ईरान में हालात तेजी से बेकाबू हो रहे हैं। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक प्रदर्शन और सरकारी कार्रवाई के बीच 5,000 से अधिक मौतों की पुष्टि होने का दावा किया गया है। यह जानकारी एक ईरानी अधिकारी के हवाले से सामने आई है। रिपोर्ट में कहा गया कि मृतकों में करीब 500 सुरक्षाकर्मी भी शामिल हैं। उधर मानवाधिकार समूहों के आंकड़े अलग हैं। कुछ खबरों ने मौतों का आंकड़ा 3,308 बताया है और दावा किया है कि 24,000 से अधिक गिरफ्तारियां हुई हैं। ईरान सरकार इस उथल-पुथल के पीछे ‘विदेशी हाथ’ का आरोप लगा रही है


ईरान इस वक्त अपने सबसे बड़े आंतरिक राजनीतिक संकट में फंसा हुआ है और हालात हर घंटे ज्यादा गम्भीर होते जा रहे हैं। देशभर में प्रदर्शन, झड़पें, सुरक्षा बलों की तैनाती, इंटरनेट पर नियंत्रण और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों की खबरों के बीच अब जो आंकड़ा सामने आया है, उसने पूरी दुनिया को हिला दिया है। ‘रिउटर्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक एक ईरानी अधिकारी ने दावा किया है कि प्रदर्शनों और उसके बाद हुई कार्रवाई में अब तक कम से कम 5,000 से ज्यादा मौतें ‘सत्यापित’ की जा चुकी हैं। इस अधिकारी के मुताबिक इस संख्या में लगभग 500 सुरक्षा कर्मियों की मौत भी शामिल बताई गई है।

यह दावा ऐसे समय में आया है जब ईरान में सूचनाओं का प्रवाह बहुत सीमित है, स्वतंत्र पत्रकारिता पर निगरानी का आरोप है और कई इलाकों में इंटरनेट ब्लैकआउट, पाबंदियों की बात कही जा रही है। यही वजह है कि मौतों के आंकड़ों को लेकर कई दावे सामने आ रहे हैं और हर दावा अपने-आप में एक नया राजनीतिक संदेश बनता जा रहा है। एक तरफ ईरानी शासन कह रहा है कि मौतों के पीछे ‘आतंकवादी’ और ‘सशस्त्र दंगाई’ जिम्मेदार हैं, दूसरी ओर मानवाधिकार समूह और विपक्षी धड़े सरकारी बलों पर सीधे गोलीबारी और अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगा रहे हैं।

घटनाक्रम की सबसे अहम बात यह है कि जो विरोध पहले एक असंतोष की तरह दिख रहा था, वह अब एक ‘राष्ट्रीय संकट’ में बदल चुका है। रिपोर्टों के मुताबिक इस उथल-पुथल के केंद्र में कई शहर रहे हैं लेकिन कुर्द बहुल उत्तर-पश्चिमी इलाकों में स्थिति विशेष तौर पर ज्यादा उग्र बताई गई है। ‘रिउटर्स’ की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि विरोध- प्रदर्शन और टकराव कुर्द क्षेत्रों में ज्यादा तीव्र रहे।

इसी बीच यह भी सामने आया है कि सरकार विरोध को दबाने के लिए सिर्फ पुलिस या सामान्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है। शासन की रणनीति अब ‘संदेश’ देने वाली सख्ती में बदलती दिख रही है। देश के भीतर कई जगहों से फास्ट-ट्रायल, भारी गिरफ्तारियां, कड़ी सजा, और विरोध के प्रतीकों को तोड़ने की खबरें लगातार आ रही हैं। इस बीच ‘एसोसिएटेड प्रेस’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि हजारों मौतों और सख्त कार्रवाई के बीच हैकर्स ने ईरान के स्टेट टीवी को भी बाधित किया जिसके दौरान प्रसारण में ऐसे संदेश दिखाए गए जिनमें निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी के समर्थन की बातें थीं और सुरक्षा बलों से नागरिकों पर कार्रवाई न करने की अपील भी दिखाई गई।

यह घटना बताती है कि संघर्ष सिर्फ सड़कों पर नहीं है। यह एक तरह से ईरान में ‘सूचना युद्ध’ बन चुका है, सरकार नियंत्रण बनाए रखना चाहती है जबकि विरोधी पक्ष सरकार की सूचना-दीवार को तोड़कर बाहर तक संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। ‘एसोसिएटेड प्रेस’ की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ईरान सरकार इंटरनेट पर पाबंदियां बढ़ा रही है, जिससे स्वतंत्र पुष्टि और रिपोर्टिंग बेहद मुश्किल हो रही है।

इस बीच मौतों का जो आंकड़ा ‘रिउटर्स’ के हवाले से आया है, उसी के समानांतर मानवाधिकार संगठनों ने भी भारी संख्या में हताहत होने के दावे किए हैं लेकिन उनके आंकड़े अलग हैं। ‘रिउटर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार   3,308 मौतों की संख्या बताई गई है जबकि अन्य मामलों की जांच अभी चल रही है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि गिरफ्तार लोगों की संख्या 24,000 से अधिक पहुंच चुकी है।

यहां हालात इसलिए और संवेदनशील हो जाते हैं क्योंकि ईरान में गिरफ्तारियों और हिरासत को लेकर लम्बे समय से आरोप लगते रहे हैं। अब ताजा घटनाक्रम में ‘दि गार्डियन’ ने एक रिपोर्ट में दावा किया है कि हिरासत में गम्भीर दुर्व्यवहार के आरोप सामने आ रहे हैं और एक 16 वर्षीय किशोरी सहित कुछ लोगों के साथ यौन हिंसा का भी दावा किया गया है। रिपोर्ट कहती है कि संचार ब्लैकआउट के कारण हिरासत में बंद लोगों की स्थिति पर अपडेट बेहद सीमित हैं।

ईरान सरकार, दूसरी ओर, इस पूरी स्थिति को ‘विदेशी साजिश’ के दायरे में रखकर देख रही है। ‘अल जजीरा’ के मुताबिक ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने भी कहा है कि ‘हजारों मौतों’ के पीछे अमेरिका और इजरायल से जुड़े तत्वों की भूमिका है और उन्होंने इन प्रदर्शनों को ‘विदेश समर्थित’ करार दिया है।
यहीं से इस संकट का दूसरा चेहरा सामने आता है, अंतरराष्ट्रीय दबाव। पश्चिमी देशों में ईरान की कार्रवाई को लेकर नाराजगी और राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज होती जा रही है। ईरान के विदेश मंत्री को वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम से कपेपदअपजम किया गया और म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन से भी ईरानी अधिकारियों को रोके जाने की रिपोर्ट सामने आई है। यानी कार्रवाई के कारण ईरान की अंतरराष्ट्रीय छवि पर चोट पड़ती दिख रही है।

अब सवाल यह है कि ‘अमेरिकी दबाव’ का असर किस रूप में सामने आ रहा है। यह दबाव केवल बयानबाजी तक नहीं है। रिपोर्ट में क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों के संकेत भी दिए गए हैं। ‘एसोसिएटेड प्रेस’ ने यह भी रिपोर्ट किया है कि अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर ‘यू एस एस अब्राहम लिंकन’ स्ट्राइक ग्रुप के मूवमेंट की खबरें सामने आई हैं जो इस व्यापक तनाव की पृष्ठभूमि को और भारी बना देती हैं। उधर ईरान के भीतर सरकार जिस तरह से विरोध को ‘सुरक्षा खतरे’ की तरह ट्रीट कर रही है, उससे स्थिति और विस्फोटक हो रही है क्योंकि जब किसी देश में जन-आंदोलन को सीधे ‘दुश्मन का ओपरेशन’ घोषित कर दिया जाता है, तब राज्य का जवाब भी सामान्य नहीं रहता, वह फिर सैन्य शैली का हो जाता है। यही इस संकट की सबसे बड़ी खासियत बनती जा रही है।

खासतौर पर कुर्द इलाकों में हालात ज्यादा खतरनाक बताए जा रहे हैं। ‘रिउटर्स’ के मुताबिक ईरान का दावा है कि झड़पों में ‘आतंकवादी’ और ‘सशस्त्र दंगाई’ शामिल हैं और विदेशी समूहों के इजरायल संग कनेक्शन की बात भी कही गई है। इसी बीच मौतों के आंकड़े को लेकर ‘नैरेटिव वाॅर’ खुलकर सामने आ गया है यानी कौन मारा, किसने मारा, कितने मारे गए और किसके आंकड़े सच हैं। ‘अल जजीरा’ ने इसे साफ तौर पर ‘नैरेटिव वाॅर’ के रूप में बताया है और लिखा है कि सरकार विरोध की जिम्मेदारी बाहरी ताकतों पर डाल रही है, जबकि विपक्ष राज्य बलों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि कई जगहों पर सरकारी कार्रवाई के बाद शवों के अंतिम संस्कार, शोक सभाओं और परिवारों पर दबाव जैसी खबरें भी सामने आती रही हैं। ‘दि गार्डियन’ की रिपोर्ट में भी संकेत मिलता है कि कई परिवारों को सार्वजनिक रूप से शोक जताने से रोके जाने के आरोप हैं और हिरासत में मौतें/दुर्व्यवहार के मामलों की जांच की मांग उठ रही है।

कुल मिलाकर ईरान आज एक ऐसे संकट में है जहां ‘सड़क’ और ‘सिस्टम’, दोनों आमने-सामने हैं। मौतों का आंकड़ा चाहे 3,000 के आस-पास हो या 5,000 से ऊपर, यह स्पष्ट है कि संकट का पैमाना बेहद बड़ा है। यह केवल एक आंदोलन नहीं है, यह देश के भीतर गहरी राजनीतिक-सामाजिक टूटन का संकेत है। सरकार के लिए यह ‘कंट्रोल’ का प्रश्न है और जनता के एक हिस्से के लिए यह ‘जिंदगी और अधिकार’ का प्रश्न बन गया है। अब सबसे बड़ा डर इस बात का है कि अगर सरकार ने विरोध को पूरी तरह कुचलने के लिए और कठोर रास्ता चुना जिसमें फांसी, तेज सजा और बड़े ऑपरेशन शामिल हों तो यह संकट और घातक हो सकता है। और अगर आंदोलन दब भी गया तो भी यह सवाल बना रहेगा कि 5,000 से अधिक मौतों के बाद ईरान में शांति लौटेगी? या केवल सन्नाटा बचेगा?

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