Uttarakhand

फिर विवादों में विचार, विरोध और वैकल्पिक राजनीति की प्रयोगशाला

  • जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जिसकी पहचान स्थापनाकाल से ही बहस, असहमति और सत्ता से टकराव की परम्परा के रूप में रही है और जहां छात्र-शिक्षक आंदोलनों ने बार-बार राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित किया है, वही परिसर एक बार फिर विवाद के केंद्र में है। यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को चैथा पत्र लिखकर कुलपति शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित को हटाने की मांग की है। कुलपति द्वारा 5 प्रतिशत वार्ड कोटा को लागू करने का निर्णय इस टकराव का केंद्र बिंदु है। शिक्षकों ने इसे सामाजिक न्याय की मूल नीति के खिलाफ बताया है। निर्णय प्रक्रिया, पारदर्शिता और कुलपति की बेटी की कथित भूमिका को लेकर आरोपों ने विवाद को और गहरा कर दिया है जिससे विश्वविद्यालय एक बार फिर अपने पुराने स्वरूप, संघर्ष और टकराव के केंद्र में दिखाई दे रहा है

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में एक विशिष्ट स्थान रखता है। 1969 में स्थापित यह विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं बल्कि वैचारिक बहस, राजनीतिक सक्रियता और सामाजिक न्याय के प्रश्नों का एक जीवंत मंच रहा है। इसकी स्थापना का उद्देश्य भी पारम्परिक विश्वविद्यालयों से अलग था यहां शिक्षा को आलोचनात्मक सोच, बहस और लोकतांत्रिक भागीदारी के साथ जोड़ा गया। समय के साथ जेएनयू ने एक ऐसी पहचान बनाई जहां असहमति को न केवल स्वीकार किया गया बल्कि उसे संस्थागत स्वरूप भी मिला। शुरुआती वर्षों से ही जेएनयू का अकादमिक ढांचा और वातावरण इसे अन्य विश्वविद्यालयों से अलग करता रहा। यहां इंटरडिसिप्लिनरी अध्ययन, छात्र-शिक्षक संवाद और खुले राजनीतिक विमर्श को प्रोत्साहन मिला। यही कारण है कि यह धीरे-धीरे एक ऐसे परिसर में बदल गया जहां छात्र राजनीति केवल चुनाव तक सीमित नहीं रही बल्कि सामाजिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर निरंतर बहस का हिस्सा बनी। इस प्रक्रिया में विश्वविद्यालय ने एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित की जिसमें सवाल उठाना, असहमति दर्ज करना और सत्ता से टकराना सामान्य बात बन गई।

जेएनयू का इतिहास बताता है कि यहां संघर्ष कोई अपवाद नहीं बल्कि परम्परा है। 1983 का छात्र आंदोलन, जो अनिवार्य उपस्थिति के खिलाफ था, विश्वविद्यालय की पहली बड़ी राजनीतिक टकराव की घटना माना जाता है। इसके बाद 2016 का देशद्रोह विवाद, जिसमें छात्र नेताओं की गिरफ्तारी हुई, ने जेएनयू को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। 2019-20 में फीस वृद्धि के खिलाफ आंदोलन और उसके दौरान हुई हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि जेएनयू में प्रशासन और छात्र समुदाय के बीच टकराव लगातार बना रहता है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में आज का वर्तमान विवाद भी देखा जाना चाहिए। हाल के दिनों में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच टकराव तीव्र हो गया है। शिक्षक संगठन ने विश्वविद्यालय की विजिटर द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर कुलपति शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित को हटाने की मांग की है। यह कोई पहली बार नहीं है, इससे पहले भी कई पत्र लिखे जा चुके हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि विवाद लम्बे समय से चल रहा है और अब गम्भीर रूप ले चुका है।
इस ताजा टकराव की मुख्य वजह विश्वविद्यालय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल द्वारा कर्मचारियों के बच्चों के लिए 5 प्रतिशत ‘वार्ड कोटा’ शुरू करने का प्रस्ताव है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे विश्वविद्यालय की मूल प्रवेश नीति के खिलाफ बताया है। जेएनयू की पहचान लम्बे समय तक उसके ‘डेप्रिवेशन पाॅइंट्स सिस्टम’ से जुड़ी रही है जिसके तहत सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तबकों, महिलाओं और पिछड़े क्षेत्रों के छात्रों को अतिरिक्त वेटेज दिया जाता था। शिक्षक संगठन का तर्क है कि नया कोटा इस व्यवस्था को कमजोर करता है और विश्वविद्यालय के सामाजिक न्याय के उद्देश्य को पीछे धकेलता है।
विवाद यहीं तक सीमित नहीं है। शिक्षकों ने यह भी आरोप लगाया है कि निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और एग्जीक्यूटिव काउंसिल की बैठकों में पर्याप्त चर्चा नहीं होती। इस विश्वविद्यालय की उस परम्परा पर सवाल उठते हैं जिसमें निर्णय हमेशा बहस और सहमति के आधार पर लिए जाते रहे हैं। इसके अतिरिक्त, कुलपति पर यह आरोप भी लगाया गया है कि उनकी बेटी बिना किसी औपचारिक नियुक्ति के शैक्षणिक गतिविधियों में शामिल हो रही हैं, जिसे शिक्षक संगठन ने संस्थागत प्रक्रियाओं का उल्लंघन बताया है। इस तरह के आरोपों ने विश्वविद्यालय के भीतर विश्वास के संकट को और गहरा कर दिया है। शिक्षक संगठन ने महिला प्रतिनिधित्व में आई गिरावट को भी एक गम्भीर मुद्दे के रूप में उठाया है। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में प्रवेश नीतियों में हुए बदलावों, विशेषकर पीएचडी में डेप्रिवेशन पॉइंट्स को हटाने के कारण महिलाओं और वंचित वर्गों की भागीदारी कम हुई है। इस संदर्भ में ‘वार्ड कोटा’ का प्रस्ताव एक व्यापक नीति परिवर्तन का हिस्सा प्रतीत होता है, जो  जेएनयू के मूल चरित्र को बदलने की दिशा में देखा जा रहा है।
जेएनयू का यह वर्तमान टकराव उसके ऐतिहासिक चरित्र से अलग नहीं है। यह विश्वविद्यालय हमेशा से सत्ता और प्रशासनिक निर्णयों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखता आया है। यहां की छात्र और शिक्षक राजनीति ने बार-बार यह दिखाया है कि विश्वविद्यालय केवल ज्ञान का केंद्र नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतना का भी केंद्र है। इसी कारण यहां से निकले कई छात्र बाद में राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय हुए, चाहे वह प्रकाश करात हों, कन्हैया कुमार हों, उमर खालिद या शेहला रशीद। दिलचस्प बात यह है कि यहां से अलग-अलग विचारधाराओं के लोग निकले, जो यह दिखाता है कि जेएनयू किसी एक राजनीतिक धारा तक सीमित नहीं है बल्कि बहस की एक खुली जमीन है। वर्तमान में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा पाई हैं।
समय के साथ जेएनयू को लेकर धारणाएं भी बदली हैं। एक ओर इसे ‘वामपंथी गढ़’ या ‘विरोध का केंद्र’ कहा जाता है तो वहीं दूसरी ओर इसे लोकतंत्र की जीवंत प्रयोगशाला के रूप में भी देखा जाता रहा है। आलोचक इसे अराजकता का केंद्र बताते हैं जबकि समर्थक इसे लोकतांत्रिक असहमति का जरूरी मंच मानते हैं। यही द्वंद्व जेएनयू की पहचान का हिस्सा बन चुका है। आज जब जेएनयूटीए और विश्वविद्यालय प्रशासन आमने- सामने हैं तो यह केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं है बल्कि उस व्यापक संघर्ष का हिस्सा है जिसमें विश्वविद्यालय के चरित्र, उसकी नीतियों और उसकी वैचारिक दिशा को लेकर टकराव हो रहा है। जेएनयू का इतिहास बताता है कि यहां संघर्ष कभी समाप्त नहीं होते, वे केवल नए रूप में सामने आते हैं। अंततः जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को समझने के लिए उसे केवल एक शैक्षणिक संस्थान के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह एक ऐसा स्थान है जहां विचार लगातार टकराते हैं, नीतियां चुनौती दी जाती हैं और लोकतंत्र अपने सबसे जीवंत रूप में दिखाई देता है। शायद यही कारण है कि हर दौर में, किसी न किसी रूप में, जेएनयू और सत्ता के बीच यह संवाद या टकराव जारी रहता है।

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