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अलग होंगी कांग्रेस-आरजेडी की राहें?

राहुल गांधी और तेजस्वी याादव

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद महागठबंधन खासकर कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के रिश्तों में आई तल्खी अब खुलकर सामने आने लगी है। चुनाव से पहले शुरू हुई आपसी खींचतान चुनाव के दौरान बनी रही और हार के बाद आरोप-प्रत्यारोप में तब्दील हो गई है। मौजूदा हालात को देखते हुए राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या चुनाव से पहले ही बिगड़ने लगे थे रिश्ते? क्या चुनाव नतीजों ने बढ़ाई दरार? सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या बिहार में कांग्रेस और आरजेडी अब अलग-अलग राजनीतिक राह पकड़ने की तैयारी में हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कांग्रेस वाकई आरजेडी से अलग होकर चलती है तो उसे बिहार में संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा वहीं आरजेडी के लिए भी बिना कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता बनाए रखना आसान नहीं होगा। फिलहाल कांग्रेस और आरजेडी के बीच गठबंधन औपचारिक रूप से कायम है लेकिन अंदरूनी हालात बता रहे हैं कि भरोसे की नींव कमजोर हो चुकी है। आने वाले दिनों में यदि दोनों दलों ने आत्ममंथन कर साझा रणनीति नहीं बनाई तो बिहार की राजनीति में महागठबंधन की राहें अलग होना तय है।

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव से पहले ही कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर तीखा विवाद देखने को मिला था। कांग्रेस जहां 70 सीटों की मांग कर रही थी वहीं आरजेडी 40 से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं था। लम्बी खींचतान के बाद 60 सीटों पर समझौता हुआ जरूर लेकिन यह समझौता दोनों दलों के बीच भरोसे की कमी को दूर नहीं कर सका। मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर भी दोनों दलों में असमंजस की स्थिति बनी रही। कांग्रेस ने अंत समय तक तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया जिससे आरजेडी में नाराजगी बढ़ी। हालात इतने बिगड़ गए कि महागठबंधन को टूटने से बचाने के लिए राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को हस्तक्षेप करना पड़ा। उनके प्रयासों के बाद ही तेजस्वी यादव को महागठबंधन का चेहरा घोषित किया गया।

चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस और आरजेडी के बीच तनाव और गहरा गया। कांग्रेस ने 60 सीटों पर चुनाव लड़कर मात्र 6 सीटों पर जीत दर्ज की जबकि आरजेडी 142 सीटों पर चुनाव लड़कर 25 सीटें ही हासिल कर सकी। दोनों दलों का प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा लेकिन हार की जिम्मेदारी लेने के बजाय एक-दूसरे पर आरोप लगाए जाने लगे।

यही नहीं चुनाव में 11 सीटों पर ‘दोस्ताना संघर्ष’ भी हुआ जिसे कांग्रेस ने हार की बड़ी वजह बताया। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इससे मतदाताओं में नकारात्मक संदेश गया और महागठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े हुए। कांग्रेस विधायक दल के पूर्व नेता डाॅ. शकील अहमद खां और चुनाव मैदान में उतरे कांग्रेस के सभी सात प्रत्याशियों ने खुलकर आरजेडी के साथ गठबंधन पर सवाल उठाए हैं। डाॅ. शकील अहमद खां का कहना है कि महागठबंधन में आरजेडी के साथ बने रहना कांग्रेस के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। अब यह गठबंधन केवल औपचारिक रह गया है। आरजेडी के साथ रहने से कांग्रेस न तो चुनावी लाभ हासिल कर पा रही है और न ही संगठन को मजबूत कर पा रही है। उलटे कांग्रेस अपना राजनीतिक जमीन लगातार खो रही है।

कांग्रेस प्रत्याशियों ने भी पार्टी नेतृत्व को साफ शब्दों में बता दिया है कि आरजेडी के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए आत्मघाती हो सकता है। उनका मानना है कि अगर कांग्रेस को बिहार में दोबारा मजबूत होना है तो उसे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनानी होगी। कांग्रेस के आरोपों पर आरजेडी ने भी तीखा पलटवार किया है। पार्टी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि कांग्रेस आरजेडी के जनाधार के सहारे ही छह सीटें जीत पाई है। आरजेडी के पास आज भी प्रदेशव्यापी जनाधार है जबकि कांग्रेस का अपना कोई मजबूत वोट बैंक नहीं बचा है। मृत्युंजय तिवारी का दावा है कि अगर कांग्रेस को कम सीटें दी जाती तो आरजेडी का प्रदर्शन और बेहतर हो सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कांग्रेस अलग रास्ते पर चलना चाहती है तो आरजेडी उसे रोकने नहीं जा रही। इन तीखे बयानों और आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह साफ होता जा रहा है कि बिहार में महागठबंधन, खासकर कांग्रेस और आरजेडी के रिश्ते गम्भीर संकट में हैं। दोनों दल एक-दूसरे को कमजोर मानते हुए अपने-अपने राजनीतिक हित साधने की कोशिश में लगे हैं।

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