देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में शामिल नीट-यूजी एक बार फिर पेपर लीक और परीक्षा की सुरक्षा सवालों के घेरे में है। 22 लाख से अधिक छात्रों को प्रभावित करने वाले इस घटनाक्रम ने न केवल राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया है बल्कि पिछले वर्षों में विभिन्न राज्यों में सामने आए पेपर लीक कांडों की लम्बी श्ृंखला को भी फिर से चर्चा में ला दिया है
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने नीट-यूजी परीक्षा को रद्द करने का निर्णय लेते हुए दोबारा परीक्षा कराने की घोषणा की है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब परीक्षा के आयोजन के तुरंत बाद कई राज्यों से प्रश्नपत्र लीक होने, हल किए गए पेपर व्हाट्सऐप और टेलीग्राम समूहों में प्रसारित होने तथा संगठित गिरोहों के सक्रिय होने के आरोप सामने आए। लगभग 22 लाख से अधिक छात्रों के भविष्य से जुड़ी इस परीक्षा पर उठे सवालों ने पूरे देश में चिंता और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है।
बताया जा रहा है कि परीक्षा के बाद बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में जांच एजेंसियों ने संदिग्ध गतिविधियों की पड़ताल शुरू की। कुछ स्थानों पर ऐसे छात्रों और बिचैलियों को हिरासत में लिया गया जिन पर परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने का आरोप है। नासिक में एक केंद्र पर परीक्षा आयोजित होने के बावजूद व्यापक स्तर पर परीक्षा रद्द करने का निर्णय इस बात का संकेत माना जा रहा है कि एजेंसियों को पेपर लीक के पर्याप्त संकेत मिले थे। इस पूरे विवाद के बीच एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया है कि पिछली बार नीट परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों के बाद केंद्र सरकार ने पूर्व इसरो प्रमुख डाॅ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। समिति ने अक्टूबर 2024 में अपनी रिपोर्ट में परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों की सिफारिश की थी। इसमें पेन-पेपर आधारित परीक्षा के स्थान पर कम्प्यूटर आधारित टेस्ट (सीबीटी), मल्टी-सेशन परीक्षा, बेहतर एन्क्रिप्शन व्यवस्था और बहुस्तरीय सुरक्षा प्रणाली लागू करने की बात कही गई थी।
समिति ने स्पष्ट कहा था कि इतने बड़े स्तर की परीक्षा में भौतिक रूप से प्रश्नपत्र पहुंचाने की प्रक्रिया अपने आप में जोखिमपूर्ण है और कई स्तरों पर पेपर लीक सम्भव हो जाता है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि जेईई मेन की तरह नीट को भी कई चरणों और कई दिनों में आयोजित किया जाए ताकि एक ही प्रश्नपत्र पर निर्भरता समाप्त हो सके लेकिन लगभग दो वर्ष बीत जाने के बावजूद समिति की अधिकांश सिफारिशें कागजों तक ही सीमित रहीं।
एनटीए के अधिकारियों ने यह तर्क दिया था कि नीट जैसी परीक्षा को पूरी तरह कम्प्यूटर आधारित बनाना आसान नहीं है क्योंकि एक ही दिन में 22 लाख से अधिक छात्रों के लिए पर्याप्त तकनीकी ढांचा उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण है। अधिकारियों के अनुसार यदि परीक्षा कई शिफ्टों में कराई जाती है तो प्रश्नपत्रों के सामान्यीकरण और परिणामों को लेकर नए विवाद तथा कानूनी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। इसके बावजूद शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक की तुलना में तकनीकी चुनौतियां छोटी समस्या हैं। पेपर लीक का यह मामला अचानक सामने नहीं आया। पिछले कुछ वर्षों में देश की अनेक बड़ी परीक्षाएं इसी तरह विवादों में रही हैं। बिहार में शिक्षक भर्ती परीक्षा से लेकर पुलिस भर्ती परीक्षा तक कई बार प्रश्नपत्र लीक होने के मामले सामने आए। उत्तर प्रदेश में पुलिस काॅन्सटेबल भर्ती परीक्षा को लाखों अभ्यर्थियों के विरोध के बाद रद्द करना पड़ा था। राजस्थान में रीट परीक्षा पेपर लीक ने पूरे राज्य की राजनीति को झकझोर दिया था जहां संगठित गिरोहों द्वारा करोड़ों रुपए लेकर प्रश्नपत्र बेचने के आरोप लगे।
एनटीए के अधिकारियों ने यह तर्क दिया था कि नीट जैसी परीक्षा को पूरी तरह कम्प्यूटर आधारित बनाना आसान नहीं है क्योंकि एक ही दिन में 22 लाख से अधिक छात्रों के लिए पर्याप्त तकनीकी ढांचा उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण है। अधिकारियों के अनुसार यदि परीक्षा कई शिफ्टों में कराई जाती है तो प्रश्नपत्रों के सामान्यीकरण और परिणामों को लेकर नए विवाद तथा कानूनी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। इसके बावजूद शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक की तुलना में तकनीकी चुनौतियां छोटी समस्या हैं। पेपर लीक का यह मामला अचानक सामने नहीं आया। पिछले कुछ वर्षों में देश की अनेक बड़ी परीक्षाएं इसी तरह विवादों में रही हैं। बिहार में शिक्षक भर्ती परीक्षा से लेकर पुलिस भर्ती परीक्षा तक कई बार प्रश्नपत्र लीक होने के मामले सामने आए। उत्तर प्रदेश में पुलिस काॅन्सटेबल भर्ती परीक्षा को लाखों अभ्यर्थियों के विरोध के बाद रद्द करना पड़ा था। राजस्थान में रीट परीक्षा पेपर लीक ने पूरे राज्य की राजनीति को झकझोर दिया था जहां संगठित गिरोहों द्वारा करोड़ों रुपए लेकर प्रश्नपत्र बेचने के आरोप लगे।
उत्तराखण्ड भी पेपर लीक के मामलों से बुरी तरह प्रभावित रहा है। उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूकेएसएसएससी) की स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद खड़ा हुआ था। जांच में सामने आया कि संगठित गिरोह अभ्यर्थियों से लाखों रुपए लेकर प्रश्नपत्र उपलब्ध करा रहे थे। इसके बाद पुलिस भर्ती, वन दरोगा भर्ती और पटवारी भर्ती परीक्षाओं पर भी सवाल उठे। कई गिरफ्तारियां हुईं और राज्य सरकार को अनेक परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं। प्रदेश में लगातार सामने आए इन मामलों ने यह संकेत दिया कि परीक्षा माफिया केवल बड़े राज्यों तक सीमित नहीं रह गए हैं बल्कि छोटे राज्यों की भर्ती और प्रवेश प्रणालियों में भी गहरी पैठ बना चुके हैं।
मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला आज भी भारत के सबसे बड़े परीक्षा घोटालों में गिना जाता है, जिसमें मेडिकल प्रवेश, सरकारी भर्ती और चयन प्रक्रियाओं में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगे थे। इस मामले ने दिखाया था कि परीक्षा माफिया किस तरह राजनीतिक, प्रशासनिक और तकनीकी नेटवर्क का उपयोग कर पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं। इसी प्रकार रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं, एसएससी सीजीएल, सेना भर्ती, बैंकिंग परीक्षाओं और विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाओं में भी समय-समय पर पेपर लीक या तकनीकी हेरफेर के आरोप लगते रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि परीक्षा उद्योग के बढ़ते आकार और प्रतियोगिता की तीव्रता ने ‘एग्जाम माफिया’ नामक समानांतर अपराध तंत्र को जन्म दिया है।
नीट परीक्षा को लेकर इस बार सबसे बड़ा सवाल परीक्षा सुरक्षा तंत्र पर उठ रहा है। विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और एनटीए पर गम्भीर आरोप लगाते हुए कहा है कि लाखों छात्रों की मेहनत और मानसिक संतुलन के साथ खिलवाड़ हुआ है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि ‘पेपर माफिया’ बार-बार बच निकलता है जबकि छात्रों को मानसिक तनाव, आर्थिक बोझ और अनिश्चितता झेलनी पड़ती है। कई छात्र संगठनों ने दिल्ली, पटना और जयपुर सहित अनेक शहरों में प्रदर्शन किए। छात्रों का कहना है कि वर्षों की तैयारी बाद यदि परीक्षा की विश्वसनीयता ही संदिग्ध हो जाए तो मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों का मनोबल टूट जाता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार हो रहे पेपर लीक केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि राष्ट्रीय प्रतिभा चयन प्रणाली के लिए गम्भीर खतरा हैं। जब योग्य छात्र मेहनत के बावजूद असुरक्षित महसूस करने लगे और पैसे तथा सम्पर्क के बल पर प्रश्नपत्र हासिल करने की खबरें सामने आए तो पूरी चयन प्रक्रिया की नैतिकता प्रभावित होती है।
सरकार ने मामले की जांच केंद्रीय एजेंसियों को सौंपने और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। साथ ही परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए डिजिटल निगरानी, एन्क्रिप्टेड पेपर ट्रांसमिशन, केंद्रों पर बायोमेट्रिक सत्यापन तथा अंतिम समय में प्रश्नपत्र वितरण जैसे उपायों पर चर्चा हो रही है। हालांकि छात्रों और अभिभावकों के बीच सबसे बड़ी चिंता यह है कि बार-बार परीक्षा रद्द होने और पुनर्परीक्षा आयोजित होने से मानसिक दबाव, आर्थिक बोझ और अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। लाखों विद्यार्थी अब नई परीक्षा तिथि की प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन उनके मन में यह प्रश्न भी बना हुआ है कि क्या अगली परीक्षा पूरी तरह निष्पक्ष और सुरक्षित हो पाएगी।
व्हिसलब्लोअर’, व्हाट्सऐप ग्रुप और 15 लाख का सौदा
यूजी पेपर लीक मामले की जांच में अब ऐसे खुलासे सामने आ रहे हैं जिन्होंने पूरे देश को चैंका दिया है। जांच एजेंसियों के अनुसार प्रश्नपत्र केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्हाट्सऐप ग्रुप, पीडीएफ काॅपी और ‘गेस पेपर’ के नाम पर कई राज्यों तक पहुंचाया गया। इस पूरे नेटवर्क में मेडिकल छात्र, कोचिंग से जुड़े लोग, करियर काउंसलर और बिचैलियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
महाराष्ट्र के नासिक से शुरू हुई जांच में पुलिस ने एक मेडिकल छात्र शुभम खैरनार को हिरासत में लिया है। अधिकारियों के अनुसार उस पर आरोप है कि उसने परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र हासिल किया और उसे आगे साझा किया। पुलिस का दावा है कि प्रश्नपत्र की हार्ड काॅपी पुणे से जुड़े एक व्यक्ति के माध्यम से प्राप्त की गई थी, जिसे बाद में डिजिटल रूप में कई लोगों तक पहुंचाया गया। जांच एजेंसियों को संदेह है कि इस प्रश्नपत्र को ‘गेस पेपर’ बताकर छात्रों को बेचा गया ताकि शक कम हो।
जांच में यह भी सामने आया है कि पेपर राजस्थान, बिहार, उत्तराखण्ड, जम्मू-कश्मीर, केरल और हरियाणा तक पहुंचा। सूत्रों के अनुसार गुरुग्राम और राजस्थान के कुछ इलाकों में व्हाट्सऐप समूहों के माध्यम से प्रश्नपत्र साझा किया गया। कई छात्रों और उनके अभिभावकों से पूछताछ की गई है। राजस्थान एसओजी ने अब तक 150 से अधिक अभ्यर्थियों और उनके परिजनों से पूछताछ की है।
सूत्रों के अनुसार पेपर लीक के इस नेटवर्क में लाखों रुपए का लेन-देन हुआ। प्रारम्भिक जांच में यह आशंका जताई गई है कि कुछ लोगों ने प्रश्नपत्र लगभग 10 लाख रुपए में खरीदा और बाद में उसे 15 लाख रुपए तक में आगे बेचा। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह केवल व्यक्तिगत स्तर का अपराध नहीं बल्कि संगठित गिरोह का काम है, जो वर्षों से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सक्रिय हो सकता है।
मामले का सबसे दिलचस्प और गम्भीर पहलू एक ‘व्हिसलब्लोअर’ का सामने आना है। राजस्थान से जुड़े सूत्रों का दावा है कि एक व्यक्ति ने परीक्षा से पहले स्थानीय पुलिस को सम्भावित पेपर लीक की सूचना देने की कोशिश की थी, लेकिन उसे गम्भीरता से नहीं लिया गया। बाद में उसी व्यक्ति ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को शिकायत भेजी। बताया जा रहा है कि शुरुआती जांच के बाद राजस्थान एसओजी ने मामले की जांच शुरू की और फिर धीरे-धीरे पूरे नेटवर्क का खुलासा होने लगा। हालांकि अब जांच एजेंसियां उसी कथित व्हिसलब्लोअर की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं। संदेह है कि उसने स्वयं भी प्रश्नपत्र प्राप्त किया था और मामला फैलने के बाद खुद को बचाने के लिए शिकायतकर्ता की भूमिका निभाई। सीबीआई और राज्य एजेंसियां फिलहाल इस बात की जांच कर रही हैं कि असली मास्टरमाइंड कौन है और प्रश्नपत्र सबसे पहले किस स्तर से बाहर आया। जांच अधिकारियों का कहना है कि अब तक मिले संकेत बताते हैं कि पेपर लीक का यह मामला किसी एक राज्य का नहीं बल्कि अंतरराज्यीय नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने मामले की जांच केंद्रीय एजेंसियों को सौंप दी है। इस बीच लाखों छात्र फिर से परीक्षा की तैयारी और अनिश्चितता के दबाव के बीच फंसे हुए हैं।