजपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के नेताओं का जारी है आवागमन

चार जून को लोकसभा चुनाव के नतीजे आ जाएंगे। मतदान से पहले लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तराखण्ड की राजनीति में बड़ा गहमा- गहमी वाला माहौल रहा। सत्तारूढ़ भाजपा का अतिआत्मविश्वास तो कांग्रेस से भाजपा की ओर रुखसत होते उत्तराखण्ड कांग्रेस के कई बड़े चेहरे भी दिखे। ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आते गए कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाने वालें चेहरे बढ़ते गए। अब जब लोकसभा चुनाव का नतीजा आने में तकरीबन एक महीने का समय बाकी है लगता है कांग्रेस इस वक्त को अपने किले को दुरुस्त करने के लिए उपयोग करना चाहती है।

आगामी जून माह में होने वाले निकाय चुनाव की तैयारियों के लिए कवायद उत्तराखण्ड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा ने शुरू कर दी है। आने वाले निकाय चुनाव में दोनों राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस में घमासान होना तय है। स्थानीय निकाय चुनाव ही नहीं छह माह बाद होने वाले पंचायत चुनावों में भी दोनों दलों को कड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ेगा। कांग्रेस लोकसभा चुनाव के दौरान जिस प्रकार अपने बड़े नेताओं का पलायन देखा है उसने उत्तराखण्ड में पार्टी के सम्मुख बड़ी चुनौती पेश कर दी है। हालांकि पार्टी के बड़े नेता इसे चुनौती नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि पार्टी का आंतरिक ढांचा इन चुनौतियों से निपटने में सक्षम है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करण माहरा का मानना है कि ‘वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़कर जाना दुर्भाग्यपूर्ण तो है लेकिन उनके सामने क्या परिस्थितियां थीं जिनके कारण वो भाजपा में गए, इसका कारण सिर्फ राजनीतिक नहीं हो सकता है। आने वाले वक्त में इसका खुलासा जरूर होगा।’

अब जब लोकसभा चुनाव का परिणाम आना बाकी है, उत्तराखण्ड में राजनीतिक गतिविधियां थम गई हैं। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बड़े नेता दूसरे प्रदेशों के चुनाव में व्यस्त हैं। उत्तराखण्ड सरकार निकाय चुनाव की


लोकसभा चुनाव से पहले बद्रीनाथ से विधायक राजेंद्र भंडारी और कांग्रेस नेता महेश शर्मा भाजपा में हुए शामिल

तैयारियों में लगी है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दल और राजनीतिक व्यक्ति इन चुनावों में अपनी भूमिका तलाश रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के सामने आने वाली है। लोकसभा चुनाव परिणाम भले ही कुछ भी हों लेकिन उन तीखे सवालों का सामना कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व को करना ही पड़ेगा जिनके कारण आज उत्तराखण्ड में कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। आज भले ही बद्रीनाथ से विधायक राजेंद्र सिंह भंडारी के भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस के पास 18 विधायक हों, लेकिन जिस प्रकार समन्वय की कमी है उससे लगता नहीं कि आने वाले समय में ये संख्या बरकार रह पाएगी। शायद संगठन स्तर पर आधे-अधूरे मन से की गई कवायदें और बड़े-बड़े नेताओं के बीच अहं की टकराहट और आपसी संवादहीनता ने कांग्रेस का बेड़ा गर्क किया है। आज जब कांग्रेस के कई बड़े नेता पार्टी छोड़ भाजपा में जा रहे हैं और प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता इस संकट को भांप नहीं पा रहे हों तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी कितनी सजग है।

2022 के चुनाव बाद कांग्रेस में फेरबदल इन उम्मीदों के साथ किया गया था कि पार्टी में आई जड़ता कुछ टूटेगी लेकिन बड़े नेताओं की महत्वाकांक्षाओं ने संगठन को मजबूत करने की कवायदों पर पानी ही फेरा है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार इसी लड़ाई का नतीजा थी। 2000 में उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद भारतीय जनता पार्टी तो संगठनात्मक रूप से मजबूत होती गई और उसने अपना जनाधार मजबूत किया, वहीं कभी उत्तराखण्ड में मजबूत जनाधार रखने वाली कांग्रेस अपना जनाधार खोती गई। रही-सही कसर नेताओं की आपसी गुटबाजी ने पूरी कर दी। कांग्रेस संगठन की बात करें उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यहां कांग्रेस के अंदर हरीश रावत और तिवारी गुट का टकराव हमेशा से ही रहा। 2002 के बाद पहली निर्वाचित सरकार का मुखिया नारायण दत्त तिवारी के बनने को हरीश रावत गुट ने आसानी से स्वीकार नहीं किया था, वो तो नारायण दत्त तिवारी सरीखे नेता पांच साल सरकार चला ले गए वरना 2012 में कांग्रेस की सरकारों में अस्थिरता ही रही फिर वो विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री रहे या फिर हरीश रावत। उस दौर की राजनीतिक अस्थिरता में कांग्रेस ने एक बड़ा दलबदल देखा। उस वक्त भले ही हरीश रावत की सरकार बच गई हो, लेकिन उस दौर की अस्थिरता आज भी कांग्रेस को भारी पड़ रही है। 2016 के बाद कांग्रेस ने बड़े नेताओं को पार्टी से जाते हुए देखा है।

भाजपा से कुछ नेता कांग्रेस में आए भी तो वो भाजपा में वापस चले गए। जिन मालचन्द, दान सिंह भंडारी, दिनेश धनै के लिए हरीश रावत ने बड़े नेताओं को नाराज कर दिया था आज वो फिर भाजपा में शरणागत हो गए हैं। किशोर उपाध्याय दिनेश धनै के कारण नाराज थे लेकिन उस वक्त कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व दिनेश धनै पर मेहरबान था जिस कारण किशोर उपाध्याय अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए भाजपा में जाकर विधायक बन गए लेकिन जिस दिनेश धनै को हरीश रावत ने किशोर उपाध्याय के ऊपर तवज्जो दी, वही दिनेश ऐन लोकसभा चुनाव के वक्त भाजपाई हो गए। इसी प्रकार भीमताल में दान सिंह भंडारी के मोह चलते हरीश रावत ने अपने कट्टर समर्थक राम सिंह कैड़ा का 2017 में टिकर काट कर दान सिंह भंडारी को कांग्रेस का टिकट दिलवा दिया। 2017 में राम सिंह कैड़ा निर्दलीय लड़कर जीतें, वहीं 2022 में भाजपा में शामिल हो भीमताल से पुनः विधायक बन गए। जिन दान सिंह भंडारी को कांग्रेस ने राम सिंह कैड़ा पर तरजीह दी थी, वही दान सिंह भंडारी 2024 के लोकसभा चुनाव के वक्त भाजपा में शामिल हो घर वापसी कर गए। यही हाल प्रदेश के अन्य स्थानों में रहा। आज देखें तो कांग्रेस में प्रदेश स्तर के शीर्ष नेताओं का अभाव तो खलता है लेकिन दूसरी पंक्ति के नेताओं की नई पांत दूर-दूर तक नजर नहीं आती, ऐसे में कांग्रेस के सामने फिर से खड़ा होने का संकट है। लेकिन इस संकट से निपटने के लिए कांग्रेस के सामने कोई ठोस रणनीति है, ऐसा लगता नहीं है। चुनाव से पहले बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने की बात जरूर कही जा रही थी लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान जैसा देखने को मिला उससे लगता है कि ये सब महज कागजी कार्रवाई बन कर रह गई।

2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम उत्तराखण्ड ही नहीं पूरे देश में कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है। खासकर उत्तराखण्ड कांग्रेस को खड़ी करने की कवायद बहुत चुनौतीपूर्ण होगी। अगर लोकसभा चुनाव में पार्टी कुछ बेहतर प्रदर्शन कर पाती है तो तस्वीर कुछ अलग होगी वरना एक और असफलता कांग्रेस का रास्ता और कठिन बना देगी।

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