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अस्मिता या राजनीति का नया औजार?

जीवन सिंह टनवाल
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का बुनियादी ज्ञान अनिवार्य करने का फैसला लिया है। इस फैसले ने सियासी और सामाजिक बहस को दो ध्रुवों में बांट दिया है। जहां सत्तारूढ़ पक्ष इसे स्थानीय भाषा और संस्कृति के संरक्षण का जरूरी कदम बता रहा है, वहीं विपक्षी दल इसे क्षेत्रवाद से जोड़कर आलोचना कर रहे हैं। सरकार का तर्क है कि यह कोई नया नियम नहीं बल्कि पहले से मौजूद प्रावधान को अब सख्ती से लागू किया जा रहा है। एक पक्ष इसे मराठी मानुस और स्थानीय संस्कृति को मजबूत करने वाला कदम मान रहा है तो दूसरा पक्ष इसे बाहरी राज्यों से आए कामगारों के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला फैसला बता रहा है।

सेलिब्रिटी ज्योतिषी जय मदान ने आस्था और समावेश की बात की वहीं शिवसेना प्रवक्ता शाइना एनसी ने मराठी भाषा को महाराष्ट्र की अस्मिता से जोड़ते हुए सख्त रुख अपनाया। उन्होंने मुम्बई की आत्मा को मुम्बा देवी से जोड़ते हुए कहा कि यह शहर आस्था और आशीर्वाद से चलता है। जो भी यहां अपने सपनों को साकार करने आता है उसे इस शहर की परम्पराओं और भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। स्थानीय भाषा का सम्मान जरूरी है लेकिन इसे टकराव का कारण नहीं बनना चाहिए। आज के दौर में एआई और ट्रांसलेटर टूल्स के जरिए भाषाई दूरी आसानी से खत्म की जा सकती है।
दूसरी ओर शिवसेना प्रवक्ता शाइना एनसी ने मराठी भाषा को सिर्फ संचार का माध्यम नहीं बल्कि पहचान और गर्व का प्रतीक बताया। उन्होंने साफ कहा कि महाराष्ट्र में रहने और काम करने वालों को मराठी आनी चाहिए खासकर ऑटो और टैक्सी चालकों को ताकि आम लोगों को सुविधा हो। साथ ही उन्होंने इशारों-इशारों में उन राजनीतिक ताकतों पर निशाना साधा जो भाषा के नाम पर दादागिरी या अवसरवाद की राजनीति करते हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या यह भाषा और पहचान की रक्षा का प्रयास है या फिर राजनीति का नया हथियार है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मुम्बई जैसी महानगरी जो अपनी विविधता और खुलेपन के लिए जानी जाती है वहां इस तरह के फैसले संतुलन की परीक्षा लेते हैं। एक तरफ नियम और स्थानीय गौरव है तो दूसरी तरफ रोजी-रोटी और समावेशिता का सवाल है। यह मुद्दा अब भाषा, पहचान और रोजगार के बीच संतुलन की परीक्षा बन गया है। एक तरफ मराठी भाषा के सम्मान की बात है तो दूसरी तरफ उन हजारों चालकों की चिंता भी है जो दूसरे राज्यों से आकर यहां आजीविका कमा रहे हैं। यह मुद्दा सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है बल्कि सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर भी जोर -शोर से गूंज रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस किसी ठोस समाधान तक पहुंचती है या फिर सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाती है।
गौरतलब है कि नए प्रावधान के अनुसार ड्राइवरों के लिए मराठी बोलना, समझना और पढ़ना जरूरी होगा। जिन चालकों को पढ़ना-लिखना नहीं आता उनके लिए कम से कम मराठी बोलना अनिवार्य रखा गया है। इस नियम की निगरानी राज्यभर के 59 आरटीओ केंद्रों पर की जाएगी जहां चालकों की भाषा दक्षता की जांच होगी। शुरुआत में नियमों का पालन न करने पर लाइसेंस या परमिट रद्द करने की चेतावनी दी गई थी लेकिन अब संकेत मिल रहे हैं कि सरकार इसे पूरी सख्ती से लागू करने के बजाय व्यावहारिक रुख अपनाएगी। यानी दंडात्मक कार्रवाई के बजाय सुधार और समय देने पर जोर रहेगा।
ऑटो यूनियनों की मांग को ध्यान में रखते हुए सरकार मराठी सीखने के लिए 3 महीने से लेकर 1 साल तक की
अतिरिक्त समय-सीमा दे सकती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाहर से आए कामगारों को अचानक परेशानी न हो और वे धीरे-धीरे नई शर्तों को पूरा कर सकें। फिलहाल सरकार के नरम रुख से यह साफ है कि टकराव से बचते हुए समाधान की कोशिश की जा रही है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह नियम जमीनी स्तर पर कैसे लागू होता है और क्या यह विवाद थमता है या और गहराता है।

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