एल्गोरिथम क्या है? सरल शब्दों में, एल्गोरिथम निर्देशों का एक ऐसा क्रम set of instructions) है जो यह तय करता है कि किसी स्थिति में क्या निर्णय लिया जाएगा। कौन-सा काम किसे मिलेगा, किसे कितना भुगतान होगा, किसकी प्राथमिकता बढ़ेगी, किसकी घटेगी, इन सबका फैसला अब तेजी से एल्गोरिथम करने लगे हैं। सुनने में यह एक तटस्थ और तकनीकी व्यवस्था लगती है, मानो मशीनें इंसानों से ज्यादा निष्पक्ष हों। लेकिन असली सवाल यह है कि एल्गोरिथम को लिख कौन रहा है, उसे नियंत्रित कौन कर रहा है और वह आखिर किसके हित में काम कर रहा है। यहीं से हमारे समय की सबसे बड़ी सच्चाई सामने आती है, शोषण का एक नया, परिष्कृत और लगभग अदृश्य रूप।

अब शोषण सिर्फ फैक्ट्री की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा। वह ऐप, डेटा, कोड और डिजिटल प्लेटफाॅर्म के भीतर छिप गया है। वह उतना ही क्रूर है बल्कि कई बार उससे भी ज्यादा क्योंकि अब शोषण को पहचानना मुश्किल है और उसके खिलाफ संगठित होना उससे भी ज्यादा कठिन।

वर्ष 1886 में अमेरिका के हेमार्केट एफेयर (Haymarket affair) ने दुनिया को यह सिखाया था कि श्रमिक जब एकजुट होते हैं तो इतिहास बदलता है। 8 घंटे काम के अधिकार की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन सिर्फ अमेरिका की घटना नहीं थी। उसने पूरी दुनिया में श्रमिक चेतना को जन्म दिया। उसी की स्मृति में हर साल 1 मई को ‘मजदूर दिवस’ मनाया जाता है। उस समय संघर्ष स्पष्ट था। मालिक सामने था, कारखाना सामने था और शोषण का चेहरा साफ दिखाई देता था। मजदूर जानते थे कि उन्हें किससे लड़ना है। इसलिए यूनियनें बनीं, सामूहिकता पैदा हुई और श्रम कानूनों की नींव पड़ी।

औद्योगिक क्रांति के शुरुआती दौर में श्रमिकों की स्थिति अत्यंत अमानवीय थी। 12-14 घंटे काम, बेहद कम मजदूरी, सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं और विरोध करने पर बेरहमी से दमन लेकिन धीरे-धीरे संघर्षों ने दुनिया को बदला। ट्रेड यूनियनों का जन्म हुआ। श्रमिक आंदोलनों ने पूंजी को यह एहसास कराया कि उत्पादन सिर्फ मशीनों से नहीं, इंसानों से चलता है। यही वह दौर था जब दुनिया के कई देशों में श्रम कानून बने, न्यूनतम वेतन तय हुए, काम के घंटे सीमित हुए और श्रमिक अधिकारों को कानूनी मान्यता मिली।

भारत में भी श्रम संघर्षों का लम्बा इतिहास रहा है। कपड़ा मिलों से लेकर खदानों तक, रेलवे से लेकर बंदरगाहों तक, लाखों मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर श्रमिक आंदोलनों ने भी देश की सामाजिक और राजनीतिक चेतना को आकार दिया। संविधान में श्रमिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की जो बातें शामिल हुईं, वे अचानक नहीं आईं, वे लम्बे संघर्षों का परिणाम थीं लेकिन 1991 के बाद दुनिया बदलने लगी। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नई आर्थिक व्यवस्था ने पूंजी को अभूतपूर्व शक्ति दी। इसे ‘रिफाॅर्म’ कहा गया, ‘आर्थिक विकास’ कहा गया, ‘प्रतिस्पर्धा’ कहा गया लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का एक दूसरा पक्ष भी था, श्रम कानूनों को धीरे-धीरे कमजोर करना। यह कहा गया कि भारत में उद्योग इसलिए नहीं बढ़ रहे क्योंकि यहां श्रम कानून बहुत कठोर हैं, यूनियनें बहुत ताकतवर हैं और श्रमिक अधिकार निवेश में बाधा हैं। यहीं से शोषण का नया अध्याय शुरू हुआ।

स्थायी नौकरी धीरे-धीरे खत्म होने लगी। उसकी जगह संविदा, आउटसोर्सिंग और अस्थायी रोजगार ने ले ली। एक ही फैक्ट्री में तीन-तीन तरह के कर्मचारी दिखने लगे, स्थायी, ठेका और आउटसोर्स। एक ही मशीन पर काम करने वाले दो लोगों की तनख्वाह, सुरक्षा और अधिकार अलग-अलग हो गए। यह सिर्फ लागत घटाने का मामला नहीं था, यह संगठन तोड़ने की रणनीति भी थी।

आज नोएडा, मानेसर, सूरत, पानीपत, गुरुग्राम या देश के किसी भी बड़े औद्योगिक क्षेत्र में जाकर देख लीजिए। विशाल इमारतें, चमकदार कैम्पस और करोड़ों-अरबों का कारोबार दिखेगा लेकिन उसी के भीतर हजारों श्रमिक असुरक्षा के वातावरण में काम करते मिलेंगे। उन्हें पता है कि उनकी जगह लेने के लिए बाहर लम्बी लाइन लगी है। यही डर आधुनिक पूंजीवाद का सबसे प्रभावी हथियार है।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने इस पूरी प्रक्रिया को और जटिल बना दिया है। असली मालिक हजारों किलोमीटर दूर बैठे होते हैं। वे शायद उस शहर का नाम भी ठीक से न जानते हों जहां उनके लिए उत्पादन हो रहा है। जमीन पर जो है, वह लोकल मैनेजमेंट है, जिसका काम ऊपर के मुनाफे और नीचे के श्रमिक के बीच संतुलन नहीं बल्कि अधिकतम मुनाफा सुनिश्चित करना है।

यूनियन बनने नहीं दी जाती। अगर कहीं संगठन की कोशिश हुई तो लोगों को धीरे-धीरे निकाल दिया जाता है। कुछ को ट्रांसफर, कुछ को सस्पेंड, कुछ का कॉन्ट्रैक्ट खत्म। बाकी कर्मचारियों को संदेश मिल जाता है कि ‘बहुत आवाज उठाओगे तो बाहर कर दिए जाओगे।’

यह भय अब औद्योगिक इकाइयों तक सीमित नहीं है। सूचना क्रांति और इंटरनेट ने शोषण को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। ओला-उबर का ड्राइवर, जोमैटो-स्विगी का डिलीवरी बाॅय या किसी ऐप पर काम करने वाला गिग वर्कर, ये सब एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा हैं जहां आदेश इंसान नहीं, मशीन देती है। यहां न कोई बहस है, न कोई संवाद, सिर्फ स्वीकारने या अस्वीकारने का विकल्प है और उसके पीछे छिपी सजा का डर। अगर आपने कुछ ऑर्डर ठुकराए तो आपकी रेटिंग गिर जाएगी, रेटिंग गिरी तो काम कम मिलेगा, काम कम मिला तो कमाई खत्म। यह आधुनिक शोषण का सबसे चालाक रूप है। यह आपको ‘स्वतंत्र’ होने का भ्रम देता है।

आपको लगता है कि आप अपने मालिक खुद हैं। आपके पास कोई बाॅस नहीं, कोई फिक्स टाइम नहीं लेकिन असलियत यह है कि आपकी हर हरकत एक अदृश्य एल्गोरिथम नियंत्रित कर रहा है। वह तय करता है कि आपको कौन-सी राइड मिलेगी, कितनी दूरी पर मिलेगी, कितने पैसे मिलेंगे और कितनी देर इंतजार करना पड़ेगा।

आज का श्रमिक अपने ही औजारों से बंधा हुआ है, उसकी मोटरसाइकिल, उसका मोबाइल, उसका इंटरनेट, यही उसके रोजगार के साधन हैं और यही उसकी बेड़ियां भी। यहीं पर Karl Marx की वह बात और भी प्रासंगिक हो जाती है- “Capital is dead labour, that, vampire & like, lives only by sucking living labour.” (पूंजी मृत श्रम है जो पिशाच की तरह जीवित श्रम का खून चूसकर ही जीवित रहती है।)

मार्क्स ने जिस पूंजी को ‘‘जीवित श्रम का खून चूसने वाली शक्ति’’ कहा था, वह आज और भी परिष्कृत रूप में हमारे सामने है। पहले पूंजी का चेहरा था, अब उसका कोड है। पहले शोषण फैक्ट्री की चारदीवारी में होता था, अब वह मोबाइल स्क्रीन पर होता है। मार्क्स ने “Alienation” यानी ‘विमुखता’ की जो अवधारणा दी थी, आज वह पहले से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक लगती है। श्रमिक सिर्फ अपने श्रम से नहीं बल्कि अपने अधिकारों, अपनी पहचान और अपने संघर्ष की दिशा से भी विमुख हो चुका है। वह काम तो कर रहा है लेकिन यह नहीं जानता कि वह किसके लिए काम कर रहा है और किस से अपने अधिकार मांगे।

सबसे बड़ा संकट यही है कि संघर्ष का लक्ष्य धुंधला हो गया है। जब सामने कोई मालिक ही नहीं है तो विरोध किससे किया जाए? जब निर्णय एक कोड ले रहा हो तो न्याय किससे मांगा जाए? जब कम्पनी कहती है कि ‘‘सिस्टम ने फैसला लिया है’’ तो जवाबदेही किसकी है? यहीं से एक नई विडम्बना जन्म लेती है, अब श्रमिक शोषण के खिलाफ नहीं बल्कि सिस्टम के भीतर टिके रहने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसी बीच श्रम कानूनों का लगातार कमजोर होना स्थिति को और भयावह बना रहा है। ‘फ्लेक्सिबल लेबर’ के नाम पर अस्थिरता को सामान्य बनाया जा रहा है। यूनियनों की ताकत घट रही है। कॉरपोरेट हितों को राष्ट्रीय हित की तरह पेश किया जा रहा है। सरकारें इसे विकास और निवेश की भाषा में बेचती हैं लेकिन जमीन पर इसका अर्थ अक्सर यही निकलता है कि पूंजी की ताकत बढ़ रही है और श्रमिक के अधिकार सिकुड़ रहे हैं।

कोविड महामारी ने इस पूरे ढांचे की सच्चाई को नग्न कर दिया था। करोड़ों श्रमिक शहरों से पैदल अपने गांवों की ओर लौटते दिखे। तब अचानक देश को याद आया कि चमकदार शहरों की नींव किन लोगों के कंधों पर टिकी हुई है लेकिन जैसे ही संकट कम हुआ, व्यवस्था फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट गई।

आज भारत एक विचित्र दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ 5जी, एआई, डिजिटल इंडिया और दुनिया की चैथी अर्थव्यवस्था बनने के दावे हैं। दूसरी ओर असुरक्षित श्रम, बढ़ती असमानता और लगातार सिकुड़ते अधिकार। एक ओर टेक्नोलाॅजी का उत्सव है, दूसरी तरफ उसी टेक्नोलाॅजी के जरिए श्रम पर नियंत्रण का नया ढांचा खड़ा हो रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि तकनीक दुश्मन है। समस्या तकनीक नहीं बल्कि वह आर्थिक और राजनीतिक ढांचा है जो तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ मुनाफे के लिए कर रहा है। अगर एल्गोरिथम सिर्फ उत्पादकता बढ़ाने का माध्यम बन जाए और इंसान को हाशिए पर धकेल दे तो वह प्रगति नहीं, एक नई तरह की गुलामी का रास्ता बन सकता है।

हेमार्किट अफेयर के समय श्रमिक जानते थे कि उन्हें किसके खिलाफ लड़ना है। आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दुश्मन अदृश्य हो गया है। इसलिए अब लड़ाई सिर्फ वेतन या काम के घंटों की नहीं रही, यह पहचान, सुरक्षा, गरिमा और नियंत्रण की लड़ाई है। आने वाले समय का सबसे बड़ा प्रश्न यही होगा कि क्या दुनिया इस नए एल्गोरिथमिक पूंजीवाद के भीतर श्रमिक अधिकारों की नई परिभाषा गढ़ पाएगी? क्या गिग वर्कर्स को श्रमिक माना जाएगा? क्या एल्गोरिथम जवाबदेह होंगे? क्या डिजिटल प्लेटफार्म्स पर काम करने वालों को सामाजिक सुरक्षा मिलेगी? क्या यूनियनों का कोई नया रूप विकसित होगा? अगर ऐसा नहीं हुआ तो तकनीक और पूंजी का यह गठजोड़ समाज के भीतर असमानता को और विस्फोटक बना देगा।

इतिहास गवाह है, जब भी असमानता एक सीमा पार करती है, समाज के भीतर दबा हुआ गुस्सा अंततः फूटता है। इसलिए सवाल सिर्फ श्रमिकों का नहीं है, सवाल लोकतंत्र, सामाजिक स्थिरता और इंसानी गरिमा का भी है और शायद इसलिए आज फिर ‘हेमार्किट अफेयर’ की याद जरूरी हो जाती है क्योंकि इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि कोई भी व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं रहती। संघर्ष के तरीके बदलते हैं, दुश्मन के चेहरे बदलते हैं लेकिन श्रम और सम्मान की लड़ाई कभी खत्म नहीं होती।

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