वर्ष 2016 का ‘नारदा स्टिंग आॅपरेशन’ बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया था। स्टिंग में तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के कथित वीडियो सामने आए थे। भाजपा ने उस समय इन वीडियो को बंगाल में भ्रष्टाचार के सबसे बड़े प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया। स्टिंग ऑपरेशन में जिन प्रमुख नेताओं के नाम चर्चा में आए, उनमें सुवेंदु अधिकारी, मुकुल राॅय, सौगत रॉय, काकोली घोष दस्तीदार, प्रसून बनर्जी, सुल्तान अहमद, अपरूपा पोद्दार, फिरहाद हकीम, मदन मित्रा और सुभ्रत मुखर्जी जैसे नाम शामिल थे। भाजपा के नेताओं ने वर्षों तक इन मामलों को लेकर तृणमूल कांग्रेस पर हमला किया। चुनावी सभाओं में कहा गया कि बंगाल भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह तक ने शारदा और नारदा को तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार का प्रतीक बताया लेकिन राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यहीं से शुरू होता है। जब आरोपी ‘भ्रष्ट’ से ‘सम्मानित’ बन गए सुवेंदु अधिकारी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। जब तक वह तृणमूल कांग्रेस में थे, भाजपा उन्हें ममता सरकार की व्यवस्था का हिस्सा बताकर निशाना बनाती थी। नारदा प्रकरण में उनका नाम सार्वजनिक बहस का हिस्सा था लेकिन जैसे ही उन्होंने भाजपा का दामन थामा, वही नेता भाजपा के लिए बंगाल में परिवर्तन का चेहरा बन गए।
अंतरात्मा का महापलायन
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जो कुछ घट रहा है वह केवल तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक संकट नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के उस चेहरे को उजागर करता है जहां विचारधारा, नैतिकता और राजनीतिक प्रतिबद्धता अक्सर सत्ता, सुरक्षा और व्यक्तिगत भविष्य के आगे बौनी साबित हो जाती है। आज तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठ रही बगावत को कुछ लोग ‘वैचारिक विद्रोह’ बताने की कोशिश कर रहे हैं। जनता का एक बड़ा वर्ग इसे वैचारिक संघर्ष नहीं बल्कि राजनीतिक अवसरवाद के रूप में देख रहा है। कारण भी स्पष्ट है। कल तक जो नेता संसद से लेकर सड़क तक भाजपा को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते थे, नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर तीखे हमले करते थे और भाजपा को साम्प्रदायिक राजनीति का प्रतीक बताते थे वही नेता आज भाजपा और एनडीए के साथ खड़े होने में कोई संकोच नहीं कर रहे। सवाल यह नहीं है कि किसी नेता को दल बदलने का अधिकार है या नहीं। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी राजनीतिक राह चुनने का अधिकार है। असली सवाल यह है कि क्या विचारधारा इतनी सस्ती चीज है कि सत्ता का समीकरण बदलते ही उसे बदला जा सके? क्या राजनीतिक सिद्धांत केवल तब तक जीवित रहते हैं जब तक वे सत्ता और सुविधा के अनुकूल हों?
आज सुवेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री हैं और भाजपा की बंगाल राजनीति का सबसे शक्तिशाली चेहरा माने जाते हैं। यह वही नेता हैं जिनके खिलाफ कभी भाजपा तृणमूल कांग्रेस की कथित भ्रष्ट व्यवस्था का उदाहरण देकर हमला करती थी। यही कारण है कि राजनीतिक विरोधी बार-बार यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या भाजपा में शामिल होने के बाद किसी नेता का राजनीतिक चरित्र बदल जाता है या फिर राजनीतिक सुविधा के अनुसार उसके बारे में धारणा बदल दी जाती है? वास्तव में जनता को यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या सुवेंदु अधिकारी बदल गए थे या फिर राजनीतिक परिस्थितियों ने उनके लिए नया चरित्र प्रमाणपत्र जारी कर दिया? लेकिन दुर्भाग्य यह है कि लोकतंत्र में जनता अक्सर ऐसे प्रश्न पूछती नहीं है। कुछ समय बाद राजनीतिक स्मृतियां धुंधली कर दी जाती हैं, पुराने आरोप भुला दिए जाते हैं और नए राजनीतिक आख्यान गढ़ दिए जाते हैं। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक है। मुकुल राॅय का मामला भी कम दिलचस्प नहीं है। कभी तृणमूल कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकार रहे मुकुल राॅय भाजपा में गए तो उनका स्वागत ऐसे हुआ मानो भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई बड़ा योद्धा भाजपा में शामिल हो गया हो। बाद में वे वापस तृणमूल कांग्रेस में लौट गए। यह सब देखकर आम मतदाता के मन में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठना चाहिए कि आखिर सिद्धांत किसके पास हैं? जो कल भ्रष्टाचार के प्रतीक बताए जा रहे थे, वे आज व्यवस्था परिवर्तन के नायक कैसे बन गए? और जो कल लोकतंत्र के रक्षक बताए जा रहे थे, वे आज अवसरवादी कैसे घोषित किए जा रहे हैं? लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारत का एक बड़ा मतदाता वर्ग इन प्रश्नों को उठाने के बजाय धर्म, जाति, संप्रदाय, क्षेत्र, भावनात्मक नारों और राजनीतिक ध्रुवीकरण के जाल में उलझा रहता है। परिणामस्वरूप राजनीतिक दलों को भी यह विश्वास हो गया है कि जनता की स्मृति अल्पकालिक है और वह सिद्धांतों की तुलना में पहचान-आधारित राजनीति पर अधिक प्रतिक्रिया देती है।
आज के बागी नेताओं से सवाल
आज जो सांसद और नेता तृणमूल कांग्रेस से दूरी बना रहे हैं या एनडीए के साथ खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे भी कुछ प्रश्न पूछे जाने चाहिए। क्या भाजपा अचानक धर्मनिरपेक्ष हो गई? क्या भाजपा अचानक लोकतंत्र की सबसे बड़ी रक्षक बन गई? क्या वे सारे आरोप झूठे थे जो वर्षों तक संसद और मीडिया में लगाए जाते रहे? यदि भाजपा लोकतंत्र के लिए खतरा थी तो आज उसके साथ खड़े होने में अंतरात्मा क्यों नहीं कांप रही? और यदि भाजपा इतनी बुरी नहीं थी तो फिर वर्षों तक जनता को क्या बताया जा रहा था? इन दोनों में से एक बात अवश्य गलत है। या तो तब झूठ बोला गया था या फिर आज सुविधा के लिए सिद्धांत छोड़े जा रहे हैं। ममता बनर्जी भी सवालों से मुक्त नहीं यह भी सच है कि इस संकट के लिए केवल बागी नेताओं को दोषी ठहराकर बात समाप्त नहीं की जा सकती। ममता बनर्जी ने बंगाल में वामपंथी शासन को समाप्त कर एक नया राजनीतिक अध्याय लिखा लेकिन समय के साथ तृणमूल कांग्रेस में अत्यधिक केंद्रीकरण की शिकायतें बढ़ीं। सबसे अधिक आलोचना उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को लेकर हुई। पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह यह आरोप लगा कि संगठन में परिवार का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। कई वरिष्ठ नेताओं को लगा कि दशकों की उनकी राजनीतिक तपस्या की तुलना में परिवार के सदस्यों को अधिक महत्व दिया जा रहा है। यह असंतोष वास्तविक हो सकता है लेकिन सवाल यह है कि जो नेता आज परिवारवाद पर भाषण दे रहे हैं, क्या उन्होंने तब विरोध किया था जब वे मंत्री थे? जब वे सांसद थे? जब वे सत्ता का लाभ उठा रहे थे? यदि नहीं तो फिर आज उनकी नैतिकता अचानक क्यों जाग गई?
राजनीति या सुरक्षा कवच?
बंगाल की राजनीति को समझने वाले लाखों लोगों के मन में एक और सवाल उठना चाहिए कि क्या यह पूरा घटनाक्रम केवल राजनीतिक विचारधारा का मामला है? या फिर सत्ता परिवर्तन की सम्भावनाओं, जांच एजेंसियों के दबाव और राजनीतिक भविष्य की चिंताओं से भी इसका संबंध है? जनता यह देख रही है कि जिन नेताओं पर कभी भाजपा गम्भीर आरोप लगाती थी, वे भाजपा में आते ही स्वीकार्य हो जाते हैं। जो नेता भाजपा छोड़ देते हैं, वे अचानक राष्ट्रविरोधी, भ्रष्ट या अवसरवादी घोषित कर दिए जाते हैं। यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र में विश्वास को कमजोर करता है। संकट में ही चरित्र की पहचान होती है राजनीति में किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके अच्छे दिनों में नहीं बल्कि कठिन समय में होती है। जब सत्ता साथ हो, तब वफादारी दिखाना आसान होता है लेकिन जब राजनीतिक संकट आए और तब भी कोई व्यक्ति अपने साथियों और अपने राजनीतिक संघर्ष के साथ खड़ा रहे, तभी उसकी प्रतिबद्धता साबित होती है। आज बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर कौन अपने सिद्धांतों पर खड़ा है और कौन केवल अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने में लगा है।
ममता बनर्जी की गलतियां हैं। तृणमूल कांग्रेस में परिवारवाद के आरोप हैं। संगठन में केंद्रीकरण के प्रश्न हैं लेकिन यह सब उन नेताओं के अवसरवाद को सही नहीं ठहरा सकता जिन्होंने वर्षों तक उसी व्यवस्था का लाभ उठाया और संकट आते ही उससे दूरी बना ली। नारदा, शारदा और अन्य विवादों के समय जिन नेताओं को भाजपा भ्रष्टाचार का चेहरा बताती थी, उनमें से कुछ बाद में भाजपा के महत्वपूर्ण चेहरे बन गए। समस्या केवल अवसरवादी नेताओं की नहीं है। समस्या उस राजनीतिक संस्कृति की भी है जिसमें नेता यह मानकर चलते हैं कि जनता कुछ समय बाद सब भूल जाएगी। दुर्भाग्य से अधिकांश मामलों में उनका यह अनुमान गलत भी साबित नहीं होता। जब तक मतदाता दलों से वही प्रश्न पूछना शुरू नहीं करेगा जो वह उनके विरोधियों से पूछता है, तब तक अवसरवाद भारतीय राजनीति का सबसे सुरक्षित और सबसे लाभदायक व्यवसाय बना रहेगा। सत्ता बदल सकती है,दल बदल सकते हैं, नारे बदल सकते हैं लेकिन जनता सब याद रखती है या शायद उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जनता को सब याद रखना चाहिए पर वह अक्सर याद नहीं रखती। इतिहास फिर भी याद रखता है।