आज से 41 साल पहले देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ‘गंगा एक्शन प्लान’ के नाम से मोक्षदायिनी गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की योजना बनाई थी। तब से लेकर 2014 तक इसी नाम से चली इस योजना में 29 साल के दौरान कुल 575 परियोजनाएं शुरू की गई, जिसके सापेक्ष में महज 51 परियोजनाएं ही पूरी हो पाईं। इसके बाद 2014 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा की पवित्रता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम की शुरुआत की। इन दोनों ही योजनाओं में अरबों रुपए गंगा को साफ कराने के नाम पर पानी की तरह बहा दिए गए। बावजूद इसके गंगा मैली की मैली ही रही। इसका खुलासा 10 मार्च 2026 को उत्तराखण्ड विधानसभा में पेश की गई सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। जिसमें राज्य सरकार और कार्यदायी संस्थाओं की गम्भीर खामियां सामने आई हैं। इस रिपोर्ट में गंगा सफाई अभियान के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को सामने लाया गया है। ‘दि संडे पोस्ट’ ने सीएजी ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर सबसे पहले अंक 43 में ‘सवालों के घेरे में मिशन गंगा’ नामक शीर्षक से समाचार प्रस्तुत किया। इसके बाद अंक 46 में ‘राम तेरी गंगा मैली की मैली’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित हुआ। पेश है इसका अगला भाग
वर्ष 2023 का जनवरी महीना था जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की एक हेडलाइन सुर्खियों में रही थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ‘अब गंगा इतनी स्वच्छ हो गई है कि विदेशी राजनयिक इसमें स्नान कर रहे हैं और डॉल्फिन फिर से दिखाई देने लगी है लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। वर्ष 2026 में उत्तराखण्ड में नमामि गंगे मिशन का दूसरा चरण आरम्भ होना है लेकिन सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में पहले ही चरण पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अरबों रुपए खर्च करने के बावजूद आज भी गंगा मैली की मैली ही रही। ऐसे में दूसरे चरण से गंगा नदी को कितना स्वच्छ और निर्मल किया जाएगा यह सवाल अब हर किसी के मन में उठ रहा है। लगभग चार दशक से जिस गंगा नदी को स्वच्छ करने के दावे सरकारें करती रही हैं, उसका पवित्र जल अब पीने योग्य भी नहीं रह गया है। उत्तराखण्ड से निकलने वाली गंगा अपने ही मायके से प्रदूषित होकर बहने को मजबूर हो चली है।
गंगा जल की गुणवत्ता और पवित्रता भी संदेह के घेरे में
मान्यता है कि लम्बे समय तक भी गंगाजल न तो खराब होता है और न ही उसमें कीड़े पड़ते हंै लेकिन आज सच्चाई बिल्कुल इसके विपरीत है। मानकों के अनुसार ए श्रेणी का जल पारम्परिक उपचार के बगैर लेकिन कीटाणु शोधन के बाद पीने योग्य माना जाता है। बी श्रेणी का जल सिर्फ बाहरी उपयोग जैसे स्नान आदि के लिए योग्य माना जाता है। सी श्रेणी का जल पारम्परिक उपचार और कीटाणु शोधन के बाद पीने योग्य माना जाता है तो डी श्रेणी का जल वन्य जीव और मतस्य पालन आदि के लिए तथा ई श्रेणी का जल, सिंचाई, औद्योगिक तथा नियत्रित अपशिष्ठ निस्तारण के लिए उपयोग में किया जाता है। सीएजी ने गंगा नदी के जल की गुणवत्ता और स्वच्छता के मापदंडों के आधार पर जल को पीने योग्यता जानने के लिए आठ स्थानों बिष्णु प्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रूद्रप्रयाग, देवप्रयाग, उत्तरकाशी, ऋषिकेश, लक्कड़घाट तथा हरिद्वार (हरकी पैड़ी) से नमूने एकत्र किए।
सीएजी ने उक्त आठ स्थानों से प्राप्त परिणामों के बाद गंगा जल और उसकी गुणवत्ता पर अनेक खामियों को उजागर किया है। सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण में राष्ट्रीय हरित अभिकरण यानी एनजीटी और भारत सरकार के मानकों का पालन तक नहीं किया गया जिससे देवप्रयाग में गंगा जल की गुणवत्ता ए श्रेणी की है। इसके बाद ऋषिकेश में गंगा जल की गुणवत्ता बी श्रेणी पाई गई। यहां सिर्फ कोविड के समय वर्ष 2020-21 में गुणवत्ता ए श्रेणी रही है जबकि कोविड काल के दौरान हरिद्वार में लगातार गंगा जल की गुणवत्ता बी श्रेणी की ही रही है। इसी तरह विष्णु प्रयाग से लेकर देवप्रयाग तक गंगा जल की गुणवत्ता ए श्रेणी की रही जो कि पीने योग्य मानी जाती है लेकिन हरिद्वार में आकर वही जल पीने योग्य नहीं रहा। एक तरफ ‘नमामि गंगे’ के नाम पर गंगा जल को स्वच्छ करने के दावे किए जाते रहे तो वहीं दूसरी ओर गुणवत्ता का स्तर गिरता रहा।
अक्टूबर 2014 से लेकर अक्टूबर 2023 तक देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच 93 किलोमीटर तक गंगा नदी में काॅलीफार्म 32 गुना तक बढ़ा है।
कोलीफॉर्म बैक्टीरिया (जीवाणुओं) का एक समूह होता है जो पानी में गंदगी के मिल जाने का संकेत होता है।
उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गम्भीर नाकामी सीएजी की रिपोर्ट प्रदेश में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यशैली और उनकी प्रयोगशाला की खामियों पर जो रिपोर्ट दी गई है उसमें लिखा है कि इसकी प्रयोगशाला राष्ट्रीय परीक्षण और अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्र्यापन बोर्ड से मान्यता तक प्राप्त नहीं कर पाई। हालांकि 2023 में उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मान्यता के लिए आवेदन कर औपचारिकता जरूर पूर्ण की लेकिन सवाल यह है कि उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मान्यता न होने के कारण गंगा जल की गुणवत्ता को किन मानकों पर परीक्षण करता रहा है?
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा करते हुए कहा हैै कि बोर्ड ने अपनी प्रयोगशालाओं के संचालन के लिए पांच वर्ष में महज 5 करोड़ 55 लाख ही खर्च किए हैं। उत्तराखण्ड प्रदूषण बोर्ड स्वीकृत धनराशि का सिर्फ 34 प्रतिशत ही खर्च कर पाया। उत्तराखण्ड प्रदूषण बोर्ड द्वारा किए गए परीक्षणों को जब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के परीक्षण परिणामों से मिलाया गया तो भारी अंतर मिलने की बात सामने आई है।
सवालों के घेरे में वानिकीकरण योजना
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की डीपीआर के अनुसार वर्ष 2016से 2021 तक की योजना अवधि के समय उत्तराखण्ड में 54855-43 हेक्टेयर भूमि पर वृक्षारोपण के लिए 885 करोड़ 91 लाख के खर्च से योजना बनाई गई जिससे वानिकीकरण एवं पर्यावरण सुधार किया जा सके। इसमें प्राकृतिक परिदृश्य आच्छादित क्षेत्र, कृषि परिदृश्य आच्छादित और शहरी परिदृश्य आच्छादित तथा संरक्षित आच्छादित परिदृश्य क्षेत्र रखे गए लेकिन प्रत्येक वर्ष की कार्ययोजना को महज 16 प्रतिशत तक ही सीमित कर दिया गया। कुल मिलाकर देखा जाए तो वानिकीकरण के लिए पांच वर्ष में 885 करोड़ 91 लाख की बजाय सिर्फ 169 करोड़ 13 लाख का अनुमोदन
प्रस्तावित किया गया जिसके सापेक्ष में महज 144 करोड़ 27 लाख ही खर्च किए गए। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया है कि कैम्पा योजना के तहत वृक्षारोपण किया गया जबकि यह डीपीआर सिर्फ गंगा नदी पुनरुद्धार की योजना के लिए थी।
ऐसे हुई ‘नमामि गंगे’ की शुरुआत
भारत सरकार ने नमामि गंगे को एक ‘वैज्ञानिक कार्यक्रम’ बताया है जो दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक को साफ करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करता है। यह कार्यक्रम गंगा नदी बेसिन प्रबंधन योजना का हिस्सा है। बताया गया कि इसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईटी कानपुर) के नेतृत्व में सात विश्वविद्यालयों के एक संघ द्वारा तैयार किया गया है। इस योजना का उद्देश्य गंगा के पानी को पीने योग्य न सही, कम से कम स्नान के योग्य बनाना है।
मोदी सरकार के दावे और हकीकत
वर्ष 2014: मोदी सरकार ने शुरू किया ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम
उद्देश्य: गंगा को प्रदूषण मुक्त करना और पुनर्जीवित करना। साथ ही सरकार ने शुरुआत में 20,000 करोड़ का बजट तय किया। तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दावा था कि ‘‘समग्र योजना से गंगा की सफाई और बहाव दोनों सुधारे जाएंगे।’’
वर्ष 2015-2017: सरकार ने कहा कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाए जाएंगे। घाटों का विकास होगा और औद्योगिक प्रदूषण रोका जाएगा।
वर्ष 2018: मोदी सरकार ने रखा लक्ष्य, 70-80 प्रतिशत गंगा की होगी सफाई।
वर्ष 2019 में दावा: मार्च तक गंगा 70-80 प्रतिशत हो जाएगी साफ।
वर्ष 2019-20: लगभग पूरी सफाई का दावा। उसी समय आगे का लक्ष्य भी रखा गया कि मार्च 2020 तक गंगा 100 प्रतिशत तक हो जाएगी साफ।
वर्ष 2021-23: उपलब्धियों पर दिया गया जोर। सरकार ने कहा कि ‘‘गंगा सफाई कार्यक्रम को यूएन ने भी सराहा।’’ इसे ‘टाॅप इकोसिस्टम रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट’ में शामिल किया गया।
वर्ष 2024-25: प्रगति के किए गए इस तरह दावे। 500 प्रोजेक्ट हुए मंजूर जिनमें से 300 प्रोजेक्ट पूरे।
वर्ष 2025-26: 2025 तक सरकारी दावों की स्थिति यह है कि 513 प्रोजेक्ट मंजूर हुए जिनमें से 344 पूरे हो चुके हैं।
बात अपनी-अपनी
परियोजना में 26 श्मशान घाटों का निर्माण किया गया है। निर्मित श्मशान घाटों का उपयोग करने के लिए जिला गंगा समिति के माध्यम से जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मासिक तौर पर एसटीपी से शोधित जल, मां गंगा और उसकी सहायक नदियों की स्वच्छता, जल की गुणवत्ता के मानकों की नियमित जांच और निगरानी करता है। जल में घुलित ऑक्सीजन, बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड और टोटल कोलीफार्म आदि का आकलन किया जाता है। 2014 में हरिद्वार में जल की गुणवत्ता डी श्रेणी की थी जो 2015 में सी श्रेणी की हो गई। 2016-25 तक हरिद्वार में जल की गुणवत्ता बी श्रेणी की पाई गई है। यह उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नियमित मासिक जांच पर पाया गया है। तब से लेकर लगातार गंगा जल की गुणवत्ता में बहुत सुधार हुआ है। अभी तक उत्तराखण्ड में गंगा नदी में गिरने वाले 170 प्रदूषित नालों की पहचान की गई है जिसमें 155 नालों को सफलतापूर्वक टैप कर लिया गया है। शेष 15 नालों को निर्माणाधीन 49 प्वांइट 122 एलएमडी क्षमता के 11 एसटीपी शोधन हेतु टैप किए जाने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। कुल 13 जनपदों में जिला गंगा समिति, स्थानीय नदियों और स्वच्छता को डिस्ट्रिक गंगा प्लान तैयार किया जा रहा है। प्रथम चरण में अभी 8 जनपदों में प्लान तैयार हो गए हैं जिन पर कार्यवाही गतिमान है। नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत वर्तमान में गंगा की आठ सहायक नदियों पर भी योजनाएं गतिमान हैं। वानिकीकरण योजना नमामि गंगे परियोजना में वन विभाग को एक विंग बनाया गया है। इसलिए वानिकीकरण के मामले में वन विभाग ही बता पाएगा।
रोहित मीणा, निदेशक नमामि गंगे परियोजना उत्तराखण्ड