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असम में पूरी होगी कांग्रेस की मुराद?

इसी साल अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को केरल के साथ-साथ असम से भी बड़ी उम्मीदें हैं। कांग्रेस का मानना है कि 10 साल की सत्ता ने भाजपा के खिलाफ एंटी-इनकम्बेंसी पैदा कर दी है और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की भड़काऊ व विभाजनकारी राजनीति से जनता ऊब चुकी है। हालांकि पिछले दो चुनावों में हुए तीखे ध्रुवीकरण के कारण कांग्रेस के सामने चुनौती अब भी बनी हुई है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सचमुच ऐसा है? क्या असम में कांग्रेस की मुराद पूरी होगी? कांग्रेस का तर्क है कि संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) को लेकर असम में असंतोष है। आशंका है कि इससे बांग्लाभाषी आबादी बढ़ेगी और असमिया भाषा व संस्कृति कमजोर होगी। इसी को आधार बनाकर कांग्रेस ने असमिया अस्मिता को अपनी रणनीति का केंद्र बनाया है। मुख्यमंत्री पद के दावेदार गौरव गोगोई भी भाषा और संस्कृति के सवाल को लगातार उठा रहे हैं। इस बार कांग्रेस ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से बचने के लिए बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट से दूरी बनाई है। इसके बजाय उसने स्थानीय और जातीय प्रभाव वाली पार्टियों के साथ ‘असोम सम्मिलितो मोर्चा’ बनाया है, जिसमें वाम दलों के अलावा रायजोर दल और असम जातीयता परिषद शामिल हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए और कांग्रेस-नेतृत्व वाले महाजोट के वोट शेयर में अंतर एक फीसदी से भी कम था, हालांकि सीटों में बड़ा अंतर दिखा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दोनों दलों का वोट प्रतिशत लगभग बराबर रहा। कांग्रेस को भरोसा है कि यदि ध्रुवीकरण सीमित रहा और स्थानीय अस्मिता का मुद्दा हावी हुआ तो मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है। दूसरी ओर भाजपा घुसपैठ और सांप्रदायिक मुद्दों को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाए हुए है। यही कारण है कि इस बार असम में उसकी राह आसान नहीं मानी जा रही और यह सवाल अहम बना हुआ है कि क्या असम में कांग्रेस की मुराद पूरी होगी।

राज्यसभा जाएंगे भूपेश बघेल?

छत्तीसगढ़ से राज्यसभा की कुल पांच सीटों में से दो सीटें 9 अप्रैल को खाली होंगी। इन सीटों पर पहले बाहरी नेताओं को भेजे जाने के कारण अब स्थानीय नेताओं को मौका देने की मांग उठ रही है। इसी पृष्ठभूमि में
भूपेश बघेल के नाम की चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस हाईकमान उन्हें राज्यसभा भेजने पर विचार कर रहा है। इस चर्चा को बल इसलिए भी मिल रहा है क्योंकि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने भूपेश बघेल को अग्रिम बधाई तक दे डाली है। जायसवाल ने कहा कि दोनों सीटें पहले बाहरी लोगों को दी गई थीं, भूपेश के राज्यसभा जाने से कोई दिक्कत नहीं है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब अप्रैल में छत्तीसगढ़ से राज्यसभा चुनाव होने वाले हैं। इस बयान के बाद यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल राजनीति में उतरने जा रहे हैं। चैतन्य हाल ही में कथित शराब घोटाले में ईडी और ईओडब्ल्यू के मामलों में जमानत पर रिहा हुए हैं। बघेल ने इसे राजनीतिक साजिश बताते हुए कहा कि ‘‘यह सत्य की जीत है और पहले मेरे बेटे चैतन्य को कोई नहीं जानता था लेकिन अब उसे सब जानने लगे हैं।’’ भूपेश बघेल के इस बयान के बाद से ही अटकलें हैं कि वे स्वयं राज्यसभा जा रहे हैं और उनके बेटे चैतन्य प्रदेश की राजनीति करेंगे।
 
कांग्रेस-डीएमके में बढ़ेगी दरार!
 
तमिलनाडु में इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की अगुवाई वाली सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और उसकी सहयोगी कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर तनाव खुलकर सामने आ गया है। डीएमके ने 234 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को केवल 32 सीटों पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया है जिससे कांग्रेस नेतृत्व और कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ गई है। कांग्रेस का दावा है कि उसके आंतरिक सर्वे के अनुसार पार्टी कम से कम 40 सीटों पर मजबूत स्थिति में है। बातचीत के बाद संख्या 38 तक लाने की कोशिश भी हुई लेकिन डीएमके इससे आगे बढ़ने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि कांग्रेस अब वैकल्पिक राजनीतिक रास्तों की तलाश में जुट गई है जिसने मुख्यमंत्री स्टालिन की चिंता बढ़ा दी है। तमिलनाडु कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगावेत्री कझगम (टीवीके) के साथ सम्भावित गठबंधन की सम्भावना तलाशने में जुटे हैं। यह कदम डीएमके पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस सांसद माणिक्कम टैगोर ने खुलकर कहा है कि पार्टी केवल सीटों तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि सरकार बनने की स्थिति में सत्ता में हिस्सेदारी भी चाहती है। उनके इस बयान को कांग्रेस के बदले हुए तेवर और चुनाव से पहले रणनीतिक बदलाव का संकेत माना जा रहा है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस की नाराजगी, सत्ता में हिस्सेदारी की मांग और टीवीके के साथ संभावित गठबंधन ने तमिलनाडु की राजनीति को चुनाव से पहले और जटिल बना दिया है।
 
कब होगा नीतीश मंत्रिमंडल का विस्तार?

बिहार राजनीति में यह अक्सर देखा गया है कि खरमास समाप्त होते ही बड़े राजनीतिक फैसलों की गति तेज हो जाती है। ऐसे में इस बार भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खरमास के बाद अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर सकते हैं। इन अटकलों को उस समय और बल मिला जब एनडीए के वरिष्ठ नेता इशारों-इशारों में मंत्रिमंडल विस्तार की पुष्टि करने लगे हैं। हालांकि अभी तक आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लगभग तय माना जा रहा है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले ही यह दावा कर चुके हैं कि आने वाले कुछ वर्षों में वे बिहार को विकसित राज्य बनाने की दिशा में तेजी से काम करेंगे। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वह अपने मंत्रिमंडल और सहयोगी दलों के साथ लगातार मंथन कर रहे हैं। फिलहाल नीतीश मंत्रिमंडल में 27 मंत्री शामिल हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत अभी 9 मंत्री पद खाली हैं। इन्हीं खाली पदों को भरने की तैयारी अब अंतिम चरण में मानी जा रही है। सूत्रों के अनुसार 14 जनवरी को खरमास समाप्त होने के बाद जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार सम्भव है। इस विस्तार में जनता दल के कोटे से 6 और भाजपा के कोटे से 3 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है। हालांकि जेडीयू अपने सभी कोटे के पद तुरंत नहीं भरने जा रही है। खबर है कि पार्टी एक या दो मंत्री पद खाली रख सकती है ताकि भविष्य में सम्भावित राजनीतिक समीकरणों के अनुसार उन्हें भरा जा सके। जेडीयू इस विस्तार में अपने कुछ पुराने चेहरों को झटका भी दे सकती है और साथ ही पार्टी की नजर विपक्षी दलों के कुछ विधायकों पर भी बताई जा रही है जिन्हें भविष्य में एनडीए में शामिल कर मंत्रिमंडल में जगह दी जा सकती है। वहीं भाजपा भी अपने कोटे के तीन मंत्री पदों में से दो पर तत्काल नियुक्ति कर सकती है जबकि एक पद रणनीतिक कारणों से खाली रखा जा सकता है। जातीय समीकरण के लिहाज से भाजपा अति पिछड़ा वर्ग, राजपूत समाज के साथ-साथ वैश्य या कुशवाहा समाज से किसी चेहरे को मंत्री बना सकती है। दूसरी ओर जेडीयू कुशवाहा, दलित, धानुक और सवर्ण वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश में है।

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