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उखड़ा खूंटा या रणनीतिक पलायन?

राज्यसभा के लिए नामांकन करते नीतीश कुमार
करीब ढाई दशक तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार का राज्यसभा की ओर जाना केवल एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं है। यह उस दौर के अंत का संकेत भी है जिसमें उन्होंने गठबंधन, वैचारिक लचीलेपन और सत्ता संतुलन की राजनीति के सहारे अपनी सत्ता बचाए रखी। सवाल है कि यह निर्णय उनका अपना है या बदलती राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें दिल्ली की ओर धकेल दिया है। लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति का अगला अध्याय अब बिना नीतीश के प्रभाव के नहीं लिखा जा सकेगा


बिहार की राजनीति में पिछले लगभग पच्चीस वर्षों से यदि किसी एक नेता का नाम सबसे स्थायी रूप से सत्ता के केंद्र में रहा है तो वह नीतीश कुमार का है लेकिन 5 मार्च 2026 को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने से यह संकेत दे दिया है कि बिहार की राजनीति का एक लम्बा अध्याय अब शायद अपने अंतिम पड़ाव पर है। यह वही नेता हैं जिन्होंने कभी कहा था कि वह बिहार में ‘खूंटा गाड़कर’ राजनीति करेंगे लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह खूंटा धीरे-धीरे उखड़ रहा है। बिहार की जनता को धन्यवाद देकर उनका दिल्ली की ओर बढ़ना केवल एक औपचारिक राजनीतिक कदम नहीं बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों की कहानी भी है।

नीतीश कुमार की राजनीति को समझने के लिए उनके पूरे राजनीतिक जीवन को देखना जरूरी है। उनकी शुरुआत 1970 के दशक के उस दौर से होती है जब देश में छात्र आंदोलन और समाजवादी राजनीति का उभार था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन ने जिस नई पीढ़ी को राजनीति में प्रवेश दिया, उसमें लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे नेता शामिल थे। यह वह दौर था जब राजनीति का मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार विरोध और सामाजिक न्याय था। इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि ने नीतीश कुमार को राजनीति में पहचान दी।

शुरुआती दौर में वे जनता परिवार की राजनीति से जुड़े रहे लेकिन बिहार की राजनीति में उस समय लालू प्रसाद यादव का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। लालू यादव ने सामाजिक न्याय की राजनीति के आधार पर एक मजबूत जनाधार बनाया और 1990 के दशक में बिहार की राजनीति लगभग पूरी तरह उनके इर्द-गिर्द घूमने लगी। इस दौर में नीतीश कुमार खुद को एक अलग राजनीतिक पहचान देने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने जाॅर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई और यह निर्णय उनके राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा मोड़ साबित हुआ।

समता पार्टी के जरिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया। उस समय भाजपा उत्तर भारत में विस्तार कर रही थी और उसे ऐसे क्षेत्रीय नेताओं की जरूरत थी जो स्थानीय सामाजिक समीकरणों को समझते हों। नीतीश कुमार इस भूमिका में बिल्कुल उपयुक्त साबित हुए। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उन्हें रेल मंत्री सहित कई महत्वपूर्ण मंत्रालय मिले। रेल मंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली की काफी चर्चा हुई और उन्होंने अपनी प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन किया। इससे उनकी छवि एक गम्भीर और सक्षम नेता के रूप में बनी।

बिहार की सत्ता तक उनका पहला पहुंचना वर्ष 2000 में हुआ जब उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि यह सरकार महज सात दिन ही चल सकी क्योंकि वह विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाए। उसी समय उन्होंने यह कहा था कि वह बिहार में खूंटा गाड़कर रहेंगे। यह कथन बाद के वर्षों में उनकी राजनीतिक यात्रा का प्रतीक बन गया।

असल में नीतीश कुमार का असली राजनीतिक दौर 2005 से शुरू होता है। उस समय बिहार लम्बे समय तक लालू-राबड़ी शासन के बाद बदलाव की तलाश में था। भाजपा के साथ गठबंधन कर उन्होंने चुनाव लड़ा और ‘सुशासन’ को मुख्य मुद्दा बनाया। जब उनकी सरकार बनी तो उन्होंने कानून व्यवस्था सुधारने, सड़कों के निर्माण और शिक्षा में सुधार जैसे कदम उठाए। पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देना भी उनके महत्वपूर्ण फैसलों में शामिल था। इन कदमों ने उन्हें बिहार में विकासवादी नेता की पहचान दी।

2010 का चुनाव उनकी राजनीति का स्वर्णकाल माना जाता है। भाजपा के साथ गठबंधन में उन्हें भारी बहुमत मिला और उस समय उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी। कुछ राजनीतिक विश्लेषक उस दौर में उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में सम्भावित प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में भी देखने लगे थे लेकिन इसी दौर में भाजपा के भीतर नरेंद्र मोदी का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ रहा था और यहीं से नीतीश कुमार और भाजपा के बीच तनाव की शुरुआत हुई।

2013 में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया तो नीतीश कुमार ने भाजपा से अपना गठबंधन तोड़ लिया। उन्होंने इसे वैचारिक निर्णय बताया और कहा कि उनकी राजनीति धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित है लेकिन इस फैसले के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई। 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू को करारी हार मिली और इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बिहार की राजनीति में एक अप्रत्याशित मोड़ आया। 2015 में उन्होंने अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद यादव के साथ हाथ मिला लिया और महागठबंधन बनाया। यह गठबंधन बेहद सफल रहा और भाजपा को बिहार में सत्ता से दूर रहना पड़ा लेकिन यह प्रयोग ज्यादा समय तक नहीं चला। 2017 में भ्रष्टाचार के आरोपों का हवाला देते हुए उन्होंने अचानक महागठबंधन छोड़ दिया और फिर भाजपा के साथ सरकार बना ली। यही वह क्षण था जब उनकी राजनीति को ‘पलटी’ की राजनीति कहा जाने लगा।

दरअसल नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि उन्होंने हर परिस्थिति में अपने लिए सत्ता का रास्ता खोज लिया। वह कभी भाजपा के साथ रहे, कभी उसके खिलाफ गए, कभी लालू यादव के साथ आए और फिर भाजपा के साथ लौट गए। इस राजनीतिक लचीलेपन ने उन्हें लम्बे समय तक सत्ता में बनाए रखा लेकिन साथ ही उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता पर सवाल भी उठाए।

2020 के विधानसभा चुनाव के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही। इस चुनाव में भाजपा सीटों के मामले में जदयू से बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसके बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन यह साफ दिखाई देने लगा था कि बिहार की राजनीति में शक्ति संतुलन बदल चुका है। भाजपा धीरे-धीरे अपने नेतृत्व को स्थापित करने की कोशिश कर रही थी और यह केवल समय का प्रश्न था कि बिहार में मुख्यमंत्री पद पर उसका दावा मजबूत हो।

इसी पृष्ठभूमि में अब नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का संकेत माना जा रहा है। यह सम्भव है कि भाजपा उन्हें सम्मानजनक तरीके से केंद्र की राजनीति में स्थान देना चाहती हो और बिहार में अपना नेतृत्व स्थापित करना चाहती हो। दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि यह निर्णय पूरी तरह स्वैच्छिक नहीं बल्कि राजनीतिक दबावों का परिणाम है।

नीतीश कुमार की सेहत को लेकर भी पिछले कुछ वर्षों में लगातार चर्चाएं होती रही हैं। सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रियता पहले जैसी नहीं रही और कई बार उनके नेतृत्व को लेकर भी सवाल उठे। जदयू के भीतर भी यह चर्चा रही कि पार्टी के भविष्य का नेतृत्व कौन करेगा। उनके पुत्र निशांत कुमार के राजनीति में आने की चर्चा कई बार हुई लेकिन अब तक वह सक्रिय राजनीति से दूर ही रहे हैं। अब नीतीश कुमार राज्यसभा पहुंच कर उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हो जाएंगे जिन्होंने बिहार विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा, चारों सदनों का प्रतिनिधित्व किया है। यह अपने आप में एक अनोखी राजनीतिक उपलब्धि होगी लेकिन इसके साथ ही यह भी सवाल उठेगा कि उनके जाने के बाद जदयू का भविष्य क्या होगा।

बिहार की राजनीति में उनका प्रभाव इतना गहरा रहा है कि उनके बिना जदयू की कल्पना करना भी मुश्किल लगता है। यदि पार्टी मजबूत नेतृत्व नहीं खोज पाती तो यह धीरे-धीरे भाजपा के भीतर समाहित भी हो सकती है। दूसरी ओर विपक्षी दलों के लिए भी यह एक अवसर हो सकता है क्योंकि बिहार की राजनीति में सत्ता का संतुलन बदल सकता है।

नीतीश कुमार की विरासत को लेकर मतभेद हमेशा रहेंगे। एक ओर उन्हें उस नेता के रूप में याद किया जाएगा जिसने बिहार में बुनियादी ढांचे के विकास और कानून व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। दूसरी ओर उनकी राजनीति को अवसरवाद और गठबंधन बदलने की राजनीति के रूप में भी देखा जाएगा लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने बिहार की राजनीति को लम्बे समय तक प्रभावित किया। उन्होंने लालू प्रसाद यादव के प्रभुत्व वाले दौर के बाद बिहार में एक वैकल्पिक राजनीतिक माॅडल खड़ा किया और लगभग ढाई दशकों तक सत्ता के केंद्र में बने रहे।

आज जब वह राज्यसभा की ओर बढ़ रहे हैं तो यह केवल एक नेता का पद परिवर्तन नहीं बल्कि बिहार की राजनीति में एक युग के सम्भावित अंत का संकेत है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह निर्णय उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है या बदलती परिस्थितियों का परिणाम लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति का अगला अध्याय अब बिना नीतीश कुमार के प्रभाव के नहीं लिखा जा सकेगा, चाहे वह सक्रिय सत्ता में हों या दिल्ली की राजनीति से राज्य की दिशा को प्रभावित करते हैं।

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