
- श्वेता मासीवाल
सामाजिक कार्यकर्ता
बद्रीनाथ जी के दरबार में मेरा कई दफा जाना हुआ है। मैं जब यहां प्रथम बार गई थी मैंने शायद जीवन में पहली बार किसी दक्षिण भारतीय के दर्शन भी किए थे। इससे पहले तो पुस्तकों और टीवी में ही देखा था। तब माता जी ने बताया था कि राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधने का ऐसा अभिनव प्रयोग केवल शिव स्वरूप आदि शंकराचार्य ही कर सकते थे। हिमालय के मंदिरों में दक्षिण के पुजारी पूजन करने के लिए नियुक्त किए गए इसी प्रकार दक्षिण भारत के मंदिरों में उत्तर भारत के पुरोहित पूजन के लिए भेजे गए। अखंड भारत की अवधारणा को मूर्त रूप देने का कार्य आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया। इससे सुंदर कार्य ना पहले कभी हुआ ना आज होता नजर आ रहा है
‘उत्तराखण्ड एक आध्यात्मिक खोज’ में आज चलेंगे उस परम धाम की और जो कभी शिव परिवार का निवास स्थल हुआ करता था और फिर भगवान विष्णु ने बाल रूप से लीला कर इस स्थान को सदैव के लिए अपना धाम बना लिया था। बात कर रही हूं पावन तीर्थ बद्रीनाथ की। मान्यता है कि भगवान विष्णु एक बार ध्यान के लिए धरा पर एक स्थान खोज रहे थे और उन्हें ये स्थान बहुत पसंद आया पर वो अपने आराध्य से कैसे ये स्थान मांग सकते थे? तब उन्होंने अनूठी लीला रची। उन्होंने बाल रूप धारण कर मां पार्वती का ध्यान आकृष्ट किया और बाल विलाप करने लगे। भगवान शिव तो देखते ही नारायण को पहचान गए लेकिन मां पार्वती का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने पार्वती को कहा कि देवी ये बालक स्वयं चुप हो जाएगा परंतु मां पार्वती उन्हें भीतर ले आईं। बस मानो इसी क्षण की नारायण प्रतीक्षा कर रहे थे। भीतर जाते ही उन्होंने सांकल लगा दी। ये देख शिव मुस्कुराए और विष्णु भगवान को ये स्थान दे दिया। साथ ही ये उद्घोष भी किया कि वो बद्रीनाथ नाम से विशिष्ट रूप से पहचाने जाएंगे। शिव स्वयं कलयुग में भक्तों की रक्षा करने हेतु केदारनाथ में जा बसे। तब से ही ये स्थान भगवान विष्णु के परम धाम के रूप में स्थापित हो गया। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार बद्री यानी जामुन के पेड़ के कारण यहां का नाम बद्रीनाथ बना। भगवान विष्णु जब इस स्थान पर अपनी तपस्या में लीन थे तब बर्फबारी होने लगी। उस दौरान विष्णु को बचाने के लिए लक्ष्मी माता ने बद्री यानी जामुन के पेड़ का रूप लिया और उन्हें मौसम की मार से बचाया। जब विष्णु भगवान ने अपनी आंखें खोलीं तो उन्हें अहसास हुआ कि उनकी पत्नी खुद बर्फ में ढकी हुई हैं। तब नारायण ने यह वचन दिया कि इसी स्थान पर तुम्हारे साथ मेरी पूजा होगी। बद्री के पेड़ के रूप में लक्ष्मी ने विष्णु की सहायता की थी इसलिए इस जगह का नाम बद्रीनाथ पड़ा।
मान्यता है कि देवताओं के अनुरोध पर इस धाम का निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया था। बद्रीनाथ मंदिर में शालिग्राम से निर्मित विष्णु जी के लगभग एक मीटर ऊंचे विग्रह की आराधना करी जाती है। इस विग्रह का भी एक अद्भुत इतिहास है। इसे आदि गुरु शंकराचार्य ने अलकनंदा नदी की गहराइयों से निकाल कर सातवीं शताब्दी में स्थापित किया था।
मान्यता है कि ये मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी और छठी शताब्दी में पुजारियों ने इसे सुरक्षा की दृष्टि से अलकनंदा में प्रवाहित कर दिया था। धर्म की पुनर्स्थापना के लिए जब आदिगुरु शंकराचार्य ने हिमालय की यात्रा प्रारम्भ की, अनेकों मंदिरों का जीर्णोद्धार किया तब उसी क्रम में उन्होंने ध्यान साधना से जल में समाधिस्त इस विग्रह का पता लगाया और स्वयं पानी में उतर कर विग्रह को निकाल कर मंदिर में पुनर्स्थापित किया। चूंकि बद्रीनाथ धाम हिमालय की ऊंचाई में स्थित है इसलिए देवभूमि के अन्य धामों की तरह यहां भी कपाट जाड़ों में छह महीनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। कपाट बंद करने की तिथि विजयादशमी के दिन घोषित होती है। आमतौर पर अक्षय तृतीया पर पुनः कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खुलते हैं। शेष छह महीने पूजन का कार्य जोशीमठ स्थित नरसिंह देवता के मंदिर में होता है। केदारनाथ धाम की तरह ही यहां भी अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है। मंदिर के कपाट बंद होने पर भी दीप प्रज्वलित ही रहता है।
बद्रीनाथ जी के दरबार में मेरा कई दफा जाना हुआ है। यहां का प्रसाद भी कच्ची मूंगफली दाल और मीठी मिश्री का होता है और इसमें तुलसी दल अवश्य मिलता था। यहीं से सीखा था कि हरि प्रसाद में तुलसी दल अवश्य होना चाहिए। बद्री तुलसी जो इस क्षेत्र में बहुतायत में होती है, वो प्रसाद को सुवासित रखती है। आज तक मैं यह नहीं समझ पाई कि हमारे घरों में तो जाड़ों के मौसम में तुलसी की देख रेख इतनी कठिन हो जाती है, न जाने कैसे इस क्षेत्र में इतनी ठंड में भी तुलसी इतनी बड़ी मात्रा में हो जाती है।
अब तो खैर कलयुग में नए दौर के सनातनी भी आए हैं जो क्रिसमस के दिन तुलसी दिवस मनाते हैं। हिंदू त्योहारों के पीछे विज्ञान अवश्य होता है। ये तुलसी दिवस तो बलात्कार के आरोप में सजा काट रहे आसाराम बापू ने शुरू किया था। न तो वेदों में ना पुराणों में ऐसे किसी दिवस का विवरण मिलता है। हिंदू त्योहार पंचांग के हिसाब से होते हैं आंग्ल कैलेंडर से नहीं। और इतनी ठंड में तुलसी रोपने से नहीं पनपेगी। देव उठावनी एकादशी पर तुलसी मां को चुन्नी उड़ा दी जाती है। सम्भवत आने वाले शीतकाल के लिए तुलसी मां को संरक्षित रखने का यही सही तरीका है।
चलिए, वापस चलते हैं पौराणिक महत्व वाले दिव्य स्थान बद्रीनाथ जी की तरफ। जो भी यहां गया है इस बात को मानेगा कि ये स्थान एकदम जागृत है। मुख्य द्वार को सिंह द्वार कहा जाता है। जहां जहां देवभूमि को सांस्कृतिक रूप से रिप्रेजेंट करने की बात आती है, इसी मंदिर के मुख्य द्वार का मुखौटा लगाया जाता है। सूरजकुंड मेले से लेकर छब्बीस जनवरी के परेड तक में आप सिंहद्वार के दर्शन कर सकते हैं। लोनावाला में गगन गिरी महाराज जी के आश्रम से कुछ दूरी पर स्थित एक मंदिर के मुख्य द्वार को भी इसी तर्ज पर बनाया गया है। शैली कुछ कुछ दक्षिण भारतीय तर्ज पर है। नीचे कल कल बहती हैं अलकनंदा जो गंगा कि सहायक नदी है। यहां निरंतर ही भागवत पाठ चलते रहते हैं और सच में जिस किसी ने भी इस धाम में किसी कुशल वाचक की कथा का श्रवण किया होगा उन्हें ये अनुभूति अवश्य हुई होगी कि मानो किसी और ही युग में पहुंच कर साक्षात नारायण के सम्मुख बैठकर कथा का श्रवण कर रहे हैं।
चलिए, वापस चलते हैं पौराणिक महत्व वाले दिव्य स्थान बद्रीनाथ जी की तरफ। जो भी यहां गया है इस बात को मानेगा कि ये स्थान एकदम जागृत है। मुख्य द्वार को सिंह द्वार कहा जाता है। जहां जहां देवभूमि को सांस्कृतिक रूप से रिप्रेजेंट करने की बात आती है, इसी मंदिर के मुख्य द्वार का मुखौटा लगाया जाता है। सूरजकुंड मेले से लेकर छब्बीस जनवरी के परेड तक में आप सिंहद्वार के दर्शन कर सकते हैं। लोनावाला में गगन गिरी महाराज जी के आश्रम से कुछ दूरी पर स्थित एक मंदिर के मुख्य द्वार को भी इसी तर्ज पर बनाया गया है। शैली कुछ कुछ दक्षिण भारतीय तर्ज पर है। नीचे कल कल बहती हैं अलकनंदा जो गंगा कि सहायक नदी है। यहां निरंतर ही भागवत पाठ चलते रहते हैं और सच में जिस किसी ने भी इस धाम में किसी कुशल वाचक की कथा का श्रवण किया होगा उन्हें ये अनुभूति अवश्य हुई होगी कि मानो किसी और ही युग में पहुंच कर साक्षात नारायण के सम्मुख बैठकर कथा का श्रवण कर रहे हैं।
रात्रि विश्राम के दौरान इस किवदंति की तरफ भी ध्यान चला ही जाता है कि जब नर और नारायण पर्वत मिल जाएंगे तब ये धाम मनुष्यों की पहुंच से दूर हो जाएगा। ये सोच कर थोड़ा तो भय लगता है था कि हमारे वापस लौटने से पहले ही ये पर्वत मिल गए तो? ये उम्र संवत शायद सांसारिक माया ही थी जो श्री हरि के चरणों में भी इसी भय में थी कि वापस दुनिया में ना लौट पाए तो? आज सोचती हूं तो फिर स्मरण आता है कितनी गौण है हमारी पीढ़ी की भक्ति। जब कुछ साल पहले जोशीमठ में जमीन दरक रही थी फिर वही याद आ रहा था नर नारायण पर्वत शायद मिल हीं जाएं। कलयुग के आगे बढ़ते ही संकेत भी मिलने लगे हैं।
नर-नारायण नामक जुड़वा संत भगवान विष्णु का ही अवतार माने जाते हैं। भागवत पुराण में इनका उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार ये बद्रीनाथ में ही निवास करते हैं। पृथ्वी पर धर्म के प्रचार प्रसार का सारा श्रेय इन्हीं को जाता है। आज भी नर-नारायण पर्वतों को देखकर यही भान होता है कि वो एक घोर साधना में रत हैं। मान्यताओं के अनुसार जिस दिन ये मिल जाएंगे बद्रीनाथ जी का पूजन भविष्य बद्री में प्रारम्भ हो जाएगा। पर्यावरण प्रेमी होने के नाते मैं प्रकृति में ही ईश्वर को देखती हूं और मुझे कुछ यूं लगता है कि मानव प्रकृति के साथ जो खेल कर रहा है ईश्वर कुछ दिव्य स्थानों को मनुष्य के लिए अप्राप्य बना देंगे। जहां साक्षात् विष्णु ध्यान मुद्रा में विराजे हांे वहां मानव का शोर निरंतर बढ़ता जा ही रहा है। ये भी आस्था के साथ खिलवाड़ ही है। औली में जब बर्फ के मैदान में मनुष्य ने अपने लिए मनोरंजन के साधन जुटाए उस पर भी बहुत से पर्यावरणविदों ने चिंता जाहिर करी थी। नतीजा सबके सामने है अब वहां इतनी बर्फ ही नहीं पड़ती।
मैं जब यहां प्रथम बार गई थी मैंने शायद जीवन में पहली बार किसी दक्षिण भारतीय के दर्शन भी किए थे। इस से पहले तो पुस्तकों और टीवी में ही देखा था। तब माता जी ने बताया था कि राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधने का ऐसा अभिनव प्रयोग केवल शिव स्वरूप आदि शंकराचार्य ही कर सकते थे। हिमालय के मंदिरों में दक्षिण के पुजारी पूजन करने के लिए नियुक्त किए गए इसी प्रकार दक्षिण भारत के मंदिरों में उत्तर भारत के पुरोहित पूजन के लिए भेजे गए। अखंड भारत की अवधारणा को मूर्त रूप देने का कार्य आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया। इससे सुंदर कार्य ना पहले कभी हुआ ना आज होता नजर आ रहा है।
मरून वस्त्र में मोटी रुद्राक्ष माला धारण किए नंबूदरी रावल जब यहां अर्चना करते हैं तो अनोखा ही नजारा होता है। लेकिन बद्रीनाथ के रावल को कपाट बंद करने के लिए एक स्त्री का रूप धरना पड़ता है। शुरुआत देव के श्रृंगार से होती है। फूलों से देव को सजाने के बाद पूजा की विधि शुरू होती है। कपाट बंद होने की प्रक्रिया से पहले कुछ अनुष्ठान करने जरूरी हैं। यही अनुष्ठान कहलाते हैं पंच पूजा। जिसमें मंत्रों के जाप के साथ ही मंदिर की मूर्तियों को गर्भ गृह में रखा जाता है। यहां के पुजारी इस पंच पूजा के लिए कई दिनों तक तैयारियां करते हैं। पूजा में जिस तरह की सामग्री का प्रयोग होता है उन्हें भी पुजारी ही इकट्ठा करते हैं।
बद्रीनाथ का रावल यानी वहां का मुख्य पुजारी। यहां शिव पूजा के लिए केरल के नंबूदरी ब्राह्मणों को ही चुना जाता है। फिलहाल यह पदवी ईश्वर प्रसाद नंबूदिरी को प्राप्त है। बद्रीनाथ धाम में एक साथ कई मंदिर मौजूद हैं। इसमें से एक है लक्ष्मी जी का मंदिर। बद्रीनाथ धाम में लक्ष्मी जी का मंदिर बाहर की तरफ है। यहां हिंदू धर्म के हिसाब से पराई स्त्री को ना छूने की परंपरा को निभाया जाता है। मूर्ति को उठाना मुख्य पुजारी को ही है और इसलिए रावल जी को लक्ष्मी की सखी पार्वती का रूप धरकर लक्ष्मी मंदिर में प्रवेश करना होता है। सुब्बुलक्ष्मी जी के विष्णु सहस्त्रनाम का श्रवण भी मैंने सबसे पहले यहीं किया था और जब पहली बार दक्षिण की यात्रा गई और सुबह-सुबह वहां पुनः यहीं सुना तो लगा बद्रीनाथ जी ही पहुंच गई। यही सनातन मान्यताओं की सुंदरता है। संकीर्णताओं से परे अखंड भारत को अपने भीतर समाविष्ट करे हुए। जोशीमठ पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी मुझे बहुत सुहाते हैं। संतों की भीड़ में जोशीमठ में हुए दरकती चट्टानों पर मुखरता से जो स्वर सुना था उन्हीं का था। इसके अलावा इस स्थान पर भारत के अंतिम गांव माणा को देखने का भी अपना रोमांच है। एक पर्वतीय होने के नाते हमेशा लगा कि आखिरी नहीं पहला गांव होना चाहिए प्रसन्नता है आज सरकार ने इसे प्रथम गांव की मान्यता दे दी है।
यहां मौजूद भीमपुल भी अजूबा है। दो विशाल पर्वतों के बीच टिकी हुई एक विशाल शिला। कहते हैं भीम ने इस शिला को यहां रखा था। यहीं से पांडव स्वर्गारोहण के लिए चले गए थे। शिला पर उंगलियों के निशान भी है। मुझे तो उस शिला को नीचे देखने पर चक्कर आ गए थे। नीचे गहरी खाई है और अलकनंदा की धवल धारा देखकर लगता ही नहीं हम इसी धरती पर विचर रहे हैं। दुखद संयोग है कि आज जब लिख रही हूं तब फिर से हिमालय एवलांच ने इस क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है।
हो सकता है मेरी सोच बहुत अल्प हो, पर जोशीमठ को तो मलबे पर ही बसा हुआ कहते हैं। तो ऐसे स्थानों पर चट्टानों पर विस्फोट कर कौन-सा विकास तलाश रही है सरकार? कर्णप्रयाग तक ट्रेन ले जाने की बात भी सरकार और जनता करती रही है। क्या हम हिमालय की संरचना से और अपनी पौराणिक मान्यताओं से इतना दूर आ चुके हैं?
हम ऐसे दिव्य देवकृत देवालयों की तुलना मानवकृत मंदिरों से कर मनमाने तरीके से वहां विकास का नक्शा तैयार करने लगते है। क्या ये वाकई कलयुग का ऐसा चरण है जहां युग का प्रभाव सरकार और धर्म गुरुओं पर भी है? पता नहीं इस दिशा में चिंतन क्यों नहीं होता है या शायद भगवान नरसिंह की बाजू एक दिन टूट कर गिर जाएगी और नर-नारायण मिल ही जाएंगे और बद्रीनाथ मानव के लिए इतिहास की स्मृति मात्र ही बन कर रह जाएगा। जिस प्रकार सब खामोश है मैं भी साक्षी भाव से देखते हुए यही सोचती हूं:
‘होई विधि वही
जो राम रची राखा!’
साम्ब सदाशिव!
(लेखिका रेडियों प्रजे़न्टर, एड फिल्म मेकर तथा वत्सल सुदीप फाउंडेशन की सचिव हैं)

