इंसाफ जालिमों की हिमायत में जाएगा
ये हाल है तो कौन अदालत में जाएगा
लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में
यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है
सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है!’
जो आज साहिब-ए-मसनद हैं, कल नहीं होंगे
किराएदार हैं, जाती मकान थोड़ी है
-राहत इंदौरी
एक तरफ 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद मामले से जुड़े कुछ अन्य सह-आरोपियों को जमानत दे दी, दूसरी ओर उमर खालिद और एक अन्य आरोपी को राहत नहीं मिली। यानी अदालत यह स्वीकार कर रही है कि एक ही मामले में सभी की भूमिका समान नहीं है, फिर भी उमर खालिद जैसे नाम सालों से जेल में बंद हैं। न कोई सजा हुई, न ट्रायल पूरा हुआ लेकिन आजादी अब भी दूर है। दूसरी तरफ ठीक इसी बीच बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में दोषसिद्ध करार दिया जा चुका गुरमीत राम रहीम एक बार फिर पैरोल पर जेल से बाहर आ गया। यही वह क्षण है जहां देश की पूरी व्यवस्था पर सवाल नहीं बल्कि सीधा आक्षेप खड़ा होता है।
यह विरोधाभास किसी एक फैसले या एक दिन की घटना तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक संरचना का परिणाम है जहां न्यायिक सिद्धांत, प्रशासनिक विवेक और राजनीतिक यथार्थ आपस में उलझ गए हैं। संविधान यह मानता है कि जब तक दोष सिद्ध न हो व्यक्ति निर्दोष है। इसी सिद्धांत से ‘बेल नियम है, जेल अपवाद’ की अवधारणा निकलती है। लेकिन व्यवहार में यही सिद्धांत सबसे ज्यादा टूटता दिखाई देता है, खासतौर पर उन मामलों में जहां आरोपी का नाम सत्ता और असहमति की राजनीति से जुड़ा हो।
राम रहीम का मामला इस दोहरेपन का सबसे तीखा प्रतीक है। 2017 में सीबीआई की विशेष अदालत ने उसे दो साध्वियों के साथ बलात्कार का दोषी ठहराते हुए 20 साल की सजा सुनाई थी। यह फैसला तब इसलिए ऐतिहासिक माना गया क्योंकि पहली बार इतने बड़े धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव वाले किसी स्वयंभू गुरु को अदालत ने कठोर दंड दिया। फैसले के तुरंत बाद हरियाणा और पंजाब में हिंसा भड़क उठी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार दर्जनों लोगों की मौत हुई, अरबों रुपए की सार्वजनिक सम्पत्ति नष्ट हुई। उस समय यह उम्मीद की गई थी कि यह फैसला समाज को स्पष्ट संदेश देगा कि आस्था की आड़ में अपराध करने वाला चाहे कितना भी ताकवर क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है। लेकिन सजा के बाद जो घटनाक्रम सामने आया उसने उस संदेश को लगातार कमजोर किया।
वर्ष 2017 से अब तक राम रहीम को बार-बार पैरोल और फर्लो दी गई। 5 जनवरी को मिली 40 दिन की ताजा पैरोल उसकी पंद्रहवीं अस्थायी रिहाई है। अगर कुल दिनों की गणना की जाए तो वह सजा के आठ वर्षों में सैकड़ों दिन जेल से बाहर बिता चुका है। हर बार प्रशासन का तर्क यही रहा कि यह कानून के तहत है, कैदी का आचरण अच्छा है या मानवीय आधार मौजूद हैं। लेकिन सवाल यह नहीं है कि पैरोल कानूनन सम्भव है या नहीं, सवाल यह है कि क्या बार-बार की पैरोल सजा को एक औपचारिकता में नहीं बदल देती? इसका कितना
खतरनाक संदेश समाज को जाता है?
पैरोल का उद्देश्य कैदी के पुनर्वास और मानवीय जरूरतों को पूरा करना होता है। लेकिन जब यह बार-बार और खास मौकों पर दी जाए तो यह न्याय के निवारक प्रभाव को कमजोर करती है। खासकर तब जब अपराध बलात्कार जैसा जघन्य हो और पीड़ित वर्षों तक न्याय के लिए संघर्ष कर चुके हों। पीड़ितों के लिए यह स्थिति दोहरी पीड़ा बन जाती है, पहले अपराध की यातना, फिर अपराधी की बार-बार सार्वजनिक मौजूदगी।
राम रहीम को बार-बार पैरोल मिलने के पीछे एक बड़ा और असुविधाजनक सच यह भी है कि उसके पास ‘डेरा सच्चा सौदा’ के रूप में एक विशाल और संगठित वोट बैंक है। यह डेरा सिर्फ धार्मिक संस्था नहीं बल्कि लाखों अनुयायियों वाला एक ऐसा संगठन है जिसकी राजनीतिक उपयोगिता को लगभग सभी दल समय-समय पर समझते और स्वीकार करते रहे हैं। अलग-अलग चुनावों में यह देखा गया है कि डेरा किस तरह संकेत देता है और उसके अनुयायी किस दिशा में वोट करते हैं। यही वजह है कि बार-बार यह सवाल उठते रहे हैं कि क्या राम रहीम की पैरोल का समय-निर्धारण वास्तव में संयोग मात्र है?
लगभग हर बार यह संयोग सामने आया है कि जब-जब हरियाणा, पंजाब, राजस्थान या दिल्ली जैसे उन इलाकों में चुनाव नजदीक आते हैं जहां डेरा का प्रभाव माना जाता है, उसी दौरान राम रहीम को पैरोल मिल जाती है। पैरोल के समय वह सिरसा स्थित अपने डेरा मुख्यालय में ही रहता है जहां से अनुयायियों तक संदेश पहुंचता है। यह संदेश भले धार्मिक भाषा में दिया जाता है लेकिन उसका असर सीधा राजनीतिक होता है। इस स्थिति में न्याय केवल न्याय नहीं रह जाता बल्कि वह सत्ता-संतुलन का हिस्सा बनता दिखाई देता है। यहां एक प्रश्न और उठता है कि गरीब-गुरबा या अल्पसंख्यकों के यहां ‘त्वरित न्याय’ के नाम पर बुलडोजर संस्कृति के पोषक राम-रहीम सरीखे के साम्राज्य पर यही नीति क्यों नहीं अपनाते?
यह समझना जरूरी है कि राम रहीम कोई अकेला या अपवाद स्वरूप मामला नहीं है। भारत के न्यायिक इतिहास में ऐसे कई हाई-प्रोफाइल उदाहरण मौजूद हैं जहां सजा पाए प्रभावशाली लोगों को ‘अच्छे आचरण’, ‘मानवीय आधार’ या सजा-समीक्षा बोर्ड की सिफारिशों के आधार पर राहत दी गई। सबसे चर्चित उदाहरण मनु शर्मा का है जो जेसिका लाल हत्याकांड में दोषी ठहराया गया था।
वर्ष 1999 में दिल्ली के एक बार में जेसिका लाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यह मामला लम्बे समय तक न्याय व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बना रहा। गवाहों के पलटने, रसूख और राजनीतिक दबाव के कारण पहले आरोपी बरी हो गया। बाद में मीडिया और जनदबाव के चलते मामला दोबारा खुला और अंततः मनु शर्मा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उस समय इसे न्याय की बड़ी जीत माना गया लेकिन बाद के वर्षों में मनु शर्मा को जेल में ‘अच्छे आचरण’ के आधार पर कई बार पैरोल मिली। अंततः दिल्ली सजा समीक्षा बोर्ड की सिफारिश पर उसकी सजा माफ कर दी गई और उसे जेल से रिहा कर दिया गया।
कानून की दृष्टि से यह प्रक्रिया वैध हो सकती है लेकिन सामाजिक और नैतिक स्तर पर इसने गम्भीर सवाल खड़े किए। जिन लोगों ने जेसिका लाल के लिए न्याय की लड़ाई लड़ी थी, उनके लिए यह अनुभव कड़वा था। संदेश यही गया कि रसूख और पृष्ठभूमि सजा के बाद भी राहत का रास्ता खोल सकती है। यह वही संदेश है जो आज राम रहीम की बार-बार पैरोल के जरिए और मजबूत होता दिख रहा है।
इसी तरह स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम बापू के मामलों में भी दोषसिद्धि के बावजूद समय-समय पर राहत मिलती रही है। आसाराम को नाबालिग से बलात्कार जैसे गम्भीर अपराध में सजा सुनाई गई थी लेकिन स्वास्थ्य और चिकित्सा आधारों पर उसे अस्थायी राहत दी गई। यहां भी वही सवाल उठता है कि क्या यही सहानुभूति और मानवीय दृष्टिकोण सामान्य कैदियों के लिए भी अपनाया जाता है या यह सुविधा केवल प्रभावशाली नामों तक सीमित है?
इन उदाहरणों को अगर एक साथ रखा जाए तो एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है। यह पैटर्न बताता है कि भारतीय जेल और न्याय व्यवस्था में ‘सजा’ एक समान अनुभव नहीं है। किसी के लिए जेल अंतिम दंड है, किसी के लिए वह एक अस्थायी पड़ाव। यह फर्क अपराध की गम्भीरता से कम और अपराधी की सामाजिक-राजनीतिक हैसियत से ज्यादा तय होता दिखाई देता है।
अब इसी तस्वीर के दूसरे सिरे को देखिए। उमर खालिद और उनके जैसे कई लोग, जिन पर अभी तक कोई सजा नहीं हुई है, जिनका ट्रायल तक अधूरा है, वे वर्षों से जेल में हैं। 5 जनवरी को जब सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले के कुछ अन्य आरोपियों को जमानत दी तो उम्मीद जगी कि अब उमर खालिद को भी राहत मिलेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नतीजा यह है कि एक ही केस में कुछ लोग बाहर हैं और कुछ अब भी अंदर। यह स्थिति ‘प्री-ट्रायल पनिशमेंट’ यानी मुकदमे से पहले सजा की बहस को और तीखा बनाती है।
भारतीय संविधान किसी व्यक्ति को दोष सिद्ध होने से पहले सजा देने की अनुमति नहीं देता। फिर भी व्यवहार में लम्बी हिरासत खुद में सजा बन जाती है। सवाल यह नहीं कि आरोप गम्भीर हैं या नहीं? सवाल यह है कि क्या आरोप मात्र किसी की आजादी छीनने के लिए पर्याप्त हैं? अगर आरोप ही पर्याप्त हैं तो फिर दोषसिद्ध अपराधियों को बार-बार राहत क्यों?
यही फर्क मुझ सरीखों को भीतर तक झकझोरता है। एक तरफ बिना सजा के जेल, दूसरी ओर सजा के बावजूद आजादी। एक तरफ विचार, असहमति और छात्र राजनीति से जुड़े लोग, दूसरी ओर अपराध, हिंसा और आस्था की आड़ में खड़ा किया गया सत्ता-तंत्र। अगर न्याय सच में सबके लिए बराबर है तो फिर यह बराबरी केवल कुछ मामलों में ही क्यों दिखाई देती है?
राम रहीम के रेप केस की पृष्ठभूमि अपने आप में भयावह है। पीड़ित साध्वियों ने वर्षों तक धमकी, भय और सामाजिक दबाव के कारण चुप्पी साधे रखी। डेरा के भीतर एक ऐसी बंद और अनुशासित व्यवस्था थी जहां गुरु का आदेश अंतिम सत्य माना जाता था। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा था कि यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं बल्कि आस्था और सत्ता के दुरुपयोग का मामला है। ऐसे मामलों में सजा का उद्देश्य केवल अपराधी को कैद करना नहीं, समाज को यह भरोसा दिलाना होता है कि ताकतवर होने से कोई बच नहीं सकता लेकिन बार-बार की पैरोल उस भरोसे को तोड़ देती है।
आज का सवाल बिल्कुल सीधा है। 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ आरोपियों को जमानत दी लेकिन उमर खालिद और एक अन्य को नहीं। वे दोषसिद्ध नहीं हैं, फिर भी जेल में हैं। दूसरी तरफ राम रहीम, मनु शर्मा और आसाराम जैसे दोषसिद्ध लोग पैरोल या सजा माफी के जरिए बाहर आते रहे हैं। यह अंतर अब किसी कानूनी बारीकी का सवाल नहीं रह गया है। यह न्याय व्यवस्था की साख का सवाल बन चुका है।
जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, तब तक यह धारणा और गहरी होती जाएगी कि भारत में कानून का तराजू सबके लिए एक-सा नहीं है। कहीं विचार और असहमति को अपराध मानकर जेल दी जा रही है और कहीं अपराध को प्रभाव, पहचान और वोट बैंक के तराजू में तौलकर नरमी दिखाई जा रही है। यही वह बिंदु है जहां न्याय व्यवस्था पर सबसे तीखा सवाल खड़ा होता है कि क्या हमारे यहां जेल और जमानत का फैसला सच में केवल कानून करता है? या फिर सियासत और रसूख तय करते हैं कि कौन अंदर रहेगा और कौन बार-बार बाहर निकलता रहेगा।
