एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण, महिला विकास को लेकर देश की मोदी सरकार लगातार दंभ भरती रही है तो वहीं कुछ क्षेत्रों में अभी भी महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। यह तब है जब फरवरी 2020 में 17 साल की कानूनी लड़ाई के बाद सेना में महिला अफसरों को स्थाई कमीशन देने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट दे चुका है। इसके बावजूद इंडियन कोस्ट गार्ड में महिलाओं को स्थाई कमीशन न देना सरकार की ‘नारी शक्ति मिशन’ की बात हवा-हवाई ही लगती है। जिस पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी कर कहा कि आप ‘नारी शक्ति’ की बात करते हैं तो इसे यहां दिखाए, आप इतने पितृसत्तात्मक क्यों हैं कि कोस्ट गार्ड में महिलाओं को नहीं देखना चाहते
पिछले कुछ वर्षों से देश की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने शासनकाल में विकास पर जोर देने के साथ-साथ महिला उत्थान पर भी बहुत ज्यादा ध्यान दिया है। सरकार ने 27 साल से भी ज्यादा इंतजार के बाद पहली बार महिला आरक्षण बिल लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पारित कराया। यहां तक कि सरकार ने महिलाओं को लेकर बनाई गई योजनाओं का नाम भी ऐसे रखा, जो सीट्टो महिलाओं के दिल को छू रही है। जैसा कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के जरिए महिलाओं को गैस सिलेंडर देना, जनट्टान योजना के तहत खाता खुलवाना, मुस्लिम महिलाओं को लेकर तीन तलाक को कानूनी रूप से खत्म करना जैसे विधेयक ने पीएम मोदी के कद को बढ़ाया है। लेकिन सरकार एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण, महिला विकास को लेकर लगातार दंभ भरती रही है वहीं कुछ क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ पुरुषवादी दृष्टि अपनाने को लेकर उच्चतम न्यायालय ने उसे फटकार लगाई है। उच्चतम न्यायालय ने इंडियन कोस्ट गार्ड (आईसीजी) में महिलाओं को स्थाई कमीशन न देने पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) विक्रमजीत बनर्जी को कहा कि आप ‘नारी शक्ति’ की बात करते हैं तो इसे यहां दिखाए , आप इतने पितृसत्तात्मक क्यों हैं कि कोस्ट गार्ड में महिलाओं को नहीं देखना चाहते।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एडमिरल आर हरि कुमार
असल में सेना के तीनों अंगों में महिला अधिकारीयों की स्थाई रूप से कमीशन ऑफिसर के तौर पर नियुक्ति होती है। लेकिन इस प्रकार की नियुक्ति कोस्टगार्ड यानी भारतीय तटरक्षक बल की महिलाओं की नहीं होती। इस संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमुर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने गत सप्ताह प्रियंका त्यागी नामक इंडियन कोस्ट गार्ड महिला अधिकारी की याचिका पर सुनवाई की। प्रियंका त्यागी कोस्ट गार्ड की उस पहले ऑल वुमेन क्रू की सदस्य हैं जिन्हें तटरक्षक बेड़े पर डोमियर विमानों की देख-रेख के लिए तैनात किया गया है। याचिकाकर्ता ने अपनी रिट में दस वर्षों की शॉर्ट सर्विस नियुक्ति को आधार बनाते हुए और बबीता पूनिया और एनी नागराज और अन्य बनाम भारत सरकार रक्षा मंत्रालय मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट से गुहार लगाई कि उनको भी कोस्ट गार्ड में परमानेंट कमीशन रैंक स्तर पर नियुक्ति दी जाए। इससे पहले यह याचिका दिल्ली के उच्च न्यायालय में दायर की गई थी जहां से याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं मिली।
कौन है प्रियंका त्यागी
प्रियंका त्यागी ने सहायक कमांडेंट के पद पर रहते लघु सेवा नियुक्ति अधिकारी के तौर पर आईसीजी में पायलट के रूप में अपने14 साल के कार्यकाल में, समुद्र में 300 से अधिक लोगों की जान बचाई, 4,500 घंटे उड़ान भरी- जो सशस्त्र बलों में पुरुषों और महिलाओं के बीच सबसे अधिक है। साल 2016 में, वह पूर्वी क्षेत्र में समुद्री गश्त करने के लिए डोनियर विमान पर पहली बार सभी महिला चालक दल का हिस्सा थीं। इन उपलब्धियों के बावजूद, उन्हें स्थाई कमीशन से वंचित कर दिया गया। सशस्त्र बलों के तीनों अंगों में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का हवाला देते हुए, उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसने न्यायिक निर्णय आने तक आईसीजी को उनकी सेवा जारी रखने का निर्देश देकर अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने के लिए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी।
उच्चतम न्यायालय द्वारा इस मामले में फैसला सुनाते हुए सरकार को निर्देश दिया गया है कि केंद्र सरकार जल्द से जल्द लिंग तटस्थ (जेंडर न्यूट्रल) पॉलिसी लाने पर विचार करे। न्यायालय ने भारतीय तटरक्षक बल (इंडियन कोस्ट गार्ड) में महिला अट्टिकारियों को स्थायी कमीशन नहीं देने पर तीखी टिप्पणियां करते हुए कहा कि जब सेना और नौसेना महिलाओं को स्थायी कमीशन दे रही हैं तो भारतीय तटरक्षक बल को इससे बाहर नहीं रखा जा सकता। इसके अलावा कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगते हुए कहा कि सरकार ‘नारी शक्ति’ और नारी सशक्तिकरण का नारा देती है, नारी शक्ति की बात भी करती है, इसे यहां भी तो दिखाएं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जब नौसेना में महिला कमीशन अधिकारी हैं तो कोस्ट गार्ड में ऐसा क्या खास है जो यहां नहीं है। महिलाओं के साथ सरकार द्वारा अपनाया जा रहा यह रवैया सरासर पितृसत्तात्मक मानसिकता से ग्रसित है। जब सेना और नौसेना महिलाओं को परमानेंट कमीशन दे रही हैं तो भारतीय तटरक्षक बल (कोस्ट गार्ड) इस नियम से कैसे बाहर जा सकते हैं। इसके अलावा न्यायट्टाश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यदि महिलाएं सीमाओं की रक्षा कर सकती हैं, तो वो तटीय क्षेत्रों की रक्षा भी कर सकती हैं, मुझे नहीं लगता कि कोस्ट गार्ड यह कह दें कि जब सेना, नौसेना ने यह सब कर लिया है तो वे इस जिम्मेदारी की सीमा से बाहर हो सकते हैं। सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय में केंद्र सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) विक्रमजीत बनर्जी ने पक्ष रखते हुए कहा कि आर्मी और नेवी की तुलना में कोस्ट गार्ड एक अलग डोमेन में काम करता है। जिसे सुनने के बाद न्यायलय द्वारा कहा गया कि ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक बबीता पुनिया फैसला पढ़ा नहीं गया है।
स्थाई कमीशन पाने का इतिहास
फरवरी 2020 में 17 साल की कानूनी लड़ाई के बाद सेना में महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन देने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। सेना में महिलाओं का प्रवेश इससे पहले तक शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) के माध्यम से होता था। वे अधिकतम 14 साल ही सेवा दे पाती थी। हालांकि, पुरुषों को परमानेंट कमीशन का विकल्प मिल रहा था। दूसरी ओर वायुसेना और नौसेना में महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन पहले से मिल रहा था। आर्मी में शॉर्ट सर्विस कमीशन में महिलाएं 14 साल तक सर्विस के बाद रिटायर हो जाती थीं। परमानेंट कमीशन लागू होने के बाद महिला अफसर आगे सर्विस जारी रख सकती हैं। वे सर्विस पूरी होने पर रैंक के हिसाब से ही रिटायर होंगी। इस केस के दौरान भी केंद्र सरकार द्वारा कहा गया था कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं की शारीरिक क्षमता कम होती है। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र की इस दलील को लिंग भेद और निराशाजनक बताया था। न्यायालय ने कहा था कि महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का अवसर मिलना चाहिए, सरकार का यह तर्क समानता की अवधारणा के खिलाफ है और इसमें लैंगिक पूर्वाग्रह की बू आती है।
क्या है स्थायी कमीशन
स्थायी कमीशन देने का मतलब है कि महिला सैन्य अधिकारी रिटायरमेंट की उम्र तक सेना में काम कर सकती हैं। हांलाकि वह चाहें तो इससे पहले भी नौकरी से इस्तीफा दे सकती हैं। शार्ट सर्विस कमीशन के तहत अब तक सेना में नौकरी कर रही महिला सैन्य अधिकारियों को अब स्थायी कमीशन चुनने का ऑप्शन दिया जाएगा। महिला अधिकारी स्थायी कमीशन के बाद पेंशन की भी हकदार हो जाएंगी।
शॉर्ट सर्विस कमीशन के नुकसान
शार्ट सर्विस कमीशन के द्वारा महिला अधिकारियों को सेना में 14 साल की नौकरी करने के बाद सबसे ज्यादा मुश्किल रोजगार मिलने की होती है। वहीं महिलाओं को पेंशन सुविधा भी नहीं मिलने के कारण इनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो जाता है। इसके अलावा भी कई सुविधाएं महिलाओं को नहीं मिलती हैं।
क्यों शुरू हुआ शॉर्ट सर्विस कमीशन
शार्ट सर्विस कमीशन शुरू करने का मुख्य मकसद अधिकारियों की कमी से जूझ रही सेना की सहायता करना था। इसके माट्टयम से सेना में बीच के स्तर पर अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है। गौरतलब है कि साल 2003 के दौरान सेना में स्थाई कमीशन पाने के लिए कुछ महिला अधिकारियों द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी। इस मामले को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने साल 2010 में महिला अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। हालांकि सरकार ने फैसले के खिलाफ जाकर उच्चतम न्यायालय में इसे चुनौती दी थी। लेकिन मार्च 2020 में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और भारतीय नौसेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का निर्देश दिया। इसके अलावा 7 जुलाई, 2020 को उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में केंद्र सरकार को न्यायालय के फैसले का पूर्ण रूप से अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये एक माह का अतिरिक्त समय दिया था।
साल 2020 में दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में उच्तम न्यायलय ने कहा था कि शार्ट सर्विस कमीशन के तहत महिला अधिकारी अपने पुरुष समकक्षों के समान स्थाई कमीशन की हकदार है। जिसके बाद केंद्र सरकार द्वारा भारतीय सेना में महिला अधिकारियों को ‘स्थाई कमीशन’ प्रदान करने के लिये औपचारिक मंजूरी पत्र जारी किए गए। उस दौरान न्यायलय ने कहा था कि सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन न दिया जाना संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत मिले समानता के अधिकारों का उल्लंघन होगा। न्यायालय अनुसार केवल लिंग के आधार पर महिला अधिकारियों की क्षमताओं में बाट्टा उत्पन्न करना न सिर्फ एक महिला के रूप में, बल्कि भारतीय सेना के एक सदस्य के रूप में भी उनकी गरिमा का अपमान है।
मौजूदा समय में जिन दस शाखाओं में महिला अधिकारीयों को स्थायी कमीशन दिया जा रहा है उनमें न्यायाधीश, महाधिवक्ता और सेना शिक्षा कोर के अतिरिक्त सेना की हवाई सुरक्षा, सिग्नल, इंजीनियर, सेना विमानन, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियर, सेना सेवा कोर भी शामिल हैं। सेना की तीनों सेवाओं (थल, वायु और नौसेना) में महिला अधिकारियों को चिकित्सा, शिक्षा, विधिक, सिग्नल, रसद और इंजीनियरिंग सहित चुने हुए क्षेत्रों में स्थाई कमीशन की अनुमति है। भारतीय वायु सेना में ‘एसएससी’ ‘महिला अधिकारियों को ‘फ्लाईंग ब्रांच’ को छोड़कर अन्य सभी विभागों में स्थाई कमीशन प्राप्त करने का विकल्प दिया गया है। नौसेना में महिलाओं के लिये रसद, नौसेना डिजाइनिंग, वायु यातायात नियंत्रण, इंजीनियरिंग और कानूनी जैसे विभागों में स्थाई कमीशन की अनुमति है।