Uttarakhand

जहां पोस्टर थे कल तक, आज रील्स हैंप्रचार का बदला चेहरा

जहां कभी फिल्म की किस्मत पोस्टरों और टीवी विज्ञापनों से तय होती थी वहीं अब दर्शकों का एक ट्वीट, एक इंस्टाग्राम रील या एक यूट्यूब रिव्यू फिल्म को रातों-रात हिट बना सकता है। डिजिटल दौर में ‘माउथ पब्लिसिटी’ सिर्फ चर्चा नहीं, बल्कि बॉक्स ऑफिस का निर्णायक हथियार बन चुकी है।
 
बदलते समय का बदलता प्रचार

हिंदी सिनेमा में प्रचार का अर्थ लम्बे समय तक बड़े-बड़े होर्डिंग, अखबारों के फुल पेज विज्ञापन और टीवी चैनलों पर इंटरव्यू तक सीमित रहा। रिलीज से पहले महीनों तक चलने वाला प्रमोशनल अभियान ही किसी फिल्म की सफलता की बुनियाद माना जाता था लेकिन डिजिटल क्रांति ने इस सोच को उलट दिया है। अब प्रचार केवल निर्माता या पीआर एजेंसी के हाथ में नहीं है, वह सीधे दर्शकों के हाथ में आ चुका है। आज यदि किसी फिल्म को पहले शो के बाद सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल जाती है तो वह प्रतिक्रिया कुछ ही घंटों में हजारों पोस्ट और वीडियो के रूप में फैल जाती है। यही आधुनिक ‘माउथ पब्लिसिटी’ है, तेज, स्वाभाविक और प्रभावशाली।
 
सोशल मीडिया : नया सिनेमाघर

ट्विटर (एक्स), इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफाॅर्म अब वैकल्पिक मंच नहीं रहे बल्कि सिनेमा के समानांतर संवाद स्थल बन चुके हैं। एक दर्शक जब सिनेमाघर से बाहर निकलकर अपने अनुभव को साझा करता है तो वह अकेला दर्शक नहीं रह जाता, वह एक प्रभावक बन जाता है।

यूट्यूब पर फिल्म समीक्षकों के वीडियो लाखों बार देखे जाते हैं। इंस्टाग्राम पर 30 सेकंड की रील किसी फिल्म के एक भावुक दृश्य को वायरल कर सकती है। ट्विटर पर ट्रेंड होने वाला हैशटैग फिल्म के प्रति उत्सुकता या आलोचना दोनों को तीव्र कर देता है। इस तरह डिजिटल स्पेस ने प्रचार को लोकतांत्रिक बना दिया है।
 
सकारात्मक प्रतिक्रिया की शक्ति
 
हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि कुछ फिल्में पहले दिन औसत शुरुआत के बावजूद दूसरे और तीसरे दिन मजबूत कलेक्शन दर्ज करती हैं। इसकी वजह यही डिजिटल चर्चा होती है। उदाहरण के तौर पर 12जी थ्ंपस को शुरुआती दिनों में सीमित स्क्रीन मिलीं लेकिन दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रियाओं ने फिल्म को धीरे-धीरे लम्बी दौड़ का घोड़ा बना दिया। जब आम दर्शक अपने अनुभव को ईमानदारी से साझा करते हैं तो उसमें विज्ञापन जैसी कृत्रिमता नहीं होती। यही स्वाभाविकता दूसरे दर्शकों को प्रभावित करती है। किसी फिल्म के बारे में ‘जरूर देखिए’ जैसे शब्द अब प्रचार का सबसे प्रभावी वाक्य बन चुके हैं।
 
नकारात्मक ट्रेंड और उसका असर

‘माउथ पब्लिसिटी’ का यह नया युग केवल सकारात्मकता तक सीमित नहीं है। नकारात्मक प्रतिक्रिया भी उतनी ही तेजी से फैलती है। यदि दर्शकों को कहानी कमजोर लगती है या फिल्म अपेक्षा पर खरी नहीं उतरती तो आलोचना भी तुरंत वायरल हो जाती है। कई बार सोशल मीडिया पर उठी आलोचना फिल्म के शुरुआती कलेक्शन को प्रभावित कर देती है।

डिजिटल युग में दर्शक अधिक सजग और मुखर हो गए हैं। वे अपनी राय खुलकर रखते हैं और दूसरों की राय से प्रभावित भी होते हैं। इस कारण निर्माताओं के लिए अब केवल स्टार पावर पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं रह गया है।
 
मार्केटिंग रणनीति में बदलाव

फिल्म कम्पनियों ने भी इस बदलाव को समझ लिया है। अब प्रचार अभियान में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, डिजिटल प्रीमियर शो और ऑनलाइन इंटरैक्शन को प्राथमिकता दी जाती है। रिलीज से पहले ‘पेड रिव्यू’ और ‘अर्ली रिएक्शन’ का चलन भी बढ़ा है। हालांकि दर्शक अब प्रचार और वास्तविक प्रतिक्रिया के बीच फर्क पहचानने लगे हैं। इसलिए सच्ची ‘माउथ पब्लिसिटी’ वही मानी जाती है जो स्वतः उत्पन्न हो, न कि प्रायोजित हो। यही कारण है कि कंटेंट-ड्रिवेन फिल्में अपेक्षाकृत अधिक लाभान्वित होती हैं।
 
मल्टीप्लेक्स और डिजिटल संवाद

मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने भी ‘माउथ पब्लिसिटी’ को बल दिया है। शहरी दर्शक फिल्म देखकर तुरंत सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं। वहीं छोटे शहरों के दर्शक भी अब डिजिटल माध्यम से जुड़ चुके हैं। इस प्रकार फिल्म पर चर्चा केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहती बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फैल जाती है। डिजिटल संवाद ने दर्शक और निर्माता के बीच दूरी कम कर दी है। अब प्रतिक्रिया तत्काल मिलती है और उसी के आधार पर शो की संख्या बढ़ाई या घटाई जाती है।
 
कंटेंट की निर्णायक भूमिका

‘माउथ पब्लिसिटी’ का नया युग ­अंततः कहानी की ताकत को ही केंद्र में रखता है। यदि फिल्म में भावनात्मक गहराई, सामाजिक प्रासंगिकता या मनोरंजन का संतुलन है तो दर्शक स्वयं उसका प्रचारक बन जाता है लेकिन यदि फिल्म में सार की कमी है तो डिजिटल आलोचना उसे जल्दी उजागर कर देती है।

यह परिवर्तन सिनेमा के लिए सकारात्मक संकेत है। अब सफलता केवल विज्ञापन बजट से तय नहीं होती बल्कि दर्शकों की सामूहिक राय से निर्धारित होती है। कुल मिलाकर आज के दौर में माउथ पब्लिसिटी केवल प्रचार का ही माध्यम नहीं, फिल्म की असली परीक्षा बन चुकी है। दर्शक अब निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं, बल्कि सक्रिय समीक्षक हैं। उनकी राय ही फिल्म की दिशा तय करती है।

स्क्रीन से निकलकर मोबाइल स्क्रीन तक पहुंची यह चर्चा सिनेमा के लोकतंत्रीकरण का प्रतीक है। आने वाले समय में यह प्रवृत्ति और मजबूत होगी जहां हर दर्शक की आवाज फिल्म उद्योग के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण होगी जितनी किसी बड़े सितारे की मौजूदगी। यही है ‘माउथ पब्लिसिटी’ का नया युग जहां कहानी जीतती है और दर्शक उसकी गूंज को दूर तक पहुंचाते हैं।

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