उत्तराखंड में कांग्रेस लम्बे समय से सत्ता से बाहर है, आपके नेतृत्व में संगठन को पुनर्जीवित करने की क्या ठोस रणनीति है?
सवाल मेरी लीडरशिप का नहीं है। नेतृत्व राज्य के लोग हैं, हमारी पार्टी है, हमारी लीडरशिप है, हमारे कांग्रेसजन हैं, हमारे आम कार्यकर्ता हैं। आपने देखा है कि पहले भी भाजपा ने किस तरह हथकंडे अपनाए लेकिन अब आम लोग भी तैयार हैं, कांग्रेसजन भी तैयार हैं और भाजपा के लोग जो भी रणनीति अपनाएंगे उसका सामना करते हुए हम राज्य में जीत हासिल करेंगे।
जब हम कोई चुनाव हारते हैं तो उस पर मंथन करते हैं, उसकी समीक्षा भी होती है, आंतरिक तौर पर हम देखते हैं कि क्या कमी रही, उसको दुरुस्त किया जाता है। हम संगठन को पूरी मजबूती के साथ आगे ले जा रहे हैं। आने वाले दिनों में हमारा संगठन और मजबूत होगा और 2027 के विधानसभा चुनाव में पूरी तरह से जमीनी स्तर पर हम अपने संगठन को मजबूत करते हुए यह लड़ाई लड़ेंगे।
देखिए सबके अपने-अपने ‘एम्बीशन’ होते हैं। यह हर संगठन का हिस्सा होता है और हर पार्टी में होता है। आप भाजपा में देखें या किसी अन्य दल में देखें, वहां भी आप ऐसा ही पाएंगे। हर राजनीतिक दल में कुछ लेवल तक ये चीज चलती हैं। ऐसी कोई बात नहीं है जिससे ज्यादा नुकसान हो। अगर थोड़ा बहुत हमें लगता है तो उसको दुरुस्त किया जाता है लेकिन सब लोगों ने मन बनाया हुआ है कि अगली सरकार हम बनाएंगे। मिलजुल कर बैठकर सब लोग इस रणनीति का हिस्सा होते हुए आगे कार्य करते रहेंगे।
ऐसी स्थिति पर हर राजनीतिक दल परिस्थिति के अनुसार काम करता है।
ऐसा मुझे कुछ विशेष नजर आया नहीं कि कोऑर्डिनेशन की कोई कमी है। हम अभी जैसे-जैसे पार्टी के प्रोग्राम बनाते रहेंगे सभी लोग उसमें मिलजुल कर कार्य करते रहेंगे।
नहीं, इस तरह की कोई बात नहीं है। बात यह है कि अभी बहुत से लोग हैं जो पार्टी ज्वाइन करना चाह रहे हैं। हम एकदम नहीं बल्कि बारी-बारी से इस पर विचार करके सबके साथ आपस में राय मशविरा करके फैसले लेते रहेंगे। अभी तो बहुत लम्बा रास्ता है चुनाव तक। बहुत से लोगों को ज्वाइन करना है। हमारे साथ बातचीत चल रही है और समय-समय पर हम लोगों को ज्वाइन कराते रहेंगे। चुनाव से पहले तक ये सिलसिला चलता रहेगा।
देखिए यह भावना थोड़ी-बहुत स्वाभाविक तौर पर होती है लेकिन यह हमारा काम है, पार्टी का काम है कि सबको ‘कम्फर्टेबल’ करें और जो पुराने लोग हैं उनकी मेहनत को और उनकी पहचान बरकरार रखी जाए, उनका मानसम्मान बरकरार रखा जाए।
देखिए ऐसा नहीं है। हम दोनों चीजों को देखते हुए काम कर रहे हैं, जमीन से जुड़ा होना चाहिए और जिसका लोगों से जुड़ाव हो, पार्टी के प्रति भी उसका जुड़ाव हो।
हरीश रावत हमारे वरिष्ठ नेता हैं। संगठन में तो उन्हें हमेशा जगह मिलती रहती है, मिली भी है। उनको पूरी इज्जत हमेशा मिलती रही है। वह ‘कांग्रेस वर्किंग कमेटी’ (सीडब्लूसी) जो कांग्रेस की सबसे ऊंची समिति है, उस समिति के मेम्बर हैं। पहले से ही पूरी स्टेट में उनका बहुत योगदान रहा है। ऐसी कोई बात नहीं है। सब को साथ लेकर चलेंगे।
देखिए रूठना-मनाना जैसी कोई चीज है नहीं। सब पार्टी का हिस्सा हैं।
जब इस तरह की कोई स्थिति है ही नहीं तो इस प्रकार की चर्चा गैर जरूरी है।
हम सभी लोग आला लीडरशिप, स्टेट लीडरशिप और नीचे जमीन तक हमारे कार्यकर्ताओं को कार्य दिया गया है। कार्य होते रहेंगे। हमारे इस अभियान में सभी ने जुड़कर, मिलकर कर पहले से भी काम किया है और जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, जैसा आपने कहा एक रणनीति के तहत काम करेंगे। असली बात तो यह है कि भाजपा ने जो गलतियां की हैं जो भाजपा की नीतियां हैं, उनकी सरकार की जो गलत नीतियां हैं, वो जनता के सामने आ चुकी हैं, इनको जनता समझ चुकी है। लोग भी अब इनसे ऊब चुके हैं। उनके हर तरह के वादे न केवल खोखले साबित हुए बल्कि सरकार को जो डिलीवरी करनी चाहिए थी, शासन प्रशासन जिस प्रकार चलना चाहिए था, वो ये नहीं कर पा रहे हैं। आप क्राइम को ही देख लीजिए, कितना क्राइम बढ़ गया है। उत्तराखण्ड के बड़े-बड़े शहरों से लेकर छोटी से छोटी जगह तक ऐसा लगता है कि इस स्टेट को एक ऐसा संरक्षण स्थल बना दिया है कि देशभर के जो भी क्रिमिनल लोग हैं, वो यहां आएं और अपना काम धंधा चलाएं। सवाल है कि ऐसी स्थिति आखिर बनी ही क्यों? महिलाओं की आप बात करें तो महिलाओं की सुरक्षा के मामले में देश भर में उत्तराखण्ड का नाम बदनाम क्यों हुआ? महिलाओं पर अत्याचार के मामले में अंकिता भंडारी वाला प्रकरण देख लीजिए। मैं हमेशा कहती हूं कि यह केवल अंकिता भंडारी की बात नहीं है, पूरे उत्तराखण्ड में हो रहा है, दलितों के साथ हो रहा है, बच्चियों के साथ हो रहा है, उसका जवाब सरकार को देना होगा कि यहां पर ‘लाॅ एंड आर्डर’ की इतनी जर्जर स्थिति क्यों है? फिर बड़ा माफिया जिसका हर जगह बोलबाला चल रहा है। आप सुबह वाॅक पर निडर होकर जा सकते हैं क्या? आम नागरिक सुबह-सुबह जब घर से निकलता है तो सोचता है कि मैं सुरक्षित वापस आ जाऊंगा? इसका उदाहरण आपने देख लिया एक रिटायर ब्रिगेडियर के साथ जो हुआ। तो मैं मानती हूं कि ये सरकार टोटल नाकाम रही है।
फिलहाल तो सामूहिक लीडरशिप तरीके पर हम काम कर रहे हैं।
हम अपनी पार्टी को पूरी तरह से सक्षम रखते हुए पूरी मजबूती से चुनाव लड़ेंगे। आज के दिन हमारे सामने ऐसा कोई प्रश्न नहीं है।
देखिए हमारा संगठन भी मजबूत है और हमारे यहां नेतृत्व भी मजबूत है। तो दोनों के समन्वय के साथ आगे बढ़ रहे हैं। नेतृत्व भी चाहिए और संगठन भी चाहिए। इंस्पिरेशन तो चाहिए ना लोगों, प्रेरणा तो चाहिए ना। दोनों चीजों के समन्वय से ही काम चलता है।
जब कभी ऐसी स्थिति आती है तो पार्टी उस पर विचार करती है। इसमें सब मिल बैठकर विचार करते हैं लेकिन आज के दिन हमको ऐसी स्थिति दिख नहीं रही है।