world

ईरान-अमेरिका समझौता पाकिस्तान की कूटनीतिक जीत, हाशिए पर भारत और बदलती विश्व व्यवस्था

अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चले आ रहे तनाव और युद्ध जैसी स्थिति को समाप्त करने वाले समझौते ने सिर्फ पश्चिम एशिया की राजनीति ही नहीं बदली बल्कि वैश्विक कूटनीति की नई तस्वीर भी सामने रख दी है। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान एक सक्रिय मध्यस्थ के रूप में उभरा है जिसकी भूमिका की सराहना कई देशों ने की जबकि भारत लगभग दर्शक की भूमिका में नजर आ रहा है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस क्षेत्र में भारत के बड़े आर्थिक और सामरिक हित जुड़े हैं, वहां उसकी भूमिका इतनी सीमित क्यों रही?

अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते को केवल एक शांति समझौते के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह 21वीं सदी की बदलती कूटनीतिक संरचना का प्रतीक है, जिसमें पारम्परिक शक्तियों के साथ-साथ क्षेत्रीय देशों की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। पिछले कई महीनों से पश्चिम एशिया युद्ध की आग में झुलस रहा था। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया था। वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका ने विश्व अर्थव्यवस्था को भी हिला दिया था। ऐसे समय में जब अधिकांश देश केवल बयान जारी कर रहे थे, पाकिस्तान और कतर ने पर्दे के पीछे मध्यस्थता की भूमिका निभाई। अंततः अमेरिका और ईरान एक ऐसे समझौते पर पहुंचे जिसके तहत युद्ध विराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना, परमाणु निरीक्षकों की वापसी और आगे की वार्ताओं का रास्ता तैयार हुआ।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस समझौते की घोषणा सबसे पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने की। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से दोनों पक्ष समझौते के अंतिम मसौदे पर सहमत हुए हैं और औपचारिक हस्ताक्षर की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। बाद में अमेरिका और ईरान दोनों पक्षों ने भी इस दिशा में प्रगति की पुष्टि की।

इस घटनाक्रम ने पाकिस्तान को अचानक वैश्विक कूटनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। वर्षों से आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद की छवि से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। पश्चिमी मीडिया से लेकर क्षेत्रीय विश्लेषकों तक ने माना कि पाकिस्तान ने अपनी भौगोलिक स्थिति और दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की क्षमता का प्रभावी उपयोग किया।

इटली की प्रधानमंत्री जाॅर्जिया मेलोनी द्वारा पाकिस्तान की मध्यस्थता की सार्वजनिक सराहना ने इस सफलता को और अधिक महत्व दे दिया। इटली की ओर से पाकिस्तान और कतर के प्रयासों को शांति स्थापना में महत्वपूर्ण बताया गया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने भी इस मान्यता को अपने देश की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताया।

यहीं से भारत को लेकर बहस शुरू होती है। आखिर वह भारत, जो स्वयं को ‘विश्वगुरु’, ‘वैश्विक दक्षिण की आवाज’ और ‘विश्वसनीय साझेदार’ के रूप में प्रस्तुत करता है, पश्चिम एशिया के इतने बड़े संकट में निर्णायक भूमिका निभाने में क्यों असफल रहा? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल एक भू-राजनीतिक क्षेत्र नहीं है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, लाखों प्रवासी भारतीयों का भविष्य, अरब देशों के साथ व्यापारिक सम्बंध और ईरान के साथ रणनीतिक हित सीधे तौर पर इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।

भारत ने इस पूरे संकट के दौरान अपेक्षाकृत संतुलित और सावधानी पूर्ण रुख अपनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समझौते का स्वागत करते हुए आशा व्यक्त की कि इससे क्षेत्र में शांति और नौवहन की स्वतंत्रता
सुनिश्चित होगी लेकिन यह स्वागत समझौते के बाद आया, समझौते को आकार देने की प्रक्रिया में भारत कहीं दिखाई नहीं दिया।

इसको समझने के लिए भारत की विदेश नीति के हालिया बदलावों को देखना होगा। पिछले एक दशक में भारत ने अमेरिका, इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपने सम्बंधों को काफी मजबूत किया है। दूसरी ओर ईरान के साथ सम्बंध अपेक्षाकृत कमजोर हुए हैं। चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं भी अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकीं। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत ने ईरानी तेल आयात लगभग समाप्त कर दिया। परिणामस्वरूप ईरान की नजर में भारत अब पहले जैसा स्वतंत्र और संतुलित साझेदार नहीं रह गया। इसके विपरीत पाकिस्तान ने एक अलग रणनीति अपनाई। उसने अमेरिका के साथ भी संवाद बनाए रखा, चीन के साथ भी निकटता बरकरार रखी और ईरान तथा खाड़ी देशों से सम्बंध कायम रखे। यही कारण रहा कि जब मध्यस्थ की तलाश हुई तो पाकिस्तान स्वीकार्य विकल्प के रूप में उभर सका।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कूटनीति केवल आर्थिक शक्ति या सैन्य ताकत का खेल नहीं होती। कई बार संवाद के खुले चैनल और विश्वास की पूंजी अधिक महत्वपूर्ण साबित होती है। पाकिस्तान के पास शायद भारत जैसी आर्थिक क्षमता नहीं है लेकिन इस विशेष मामले में उसके पास संवाद की वह क्षमता थी जो भारत के पास नहीं थी। हालांकि यह कहना भी अतिशयोक्ति होगी कि भारत की भूमिका पूरी तरह ‘जीरो’ रही। भारत लगातार क्षेत्रीय स्थिरता की बात करता रहा, विभिन्न पक्षों के साथ सम्पर्क बनाए रखता रहा और संघर्ष के विस्तार को रोकने के पक्ष में रहा लेकिन यह भी सच है कि भारत इस प्रक्रिया का निर्णायक खिलाड़ी नहीं बन पाया।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर इतिहास विजेताओं को याद रखता है, दर्शकों को नहीं। यह पूरा घटनाक्रम भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सबक भी है। यदि भारत वास्तव में वैश्विक शक्ति बनना चाहता है तो उसे केवल आर्थिक विकास और सैन्य शक्ति पर निर्भर नहीं रहना होगा। उसे संघर्षों के समाधान में सक्रिय भूमिका निभाने की क्षमता भी विकसित करनी होगी। आज की दुनिया में वह देश अधिक प्रभावशाली माना जाता है जो युद्ध रोक सके, न कि केवल युद्ध की स्थिति पर टिप्पणी करे।

पश्चिम एशिया में भारत की स्थिति जटिल है। एक ओर उसके इजराइल के साथ मजबूत संबंध हैं, दूसरी तरफ अरब देशों के साथ गहरे आर्थिक हित हैं। ईरान के साथ भी ऐतिहासिक और सामरिक रिश्ते हैं। ऐसे में भारत अक्सर संतुलन साधने की कोशिश करता है लेकिन अत्यधिक संतुलन कभी-कभी निष्क्रियता जैसा भी दिखाई देता है। इस संकट में यही हुआ। दूसरी ओर पाकिस्तान इस समझौते को अपनी कूटनीतिक सफलता के रूप में दुनिया के सामने पेश कर रहा है। उसकी कोशिश होगी कि इस उपलब्धि को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राजनीतिक पूंजी में बदला जाए।

आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह अवसर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उसकी वैश्विक छवि को सकारात्मक दिशा मिल सकती है। इस पूरे प्रकरण का एक बड़ा संदेश यह भी है कि विश्व व्यवस्था तेजी से बहुध्रुवीय हो रही है। अब केवल अमेरिका, रूस या चीन हीवैश्विक घटनाओं को प्रभावित नहीं कर रहे। क्षेत्रीय शक्तियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। कतर, तुर्की, सऊदी अरब और अब पाकिस्तान जैसे देश मध्यस्थता और संवाद के जरिए अपनी अंतरराष्ट्रीय हैसियत बढ़ाने में सफल हो रहे हैं। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी विशाल आर्थिक और सामरिक शक्ति को कूटनीतिक प्रभाव में कैसे बदलता है। यदि भारत भविष्य में ऐसे संकटों में अधिक सक्रिय भूमिका चाहता है तो उसे सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने, रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने और मध्यस्थता की क्षमता विकसित करने पर ध्यान देना होगा।

अमेरिका-ईरान समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इससे युद्ध का खतरा कम हुआ, तेल बाजारों में स्थिरता की उम्मीद जगी और होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने का रास्ता बना लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इस समझौते का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसने दिखा दिया कि आज की दुनिया में प्रभाव केवल शक्ति से नहीं बल्कि भरोसे और संवाद से भी बनता है।

भारत के लिए यह आत्ममंथन का क्षण है। क्या वह केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर संतुष्ट रहेगा या फिर वैश्विक संकटों के समाधान में भी अग्रणी भूमिका निभाना चाहेगा? अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता केवल पश्चिम एशिया की कहानी नहीं है। यह उस नई विश्व व्यवस्था की कहानी है जिसमें सक्रिय कूटनीति ही वास्तविक शक्ति का नया मानदंड बनती जा रही है और इस बार, कम से कम प्रतीकों के स्तर पर, सुर्खियां पाकिस्तान के हिस्से में गईं जबकि भारत पृष्ठभूमि में खड़ा दिखाई दिया। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है।

You may also like