रसातल में पहुंच चुकी भारतीय राजनीति में इन दिनों ‘तू डाल-डाल मैं पात-पात’ कहावत का दौर शुरू हो चुका है। केंद्र सरकार पर जांच एजेंसियों के जरिए विरोधियों को उत्पीड़ित करने का आरोप लगाने वाला विपक्ष अब अपने शासित राज्यों में भी कुछ ऐसा ही करने लगा है। गत् सप्ताह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारण समेत ईडी के अधिकारियों के खिलाफ जबरन वसूली और आपराधिक साजिश रच इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के जरिए कई हजार करोड़ रुपए हड़पने सम्बंधी एफआईआर कर्नाटक में दर्ज की गई है। हालांकि कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस एफआईआर पर कार्यवाही करने से रोक लगा दी है लेकिन इससे न केवल इलेक्टोरल बॉन्ड का जिन्न एक बार फिर से बाहर निकल आया है, बल्कि ईडी द्वारा कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया पर मुकदमा दर्ज करने के साथ ही केंद्र एवं राज्य की जांच एजेंसियों के दुरुपयोग की आशंका बलवती हो उठी है
इसी साल लोकसभा चुनाव से ठीक पहले देश की सर्वाेच्च अदालत ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को यह कहते हुए खत्म कर दिया था कि यह संविधान के तहत सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन करती है। जिसके बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चले गया था। लेकिन यह मामला इन दिनों एक बार फिर सुर्खियों में है और केंद्र की मोदी सरकार के गले की फांस बनता नजर आ रहा है। अब कर्नाटक की एक कोर्ट द्वारा गत् सप्ताह एक याचिका को स्वीकार करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा समेत कई अन्य भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए और जैसे ही आदेश जारी हुए कर्नाटक पुलिस ने तुरंत एफआईआर दर्ज कर डाली।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, ईडी अधिकारियों, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के पदाधिकारियों के खिलाफ धारा 384 (जबरन वसूली के लिए सजा) और 120 बी (आपराधिक साजिश) के साथ धारा 34 (सामान्य इरादे से कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कृत्य) के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। हालांकि कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई पर 22 अक्टूबर तक रोक लगा दी है। खास बात यह है कि जबरन चुनावी चंदा वसूलने के मामले में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को प्रमुख आरोपी बनाया गया। इसके अलावा वसूली में शामिल अन्य बड़े भाजपा नेताओं में नलिन कटील और बीवाई विजयेंद्र हैं। वित्त मंत्री पर चुनावी बॉन्ड के जरिए जबरन वसूली का आरोप लगाया गया है। जनाधिकार संघर्ष परिषद (जेएसपी) के आदर्श अय्यर ने बेंगलुरु के कोर्ट में शिकायत दर्ज कर निर्मला सीतारमण के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की थी। याचिका पर सुनवाई कर कोर्ट ने बेंगलुरु के तिलक नगर पुलिस स्टेशन को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। अगली सुनवाई 10 अक्टूबर को होनी है।
इन लोगों के खिलाफ दर्ज हुई शिकायत
आदर्श अय्यर ने आरोप लगाया कि चुनावी बॉन्ड के जरिए धमकी देकर जबरन वसूली की गई। जन अधिकार संघर्ष परिषद ने पिछले साल अप्रैल में अदालत में याचिका दायर कर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, ईडी अधिकारियों, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, पार्टी के अन्य राष्ट्रीय नेताओं, भाजपा के तत्कालीन कर्नाटक अध्यक्ष नलिन कुमार कटील, बी वाई विजयेंद्र के खिलाफ शिकायत की थी। अदालत ने शिकायत पर सुनवाई करते हुए बेंगलुरु के तिलक नगर पुलिस थाने को चुनावी बॉन्ड के जरिए जबरन वसूली का मामला दर्ज करने का निर्देश बाद इन पर एफआईआर भी दर्ज हो गई है।
भाजपा नेताओं पर क्या हैं आरोप?
शिकायतकर्ता जनाधिकार संघर्ष परिषद (जेएसपी) के आदर्श अय्यर ने आरोप लगाया है कि भाजपा नेताओं ने संवैधानिक पदों पर बैठकर एमएनसी और टीएनसी कॉर्पाेरेट कंपनियों के सीईओ और एमडी के साथ मिलकर चुनावी बॉन्ड की आड़ में 8,000 करोड़ रुपये से अधिक की रकम जबरन वसूली की है। अय्यर ने अपनी शिकायत में कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्य आरोपी ने विभिन्न कॉर्पाेरेट कंपनियों, उनके सीईओ, एमडी आदि के यहां छापेमारी, जब्ती और गिरफ्तारी करने के लिए नामित अधिकारियों पर दबाव डाला। छापे का डर दिखाकर कॉरपोरेट को कई करोड़ों रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदने के लिए मजबूर किया गया। शिकायत में कहा गया है, आरोपी नंबर एक (निर्मला सीतारमण) ने राष्ट्रीय स्तर पर आरोपी नंबर दो (ईडी) की गुप्त सहायता और उकसावे के साथ कर्नाटक राज्य में आरोपी नंबर तीन (नड्डा) और आरोपी नंबर चार (नलिन कुमार) को उकसाया।
कब हुई शिकायत
भाजपा नेताओं के खिलाफ जबरन चंदा वसूली की शिकायत गत अप्रैल माह में की गई थी। शिकायत में कहा गया था कि अप्रैल 2021 से अगस्त 2022 तक व्यवसायी अनिल अग्रवाल की फर्म से लगभग 230 करोड़ रुपए और अरबिंदो फार्मेसी से 49 करोड़ रुपए चुनावी बॉन्ड के जरिए वसूले गए। इस खबर के सामने आने के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने केंद्रीय वित्त मंत्री के इस्तीफे की मांग की है। असल में इसी साल 15 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक चंदे के लिए चुनावी बॉन्ड स्कीम पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा कहा था कि यह स्कीम और बॉन्ड की गोपनीयता बनाए रखना असंवैधानिक है। यह स्कीम सूचना के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने एसबीआई और चुनाव आयोग को आदेश दिया था कि वह चुनावी बॉन्ड से जुड़ा पूरा आंकड़ा सार्वजनिक करे। 21 मार्च को डेटा सामने आया। इसमें पता चला था कि 2018 से 2023 तक देश की 771 कंपनियों ने 11, 484 करोड़ के बॉन्ड खरीदे थे। ट्रेडिंग कंपनियों ने सबसे ज्यादा 2, 955 करोड़ रुपए सियासी दलों को दिए। डेटा सार्वजनिक होने के बाद जुलाई 2024 में भी कॉर्पाेरेट्स और राजनीतिक दलों के बीच लेन-देन की जांच एसआईटी से करवाने की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी। वित्त मंत्री ने लोकसभा चुनाव से पहले कहा था, स्कीम वापस लाएंगे। लोकसभा चुनाव से पहले वित्त मंत्री ने बॉन्ड स्कीम को दोबारा लाने का संकेत दिया था। निर्मला सीतारमण ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अगर हम सत्ता में आए तो चुनावी बॉन्ड स्कीम को फिर से वापस लाएंगे। इसके लिए पहले बड़े स्तर पर सुझाव लिए जाएंगे। हालांकि कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने उनके इस बयान पर कहा था कि अब भाजपा लोगों को और कितना लूटना चाहती है। 2017 के बजट में उस समय के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चुनावी बॉन्ड स्कीम को पेश किया था। 2 जनवरी 2016 को केंद्र सरकार ने इसे नोटिफाई किया। ये एक तरह का प्रोमिसरी नोट होता है, जिसे बैंक नोट भी कहते हैं। इसे कोई भी भारतीय नागरिक या कंपनी खरीद सकती है। इस योजना को 2017 में ही चुनौती दी गई थी, लेकिन सुनवाई 2019 में शुरू हुई। बाद में दिसंबर 2019 में याचिकाकर्ता एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने इस योजना पर रोक लगाने के लिए एक आवेदन दिया। इसमें मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से बताया गया कि किस तरह चुनावी बॉन्ड योजना पर चुनाव आयोग और रिजर्व बैंक की चिंताओं को केंद्र सरकार ने दरकिनार किया था।
विपक्ष की जवाबी कार्रवाई
भाजपा नेताओं के खिलाफ हो रही कार्रवाइयों को विपक्षी नेताओं द्वारा केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि जिस प्रकार पिछले दस सालों से केंद्र की मोदी सरकार लगातार ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग द्वारा छापे और गिरफ्तारियां हो रही हैं उसी तरह अब जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है वहां उसके नेताओं की गिरफ्तारियां और उन पर एक्शन लिया जा रहा है। कर्नाटक के नागमंगला में गणेश मूर्ति विसर्जन के दौरान दो गुटों में झड़प के बाद विवादित टिप्पणी करने के आरोप में केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे और विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। मांड्îा जिले में एक 45 वर्षीय पुलिस अधिकारी की शिकायत को लेकर भाजपा नेताओं पर दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई है।
केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे का आरोप है कि कर्नाटक में अघोषित आपातकाल है। मुख्यमंत्री बनने के बाद सिद्धारमैया हिटलर बन गए हैं। भाजपा सांसदों और विधायकों पर लगातार एफआईआर दर्ज की जा रही हैं। राज्य के इतिहास में पहली बार विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इसके साथ ही दक्षिणी बेंगलुरु के सांसद तेजस्वी सूर्या के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई है।
सिद्धारमैया ने की इस्तीफे की मांग
इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने निर्मला सीतारमण के इस्तीफे की मांग की और कहा कि इस मामले में तीन महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपी जानी चाहिए। उन्होंने कहा निर्मला सीतारमण के खिलाफ जनप्रतिनिधियों की विशेष अदालत में प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है। वह कौन हैं? वह एक केंद्रीय मंत्री हैं और उनके खिलाफ एफआईआर भी है। वे चुनावी बॉन्ड के माध्यम से जबरन वसूली में शामिल थीं और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। एफआईआर दर्ज होने के बाद उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। क्या भाजपा उनसे इस्तीफा देने के लिए कहेगी? उनके इस्तीफे के लिए भाजपा के नेता कब विरोध-प्रदर्शन और मार्च करेंगे? अगर इस मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस्तीफा देना पड़ेगा। अब धारा 17ए (भ्रष्टाचार निरोधक कानून) के तहत जांच पूरी होनी चाहिए और तीन महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपी जानी चाहिए।
क्या था चुनावी बॉन्ड
केंद्र की भाजपा सरकार ने 2018 में चुनावी बॉन्ड योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में नकद दान को खत्म करना था, ताकि राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता बनी रहे। इसके बाद एसबीआई के चुनावी बॉन्ड के जरिए लोग राजनीतिक दलों को चंदा दे सकते थे। इसका खुलासा नहीं किया जाता था। पिछले साल विपक्षी दलों के आरोपों और इसके खिलाफ तमाम याचिकाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि यह नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करता है।

